
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी कहिए।
प्रश्नकर्ता: तो सवाल तो ये है कि सत्य के रास्ते पर वो एक खूंटा कौन-सा है, जो हम हर वक़्त जब हम रास्ते से भटक जाएँ, तो उसे लाकर लगा सकते हैं? जैसे अभी-अभी रमज़ान ख़त्म हुआ। तो हमारे रमज़ान में जो एक रात की नमाज़ होती है, बड़ी लंबी नमाज़ होती है वो, तो वो पढ़ने लोग जाते हैं। तो इस बार मैं भी चली और उसका एकमात्र वजह था — गिल्ट बेसिकली। बिकॉज़ जो गिल्ट है नमाज़ छोड़ने का, आपको सौ खून माफ़ हैं, स्कॉलर्स कहते हैं। पर नमाज़ छोड़ दिया, तो वो माने, वो गुनाह आपका माफ़ नहीं है। आप मार दो, काट दो, रेप कर लो जो करना है उसकी माफ़ी हो जाएगी। पर आपने नमाज़ छोड़ दी।
बट फिर जब जैसे वेदांत और सेल्फ नॉलेज का जो आया, तो मैं अपने आप को ऑब्ज़र्व करने लगी। और यही बात मैं अपने दोस्त से भी कह रही थी कि, "तुम अगर जा रही हो तो जस्ट ऑब्ज़र्व योरसेल्फ। अपने आप को दृष्टा की उससे देखो।"
बट सम पीपल, ज़्यादातर लोग आर जस्ट गोइंग आउट ऑफ़ ऑब्लिगेशन, कि ये फ़र्ज़ है, अगर ये छूट गया तो ख़त्म, माने हम जहन्नुम में डाले जाएँगे। तो मेरे लिए तो सलाह के बाद फिर मेडिटेशन आया, ध्यान में बैठना। तो उस पर भी मैंने कनेक्शन करने की कोशिश करी। पर उस वक़्त मुझे आपका ज्ञान नहीं आया था, तो मेरे लिए अल्लाह अभी भी बाहर था मेरे। तो मैं बाहर से कनेक्ट करने की सोचती थी, कि बाहर से मेरे अंदर कोई दिव्य शक्ति आ रही है उससे मैं कनेक्शन कर रही हूँ।
तो ख़ैर, अब तो मैं काफ़ी आगे निकल गई हूँ। और अब मुझे समझ में आ गया है कि अल्लाह से कनेक्ट कैसे करना है। पर ये जो लोग कुछ स्ट्रगल कर रहे हैं और ये सवालात कर भी रहे हैं, और उनको समझ में नहीं आ रहा कि नमाज़ और ये कनेक्शन कैसे हम करें। उस गिल्ट से कैसे बाहर आएँ, ये बड़ा एक ट्रैप जैसा है। तो वो एकमात्र खूंटा क्या हो सकता है इस सत्य के रास्ते पर?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जितनी भी विधियाँ दी जाती हैं, वो जो हम कचरा इकट्ठा कर लेते हैं दिमाग़ में न, उसको साफ़ करने की विधियाँ हैं। सत्य को पाने की तो कोई विधि आज तक बनी नहीं। और विधि बनाने की कोई ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि वो चीज़ पाने की है भी नहीं।
पाने निकलेंगे, तो पानी में मीन प्यासी हो जाएगी। अब क्या पाने निकल रहे हो? जो आपका ही केंद्र है, आपका ही सार है, आपका ही एसेंस है, उसको पाने क्या निकल रहे हो? ये ऐसी बात है जैसे पानी गंदा हो गया है। इसमें आप जानते हैं न, ये सब सीओडी, बीओडी नापा जाता है और इनसे पता चलता है कि कितना उसमें प्रदूषण है, पानी में। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड और ये सब।
तो पानी में भी अगर हमारी तरह चेतना हो, वहाँ भी कोई अहंकार हो तो वो बोले, "गड़बड़ ये है कि हाइड्रोजन की या ऑक्सीजन की, या H₂O की ही कमी हो गई है।" गंदा है, इसका मतलब ये थोड़ी है कि कमी हो गई है। गंदा है, इसका क्या मतलब है? कुछ अतिरिक्त आ गया है।
तो सारी विधियाँ जो होती हैं धर्म के क्षेत्र में, वो सब जो अतिरिक्त आ गया है उसको हटाने की विधियाँ होती हैं। पानी साफ़ करने के लिए आप उसमें हाइड्रोजन-ऑक्सीजन थोड़ी मारते हो। ऐसा करते हो? पानी साफ़ करने के लिए क्या करते हो? जो बाहरी तत्व हैं, उसको हटाने का कुछ प्रबंध करते हो। बहुत तरीक़े हो सकते हैं उसके, छानने से लेकर, उसमें कोई ऐसा केमिकल डाल देना जो गंदगी को काट-कूट देगा, नीचे उसको प्रेसिपिटेट कर देगा। कुछ भी, ये एक विधि है।
और चूँकि ज़्यादातर लोग भीतर से इतने छितराए होते हैं कि उनको मौका मिला नहीं, कि अहंकार जाकर के दुनिया के तमाम विषयों से रिश्ता बनाना शुरू कर देता है, और वहाँ पर एक झूठी खोज शुरू कर देता है। तो इसीलिए दुनिया में जितनी धार्मिक धाराएँ रही हैं, सब में कुछ अनुशासन बाँधा गया है, एक अलग-अलग तरीक़े से। पर उन सब तरीक़ों के पीछे आप देखें तो कुछ पद्धति दिखेगी, और पद्धति का मतलब ही होता है, अनुशासन।
अनुशासन बाँधा गया है कि, "यार, तुम इतने यहाँ से छितराए आदमी हो कि दिन में पाँच बार बैठो, अपने सारे काम-धंधे छोड़ के। कुछ पाने के लिए नहीं, छोड़ने के लिए।" अब मस्जिद कह रही है, मस्जिद वास्तव में क्या होती है? खाली स्थान होती है। मस्जिद में तो कुछ भी नहीं होता। अगर गिरजाघर वग़ैरह जाएँ, तो वहाँ भी कुछ होता है। मंदिरों में जाएँ तो वहाँ मूर्ति होती है। पर मस्जिद तो पूरी ही खाली होती है। वहाँ कुछ ऐसा है, जो नहीं है। क्या नहीं है? दुनिया नहीं है।
