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नादान परिंदे || आचार्य प्रशांत: शिव, शक्ति, और मन की उड़ान (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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क्यों देश-विदेश फिरे मारा क्यों हाल-बेहाल थका हारा क्यों देश-विदेश फिर मारा तू रात-बीरात का बंजारा ओ नादान परिंदे घर आजा घर आजा… घर आजा… घर आजा आ आ… नादान परिंदे घर आजा…

~ फ़िल्म (रॉकस्टार)

प्रश्नकर्ता (प्र): उक्त पंक्तियों को मैं आजकल अपनी वैचारिक प्रक्रिया से जोड़कर देख रहा हूँ और पा रहा हूँ कि मन में विचारों की दौड़ पहले की तरह आती है, पर अब बीच में ही सजग हो जाता हूँ और कभी-कभी इसे रोकने की कोशिश करता हूँ। तो फिर ये और तेज़ हो जाती है। रोकते समय कुछ-कुछ यही कहता हूँ कि "मन क्यों भाग रहा है, वापस क्यों नहीं आ जाता?" जानते हुए भी कि मन रोकने से रुकेगा नहीं, बार-बार मन को रोक कौन रहा है? क्या ये भी मन की ही चाल है? कृपया स्पष्ट करें।

आचार्य प्रशांत (आचार्य): मन माने ऊर्जा। समझना, ऊर्जा क्या है? ऊर्जा, पदार्थ, संसार एक हैं। संसार माने ऊर्जा। संसार अभी तुम्हें पदार्थ रूप में दिखाई देता है। पदार्थ रूप में नष्ट हो सकता है। हो सकता है कि पदार्थ मिट जाए, ऊर्जा मात्र बचे। ऊर्जा पदार्थ बन जाती है, ऊर्जा अनुभव बन जाती है। और जो तुम्हें अनुभव होने लगता है, उसे तुम पदार्थ का नाम देने लग जाते हो।

आइंस्टीन को वैसे तो सभी जानते हैं, पर उनका जो एक समीकरण सामान्य रूप से भी बहुत प्रचलित हो गया, वो क्या है? ई=(एमसी)^२। जो लोग भौतिकी नहीं भी पढ़े हुए हैं, वो भी जानते हैं कि ई=(एमसी)^२। लोग टी-शर्ट पर छपवाकर घूम रहे होते हैं, ई = (एमसी)^२। ये क्या है? पदार्थ और ऊर्जा एक है, ये बताने वाला समीकरण।

मन की दुनिया में पदार्थ-ही-पदार्थ है, और मन की दुनिया में गति-ही-गति है। गति ऊर्जा है, पदार्थ ऊर्जा है। और समस्त पदार्थ-ऊर्जा उठती एक ऐसे बिंदु से है जहाँ शिवत्व मात्र है, जहाँ कोई गति नहीं है—न पदार्थ है न ऊर्जा है, मात्र स्रोत है।

बात को समझना, ध्यान की आवश्यकता है। शिव स्रोत हैं शक्ति के, पर शिव स्वयं कभी गति नहीं करते। कह सकते हो कि शिव की गति को ही शक्ति कहते हैं। जब तक शिव हैं और शक्ति हैं, मामला बिलकुल ठीक है क्योंकि शक्ति का पूर्ण समर्पण, शक्ति की पूर्ण भक्ति शिव मात्र के प्रति है। वहाँ कोई तीसरा मौजूद नहीं।

शिव-शक्ति के बीच में किसी तीसरे की गुंजाइश नहीं, तो वहाँ पर जो कुछ है बहुत सुंदर है। शिव केंद्र में बैठे हैं, ध्यान में, अचल, और उनके चारों तरफ गति है, सुंदर नृत्य है शक्ति का। वहाँ किसी प्रकार का कोई भेद नहीं, कोई द्वंद नहीं, कोई टकराव नहीं, कोई विकल्प नहीं, कोई संग्राम नहीं।

आदमी भी शिव-शक्ति का ही खेल है, बस दिक्कत ये है कि यहाँ पर तीसरा बैठा हुआ है। अरे, ये क्या हो गया? तुम्हारे हृदय में शिव हैं, लेकिन तुम्हारी गति में विशुद्ध शक्ति है कि नहीं वो निर्भर करता है तुम्हारी चेतना पर। और चेतना निर्णय ले सकती है। जब शिव और शक्ति मात्र हैं, तो हमने कहा कि वहाँ कोई विकल्प नहीं होता; वहाँ बात बनी बनाई है कि शक्ति को किसको समर्पित रहना है? किसके संकेत पर चलना है? मात्र किसकी ओर देखना है? शिव की ओर।

