वक्ता: मन है ही तब तक जब तक वो सोच रहा है| तुम मुझे बताओ कि तुम यदि सोचना बंद कर दो, तो मन कहां है? तुम कह रहे हो, ‘हम सोचने पर मजबूर क्यों होते हैं?’ यहां पर तुम से अर्थ है, ‘मन’| तुम अभी मन हो| तुम सदा मन ही हो| ऐसे समझो, जब तुम सो जाते हो और गहरी नींद में होते हो, तब तुम सोच नहीं रहे होते हो| नहीं रहे होते हो ना? पर जब तुम सो जाते हो, और गहरी नींद में होते हो, तब तुम्हें कोई कष्ट भी नहीं होता| तुम कितने ही बीमार हो, पर अगर तुम सो रहे हो, गहराई से, तो तुम बीमार नहीं हो| बात ठीक है कि नहीं?
सभी श्रोतागण (एक साथ): हां|
वक्ता: विपरीत भी है। तुम बड़े बादशाह हो, पर जिस वक्त तुम सो रहे हो, उस वक्त तुम बादशाह नहीं हो| कोई अहसास नहीं है तुम्हें| तुम्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया गया है| पर जब तुम सो रहे हो, उस वक्त कोई जेल तुम्हें बंधन में नहीं रख सकती| सोता हुआ आदमी जेल में नहीं होता| है ना?
मन जिन चीजों पर पलता है, वो सब चली जाती हैं, जैसे ही विचार शांत होता है| और मन कहता है कि मैं जिन्दा ही तब तक हूं जब तक मेरा व्यक्तित्व है, पहचान है, कंडीशनिंग है| जैसे ही विचार रुकता है, जैसे ही सोच रुकती है, वैसे ही व्यक्तित्व भी थम जाता है| बादशाह, बादशाह नहीं रहता| दुःख, दुःख नहीं रहते|
तो इसलिये इस डरे हुए मन की पूरी कोशिश रहती है कि वो सोचता ही रहे| जब तक वो सोच रहा है, उसे लगता है, ‘मैं जिन्दा हूं’| जैसे ही उसने सोचना बंद किया, वो खौफ में आता है, ‘मैं मर गया’| मर ही जाता है| सही बात यही है| लेकिन वो शांत भी तभी होता है, जब वो मर जाता है|
प्राचीन समय से ही, मन के मरने को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है, चाहा ही यही गया है| दुनिया भर का जो बोध साहित्य है




