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नैहरवा हमका न भावे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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प्रश्नकर्ता आचार्य जी कबीर साहब क्यों कहते हैं, 'नैहरवा हमका न भावे?'

आचार्य प्रशांत: कबीर साहब कह रहे हैं, 'नैहरवा हमका न भावे।' नैहर किस जगह को कहते हैं? मायके का अर्थ है वो जगह जहाँ तुम्हारे वो माँ-बाप रहते हैं जिन्होंने देह को जन्म दिया। मायका—देह का घर, माँ का घर। कौन सी माँ? देह की माँ और फिर होता है पिया का घर प्रेम नगरी। पिया कौन? वो जिससे तुम्हारा आत्मा का संबंध हो।

कबीर के देखे सब जीव स्त्रियाँ ही हैं, स्त्रियाँ तो स्त्रियाँ हैं ही। जिन्हें हम पुरुष, मर्द कहते हैं वो भी स्त्रियाँ हैं। जो रूपक प्रयुक्त हुआ है वह कुछ ऐसा है कि सब पैदा होते हैं—संसार में और संसार है—मायका, नैहर। क्यों है? क्योंकि संसार में मिट्टी है और मिट्टी से यह मिट्टी की देह पैदा होती है। संसार में हम पैदा होते हैं। लेकिन मिट्टी भर नहीं हैं हम भीतर ही भीतर कुछ और हैं हम जिसका किसी भूत से किसी पदार्थ से कोई लेना देना नहीं। उसके चारों ओर जैसे मिट्टी का आवरण है। जैसे, यहाँ बीच में कोई रूपसी बैठी हो और उसके दो तरफ़ दीवारें हों और दो तरफ़ परदें दूर-दूर से देखा तो क्या दिखाई पड़ेगा ईंट,पत्थर,कपड़ा और भीतर कौन है? भीतर कोई और है भीतर कोई और है—जिसमें प्राण है, जिसमें चेतना है, जिसमें कुछ ऐसा है जो मिट्टी नहीं दे सकती। आपको दे दिए जाएँ सारे तत्व और कहा जाए, ‘लो इससे इंसान बना दो’ बना दोगे क्या। हर आदमी का भी कुछ वज़न होता है आपको दे दिया गया कि साठ किलो जितना तुम्हें जो कुछ चाहिए दे दिया जाएगा, इससे साठ किलो का आदमी खड़ा कर दो। कर दोगे? बोलो!

अच्छा उतनी सी बात छोड़ो अभी दोपहर हो रही है थोड़ी देर में खाना खाओगे, वो सारा खाना तुम्हारे सामने रख दूँ और कहूँ;अब इससे ख़ून बना दो;बना दोगे। ख़ून किससे बनता है खाए-पीए से बनता है। तो वो खाना रख दिया गया तुम्हारे सामने। कहा गया, “लो इससे रक्त निर्मित कर दो, कर दोगे?“ वह जो भोजन को रक्त बना देता है कबीर साहब उसकी याद करते हैं। वो जिसके होने से मिट्टी हँसने लगती है, गाने लगती है, खेलने लगती है, प्रेम में पड़ने लगती है—कबीर साहब उसकी याद करते हैं अजीब बात नहीं है! तुम हो क्या?

अभी प्राण निकल जाए और तुम्हारी देह को मिट्टी पर छोड़ दिया जाए। कुछ ही समय बाद तुम्हारी देह में और मिट्टी में अंतर करना मुश्किल हो जाएगा। देह मिटटी से बिलकुल ऐसे मिल जाएगी जैसे कभी अलग थी ही नहीं। कभी किसी छोटे मरे हुए कीड़े को देखना और उसको ज़रा मिटटी में रख भर देना। दो दिन बाद आना। तुम बड़ी मुश्किल से बता पाओगे कि यह रही कीड़े की देह, वो सब मिटटी-मिटटी ही हो गया है, सब झड़ गया है सब एक हो गया है वही हम हैं यह मिट्टी का मायका है।

और इस मायके में कोई ऐसी पैदा हो गई है जो मिट्टी के अलावा कुछ और है मिट्टी के अलावा वो जो है वो उसकी असली पहचान है। प्रमाण यह है कि मिट्टी का जो कुछ है वो बदलता रहता है। और जो भीतर है वो बदलता नहीं वो इस सारे बदलाव को देखता रहता है। वह सारे बदलाव का जानकार है।

