जितनी भी विधियाँ दी जाती हैं, वो जो हम कचरा इकट्ठा कर लेते हैं दिमाग़ में न, उसको साफ़ करने की विधियाँ हैं। सत्य को पाने की तो कोई विधि आज तक बनी नहीं। और विधि बनाने की कोई ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि वो चीज़ पाने की है भी नहीं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी कहिए।
प्रश्नकर्ता: तो सवाल तो ये है कि सत्य के रास्ते पर वो एक खूंटा कौन-सा है, जो हम हर वक़्त जब हम रास्ते से भटक जाएँ, तो उसे लाकर लगा सकते हैं? जैसे अभी-अभी रमज़ान ख़त्म हुआ। तो हमारे रमज़ान में जो एक रात की नमाज़ होती है, बड़ी लंबी नमाज़ होती है वो, तो वो पढ़ने लोग जाते हैं। तो इस बार मैं भी चली और उसका एकमात्र वजह था — गिल्ट बेसिकली। बिकॉज़ जो गिल्ट है नमाज़ छोड़ने का, आपको सौ खून माफ़ हैं, स्कॉलर्स कहते हैं। पर नमाज़ छोड़ दिया, तो वो माने, वो गुनाह आपका माफ़ नहीं है। आप मार दो, काट दो, रेप कर लो जो करना है उसकी माफ़ी हो जाएगी। पर आपने नमाज़ छोड़ दी।
बट फिर जब जैसे वेदांत और सेल्फ नॉलेज का जो आया, तो मैं अपने आप को ऑब्ज़र्व करने लगी। और यही बात मैं अपने दोस्त से भी कह रही थी कि, "तुम अगर जा रही हो तो जस्ट ऑब्ज़र्व योरसेल्फ। अपने आप को दृष्टा की उससे देखो।"




