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न ऊर्जा न शक्ति, तुम सद्बुद्धि माँगो || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, शरीर और ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा से बने हैं, तो इस शरीर में हम वो परम ऊर्जा कैसे महसूस करें?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): थोड़ी-सी ऊर्जा बढ़ जाती है तो थर्मामीटर लेकर दौड़ते हो। और ब्रह्मांड की परम ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो क्या करोगे? अंटार्कटिका में जाकर लोटोगे? वहाँ की भी सारी बर्फ़ पिघल जाएगी अगर ब्रह्मांड की ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो। क्यों ऐसे सवाल पूछ रहे हो? हमारी तो ऊर्जा विक्षिप्त ऊर्जा है। जितनी है उतनी ही नहीं संभाली जा रही, अभी और माँग रहे हो? और ऊर्जा नहीं माँगते; सद्बुद्धि माँगते हैं।

तुम्हारा बच्चा है छोटा, और वो कहता है, “मुझे मोपेड दिला दो," उसे दिला देते हो क्या? तुम्हारा दस साल का बच्चा है, वो मोपेड माँग रहा है। शायद चला भी ले, पर फिर भी दिला देते हो क्या उसको? और मोपेड है आठ हॉर्सपावर (अश्वशक्ति) की। और वही बच्चा मुझे सवाल लिखकर भेज रहा है, “मुझे सोलह सौ हॉर्सपावर की सुपरबाइक चाहिए।" कितने हॉर्सपावर की? सोलह सौ हॉर्सपावर की सुपरबाइक चाहिए। मैं उसको दूँ? बोलो तो दे दूँ। वो अभी इस काबिल नहीं कि आठ हॉर्सपावर की मोपेड चला सके, और माँग उसकी क्या है? ब्रह्मांड की अनंत ऊर्जा, सोलह सौ हॉर्सपावर मुझे दे दो। और दे दिया तो करेगा क्या?

प्र: दुर्घटना।

आचार्य: तुम पहले लूना चलाना तो सीख लो। तुम क्या माँग रहे हो? वो तुम्हें मिल गया तो क्या करोगे? अपना ही सर्वनाश करोगे।

सद्बुद्धि माँगो; ऊर्जा और नहीं माँगते। ऊर्जा पावर (ताकत) है, शक्ति है, और शक्ति अहंकार को बढ़ावा देती है, इसीलिए तो माँग रहे हो। और तुम तो शक्ति भी नहीं माँग रहे, तुम ब्रह्म की शक्ति माँग रहे हो, एब्सल्यूट पावर (पूर्ण शक्ति) माँग रहे हो। अंग्रेज़ी में चलता है: पावर करप्ट्स, एंड एब्सल्यूट पावर करप्ट्स एब्सल्यूटली (शक्ति भ्रष्ट कर देती है और पूर्ण शक्ति पूर्णतया भ्रष्ट कर देती है)। और तुम बिलकुल वही माँग रहे हो यहाँ पर, ब्रह्मांड की ऊर्जा, एब्सल्यूट पावर (पूर्ण शक्ति)। वो क्या करेगी तुम्हारा? एब्सल्यूट करप्शन (पूर्ण नैतिक पतन)।

एब्सल्यूट (पूर्ण) शक्ति सिर्फ शिव को शोभा देती है। वो शिव हैं इसीलिए शक्ति को संभाल सकते हैं। शक्ति तुम्हारे ऊपर जब उतर आती है, तो कहते हैं, “देखो, इसपर माता उतर आई है।" और देखा है जिन आदमी-औरतों पर माता उतरती है उनकी क्या हालत रहती है? ऐसे मासूम ना बनो। ऐसी जगहों पर आना-जाना सबका है।

प्र: पागलों जैसे लगते हैं।

आचार्य: हाँ, पागलों जैसे लगते हैं, झूम रहे हैं। संभाल पा रहे हैं अपने-आपको? कोई सर फोड़ रहा है अपना, कोई नंगा हो गया है, कोई गाली बक रहा है। तुमसे कहा जाए कि फलानी को माता आई है, तुरंत तुम्हारे मन में उत्साह उठेगा कि जाएँ और मिल आएँ? या भागोगे दूर-दूर कि ये पगलाई है, अभी इसको दूर रखो?