ज़ाहिर सी बात है जो मिट्टी नहीं है उसे मिट्टी का देश ज़रा बेगाना सा लगेगा। जिन्होंने भी संसार की हक़ीक़त को जाना है संसार उन्हें ज़रा बेगाना सा लगा है। इसीलिए कबीरों को, संतों को पिया की नगरी की याद आती है—अमरपुर की याद आती है। आम आदमी को नहीं आती, आम आदमी को नहीं आती;क्योंकि उसने दुनिया को जाना ही नहीं है। आम आदमी तो बड़े मज़े से घर बनाता है और कहता है, “यह देखो।“ कबीर साहब कहते हैं, "कंकरी चुनि-चुनि महल बनाया लोग कहें घर मेरा।" इसको तुम घर बोलते हो अरे! उस घर को छोड़ दो तुम इस घर में भी नहीं रहने वाले और जो तुम्हारा घर है उसकी तुम्हें कोई सुध नहीं है।

बेशक सुंदर है मिट्टी का नृत्य;पर मुझे तो प्यारा वो है जो मिट्टी में फूल खिला देता है। बाहर छोटे-छोटे नन्हे पौधे लगे हैं उन्हें ग़ौर से देखिएगा निकलते वक्त। यह हुआ कैसे—मिट्टी फूल बन गयी, कैसे हो गया और फूल भी ऐसा जो हवा के साथ नाचता है और फूल भी ऐसा जिसे सूरज से प्रेम है—मिट्टी, मिट्टी? और तुम यह मत समझ लेना कि कबीर साहब कह रहे हैं 'नैहरवा हमका न भावे' तो इसका मतलब उन्हें कोई विशेष दुख है,बात बिलकुल उल्टी है। दो बातें हैं समझना। कबीर साहब स्वयं में आनंदित हैं;क्योंकि जिसको उसकी याद आ रही है उसे आनंद है वो स्मृति वो सुमिरन ही आनंद है;याद तो आई।

कबीर साहब आनंदित हैं चूँकि आनंदित हैं;इसिलिए उन्हें सुख-दुख का बड़ी संवेदनशीलता से अनुभव होता है— यह पहली बात। दूसरी बात—चूँकि वो आनंदित हैं;इसिलिए जब दुनिया को, ज़माने को देखते हैं तो करुणा से भर उठते हैं। कहते हैं, “यह चल क्या रहा है क्या संभावना थी तुम्हारी क्या पहचान थी तुम्हारी और क्या तुम बने बैठे हो।“

"हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जले ज्यूँ घास । सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ।।" ~कबीर साहब

तो कबीर साहब अगर कह रहे हैं, 'हमका न भावे ये नैहर तो इसिलिए न भावे'; क्योंकि नैहर में जितने हैं सबकी बड़ी दुर्दशा दिख रही है। आसपास एक संत देखता है और कहता है, 'हे भगवान! यह क्या लीला है।' मौत स्वभाव हमारा आनंद धर्म हमारा और चारों ओर दिखती है बस त्रासदी और यंत्रणा। जिसका चेहरा देखो उसी का चेहरा सूखा हुआ है, मुरझाया हुआ है, जिसको देखो वही शक की गिरफ़्त में है, जिसको देखो उसी की नज़रें झुकी हुई हैं, जिसको देखो उसी के पास अपनी चिंताएँ हैं, जिसको देखो वह अपने में ही खोया हुआ है उसे उसका कुछ पता ही नहीं जो उपस्थित है जो चल रहा है; इसिलिए “नैहरवा न भावे।“ स्वयं के लिए तो अब कबीर साहब की क्या ही माँग शेष है।

मिट्टी के इस देश की निशानी यह है कि यहाँ मिट्टी उठती है और गिरती है। कभी कोई आकार लेती है कभी कोई आकार लेती है। एक पेड़ खड़ा हो जाता है मिट्टी से उठा और समय बाद वही पेड़ पुन: मिट्टी हो जाता है। कबीर साहब एक अर्थ में मिट्टी हो चुके 'मैं कबीरा ऐसा मरा दूजा जन्म न होए।' तो उन्हें अब मिट्टी से छूटने की कोई व्यक्तिगत ख़्वाहिश नहीं है।

