प्रश्नकर्ता: मैंने इस साल मई में पहली बार आपके सत्संग शिविर में हिस्सा लिया और इसके बाद मुझे शिविर का महत्व पता चला, क्योंकि अगर मैं ये शिविर नहीं लेती तो शायद मनोचिकित्सालय में होती।
मैं स्वयं साइकॉलोजी (मनोविज्ञान) की छात्रा हूँ, मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से साइकोलॉजी में बीए, एमए किया है। कॉलेज के थर्ड ईयर से लेकर पाँच सालों तक मेरा डिप्रेशन का दौर रहा, जो बाद में हैलूसिनेशन (मतिभ्रम) में बदल गया। लेकिन तीन दिन के शिविर और फिर श्रीमद्भगवद्गीता और हंस गीता के व्याख्यानों के बाद इक्कीस दिनों में ये सब नब्बे प्रतिशत तक सही हो गया है।
मैं जिस परिवार मे पली-बढ़ी हूँ वहाँ पर कैरियर पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। इसलिए मैंने पढ़ाई खत्म करने के बाद शिक्षण और कॉउन्सलिंग के क्षेत्र में कैरियर बनाने का फ़ैसला किया। लेकिन शिक्षण के क्षेत्र में मैं निजी विद्यालयों का दबाव नहीं झेल पायी और इसलिए मैंने वो काम छोड़ दिया। अभी मैं विदेश पढ़ने के लिए जाने वाले छात्रों के कॉउंसलर के रूप मे कार्य कर रही हूँ लेकिन वहाँ भी मुझे काम के दौरान एंज़ाइटी अटैक (व्यग्रता के दौरे) आते हैं।
मुझे पढ़ाना और बच्चों के साथ काम करना पसन्द है। मैं ग्यारहवी-बारहवी के छात्रों को पढ़ाने के लिए पात्र हूँ लेकिन जब मैं ग्यारहवी-बारहवी की साइकोलॉजी की किताबों को पढ़ती हूँ तो उनमें बिलकुल मन नहीं लगता, क्योंकि उनमें साइकोलॉजी के नाम पर व्यर्थ की चीज़ें दे रखी हैं। वहीं चौथी-पाँचवी के छात्रों को पढ़ाने में मेरा ईगो (अहम्) बीच में आता है कि मैं इतने निचले स्तर पर कैसे पढ़ा सकती हूँ।
ऐसी स्थिति में मैं कैरियर को लेकर आपका मार्गदर्शन चाहती हूँ, कृपया मार्गदर्शन करें।