वो जो दुनियादार लोग हैं, संसारी, सब इनको बुलाया जाता है, पाँच बार आओ और दुनिया को पीछे छोड़ के आओ। जितना प्रबंध करा जा सकता था, करा गया कि दुनिया को बाहर से पीछे छोड़ दो। ये दुकान से उठ के आ गए, घर से उठ के आ गए, जो भी कर रहे थे छोड़-छाड़ के थोड़ी देर को आ जाओ। बाहर से छोड़ के आ गए। कहाँ नहीं छोड़ के आए? सारी दुनिया आप खोपड़ी में ही ले आए हो, तो कोई क्या करेगा फिर? तो वहाँ पर फिर माया के सामने सारी जो पद्धतियाँ हैं, वो विफल हो जाती हैं।
आपसे बाहर से दुनिया छुड़वाई जा सकती है, पर उस दुनिया का क्या करें जो आप अपने भीतर लेकर घूम रहे हो? उसको लेकर के आप मस्जिद जा सकते हो, चर्च जा सकते हो, मंदिर जा सकते हो। और कुछ मिनटों, कुछ पलों की बात नहीं है। आप हज कर सकते हो, जिसमें हफ़्तों लगता हो। आप बड़ी-बड़ी ऊँची-ऊँची, जैसे पुराने समय में तीर्थ यात्राएँ होती थीं पैदल करी जाती थीं, आप वो सब भी कर सकते हो।
विशेषकर हिन्दुओं ने तो अपने तीर्थ बड़ी दुर्गम जगहों पर बसाए, वहाँ ऊपर पहाड़, नाले की चोटी पर। और पहले हेलीकॉप्टर तो था नहीं कि सीधे केदारनाथ उतार देगा। ये सब था कि लंबे समय के लिए तुम्हें दुनिया से दूर कर दिया जाए। ऐसा नहीं कि वहाँ पहाड़ की चोटी पर कुछ ख़ास मिल जाएगा। मिलने की बात ही नहीं है।
श्रोता: छोड़ने की।
आचार्य प्रशांत: छोड़ने की बात है। दुनिया पीछे छोड़ के आओ। और ये तुम्हारे मोहल्ले का मंदिर नहीं है। बहुत ऊपर तक जाना पड़ेगा और बहुत समय लगेगा, ताकि उतने समय तक दुनिया से तुम्हारा कुछ तो मोह छूटे। और आदमी तुम इंद्रियों के हो, दुनिया तुम में घुसी भी कैसे थी? इंद्रियों से। तो इंद्रियों को जब कुछ दिनों तक दुनिया की खुराक नहीं मिलेगी, तो दुनिया तुमसे कुछ छूटेगी भी। ठीक है?
ये उम्मीद रखी गई थी, ये व्यवस्थाएँ बनाई गईं। संडे छुट्टी होती है हिन्दुस्तान में। संडे पता है क्यों छुट्टी होती है? संडे पूरा ही खाली कर दिया गया। ये अंग्रेज़ों का, माने ईसाइयों का काम था। उन्होंने रविवार पूरा ही खाली कर दिया, उन्होंने कहा कोई काम होना ही नहीं है, सब बंद रहेगा। क्यों खाली किया था? इस दिन चर्च जाना होता है।
प्रश्नकर्ता: संडे मास।
आचार्य प्रशांत: संडे मास। उन्होंने ये भी नहीं करा कि चर्च जा के दोबारा जाकर अपनी दुकान पर बैठ जाओ। बोले सब बंद करो। क्योंकि कहीं न कहीं हमें एहसास तो होता है कि हम बड़े गड़बड़ लोग हैं, और हम मौका तलाशते रहते हैं वही अपनी नालायकियों में जल्दी-जल्दी उतरने का।
तो उसके लिए किसी ने ये कर दिया कि बहुत दुर्गम जगहों पर तीर्थ बसा दिए। किसी ने एक पूरा दिन ही हफ़्ते का खाली छोड़ दिया कि इस दिन कोई काम नहीं होगा, बस गॉड, गॉड की कहानी सुनो, गॉड का चिंतन करो, गॉड के घर में जाओ। और कहीं भी पाँच वक़्त की नमाज़ का प्रावधान कर दिया गया। ये सब कर दिया गया। पर कुछ भी कर दो, माया तो माया है।
तो एक जैन मास्टर से उनके एक शिष्य ने पूछा, कि वहाँ जापान की जो सबसे ऊँची चोटी थी।
जैन माने ध्यान, ध्यान माने शांति।
तो शिष्य पूछता है मास्टर से, गुरु से, “विल आई फाइंड ज़ेन ऑन दैट पीक?”* उसका भी यही था कि, “मैं जा रहा हूँ, ये दुनिया को छोड़-छाड़ के पहाड़ पर चढ़ जाऊँगा, वहाँ चोटी पर।” जैन मास्टर ने जवाब दिया, “ओनली ऐज़ मच ऐज़ यू कैरी विद यॉरसेल्फ।” जितना तू अपने साथ ले के जाएगा चोटी पर, उतना ही मिलेगा तुझे।” चोटी पर कुछ नहीं है। तेरे ऊपर है, तेरी चीज़ है भाई।
दुनिया एक सामग्री ही तो है ना। आप पहाड़ की चोटी पर जाते हो, वहाँ आपके पास कितना पानी होता है? जितना आप ले के गए होते हो। कितने कपड़े होते हैं? जितने आप ले के गए होते हो। वैसे ही दुनिया भी आपकी चीज़ है पानी की तरह, कपड़े की तरह। पानी, कपड़ा स्थूल है, वो बाहर पता चल जाता है — ये रही बोतल, ये रहा कपड़ा। और दुनिया, सूक्ष्म है पर वो भी हमारी एक चीज़ है, सामग्री है। उसको हम यहाँ (मस्तिष्क) इस चीज़ में, इस डब्बे (मस्तिष्क) में रख के अपने साथ चलते हैं।
मास्टर ने कहा, कि “वहाँ तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। तुम अगर दुनिया को ही अपने साथ ले के जा रहे हो, तो वहाँ तुम्हें दुनिया मिलेगी। और तुम अपने साथ ध्यान को ले के जा रहे हो, तो तुम्हें वहाँ जैन मिलेगा।”
“जैन” शब्द ही ध्यान से आया है। ध्यान वहीं जाकर ज़ेन बन गया। समझ रहे हैं बात को?
