पत्थर से प्यास बुझाने की कोशिश है कामवासना || आचार्य प्रशांत (2019)

प्र: आचार्य जी, बहुत डिप्रेशन (अवसाद) में रहता हूँ, बहुत। अत्यधिक डिप्रेशन में रहता हूँ। अपने काम को लेकर के बहुत तनाव में रहता हूँ। जैसे दुकान है, दुकान पर दिनभर झूठ बोलना पड़ता है। दिनभर जो काम करता हूँ, उसमें मतलब बहुत तकलीफ़ है। और दुकान में मन ही नहीं लगता मेरा।
कस्टूमर (ग्राहक) आते हैं, कभी-कभी वापस कर देता हूँ। और आपको ही सुनता रहता हूँ, सुनता रहता हूँ। तीन-तीन, चार-चार घंटे बीत जाते हैं। मेरा सिर दर्द करने लगता है, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। सुनता रहता हूँ। तो ये चीज़, मतलब भीतर बहुत छटपटाहट है, आचार्य जी। कैसी है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ क्या है।
आचार्य: किस बात की छटपटाहट है?
प्र: सत्य चाहिए। प्रेम नहीं है। प्रेम नहीं है जीवन में। जीवन में बोध नहीं है। जीवन में मुक्ति नहीं है। यही छटपटाहट है आचार्य जी।
आचार्य: वो क्या है जो चाहिए?
प्र: सत्य। प्रेम चाहिए, मुक्ति चाहिए।
आचार्य: अच्छा, इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करना हो तो क्या चाहिए? प्रेम या मुक्ति?



