माया से चलता संसार, सत्य की बात बेकार? || आचार्य प्रशांत (2018)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब चारों ओर माया का ही विस्तार है तो सत्य का जीवन में क्या महत्व है?
आचार्य प्रशांत: बढ़िया है, इसका मतलब माया सबको सताये हुए है। इसका मतलब परमात्मा सबको चाहिए। जहाँ माया की बात होगी वहाँ परमात्मा की तलब भी होगी-ही-होगी, क्योंकि माया किसी का भला तो करती नहीं। अगर माया की बात करनी पड़ रही है मतलब माया के सताये हुए हो। माया के सताये हुए हो तो दिल-ही-दिल में किसको चाहते हो? तो अच्छी बात है न, अगर हर जगह माया की बात चल रही है! तुम्हारे लिए मौक़ा है। पर उस मौक़े को तभी भुना पाओगे जब तुम माया को जीत लो पहले।
जो जीता हुआ है वही तो दूसरों को जीतने के गुर सिखा सकता है। जो ख़ुद ही नहीं जीता वो सिखाये कि माया से कैसे जीतना है, वो सिखा रहा, उतनी देर में माया आकर उसको एक पटकनी और दे गयी। ऐसों के मत्थे थोड़े ही धर्मयुद्ध लड़े जाएँगे!
मेरे साथ जितने लोग हैं, मैंने सबको साफ़ कह रखा है, 'भगोड़े नहीं हो तुम, योद्धा हो, पीठ मत दिखाना, हर तरीक़े से मज़बूत होना चाहिए तुमको। और बाहर निकलो, घर में घुसकर बैठने की इजाज़त नहीं है। आप आइए, देखिए, कभी आश्रम की ओर। मेरे योद्धा या तो आपको सड़कों पर नज़र आएँगे लड़ते हुए या काम करते हुए नज़र आएँगे। एक-एक आदमी से सड़क पर बात कर-करके, कर-करके अब तक चालीस-पचास हज़ार किताबें उन्होंने लोगों तक पहुँचा दिये।
बहुत बड़ा आँकड़ा नहीं है चालीस-पचास हज़ार, लेकिन जो हुआ है इधर एक-दो साल में हुआ है। और सब युवा हैं बिना अनुभव के, फिर भी खड़े हैं सड़कों पर और युद्ध जारी है। और फिर जानते हैं क्या होता है, इनको लोग सड़कों पर देखते हैं ऐसे कि छः-छः घंटे खड़े होकर के, धूप हो, बारिश हो, जाड़ा हो, आसान नहीं है। जून का महीना है, इस समय दिल्ली की जो हालत है उस हालत में छः घंटे, आठ घंटे सड़क पर आप एक दिन खड़े हों तो वास्तव में छक्के छूट जाएँगे, पसीने में नहा जाएँगे आप। और कहेंगे अगले दिन से जाना नहीं है, टाँग काँपती है, पचास तरीक़े के शरीर में आप दर्द बता देंगे। यहाँ ये लोग रोज़ खड़े होते हैं। और सब पढ़े-लिखे हैं। सबके पास वैकल्पिक काम-धन्धे थे, उनको छोड़-छाड़कर मेरे पास आये हैं।