तो सबसे पहले तो जो भी पुरानी प्रथाएँ वग़ैरह हैं ना, उनमें से कुछ तो ऐसी हैं जो एकदम ही किसी आधार से निकली ही नहीं हैं। बिल्ली रास्ता काट गई, ये हो गया वो। बहुत सारी बातें दही-शक्कर, ये-वो, नालायकियाँ, समझ रहे हो? फलाँनी जगह जाकर के धागा बाँध दो, ये करो, वो करो। या बहुत तरह के जादू-टोना, भूत-प्रेत। या बहुत सारे तो ऐसे हैं कि जिनका कहीं किसी तरीक़े का कोई तार्किक आधार है ही नहीं।
पर जो धर्म के साथ मूल प्रक्रियाएँ जुड़ी हुई हैं, जो मौलिक कर्मकांड हैं, उसके प्रति थोड़ी सी सहानुभूति रखनी चाहिए। क्योंकि वो विधियाँ विकसित करी गई थीं, सब झुन्नु लोगों को थोड़ा-सा अनुशासित रखने के लिए। वो किसी ने यूँ ही बेवकूफ़ बनाने के लिए आपको नहीं थमा दिया था कि, “ये लो, ये कर लिया करो।” उसके पीछे एक प्रेम था, कि इनको कोई ऐसा तरीक़ा दे दो, कोई विधि दे दो, जिससे कि ये थोड़ा ठीक-ठाक चले। पर वो उनका प्रेम था कि उन्होंने विधि दे दी, और ये हमारी माया है कि हम उस विधि को भी खा-पी-पचा गए, डकार मार दी।
समझ में आ रही है बात?
आप बिल्कुल यंत्रवत कोई काम कर सकते हो। शरीर कुछ कर रहा है और मन आपका कहीं और हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है। आप बिल्कुल अपने धर्म-स्थल जा सकते हो, और पूरी दुनिया को आप अपने भीतर अभी भी रखे हुए हो। एकदम हो सकता है। एकदम संभव है।
प्रश्नकर्ता: इसका सिरा कैसे ढूँढ़ें, इतना उलझा हुआ?
आचार्य प्रशांत: नियत। और कोई तरीक़ा नहीं है, ज़बरदस्ती वाला काम नहीं है ना ये। आज का पूरा सत्र ही प्रेम पर था, इश्क पर था। इश्क पहले होना चाहिए। कम से कम उसमें से कुछ तो दो-चार छोटी-मोटी पत्तियाँ, कोपलें फूटनी दिखाई देनी चाहिए। जान होनी चाहिए पौधे में, फिर विधियों की खाद पड़ती तो फ़ायदा होता है।
पर नियत है ही नहीं, इरादा है ही नहीं, तो कितनी भी विधियाँ लगवा लो, वो सब विधियाँ बेअसर हो जानी हैं। हमारी दुनिया को ना प्यार की ज़रूरत है।
प्रश्नकर्ता: प्यार का जो, समझते भी नहीं हैं। कि प्यार को गिल्ट से भी जोड़ रखा है।
आचार्य प्रशांत: वो गिल्ट इसलिए क्योंकि उसको कर्तव्य बना लिया ना। वो तो एक अंधा कर्तव्य है कि ये कर लो, नहीं करोगे तो तुमने पाप किया है। पाप करा है तो तुम गंदे आदमी हो, जहन्नुम जाओगे। तो उससे फिर अपराधबोध आ जाता है, गिल्ट आती है। ये बात उसकी नहीं है।
आप अपने प्रेमी से मिलने जा रहे हो। आप किसी ऐसे के पास जा रहे हो जो आपके लिए बहुत कुछ है, बहुत इज़्ज़त देते हो। और आप नहीं जा पाए, तो आपको ये थोड़ी लगना चाहिए कि "हाय, अब कोई मुझे जेल में डाल देगा!" बात जेल में डालने की नहीं है। बात इसकी है कि, इतना सुंदर मौका था और मैं चूक गई।
पर हम, जब हमारा कोई धार्मिक अनुष्ठान छूट जाता है। या कुछ हम करने से परेशान हो जाते हैं, तो हमें गिल्ट होती है। वो गिल्ट ये होती है, जैसा आपने कहा कि "अरे, जहन्नुम में होगा, वहाँ पर सब हमें सज़ा मिलेगी और ये सब होगा।" ये गिल्ट हो जाती है, क्या कि अब मैं अपनी नज़रों में गंदा आदमी हो गया। ये गिल्ट आ जाती है। गिल्ट आ रही है तो इसका मतलब, आपके पास प्यार नहीं है, आपके पास डर है। आप गॉड-फियरिंग आदमी हो, गॉड-लविंग नहीं हो।
वास्तव में जो गॉड का कॉन्सेप्ट है, उसके साथ तो फियर ही जोड़ा गया है। बहुत होता है, आप इस्लाम में ख़ासकर सुनते हैं, "ऐ बंदे! अल्लाह से डर!" ट्रुथ-लविंग हो सकते हो, गॉड के साथ तो फियर ही चलेगा। प्रेम तो सत्य से ही हो सकता है।
प्रश्नकर्ता: लोकधर्म जो है…
आचार्य प्रशांत: हाँ, लोकधर्म तो डर पर ही चलता है। वरना नर्क का निर्माण क्यों किया जाए, डराना नहीं है तो?