कहते हैं, 'सांई की नगरी परम अति सुंदर।' कैसे बता दिया उन्होंने कि 'सांई की नगरी परम अति सुन्दर है'। वो वहाँ के निवासी हो गए हैं एक तरह की दोहरी नागरिकता है उनके पास दिखने में वो मिट्टी के देश के हैं और वास्तव में उनका आवास कहाँ है? वहाँ, 'जहाँ कोई आवे न जावे।' वहीं के वह गीत गाते हैं तो अपने लिए तो माँग नहीं रहे होंगे कि परमात्मा मुझे आज़ादी दिला यहाँ की तमाम दुश्वारियों से। वो तो वहाँ पहुँच गए अपने लिए क्या माँगना है वो माँग रहे हैं — तुम्हारे लिए। उन्हें यदि उदासी है, दुख है, उनके यदि आँसू हैं तो तुम्हारे लिए हैं। 'दिया कबीरा रोए'—वह इसलिए थोड़े ही रो रहे हैं कि बाज़ार में चीज़ें महँगी होती जा रही हैं या उनकी पसंद की सरकार नहीं बनी।

वह इसिलिए थोड़े ही रो रहे हैं कि बीवी ने रंगे हाथों पकड़ लिया ताक- झाँक कर रहे थे। उनके रोने और तुम्हारे रोने में अंतर है न और रोते तो वो ख़ूब हैं। कभी कहते हैं, 'दिया कबीरा रोए' कभी कहते हैं, 'उदास हूँ मैं', कभी कहते हैं कि 'सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।' ऐसा लगता है जैसे, उनके दुख का कोई पारावार नहीं। नहीं उनका दुख उनके लिए नहीं। दुख के प्रति तो वो मर चुके; सुख के प्रति भी। कबीर को संसार व्यक्तिगत रूप से अब न अच्छा लगता है न बुरा लगता है। उनके लिए संसार बस अब है, 'परमात्मा का विस्तार' उसके प्रति निर्णेता होना कबीर को सुहाएगा नहीं, कहेंगे, 'यही तो है इसको क्या बोलूँ अच्छा और क्या बोलूँ बुरा।'

संसार को तो वैसे ही होना था जैसा वो है। प्रकृति को भी वैसे ही होना था जैसी वो है। इंसान के पास विकल्प था सदा है। इंसान को देख करके ज़रूर दुखी हुआ जा सकता है। तुम ऐसे क्यों रह गए तुम तो आज़ भी बदल सकते हो। पेड़ से कबीर की कोई शिक़ायत नहीं पेड़ों को लेकर तो कबीर ने कितनी बातें बोल दी, 'तरुवर बोला पात से सुन पत्ते मेरी बात इस जग कि यह रीत है एक आवत एक जात।'

पेड़ को थोड़ी कह रहे हैं कि अरे! पेड़ तेरा मोक्ष निर्वाण कब होगा। इंसान को लेकर के अफ़सोस “यह तूने क्या कर डाला!” पेड़ ठीक है, पशु भी ठीक है, पहाड़ भी ठीक है, रेत भी ठीक है, पूरी कायनात ठीक है। इंसान बीमार है बहुत! बीमार है। कोई पत्ता उदास नहीं देखा होगा। पशु मरता भी है तो उसे दैहिक कष्ट होता है उसका मन नहीं तड़पता, अंतर है दोनों में — कोई जानवर उतना दर्द नहीं अनुभव करता जितना इंसान करता है क्योंकि दर्द तो सज़ा है वो होनी थी तुमको जीवन में। तुम्हारे जीवन में अगर दर्द ही दर्द भरा हुआ है तो तुम्हे सज़ा मिल रही है ज़रूर तुमने गलतियाँ की हैं, पाप किए हैं और करे ही जा रहे हो। उदासी सज़ा है, मन का छिन्न-भिन्न रहना सज़ा है। तुम अपनेआप को भोक्ता मत मान लेना। तुम अपनेआप को शिकार मत मान लेना। तुम अपनेआप को पीड़ित-शोषित मत मान लेना। तुम सज़ायाफ्ता हो।