आदमी के साथ ऐसा नहीं है। आदमी के हृदय और आदमी के जीवन के बीच में मन बैठा हुआ है। और मन के पास दुर्भाग्यवश अधिकार है निर्णय का, विकल्प का।

शक्ति निर्विकल्प हैं। शक्ति को शिव के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। शक्ति निर्विकल्प हैं। शक्ति से पूछो, "तुम्हारा मालिक कौन, स्वामी कौन?" उन्हें सोचना नहीं पड़ेगा, वो तुरंत कहेंगी, "शिव।"

आदमी का मन ऐसा नहीं है; उसके पास विकल्प हैं। वो ये भी कह सकता है कि "मेरे मालिक शिव हैं," और ये भी कह सकता है कि "मैं अपना मालिक स्वयं हूँ।" गड़बड़ हो गई न? जब आदमी कह देता है—आदमी से मेरा तात्पर्य है आदमी का मन—कि "मेरे मालिक शिव हैं," तो वो निर्विकल्प हो जाता है। फिर उसकी ऊर्जा निर्विकल्प होकर बहती है। उसे सोचना-विचारना नहीं पड़ता, निर्णय नहीं करना पड़ता, जीवन में द्वंद नहीं बचते। वो बैठकर सिर नहीं पटकता कि क्या करूँ, क्या ना करूँ। तुम नहीं पाओगे कि उसके चित्त की दशा ज्वार-भाटे की तरह है, कि रंग बदल रही है बार-बार; क्योंकि उसने तो तय कर लिया, उसने अब डोर सौंप दी। उसने अब ये अधिकार ही अपने पास नहीं रखा कि कुछ और भी हो सकता है—जो होना था वो हो गया। मुकदमे का फैसला आ गया है, निर्णय हो गया है। आखिरी बात हो गई है, डिब्बा बंद, केस खत्म।

"हम एक के होने थे, एक के हो गए। हमें अब और कोई ख्याल आता ही नहीं।" जो ऐसा आदमी होता है, उसको अपने विचारों को रोकना इत्यादि नहीं पड़ता क्योंकि उसके विचार तो अब बह ही रहे हैं किसके इशारे पर, किसकी ओर? शिव की ओर। शिव से अर्थ समझ रहे हो न? सत्य, हृदय।

लेकिन मन यदि अभी वैसा नहीं हुआ है, मन अगर अभी निर्णय का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहता है, तो कभी तो ऐसा होगा कि वो कहेगा, "शिवोहम शिवोहम। मैं शिव हूँ, मैं शिव का परम भक्त हूँ, और शिव के अलावा मुझे कोई दिखाई नहीं देता।" उन क्षणों में क्या बात होगी मन की! बहुत सुंदर लगेगा, रस की गंगा बहेगी। लेकिन कुछ ही देर बाद तुम पाओगे कि मन ने अपना निर्णय पलट दिया। पलट क्यों दिया? क्योंकि निर्णय पलटने का अधिकार अपने पास बचाकर रखा था।

तो स्वयं ही निर्णय किया था कि "शिव, शिव, शिव," और फिर स्वयं ही निर्णय कर लिया कि “नहीं भाई, शिव नहीं, मामला गड़बड़ है। अपनी मालकियत हम शिव को नहीं दे सकते। हम खुद तय करेंगे, नफ़ा-नुकसान खुद देखेंगे, अपना रास्ता खुद बनाएँगे। हमें सब पर शक है, और कभी-कभी तो हमें इस शिव पर भी शक होता है।” बात समझ में आ रही है?

जैसे ही ये होगा, वैसे ही अब मन ने अपने ऊपर बहुत भारी ज़िम्मेदारी ले ली। अब मन ने अपने ऊपर क्या ज़िम्मेदारी ले ली है? कि जीवन मैं चलाऊँगा। जब मन ने अपनी बागडोर शिव को दे दी, तो अब जीवन किसको चलाना है? शिव को। पर जैसे ही मन ने कहा, “नहीं साहब, मेरी ज़िंदगी तो मेरे हाथ है। ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है और मेरे ऊपर है।” वैसे ही अब मन के ऊपर जानते हो कितना बड़ा बोझ आ गया? कि अब तुम चलाओ ज़िंदगी। अब देखो कि भविष्य में क्या होगा। अब देखो कि तुम्हारे सारे रिश्ते-नातों का क्या होगा, तुम्हारी सारी संपदा का क्या होगा, तुम्हारे जीवन का क्या होगा।