प्रश्नकर्ता: बिल्कुल, बिल्कुल।
आचार्य प्रशांत: इतनी मेहनत करके, बताओ कितना पैसा लगाया होगा? कौन-सा आर्किटेक्ट होगा? ऐसी ज़बरदस्त नर्क की डिज़ाइन किस लिए की गई है? डिज़्नी-लैंड है? डराने के लिए ही तो की गई है न। और ये हर जगह है एल-दोज़ख़, नर्क डराने का खेल है। लोकधर्म माने, डरा के रखो। लोगों की जान निकल जाती है। कोई मान्यता टूटती है न, जान निकल जाती है। पूछो क्यों डर रहे हो? बता नहीं पाएगा।
वो डर उसके भीतर बहुत गहरा चला गया। और डर यही है, कि "मैं मरूँगा, मेरे भीतर से वो निकलेगा, हुलु लुलु लुलु लु। और फिर उसको ले जाकर के पकाया जाएगा!" अब वो सोच रहा है "हाय हाय, पकाया जाएगा!" पर शरीर तो है नहीं तो पकाएँगे क्या? ये सब प्रश्न पूछना तो गड़बड़ बात है। ये नहीं पूछ सकते।
प्रश्नकर्ता: नहीं नहीं, वो तो लोकधर्म में तो इसके डिटेल में जा चुके हैं कि पकेगा तो कैसे पकेगा, कितनी फुंसिया निकलेंगी, और किसमें से पीप निकलेगा। आई मीन, वो तो बहुत, उसके पूरी डिटेल में।
आचार्य प्रशांत: सत्य के साथ प्रेम का रिश्ता होता है — प्रेम का! ऐसे थोड़ी कि सत्र छूट गया तो गिल्ट हो रही है कि "ओ शिट! वैल्यू फॉर मनी नहीं मिली। आई हैड पेड फॉर इट एंड येट मिस्ड इट।" ये कोई प्यार की बात है? कोई प्यार की बात? ये ऐसी सी बात है, कि आपने *एडवांस बुकिंग करके और कुछ पेमेंट करके एक अच्छा सा टेबल रिज़र्व कराया था, किसी से मिलने के लिए। पैसे दिए थे, टेबल रिज़र्व कराया था और आप जा नहीं पाए।
तो आपको दुख इस बात का है कि पैसे मारे गए। अरे! दुख होना चाहिए, पर किस बात का होना चाहिए? मिल नहीं पाए! पर बहुत से लोग होते हैं, "यार 500 तो एडवांस दिया था, 500 मारा गया!" ये लोकधर्म है। समझ रहे हो? जहाँ गिल्ट आती है, और वास्तविक धर्म में जब आपसे चूक हो जाती है तो वेदना उठती है। विरह-वेदना।
“पिया मोरे जागे, मैं कैसे सोई री।”
ये उस साधारण गिल्ट से बहुत आगे की बात है। कि "वो जग रहे थे और मैं सोती रह गई, और गाड़ी छूट गई। ये कैसे कर लिया मैंने?" अंतर समझ में आ रहा है? लोकधर्म में जब आपसे कोई कर्मकांड, कोई मान्यता, कोई पूजा-पद्धति छूट जाता है तो आपके भीतर क्या उठता है? डर। अपराधबोध।
अपराधी हो, तो पीटे जाओगे। इसी बात का डर है। तो गिल्ट और फियर एक साथ चलते हैं। जो अपराधी होता है उसे अपराधबोध होता है, गिल्ट, कि अब मुझे पिटाई लगेगी। तो वो एक साथ चलता है। और जो वास्तविक धर्म होता है, उसमें प्रेम होता है। उसमें भी बुरा लगता है, पर उस अनुभव की गुणवत्ता बिल्कुल अलग है। बिल्कुल अलग है।
वो, वो है कि, "मैं मैली पिया उजरे, मिलन कहाँ से होय?" यहाँ ये थोड़ी डर है कि, "अगले जन्म में मैं चींटी बन जाऊँगी। मैं मैली हूँ, तो अगले जन्म में कॉकरोच बनूँगी या छिपकली बनूँगी।" ये थोड़ी कि, "तू मैली रहती है नहाती नहीं है न, अब तू अगले जन्म में।"
“नदी किनारे मैं खड़ी, ज्यों जल मैला होय। मैं मैली पिया ऊजरे, मिलन कहाँ से होय।।”
ये वेदना है, ये असली प्रेमी की पहचान है। ये वो नहीं है कि, "हाय हाय, पाप हो गया! पंडित जी के पास जाओ, इस पाप का निपटारा कैसे हो? बिल्ली मार दी है?” तो पंडित जी बोलते हैं, "ऐसा करो, अब सोने की छोटी सी बिल्ली बनवाकर दान कर दो।" यही होता है, तुम बिल्ली मार के देखो। समझ में आ रही है बात?
बुरा लगना चाहिए, इसलिए नहीं कि आगे दंड मिलेगा, इसलिए कि कुछ बहुत सुंदर हो सकता था। और ज़िंदगी छोटी सी है और उस सौंदर्य से वंचित रह गए, ये अलग चीज़ है। आप कोई तरीक़ा बना लीजिए, कोई पद्धति बना लीजिए, पर झुन्नू और झुन्नू की माया उसको विकृत न कर दें, उसको अर्थहीन न कर दें, उसकी काट न निकाल लें, ये संभव नहीं है।
वास्तविक धर्म बोलता है, "मैं डाल-डाल।" लोकधर्म बोलता है।
श्रोता: मैं पात-पात।
आचार्य प्रशांत: “तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात।” धर्म फिर इसीलिए उकता करके अंततः विधियाँ बताना ही छोड़ देता है। कहता है, "प्यार है तो हो जाएगा। विधियों की तो तुम काट निकाल लेते हो। तुम्हें क्या विधि बताऊँ?"
