आचार्य प्रशांत: छह-सात साल पहले भी यहाँ पर शिविर लगा था। (गंगा जी के किनारे ) थोड़ा लम्बा सा शिविर था, कम-से-कम हफ़्ते-दस दिन का रहा होगा। तो बहुत सारे उसमें पार्टिसिपेंट (प्रतिभागी ) थे, कुछ उसमें जवान लोग भी थे कॉलेजी, ऐसा ही पूरा गंगा का बहाव था। तब दिन में चार-चार सत्र हुआ करें, सुबह पाँच बजे से सत्र शुरू हो जाएँ, रात में भी बारह बजे, एक बजे, दो बजे तक चलें। लोगों को सोने को भी कम मिले मगर बड़ी मौज रहती थी।
दिन के समय पर धूप कड़ी हो जाए। रात में ठंडक हो जाती थी, दिन में धूप। तो दिन में लोग ऐसे ही गंगा में नहाने के लिए आएँ। तो जो वहाँ पर कैंप के मैनेजर थे उन्होंने एक-दो गार्ड्स (सुरक्षाकर्मी) नियुक्त कर दिए और वो गार्ड्स क्या करते थे कि ऐसे ही अपना वो तट पर रहें और वहाँ पर किसी चट्टान से या किसी और चीज़ से एक बहुत मोटी रस्सी बाँध दी उन्होंने। और उन्होंने ये कर दिया कि जो भी लोग नहाने जा रहे हैं वो उस रस्सी को हमेशा पकड़े रहेंगे।
अब इस स्थिति को समझिए, स्थिति क्या है कि गंगा हैं, तेज़ बहाव है और जवान लोग हैं, उनका मन कर रहा है बहाव में अन्दर तक चले जाएँ, वो रुकने को राजी नहीं कि भई किनारे पर रहो। वो अन्दर तक चले जाएँ तो फिर इन्तज़ाम ये किया गया कि एक रस्सी है जो किनारे से बँधी हुई है और उस रस्सी को पकड़े रहना फिर कितना भी गहरे चले जाओगे नुक़सान नहीं होगा बल्कि मौज ले पाओगे, आनन्द ले पाओगे, बस जो रस्सी है किनारे वाली उसको छोड़ना मत।
तो ठीक है, तो रस्सी इतनी लम्बी थी कि लाइन से कई लोग उसको पकड़ लेते थे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर और रस्सी अन्दर तक अपना चली जाती थी नदी में। तो अपना लोग उस रस्सी को पकड़े हुए हैं और अपना बह रहे हैं, जितनी दूर तक रस्सी जाती है काफ़ी दूर तक जाती थी। तो एक सज्जन थे वो सबसे आगे-आगे, कतार है उन लोगों की जिन्होंने रस्सी पकड़ रखी है उनमें वो सबसे आगे-आगे। थोड़ी देर में देखा गया कि वो बहे चले जा रहे हैं तो पीछे वालों ने चिल्लाकर पूछा कि भाई रस्सी पकड़ रखी है नहीं पकड़ रखी है, बहे कैसे चले जा रहे हो तुम? तो वो बोलते हैं बिलकुल पकड़ रखी है, बिलकुल पकड़ रखी है, तो ठीक है।