तुम जो हो प्रतिक्षण तुम्हें उसका फल मिल रहा है। यह शोषण नहीं किया जा रहा है तुम्हारा, यह अन्याय नहीं हो रहा तुम्हारे साथ। यह न्याय हो रहा है और न्यायाधीश तुमसे कह रहा है, 'तुमने ग़लती की है जानते-बूझते ग़लती की है तुमने चुना है कि तुम्हे सज़ा मिले' तो लो तुम्हें सजा मिल रही है—यह न्याय है। और तुम उदास जब होते हो तो इस भावना के साथ कि मेरे साथ तो कुछ ग़लत हो रहा है; ग़लत कुछ नहीं। कबीर की उदासी ज़रा अलग है। वह यह नहीं कहते कि उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है वो तो बचे ही नहीं हैं सही-ग़लत झेलने के लिए वो तुम्हें देखते हैं और कहते हैं, वाह! बार-बार तुम्हें आईना दिखाते हैं बार-बार तुम्हें तुम्हारे जीवन की याद दिलाते हैं। और फिर तुमसे पूछते हैं, 'यही होने को पैदा हुए थे।' दर्पण सामने रख तुम्हें—तुम्हारी शक्ल दिखाते हैं और कहते हैं, 'यही शक्ल चाहिए थी?' तुमसे पूछा जाता कभी कि चेहरा कैसा हो तुम्हारा—तुम यही माँगते कि ऐसा हो।

यह हालत क्यों कर ली अपनी? फूल—फूल जैसा है, पत्ता—पत्ते जैसा है, झरना—झरने जैसा है, बिल्ली—बिल्ली जैसी है। उनमें से किसी की भी शक्ल विकृत नहीं हो गयी। इंसान की शक्ल इतनी निचोड़-मरोड़ क्यों दी गई है—तो इसलिए 'नैहरवा हमका न भावे।' नैहर की ग़लती नहीं है संसार की ग़लती होती तो सभी फिर वैसे ही होते जैसे तुम हो। संसार की ग़लती अगर होती तो यह (दीवार पर लगी संतो की तस्वीर की ओर इशारा करते हैं) कहाँ से आ जाते। यह मिट्टी अगर बंजर होती पथरीली होती तो यह (आस-पास लगे पौधों की ओर इशारा करते हैं) फूल कैसे खिलते; यह तो खिले। मिट्टी को दोष मत देना, भाग्य को दोष मत देना, स्थितियों का रोना मत रोना — तुमने चुना है।

कितने अफ़सोस की बात है कि तुम आनंद चुन सकते थे—उदासी चुनी। आज़ादी चुन सकते थे—सलाखें चुनी, उत्सव चुन सकते थे—मातम चुना। 'नैहरवा हमका न भावे' इसिलिए जो भी जगा है, उसने जगने के बाद अपनी सुध छोड़ दी है और अपनी सुध छोड़कर वह कहीं भाग नहीं गया। उसने ज़माने की सुध ली है। जगने की निशानी ही यही है कि अब तुम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर के दुनिया के हो जाओगे। तुम सब झेलोगे दुख-सुख; पर अपने लिए नहीं दुनिया के लिए। तुम रोओगे ठीक वैसे ही जैसे कबीर रोते हैं। अभी भी तुम उपस्थित रहोगे वैसे ही जैसे—कबीर हैं। अभी भी तुम नज़र यहीं आओगे कि कपड़ा बुन रहे हैं। यह क्या! बाज़ार गए हैं वहाँ सौदा कर रहे हैं रुपए-पैसे की बात कर रहे हैं। कबीर कपड़ा इसलिए नहीं बुन रहे कि उन्हें पैसा इकट्ठा करना है। हाट में सौदा इसिलिए नहीं कर रहे कि उनको बड़ा आदमी बनना है। उन्हें तुमसे अपनी बात कहनी है वो उन्होंने आख़िरी सांस तक कहीं; कबीर इसिलिए अब ज़िंदा हैं। कबीर इसिलिए अब थोड़ा- बहुत धन अर्जित करते हैं, जो वो करते हैं ताकि वो बने रहे ताकि तुम्हें—तुम्हारी यंत्रणा से मुक्ती दिला सके।