मैं आपको विधि बता सकता हूँ, आओ यहाँ आकर के बैठो। आप यहाँ आकर के बैठ गए, यहाँ बैठ के भी ऊब रहे हैं कई तो। अब ज़बरदस्ती जाए उसकी खींच-खींच के पलकें उठाएँ। और कई ऐसे हैं, जो आँख खोल के सो रहे हैं। उनकी तो पलकों से भी नहीं पता चलेगा। तो आप कोई पद्धति बना लीजिए, झुन्नू के पास सबका काट है।
अंततः इसीलिए फिर वास्तविक धर्म कहता है, "पद्धति से होगा ही नहीं, प्रेम से हो जाएगा।" और जहाँ प्रेम होता है, वहाँ आदमी अपने लिए पद्धति, विधि, प्रणाली, तरकीब, उपाय ख़ुद निर्मित कर लेता है। और रोज़-रोज़ नए-नए उपाय निर्मित कर लेता है। वो ये नहीं कहता कि, "परंपरा से जो उपाय या विधि चली आ रही है, हम बस उसी पर आश्रित रहेंगे।"
प्रेम हो जाता है, तो सब है। प्रेम नहीं है, तो कुछ नहीं है। सब प्रेम की बात है, नियत की बात है।
प्रश्नकर्ता: नियत। नियत शुरू करते हैं, नमाज़ से पहले भी जो करते हैं, वो नियत होती है। पर उस वक़्त जो नियत लेते हैं, वो फिर वही, "मैं चार रकात नमाज़ पढ़ने वाली हूँ। इसकी नियत करती हूँ।" पर आपने बहुत अच्छी बात बताई।
आचार्य प्रशांत: "नियत करते हैं।" देखिए जो जब नियत करते हैं न, तो वो भी विधि में हो गया। जो वास्तविक प्रेम है, वो किसी विधि से उठाना थोड़ा मुश्किल काम है। तो फिर इतिहास ने ये देखा है कि, उसके लिए तो कोई जिंदा आदमी चाहिए। और उस जिंदा आदमी का श्रम चाहिए। और कभी-कभी उस जिंदा आदमी की कुर्बानी चाहिए।
नहीं तो हमें ये पूरा भरोसा रहता है, कि "ये दुनिया तो स्वार्थ का ही खेल है। यहाँ हर आदमी स्वार्थी है। तो मुझे भी हक़ है बदनीयति करने का। यहाँ कुछ ऐसा नहीं है जिसके साथ निस्वार्थ प्रेम किया जा सके। क्योंकि निस्वार्थ प्रेम दुनिया में असंभव होता है।” ये झुन्नू का तर्क है। निस्वार्थ प्रेम जैसी कोई चीज़ होती नहीं, हवा-हवाई है, काल्पनिक है, यूटोपियन है, होती ही नहीं है।
उसको कोई कारण नहीं है कि वो अपनी नीयत की सफ़ाई करे, या निष्काम प्रेम जैसी किसी चीज़ को महत्त्व दे। उसको आज तक कोई सबूत मिला ही नहीं कि निष्काम प्रेम जैसा कुछ होता है। तो अंततः तो यही होता है, कि उसकी नीयत तभी बदलती है जब वो अपने सामने कुछ होते हुए ही देख लेता है। तब उसको झटका लगता है। तब फिर उसके भीतर ये भाव भी आता है कि मैं ही ग़लत था।
ईसाइयत पूरी की पूरी रिपेंटेन्स पर चलती है, “ओ गॉड सेंट हिज़ ओन सन टू सफर फॉर अस।” हम कैसे पापी हैं, देखो। पर जब तक वो है, तब तक तो किसी को नहीं दिखाई दिया ना। तो नीयत भी तभी उठती है जब झटका लगे, ज़ोर का। नहीं तो हमारे पास हमारी मान्यताएँ हैं, और हमारी मान्यताएं कहती हैं कि ये दुनिया स्वार्थ का मेला है जहाँ सब अपनी-अपनी फ़सल काट रहे हैं भाई। सबने अपनी-अपनी दुकान खोल रखी है। सबके अपने-अपने छिपे या प्रकट मसूबे हैं।
तो जब सब अपनी-अपनी दुकान चला रहे हैं, तो मैं भी तो। मैं भी तो कुछ अपना ख़ुराफ़ात कर सकता हूँ। मुझे ही थोड़ी पड़ी है कि मैं प्रेमी हो जाऊँ। वो मानता ही नहीं कि प्रेम जैसी कोई चीज़ हो सकती है, जब तक उसको बहुत एक रक्तरंजित प्रमाण न दे दिया जाए। सूक्ष्म प्रमाण भी वो मानता नहीं। सूक्ष्म उसको कुछ दिखाई देता ही नहीं। क्या माने? उसको तो कुछ बहुत लाउड, बहुत प्रकट, बहुत स्थूल चाहिए। तब जाकर के उसकी इंद्रियों पर आघात होता है। उसकी कुछ मान्यताएँ टूटती हैं। और फिर वो मानता है कि नहीं, प्रेम काल्पनिक बात नहीं है। प्रेम सचमुच होता है — असली प्रेम।
पर जब तक आमतौर पर उसको ये पता चलता है, वो स्वीकार करता है, तब तक बस देर हो चुकी होती है। और यही कर सकते हो कि — रिपेंट, रिपेंट, रिपेंट।
ईसाइयों ने अपनी भूल को ईसाइयत का प्रतीक-चिन्ह बना लिया। वो क्रॉस क्या है? कि देखो, हमने क्या कर दिया। वो रोज़ अपने आप को याद दिलाते हैं कि ये देखो, हमने क्या कर डाला। वो ये नहीं कहते कि मुझे कोई आसमान को याद करना है, मुझे किसी दिव्यता को याद करना है। नहीं। वो याद करते हैं कि देखो, हमने क्या कर डाला। एक आदमी है, उसके कीलें ठुकी हुई हैं, उसके ख़ून बह रहा है और वो ऐसे लटका हुआ तब भी कह रहा है, "इनको कोई सज़ा न मिले, ये नासमझ हैं। मेरा जो हो सो हो पिता, इनको माफ़ करना।"
नीयत बदलती है। ये बड़ी भारी क़ीमत है नीयत के बदलाव की। ये कैसी नीयत है, जो नरबलि माँगती है? हम तो पशुबलि के भी ख़िलाफ़ हैं। और ये कौन-सी नीयत है आम आदमी की, जो कहती है कि जब तक नरबलि देख लेंगे, तब तक मानेंगे ही नहीं कि वास्तविक प्रेम जैसा कुछ होता है।
उसके आसपास का तो नहीं है, पर जिन दिनों धूमिल को मैंने ख़ूब पढ़ा था, याद आ गया अचानक से तो आपसे कह देता हूँ। तो वो दिखने में हट्टे-कट्टे, मस्त, उनकी मूँछें — सुदामा पांडे 'धूमिल'। उनको ब्रेन ट्यूमर हुआ था, और वो अपना काम ज़रा भी छोड़े नहीं, और कविता ज़रा भी छोड़े नहीं। किसी ने माना ही नहीं।
उनका सर फटता रहे हर समय, फटता रहे हर समय। तो बोले, सर फटता था तो सरसों का तेल लेता था, ऐसे ठोकता था और काम पर निकल पड़ता था। किसी ने माना ही नहीं। लोगों ने कहा, वैसे भी अक्खड़ आदमी है, कविता क्या ज़हर-बुझी इसकी कविताएँ होती हैं। साहित्य के नाम पर बिल्कुल ये तलवार चलाता है, इसको कुछ नहीं होगा। ये बहुत पहलवान है। मर गए।
जब मर गए तो लोगों को, "ये क्या, मर ही गए? ये सचमुच मर गए?" इनका एक वक्तव्य है, कुछ तरीक़े से है कि —
“कविता माँगती है एक समूचा आदमी अपनी ख़ुराक के लिए, उसके मुँह से ख़ून की बू आ रही है।”
आज के समय में आपको अगर एक सार्थक वक्तव्य देना है, तो अपने ख़ून से लिख के देना होगा। वो अपनी ही बात कह रहे थे। पर जब वो कह रहे थे तो ख़ुद कह रहे हैं, तो भी लोगों की नहीं समझ में आई। वो मर गए, तो बहुतों को झटका लगा। बोलते,"मर कैसे सकता है? कट्टा आदमी है!" तब नीयत उठती है।