हमारी ऊर्जा बौराई हुई है, और वो बौराई ही रहेगी। जैसा मैंने कहा कि ऊर्जा को सुनियोजित, सुव्यवस्थित, प्रवाहमान, लयमान रखने का काम मात्र शिव कर सकते हैं। जिसके हृदय में शिव हैं, उसकी शक्ति नाचेगी।

नृत्य समझते हो? नृत्य में क्या होता है? गति में एक लय होती है, गति में एक अपूर्व व्यवस्था होती है, उसको तुम कहते हो नृत्य। और जिसके हृदय में शिव नहीं है, उसकी शक्ति बौराएगी, वो पगलाएगा। वो हाथ इधर मार रहा है, सिर उधर फोड़ रहा है, दस दिशाओं में एकसाथ भागने की कोशिश कर रहा है, वो ऐसा हो जाएगा। तुम्हें पहले क्या माँगना चाहिए, शक्ति कि शिव?

प्र: शिव।

आचार्य: तुमने शिव का यहाँ कहीं नाम लिखा नहीं। इस प्रश्न से शिव अनुपस्थित हैं। माँग क्या रहे हैं?

प्र: शक्ति।

आचार्य: और शक्ति क्या करती है? अहंकार बढ़ाती है। शिव माँग ही नहीं रहे। शक्ति क्या है? वो शक्ति शिव की प्रेयसी है, शिव की छाया है, शिव का साकार रूप है। क्या माँगना चाहिए? शिव।

कबीर साहब इसी को कह गए हैं:

प्रभुता को सब कोई भजे, प्रभु को भजे न कोय । जो कोई प्रभु को भजे, प्रभुता चेरी होय ।।

प्रभुता माने? शक्ति। और प्रभुता सबको चाहिए। प्रभु 'से' जो चीज़ें मिलती हैं वो सबको चाहिए; प्रभु बेचारे किसी को नहीं चाहिए। भाई, प्रभु के साथ रहते हो तो बहुत कुछ मिलता है न? मालिक के साथ नौकर भी चलता है, तो नौकर को भी सलाम मिलता है, मिलता है कि नहीं मिलता है? दूल्हे के साथ पूरी बारात आ जाती है। उसमें सब एक-से-एक नमूने भरे हैं, भूत-प्रेत-पिशाच, पर उनके ऊपर भी फिर इत्र छिड़का जाता है, काहे को? वो दूल्हे के साथ आए हैं।

ये प्रभुता है। प्रभु कौन है? दूल्हा प्रभु है, बाराती प्रभुता हैं। दूल्हे का जितना सत्कार नहीं होता उतना बारातियों का होता है। दूल्हे को कभी रूठते देखा है, कि दूल्हे राजा रूठ गए हैं? दूल्हे की औकात कि रूठ जाए? उसे अभी आगे झेलना है। अभी रूठेगा तो आगे भरेगा। बारातियों को रूठते तुमने खूब देखा होगा। और बाराती की कोई हैसियत नहीं, लेकिन उसका मान देखो, उसका अहंकार देखो। तो ‘प्रभुता को सब कोई भजे'—बारातियों का सत्कार चलता है फिर—‘प्रभु को भजे न कोय'। लेकिन आगे भी कबीर साहब समझाते हैं कि ‘जो कबीर प्रभु को भजे, प्रभुता चेरी होय'। चेरी माने? दासी।

ये भूल मत कर देना। शिव को माँगना, पीछे-पीछे शक्ति अपने आप मिल जाएगी। शक्ति के प्रार्थी मत हो जाना।

जब भी किसी से कुछ मिलता हो तो एक सवाल ईमानदारी से ज़रूर पूछा करो, “मैं इस व्यक्ति से क्यों जुड़ा हुआ हूँ? इस व्यक्ति की खातिर, या मुझे इस व्यक्ति से जो मिलता है उसकी खातिर?"