बोधिसत्व से किसी ने पूछा, 'यह पार संसार है मृत्यु का विस्तार है इस पार सब जल रहा है और तुम देखो तट तक आ गए हो और देखो तुम्हारे लिए नाव भी उपलब्ध है तुम क्यों नहीं पार चले जाते तुम क्यों नहीं तर जाते। इस तरफ़ तो दुख ही दुख है तुम इधर क्यों रुके और फँसे हुए हो।' बोधिसत्व ने कहा, 'बिलकुल इधर अब मेरा कुछ बचा नहीं, निजी कोई दायित्व नहीं जीने के लिए व्यक्तिगत कोई हसरत नहीं। लेकिन उस पार अकेले नहीं जाऊँगा—यह नाव प्रतीक्षा करेगी। जाएँगे तो सब जाएँगे नहीं तो कोई नहीं जाएगा—मैं भी इन्हीं के साथ रहूँगा।'

कबीर ऐसे जीते हैं। वो कह रहे हैं, 'अकेले अपने लिए मुक्ति चाहिए नहीं, अकेले अपने लिए मुक्ति संभव नहीं।' दोनों बातें एक साथ अपने लिए चाहिए भी नहीं और अपने लिए वस्तुत: संभव भी नहीं। तो इसिलिए मैं सेवा कर रहा हूँ। इसको सेवा कहो, इसको प्रेम कहो, इसको गुरुत्व कहो इसको देशना कहो जो चाहे कह लो पर संसार से यह मेरा नाता है।

कोई यह कह सकता है कि मैं गुरु हूँ उपदेश देता हूँ। कोई यह भी कह सकता है कि सेवक हूँ सेवा करता हूँ। दोनों ही ठीक कह रहे हैं, यह नाता है मेरा; पर जाएँगे तो सब एक साथ जाएँगे। मैं तुमसे बात करूँगा तुम्हें समझाऊँगा, प्रतीक्षा करूँगा तुम्हारी। तुमने नाहक ज़िद पाल रखी है दूसरी ओर शीतलता है, सौंदर्य है, स्वर्ग है और तुम इस जलते हुए किनारे पर बने रहना चाहते हो। तुम कहते हो, 'यही घर है मेरा।' नहीं, यह घर नहीं है तुम्हारा, आग तुम्हारा घर नहीं हो सकती। घर तुम्हारा जल रहा है तुम्हें मैं छोड़ नहीं सकता;तुम्हें छोड़ नहीं सकता तो लपटे झुलसा मुझे भी रही है। लेकिन कोई बात नहीं हम तो कबके जल चुके। राख को कोई क्या जलाएगा। हाँ, तुम्हें देखते हैं तड़पते हुए, देखते हैं कि नाव उपस्थित है फिर भी तुम घर में ही बने रहना चाहते हो तो फिर हम गा उठते हैं "नैहरवा हमका न भावे।"

जो मिट्टी से तादात्म्य रखते हैं, उनकी पहचान यह है कि वो अपने पुतले में यक़ीन रखते हैं उन्हें अपनी निजी सत्ता में यक़ीन है। पुतला कहता है, 'मैं उतना ही हूँ जितना पुतला है।' और जिन्होंने मिट्टी के आवरण के नीचे अपनी हक़ीक़त को जाना है सच्चाई को गले लगाया है, वो कहते हैं, 'नहीं भाई, मिट्टी बँट सकती है कि आधी इधर करो आधी उधर करो। आठ पुतले खड़े कर दो और आठों अलग-अलग है;पर मिट्टी में जो प्राण हैं वो बँटे हुए नहीं हो सकते।' तो इसीलिए हमारी व्यक्तिगत मुक्ति झूठी होगी, अर्थहीन होगी। हम अगर पुतले होते तो कह देते कि एक पुतला नाव पर बैठकर पार चला गया, एक पुतला मुक्त हो गया; तर गया।

पर अगर हम पुतले ही होते तो तर कैसे जाते? तर तो हम तभी न जब हमने जाना कि हम पुतले हैं नहीं। प्राण विभाजित नहीं होते शरीर विभाजित होते है। आत्मा एक है जो शरीर के तल पर है वो कहेगा कि मेरे हित और दुनिया के हित अलग- अलग हैं, मैं अलग हूँ दुनिया अलग है तो मेरे हित दुनिया से अलग हुए। और जो शरीर के तल पर अब नहीं देख रहा नहीं जी रहा वो ऐसी बात नहीं करता। उसे कुछ और दिखता है। वो कहता है, 'या तो सब एक साथ नहीं तो कोई भी नहीं और कुछ भी नहीं।'