उसके बाद उनकी जो अप्रकाशित कविताएँ थीं, वो सब इकट्ठा की गईं। बहुत कुछ उनका तो उनके मरने के बाद छपा। जो पहले उनका था, अभी तो उसको कई बार तो प्रकाशक ही नहीं मिलते थे।
तो हम अजीब लोग हैं। हम मानते नहीं, मानते नहीं, मानते नहीं, फिर जब देख लेते हैं कि ये क्या हो गया, तो फिर हम अचानक से प्रायश्चित की स्थिति में आ जाते हैं। रिपेंट — अरे, ये क्या पाप कर दिया हमने! लेकिन वो जो झटके से हम प्रायश्चित की स्थिति में आते हैं न, वो भी फिर चलता नहीं। वो फिर जब चलता नहीं, तो फिर किसी और को आकर के प्रमाण देना पड़ता है अपने जीवन से। फिर हमें झटका लग जाता है। कुछ दिन तक हमारी नीयत साफ़ रहती है। फिर हम अपने खेल में लग जाते हैं। फिर कोई आता है, अपनी जान जलाता है हमारे पीछे, तो हमारी नीयत कुछ दिन के लिए साफ़ होती है। फिर हम अपने खेल में लग जाते हैं, ऐसे ही चलता रहा है।
आज हम कहते हैं, अद्वैत वेदांत, आचार्य शंकर इतनी कम उम्र में चले गए। उसकी वजह समझिए। ये तो छोड़िए कि उनको सनातन धर्म का सर्वोच्च आचार्य माना गया हो उनके समय में। अब हम मानते हैं। हम कहते हैं, उनसे ऊपर आज तक कोई नहीं हुआ। उनको तो हिंदू मानने से भी मना कर दिया लोगों ने। बोले, "हिंदू ही नहीं है।" क्योंकि वो जो बात कर रहे थे, वो उस समय के प्रचलित द्वैतवाद के ख़िलाफ़ थी। और अद्वैत मात्र वैदिक धर्म में नहीं पाया जाता।
जो आचार्य नागार्जुन का शून्यवाद है, वो अद्वैतवाद के बिल्कुल निकट का है। तो आदि शंकर को लोगों ने कहा, "ये प्रच्छन्न बौद्ध है। ये हिंदू है ही नहीं। ये बौद्ध है। ये बौद्ध घुसपैठिया है, और ये यहाँ घुसा है ताकि हिंदू धर्म को ख़राब कर दे।"
आज आप बोल देते हो, और फ़िल्म पर फ़िल्में बनती हैं और ये सब होता है और हम कहते हैं, वर्ल्ड्स फाइनल फिलॉसफर ये सब बात हम करते हैं। लेकिन उनके समय में। वरना आप सोचिए न, इतनी जल्दी कोई कैसे चला? किसी दुर्घटना का कोई ब्यौरा हमें मिलता नहीं। किसी बीमारी का भी कोई ब्योरा ऐसा मिलता नहीं।
एक लड़का है, लड़का वो केरल से चला है और पूरे भारत को जगा रहा है। और जहाँ जा रहा है, उसको विरोध ही विरोध मिल रहा है। उनके जीवन से संबंधित अब कहानियाँ पकड़ी गईं। एक बार उनको लोगों ने पकड़ लिया, तो उनकी बलि देने ले गए थे। बिल्कुल, उनको वहाँ खड़ा ही कर दिया था कि अब इसकी गर्दन काट देते हैं, बलि दे देते हैं। उन्होंने कहा कि ये जो तुम यहाँ पर अपना तुम्हारा देव है, जिसके आगे बलि दे रहे हो। यही सब चलता था। हमारे किसी के कुल-देवता हैं, किसी का कुछ है, किसी का कुछ है। तो उन्होंने पूछा कि, "ये जो देव है, जिसके आगे तुम मेरी बलि दे रहे हो, तो इसके आगे तुम किसकी बलि दे रहे हो? किसकी?"
वेदांत की बात — मैं कौन हूँ? किसकी बलि दे रहे हो? पढ़िएगा, बड़ी रोचक कहानी है।
एक अग्निकुंड था, वहीं बलि दी जाती थी। तो वो जो बलि दे रहा था, उसने कहा कि, "जीव की बलि दे रहे हैं। जीव बलि देते हैं। और तुम बड़े अच्छे जीव हो, बोले तुम्हारी दे रहे हैं।" वो बोले, "जीव कहाँ है मुझ में? दिखाओ, जीव कहाँ है?" वैसे ही उन्होंने दो-चार उससे बातें करीं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जीव वग़ैरह तो कुछ होता ही नहीं भीतर। मैं तो हाड़-मांस का पिंड हूँ और मेरे भीतर बहुत सारा अपशिष्ट भरा हुआ है, मल-मूत्र वग़ैरह।
बोले "देखो, तुमने अपने इस देव के आगे मुझ जैसी गंदी चीज़ को लाकर खड़ा कर दिया है। ये तो तुमने पाप कर दिया।" और जब बोला, "पाप कर दिया" तो वो जो बलि दे रहा था, वो ख़ुद ही उस अग्निकुंड में कूद गया और मर गया। बोला, "हाय! ये मैंने क्या ग़लती कर दी।" और बाक़ी दो-चार थे, वो आचार्य शंकर के शिष्य बन गए।
वो ज़माना फिर भी ठीक था। उस समय किसी को अगर प्रमाणित कर दो कि तू ग़लत कर रहा है, तो शिष्य बन जाता था। तो आप प्रमाणित भी करते रहो, कोई मानने वाला नहीं। नीयत बदलने के लिए इतना बड़ा कोई कांड हो, तब नीयत बदलती है। समझ रहे हो? कितना नाटकीय घटनाक्रम है, कि आज तक के जो सर्वोच्च दार्शनिक हैं, उनको लेके आओ, बिल्कुल उन पर गंडासा मारने को तैयार हो।
कभी उन्होंने कहा, "मुझे कुछ बात करनी है।" और बात करने में उन्होंने कुछ बोल दिया इससे जो वध करने जा रहा था, वो आग में कूद गया। तब जाकर के वो जो बाक़ी वहाँ थे, उनकी कुछ नीयत बदली। वो बोले, "महाराज, हमें भी कुछ ज्ञान दीजिए।" अब इतना कौन करे रोज़-रोज़? और इतना रोज़-रोज़ करा नहीं जा सकता। इसके लिए बहुत ऊर्जा चाहिए, बहुत प्रेम चाहिए, ज्ञान चाहिए। इतना रोज़-रोज़ हो नहीं सकता। तो हमारी नीयत उल्टी-सीधी रहती है। नीयत सुधारने वाला कोई रहता ही नहीं है। कौन हमारे ऊपर इतनी ताक़त, इतनी ऊर्जा लगाए, कि हमें प्रमाणित करके दिखाए कि हम जो सोच रहे हैं वो बिल्कुल ग़लत है।
इतना प्रेम विरल होता है।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। तो मेरा सवाल आज का ये था कि शांति, पीस, सलाम, ये शब्दों का धर्मों में बहुत इस्तेमाल होता है। तो मुझे ये समझना था कि इनका आत्मा से क्या कोई? है तो इनका आत्मा से कुछ लिंक है। बट हम लोग जैसे, क्योंकि मैं मुसलमान बैकग्राउंड से हूँ, तो हमारा तो — अस्सलाम वालेकुम, ये तो माने एक रोज़मर्रा की चीज़ है। इतना-इतना इस शब्द को इस्तेमाल करते हैं — सलाम, पीस, सलाम, पीस।
पर आज आपने जब बताया, कि हमें तीन बातों से जगत में हम तलाश करती हैं, वो ये है — आत्मा में जो आनंद भीतर और अंतर आराम और प्रकाश। तो मैं तो पीस को यही समझती थी। और आत्मा से जोड़कर, क्या यही पीस के मायने होंगे?