मन छोटा-सा, और ज़िम्मेदारी ले ली इतनी बड़ी, तो पगला जाएगा। जैसे किसी बच्चे से तुमने बोल दिया हो कि चल बेटा, अपनी पीएचडी थीसिस (शोध प्रबन्ध) जमा कर दे। और बच्चा भी ऐसा आग्रही कि वो कह रहा हो कि "कर ही देंगे हम।" और वो लगा हुआ है। लग तो गया है, ज़िम्मेदारी तो उठा ली है, हश्र क्या होगा? पागल हो जाएगा। या फिर कोई झूठी, अधकचरी, बनावटी, हास्यास्पद फ़ाइल प्रस्तुत कर देगा, जमा कर आएगा। बच्चे ने बनाई है, कैसी होगी?

तो तुमने पूछा कि कौन हैं ये दो: एक तरफ है विचारों का विक्षिप्त बहाव, और दूसरी तरफ कोई है जो उन विचारों को रोकता है। ये दोनों तुम हो। तुम एक नहीं हो; तुम दो हो। जो भी कोई चेतना की ज़िंदगी जी रहा है, जो भी कोई मन के साथ तादात्म्य रखता है, वो एक नहीं है, वो दो है क्योंकि चेतना का अर्थ ही होता है 'दो'। चेतना माने 'दो'। चेतना माने वो जो कभी शिव की ओर भी जा सकती है और कभी शिव के खिलाफ भी।

हम सब का उपनाम है 'चेतना'। हम निर्णय करते हैं न? हम सोचते हैं, विचारते हैं, नापते हैं, तौलते हैं। आप सोचोगे-विचारोगे, तो कभी निर्णय आएगा कि उधर को चल दो, और कभी ये भी आएगा कि इधर को चल दो। ये सारा झंझट परिणाम है बेवफ़ाई का। शक्ति की तो पूरी वफ़ा है शिव के प्रति, हमारी नहीं है। और ऐसा भी नहीं कि हम बेवफ़ा हैं। कभी तो हम बहुत ही वफ़ादार हैं, अहा! और कभी हमसे ज़्यादा बेवफ़ा कोई नहीं।

ये है आदमी की हालत: कभी धूप कभी छाँव। ना वफ़ा निभाई जाती है ना रिश्ता तोड़ा जाता है। ऐसे जी रहे हैं हम। तुम तय कर लो ज़्यादा आसान क्या है, वफ़ा निभाना या रिश्ता तोड़ देना? किसी एक तरफ को तो चले जाओ, ये बीच में लटके हो त्रिशंकु की तरह। सुना है न, "आसमान से गिरे खजूर में अटके"? अब देख लो, बाहर वहाँ खजूर का लंबा पेड़ है। सिर उठाओगे, देखोगे, तो वहाँ ये (प्रश्नकर्ता की ओर इशारा करते हुए) लटके हुए हैं ऊपर। इससे भला तो गिर ही जाओ, चोट एक बार को लगेगी। वहाँ लटके-लटके तो प्रतिपल यंत्रणा पा रहे हो, पा रहे हो कि नहीं? हिम्मत करके तुम गिर ही पड़ो। दो-चार हड्डी टूटेगी, बहुत होगा तो ज़िंदगी से जाओगे, पर ये पल-पल की मौत से तो बचोगे। और नहीं ये कर सकते, तो वहीं खजूर के ऊपर घर बना लो। यही कर लो। यूँ लटके तो मत रहो।

और याद रखना, मैं सिर्फ सलाह दे सकता हूँ क्योंकि अपनी नज़रों में मालिक तो तुम खुद हो। मालिक तुम खुद हो, तो निर्णय तो तुम ही करोगे। मैं तुम्हारे लिए निर्णय नहीं कर पाऊँगा क्योंकि तुमने मुझे हैसियत ही बस दी है मंत्री की, सलाहकार की। राजा तो तुम ही हो। जब राजा तुम हो, तो गुरु की भी अधिक-से-अधिक क्या हैसियत है? सलाह दे सकता है, और क्या हो सकता है। जो लोग राजा होते हैं, गुरु उनके लिए बहुत हुआ तो क्या हो जाएगा? मंत्री। अब मंत्री जाएगा, हाथ जोड़कर कुछ निवेदन कर देगा, माने या न माने, ये तो राजा साहब की मर्ज़ी।

जब तुम सीधे-सीधे शिव की ही नहीं मान पाए तो ज़रा मुश्किल है कि गुरु की आसानी से मान लोगे। निवेदन किया जा सकता है, "सुन लो भाई," बाकी तो आप राजा हैं।

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