जब कबीर साहब कहें 'नैहरवा हमका न भावे', तो वो कह रहे हैं, 'तुम्हारा चुनाव उनको नहीं भा रहा, इंसान उनको नहीं भा रहा, इंसान का भटका हुआ मन उनको नहीं भा रहा।' भूल में मत पड़ जाना कि जैसे, कबीर को पृथ्वी से ही कोई शिकवा हो। नहीं कुछ नहीं। कहा ही था मैंने कि फूल से जाकर नहीं, कबीर कहेंगे कि तुझमे कोई दोष है या तू मुझे नहीं भाता। गाय, घोड़ा, चींटी, हाथी यह सब अपनी- अपनी जगह स्थापित है इनको लेकर के संतो ने कोई व्यग्रता ज़ाहिर नहीं करी है। आदमी को लेकर रोए हैं सब; क्या हालत कर ली!

इनको ग़ौर से देखो प्रेरित भी अनुभव करो और अपमानित भी। यह भी देखो कि कितनी संभावना है और यह भी देखो कि कितना चूके तुम। देखो कि क्या हो सकते थे और देखो की कैसे रह गए। यक़ीन मानो किसी निर्धाता ने तय कर के नहीं भेजा था कि “उस शक्ल वाला उस देह वाला वहाँ ऊँचा बिराजेगा” और बाकी सब संसार में मिट्टी पर लोटते नज़र आएँगे। नहीं, किसी ने तय नहीं किया था। यह तुम्हारे चुनाव की बात है;यह तुमने तय किया—तुम दुख में हो तो विधाता ने नहीं तय किया, यह तुमने तय किया। ये (दीवार लगी संतों की तस्वीर की ओर इशारा करते हैं) वहाँ हैं तो यह परमात्मा ने नहीं तय किया यह इन्होंने तय किया। तुम चैतन्य हो, विकल्प सदा तुम्हारे पास रहता है कि चेतना को और गहरा करूँ या निर्णय ऐसा लूँ जो बेहोश कर देगा।

जितना भी आधा-अधूरा होश है तुम्हारे पास इस बात को पकड़ लेना। जितना भी आधा-अधूरा होश है तुम्हारे पास उसमें तुम्हारे पास यह विकल्प रहता है कि कुछ ऐसा करूँ जो होश को और गहरा कर देगा या कुछ ऐसा करूँ जो होश जो बचे-खुचे होश को भी मिटा देगा हटा देगा। सुबह तुम सो के उठते हो अधजगे रहते हो न, आधा होश है आधी नींद है। और उस वक्त दो विकल्प होते हैं कि नहीं—रज़ाई हटा दो होश बढ़ जाएगा और रज़ाई और मुँह पर डाल दो तो जितनी नींद खुली भी है उतनी भी ग़ायब हो जाएगी। इंसान की हालत उस आदमी जैसी है जो अधजगा है। अब चुनाव तुम कर सकते हो, इस अधजगी हालत में भी तुम चुनाव कर सकते हो—तुम कह सकते हो आधा जगा हूँ और पूरा जगना है, हटाओ रज़ाई खड़े हो जाओ नीचे। यह आधे जगे वाले ने फ़ैसला किया है पूरा जगने का या वहीं आधा जगा आदमी फ़ैसला कर सकता है कि नहीं साहब अभी तो सोते हैं।

फ़ैसला तुम कर रहे हो और यह मत कहना कि हम तो आधे जगे हुए हैं इसिलिए हमारा फ़ैसला अनिवार्यत: ग़लत ही होगा। नहीं, पूरा जगने का फ़ैसला भी आधा जगा आदमी ही करता है तुम जैसे हो उसी हालत में तुम तय कर सकते हो कि उठना है। तो यह बहाना तो देना ही मत कि वो नींद आ गई। झूठी बात है! नींद आयी नहीं तुमने चुना कि नींद ही रखनी है, तुमने चुना कि नींद ही चाहिए।