आचार्य प्रशांत: वो जो फर्स्ट प्रिंसिपल्स थे, उन पर वापस चलते हैं, तो आत्मा तो कुछ होती ही नहीं। पर ये जो अहंकार है, इसका नाम है — बेचैनी। और अहंकार हमेशा संसार के साथ चलता है। तो पीस क्या चीज़ है? पीस जैसे आत्मा है ना, कि नाम दे दिया तो आत्मा नहीं रही। जिसको नाम दिया ही नहीं जा सकता।
पीस भी वैसी ही चीज़ है, उसको अगर आपने कह दिया, आई ऐम पीसफुल, तो इसका मतलब आप पीसफुल हो नहीं। कहना छोड़ दीजिए। अगर आपको पता भी लग गया, अगर आपको ये कॉन्शसनेस हो गई कि मैं शांत हूँ, तो इसका मतलब आप अशांत हो।
किसी ने पूछा था मैंने एक बार, मैंने कहा था, इफ यू आर पीसफुल, यू स्टिल आर। एंड इफ यू स्टिल आर, हाउ कैन यू बी पीसफुल? क्योंकि हमारा होना ही लैक ऑफ पीस है ना? इसी तरीक़े से, इफ यू आर साइलेंट, इफ यू से "आई ऐम साइलेंट," यू स्टिल आर। एंड इफ यू स्टिल आर, योर वेरी "आर-नेस," द वेरी "इज़-नेस” ऑफ योर बीइंग इज़ नॉइज़। हाउ कैन देयर बी साइलेंस?
तो आत्मा को हटाइए। लेकिन जो अहंकार है, इसका होना ही अशांति है। इसका होना ही बेचैनी है। तो आत्मा तो सिर्फ़ एक सिंबॉल है, एक प्रतीक है। कि अहंकार जो अपने आप को क़ायम रखे हुए था, अपनी नासमझी में, इग्नोरेंस में, ख़ुद को ना जानने में। वो उसने फैसला किया कि, ये इग्नोरेंस हटाई जा सकती है। मैं इसको हटाऊँगा। तो चैन क्या है? उल्टी दिशा से चलना पड़ेगा। नेति-नेति की दिशा।
अहंकार की बेचैनी का ना होना ही चैन है।
इसके अलावा चैन की कोई सकारात्मक, कोई अफर्मेटिव परिभाषा नहीं हो सकती। माने, डिसोल्यूशन ऑफ़ द ईगो, वही पीस है। उसके अलावा पीस कुछ नहीं हो सकती, बस।
प्रश्नकर्ता: उसका जो इतना ज़्यादा इस्तेमाल जो हम लोग करते हैं धर्मों में — शांति-शांति, पीस-पीस।
आचार्य प्रशांत: वो इट बिकम्स अ थिंग ऑफ़ द माइंड। फिर जो हमारी पीस है ना, एक पीस होती है, ये (हाथ में पेन उठाते हुए) है हमारी साधारण ड्युअलिस्टिक कॉन्शसनेस। एक पीस होती है कि, इसके एंड पर यहाँ जो ईगो बैठी है, और उसने ये मान्यता बना ली है कि इस पर्टिक्युलर ऑब्जेक्ट से जुड़ने पर मुझे पूर्णता मिल जाएगी। एक पीस तो ये होती है — ड्युअलिस्टिक पीस है। ये नकली पीस है। ये भी बीच-बीच में मिलती है ना, रसगुल्ला खा लिया, कह रहे — बड़ी शांति हो गई। कुछ भी उल्टा-पुल्टा काम करे, कहते हैं — आह! शांति है।
ये ड्युअल, ये भी एक तरह की नकली पीस होती है, टेम्पोरल पीस, माने जो थोड़ी देर चलेगी, फिर नहीं ख़त्म हो जाएगी। ये होती है। एक ये होती है — जिसमें इसको इसका (पेन के अंतिम हिस्से से निप को) कुछ मिल गया। जो माँगा हुआ कामना का विषय था, वो मिल गया। ये होता है।
और दूसरी पीस ये होती है, कि सारी दिक़्कत तो ये थी ना कि इसको (पेन के अंतिम हिस्से की तरफ इशारा करते हुए) चैन नहीं था, तो ये गायब हो गया। ये दूसरी पीस है। ये रियल पीस है। ये नॉन-ड्युअल, ये अद्वैत पीस है। एक तरह से, यही तौहीद है। इसका हट जाना। इसको कुछ मिल जाने पर जो पीस होती है, वो नकली है। वो थोड़ी देर आपको झाँसा देगी कि — शांति मिल गई, शांति मिल गई। फिर ढाक के तीन पात। पता चलेगा, भाई अगले दिन उठे, सिर खुजा रहे हैं, "यार! अभी तो कुछ मज़ा नहीं आया।"
रियल पीस इज़ द डिसोल्यूशन ऑफ द वन हू वाज़ सीकिंग पीस। ही इज़ नो मोर क्लैमरिंग फॉर पीस। यही पीस है।
प्रश्नकर्ता: द होल है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, इट्स एन एब्सेंस व्हिच यू कैन कॉल ऐज़ होलनेस। इट्स एन एब्सेंस ऑफ द वन हू वाज़ क्राइंग एंड बेगिंग फॉर पीस।
देखिए, एक ये होता है कि वो चिल्ला रहा था, "पीस दो, पीस दो"। आपने लाके कुछ दे दिया, तो उसका चिल्लाना बंद हो गया। और एक ये देखो, चिल्लाता-चिल्लाता उसको भगा दिया। तो अब कोई नहीं चिल्ला रहा। दोनों ही स्थितियों में चिल्लाहट की आवाज़ बंद हो जाएगी।