"प्रभु से क्यों जुड़ा हूँ, प्रभु की खातिर, या प्रभुता की खातिर?" ये सवाल बहुत-बहुत ज़रूरी है। प्रभु से तुम्हारा जब भी प्रेम होगा, वो निःस्वार्थ होगा। प्रभुता से तुम्हारा जब भी प्रेम होगा, उसमें स्वार्थ है, उसमें हड़पने की, नोचने की दुर्गंध है। इसीलिए तो चूक हो जाती है न।

भगवान को भी हम जब स्थापित करते है, तो उन्हें अति वैभवशाली, विभूता, बलशाली बनाकर स्थापित करते हैं, काहे को? ताकि हमें उनसे वो सब मिले भी तो। अब भगवान को बना दिया है दस हाथों वाला। अब वो दस हाथ उसके तो काम आएँगे नहीं—वो तो उसी में उलझ जाएगा। वो दस हाथ तुमने इसलिए बनाए हैं ताकि वो दस हाथों से तुमको दे।

तुमने दस हाथ भगवान के इसलिए थोड़े ही बनाए हैं कि भगवान उनसे दस जगह खुजली करें अपनी। तुम चाहते हो दसों हाथों से तुमपर लुटाए। फिर इसीलिए भगवान जब तुम्हारे सामने भिखारी बनकर आते हैं या साधारण बनकर आते हैं, तो तुम्हें पहचान में ही नहीं आते और चूक जाते हो क्योंकि तुम्हें प्रभु से तो मतलब था ही नहीं, मतलब था प्रभुता से। और बिना प्रभुता के जब प्रभु तुम्हारे सामने आ गए, तो तुमने कहा, "ये प्रभु हैं ही नहीं।"

इसीलिए फिर तुमको बेवकूफ बनाना भी आसान है। कोई भी बस प्रभुता का प्रदर्शन कर दे तुम्हारे सामने, तो वो तुम्हारे लिए प्रभु हो जाता है क्योंकि तुम्हें मतलब ही प्रभुता से है। तुम पहचान ही किसकी करते हो? प्रभुता की। तो कोई भी तुम्हारे सामने आकर ज़रा शक्ति दिखा जाता है, वो तुम्हारे लिए क्या हो जाता है? भगवान।

प्रभु से मतलब रखो, शिव से मतलब रखो, शक्ति पीछे-पीछे चली आएगी। पर जब तुम शिव से मतलब रख रहे हो तो चुपके-चुपके कनखियों से देखते मत रहना कि शक्ति आ रही है कि नहीं आ रही। और न आ रही हो तो धीरे से याद दिलाया प्रभु को, "प्रभु, आप आ रहे हैं बड़ा सौभाग्य है। वो शायद शक्ति जी, हेहेहे, वो छूट गईं हैं, ज़रा उनको भी...।" ये सब नहीं चलेगा। तुम्हारा ऐसे ही है।

अब नई-नई शादी हुई किसी की। सोमनाथ ने फोन किया। दोस्त ने फोन उठाया। उससे पूछ रहा है, "भाभी घर पर हैं?,” वो बोला, "हाँ।" ये बोलता है, "आ रहा हूँ।" अब ये तुम किसके लिए जा रहे हो? भाई के लिए कि भाभी के लिए? और जब तुम्हारी शादी होती है तो भूले-बिसरे, पुराने दोस्त-यार भी चले आते हैं। तुम्हें लग रहा है तुमसे मिलने आ रहे हैं? ये सब किसके दीवाने हैं?

प्र: भाभी के।

आचार्य: देखा नहीं है क्या? वो एक आएगा, बोलेगा, "मैंने तेरे साथ नर्सरी क्लास पढ़ी थी। भाभी कहाँ है?” ऐसा तो हमारा हाल है।

शक्ति माँग रहे हैं तो क्या बोलूँ? मेरे लिए ये हैं (पास रखी शिव की मूर्ति की तरफ इंगित करते हुए), इनका तुम नाम नहीं लोगे, तो मैं तो गरियाऊँगा। ये (शिव) हों, तो शक्ति तो मिल ही जाती हैं। जो शक्ति माँगेगा, उसने शिव तो माँगे ही नहीं, और शक्ति भी नहीं मिलेंगी क्योंकि शक्ति वफ़ादार हैं शिव की। दोनों तरफ से मारा गया।