यह कितनी अजीब बात है सोचो तुम शराब पी रहे हो, शराब चढ़ी हुई है। तीन पेग ले चुके हो, अभी भी निर्णय कर सकते हो तुम विकल्प है तुम्हारे पास तुम यह भी कह सकते हो कि चौथा पेग आ जाए और तुम यह भी कह सकते हो कि थोड़ा नींबू पानी ले आओ। एक निर्णय तुम्हारी बेहोशी को कम करेगा एक निर्णय तुम्हारी बेहोशी को गहरा देगा। तो यह तो कहना ही मत कि इतना पी रखी थी तो और पी ली। पर यह तुम्हारा पसंदीदा तर्क है। कोई पूछे कि “क्यों पी ली” तुम कहते हो, 'पी ली थी; इसलिए पी ली' फिर कोई पूछता है, 'और क्यों पी ली' तो तुम कहते हो, 'और पी ली थी; इसलिए और पी ली।' यह तर्क है तुम्हारा कि नहीं है।

जो सबसे ज़्यादा गर्हित हालत में लोग होते हैं, मेरे पास आते हैं। मैं कहता हूँ, बहुत बुरे फँसे हो— छोड़ो और दुनिया से ज़्यादा फँसे हुए हो तुम—छोड़ो। तो जानते हो उनका तर्क क्या होता है, 'इतना फँसे हैं अब कैसे छोड़े, अजीब बात है! इतनी पी ली है अब पीना कैसे छोड़ दें' यह कुबुद्धी है। तुम तर्क दे रहे हो इसलिए ताकि तुम्हारे बंधन बचे रहें यह—कुबुद्धी है। जैसे, कोई कमज़ोर आदमी कहे कि “मैं इतना कमज़ोर हूँ मैं कैसे खेलूँ, मैं कैसे दौडूँ, मैं कैसे व्यायाम करूँ।“

और सुबुद्धि होती है कि मैं चूँकि कमज़ोर हूँ; इसिलिए मैं और ज़्यादा प्रेरणा से दौड़ूँगा, समय दूँगा, व्यायाम करूँगा, खेलूँगा; पर यह तर्क तुमने ख़ूब सुना होगा, 'मैं तो बहुत ही कमज़ोर हूँ, मैं कैसे दौड़ूँ!' यह तुम क्या कह रहे हो? क्यों नहीं आए क्यों नहीं बात सुनी? 'वो आचार्य जी ज़िम्मेदारियाँ बहुत हैं, बंधन बहुत है।' अगर तुम पर बंधन बहुत है तो तुम्हें और ज़्यादा आने की ज़रूरत है या बंधनों की दुहाई देकर और कम आने की ज़रूरत है, जवाब दो। पर देखो तुम कैसा तर्क मारते हो तुम कहते, 'हमारे बंधन बहुत ज़्यादा हैं; इसिलिए हम और कम आते हैं यही है दुर्बुद्धी। इतना क्यों खाते हो, 'मैं मोटा हूँ न इसिलिए भूख ज़्यादा लगती है' ग़ज़ब! हो। और इतना कम क्यों दौड़ते हो, 'मैं मोटा हूँ न इसिलिए दौड़ नहीं पाता।' दुर्बुद्धि की निशानी यह है कि वो आधार ही बनाती है अपनी बिगड़ी हुई स्थिति को वो उसको पैमाना बनाती है। मोटा आदमी है तो ज़ाहिर है ज़्यादा खाएगा लेकिन वो इसी बात को अपनी सहूलियत बना रहा है। 'अरे! तू इतना क्यों खा रहा है? 'क्योंकि मैं बहुत मोटा हूँ।'

यह क्या कर रहे हो? तुम्हें अपने खिलाफ़ जाना है, अपने साथ नहीं। तुम आप अपना नर्क हो अपना विरोध करना सीखो।

अपनेआप को इतनी छूट मत दिया करो, अपनेआप को इतनी हैसियत मत दो। अपने साथ मत चल दिया करो कि मेरा मन कर रहा है तो मैं चल दिया। अरे! तुम्हारा मन यही करेगा हमेशा कि नर्क की ओर जाओ। क्यों चले जा रहे हो? यह मन भ्रष्ट हो चुका है यह मन तुम्हारा है ही नहीं क्योंकि तुम परमात्मा के हो ही नहीं यह तर्क दे मत देना। और यह तर्क सब देते हैं; इसिलिए 'नैहरवा हमका न भावे!'

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