एक स्थिति है, जो चिल्ला रहा है पागल है, कुछ है, आपने उसको कुछ दे दिया, तो थोड़ी देर के लिए उसका चिल्लाना बंद हो गया। और दूसरा ये है, कि वो जो चिल्ला रहा था, आपने उसको कुछ ऐसा बदल ही दिया कि वो चीज़ ही वही नहीं रहा। वो इंसान ही दूसरा हो गया, उसका चिल्लाना बंद हो गया। ऐसा नहीं कि उसे कुछ मिल गया, पर अब चिल्लाने वाली उसकी बात रही नहीं। ये असली पीस है। वो विदा हो गया।
प्रश्नकर्ता: अंडरस्टैंडिंग हो गई है वो।
आचार्य प्रशांत: अंडरस्टैंडिंग द वेरी डिसक्वाइएट दैट अफेक्ट्स यू। एंड नॉट नॉट लुकिंग फॉर अ सॉल्यूशन हियर एंड देयर इन ऑब्जेक्ट्स। वो असली पीस है, उसको ही कह सकते हैं — असली।
माने देखिए, धर्म तो आत्मज्ञान ही होता है। तो वही है मतलब, सलाम वही है। भीतर मुड़े बिना तो वो नहीं हो सकता है। भीतर मुड़े बिना अगर आप पीस माँगोगे, तो फिर तो लूट-खसोट करनी ही पड़ेगी। और वो हर आदमी का हश्र होता है, जो भीतर नहीं देखता पर पीस माँगता है।
दुनिया के सबसे बड़े-बड़े फ़साद, पीस की खातिर ही तो किए गए हैं। अभी भी कोई देश अगर लड़ाई शुरू करता है तो क्या बोलता है? "ये युद्ध शांति की खातिर लड़ा जा रहा है। लेट्स फाइट सो दैट देयर कैन बी पीस।"
सर, इट नेवर कम्स दैट वे।
प्रश्नकर्ता: बिल्कुल। आपको मैं ये बोल के ख़त्म करना चाहती हूँ, दिस इज़ वेरी इंटरेस्टिंग एक्सप्लेनेशन। बट, मेरी जर्नी तो पूरी यही रही थी कि बाहर पीस तलाश करते-करते जब देखा, कि सोल्यूशन मिल ही नहीं रहा। सब कुछ ट्राय कर लिया मैंने — मेडिटेशन, योगा, इस्लाम तो शुरू से ही था। सब कुछ ट्राय किया।
सारे के सारे, मुझे लगता है जितनी भी चीज़ें आपको रोकती हैं सब चीज़ें ट्राय करीं। एक्सपेरिमेंट्स किए हर तरीक़े के। और फिर जब आपको सुनना शुरू किया ना, ये कोविड के ज़माने की बात है। और मैं आपसे बता रही हूँ आज, तो मैं बहुत रोती थी। अपने आप, एक रोना आता था।
मैं गेराज में जाकर रात को। ये पहली बार बता रही हूँ, मैं गेराज में जाकर रात को गाड़ी में बैठ के, ठंड में कैनेडा की, मैं चीखती थी, कि "ये क्या है जो अंदर से मुझे दहाड़ रहा है और कह रहा है कि बस अब ये नहीं होना है। अब ये जो तुम बाहर जो तलाश कर रही हो, लोगों में तलाश कर रही हो, पार्टनर में तलाश कर रही हो, बच्चों में तलाश कर रही हो, ये अब ख़त्म होना है।"
तो फिर बाहर से जो वैलिडेशन, जो ख़ास तौर पर मिलके जो आपको एक थोड़ा-सा आराम, जो आपने बिल्कुल सही बात कही — जो टेम्पररी आपको आराम मिलता है, वो जैसे कहीं उड़ने लगा धीरे-धीरे। बट वो इवैपोरेट होने लगा, और अब ऐसा हो गया है कि, मैं इतनी ऑब्ज़र्वेंट बनने लगी हूँ अपने आप की, कि अगर कोई चीज़ ने मुझे ट्रिगर भी कर दिया ना स्लाइटली, तो मैं देखती हूँ और अपने आप से बात करती हूँ — "अच्छा, इसने तुम्हें ट्रिगर कर दिया कितना टाइम निकालोगी अब तुम इसके ऊपर?"
और वो अपने आप डिसॉलेट हो जाता है। लाइक इट डज़ंट ईवन टेक मी वन डे। थैंक गॉड इट डज़ंट ईवन टेक मी अ डे। और मैक्सिमम, इट माइट टेक मी बहुत ही क़रीबी इंसान होगा तो, मेबी सेकंड डे तक मैं थोड़ा-सा सोचूँगी। और उसके बाद अपने आप वो चीज़ न, बिल्कुल शून्य हो जाती है।
तो ये एक्सपीरियंस, आचार्य जी लाइक रियली, यू आर समथिंग एल्स, माशाल्लाह। लाइक आई रियली प्रे फॉर यू। मेरे दिल से बिल्कुल एक आह जो होती है ना, वो निकलती है, जो शायद ही किसी के लिए निकली होगी।
क्योंकि मैंने सिर्फ़ पढ़ा है प्रॉफेट्स के बारे में, और बहुत ज़्यादा उसको आइडिलाइज़ किया है। बट रियली शायद प्रॉफेट्स ऐसे ही होंगे। सो, थैंक यू सो मच। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। और आपको उसकी जज़ा मिलती रहे, और आपके सारे शिष्यों को उसकी जज़ा मिलती रहे। दिस इज़ माई प्रेयर फॉर यू। थैंक यू।