जो शक्ति माँग रहा है उसने शिव तो माँगे ही नहीं, और शक्ति मिली नहीं। इसलिए अब तुम समझो कि दुनिया में सब ताकत, ओहदा, शक्ति, बल माँगते रहते हैं और रह निर्बल जाते हैं, क्यों? क्योंकि उन्होंने शक्ति माँगी, शिव नहीं माँगे। बल माँगा; जो बलातीत है, उसको नहीं माँगा। और दूसरी तरफ वो होते हैं जो शिव को ही माँग लेते हैं, कहते हैं, “तुम आ जाओ, बाबा। हमारे लिए तुम ही काफी हो। तुमसे कुछ नहीं चाहिए, तुम ही चाहिए।"

हमारे रिश्तों में बड़ी भूल रहती है न? हमें कभी भी ‘तुम' नहीं चाहिए, हमें हमेशा ‘तुमसे’ कुछ चाहिए। और जिसे तुमसे जो कुछ चाहिए वो तुम देना बंद कर दो, तो रिश्ता टूट जाता है। कभी ऐसा रिश्ता बनाना जिसमें कोई माँग ना हो, कोई शर्त ना हो। ऐसा रिश्ता बनाने के लिए बड़ी शक्ति चाहिए—वो मिल जाएगी। पहले ध्येय में तो शिवत्व हो, फिर बाज़ुओं में शक्ति अपने आप मिल जाएगी। समझ रहे हो?

प्र: आचार्य जी, जिन आँखों ने पूरी ज़िंदगी बस शक्ति ही देखी है, प्रभुता ही देखी है, तो उनमें ये बदलाव कि वो प्रभु देख सकें, ये तो मात्र प्रभु ही कर सकते हैं। तो बस प्रभु से प्रार्थना ही कर सकते हैं।

आचार्य: प्रभु से प्रार्थना करो, और अपने प्रति ज़रा सच्चे रहो। जीवन भर अगर शक्ति ही देखी है—और वो शक्ति जो शिव-विहीन है—तो पछताए भी बहुत होंगे क्योंकि तुमने फिर बड़ी नपुंसक शक्ति देखी होगी, बड़ी अधूरी शक्ति देखी होगी, बड़ी लाचार और लचर शक्ति देखी होगी। असली शक्ति देखनी किनको नसीब होती है? जिनकी आँखों के पीछे शिव होते हैं। वो असली वाली तो तुमने देखी नहीं है शक्ति। जो शक्ति तुमने देखी है वो तो तुम्हें और अशक्त कर गई होगी न? पछताए बहुत होगे। तो अच्छा ही है, अनुभवों से सबक ले लो।

प्र: आचार्य जी, आपने कहा था कि यदि मक्खी को हटाना है तो गुड़ को हटा दो। तो हमारा अहंकार किस चीज़ को भोजन बनाता है?

आचार्य: अहंकार को जिस चीज़ को भोजन बनाना है, अहंकार उसको प्रक्षेपित कर देता है। अहंकार इस मामले में सेल्फ-सफिशिएंट (आत्मनिर्भर) है। उसको जो चाहिए वो उसकी रचना कर देता है। तुम पलते हो क्रोध और द्वेष पर, तुम रचना कर डालोगे एक कहानी की। तुम कहोगे, "ये जो यहाँ बैठे हैं ये मेरे दुश्मन हैं, इनके इरादे खतरनाक हैं।" तुमने रचना कर डाली। अब जैसे ही तुमने रचना करी, तुम्हें क्या उठेगा? गुस्सा उठेगा। अहंकार को जो चाहिए वो उसे तथ्यों में नहीं ढूँढना पड़ता, वो उसकी कल्पना कर डालता है, तो अहंकार इस मामले में बड़ा आत्मनिर्भर है। तुम उससे उसका भोजन छीन ही नहीं सकते, वो अपना भोजन खुद बनाता है।

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