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मन को किसी ख़ास रिश्ते की तलाश क्यों रहती है? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। क्या कोई ऐसा रिश्ता हो सकता है जिसमें सिर्फ़ देने में ही मज़ा आये। कुछ भी लेने की चाहत नहीं हो?

आचार्य प्रशांत: अगर यह पूछ रही हैं आप कि क्या ऐसा कोई विशेष रिश्ता हो सकता है, तो नहीं हो सकता। ऐसा नहीं हो पाएगा कि आपके पचास रिश्ते हों जिनमें से अड़तालिस में या तो आपकी लेने पर बहुत निगाह रहती हो या रिश्ता ही लेन-देन के व्यापार का हो। और कोई दो विशेष ऐसे रिश्ते हों जिसमें आप देने को उत्सुक हों। ऐसा नहीं हो पाएगा।

हमें लगता यही है, हमें सिर्फ़ ऐसा लगता ही नहीं है, हम ऐसा चाहते भी हैं कि कोई ख़ास रिश्ता ऐसा हो जिसकी बात ही निराली हो। आप किसी से सम्बन्धित हैं तो भीतर-भीतर एक छुपा हुआ हर्ष होता है। अगर वह अपनी ज़िन्दगी के अड़तालीस लोगों के साथ तो आम सांसारिक, व्यापारिक सम्बन्ध रखता है, कभी-कभार लूट-खसोट भी कर लेता है, और वहाँ से जो कुछ वह लूट-खसोट कर पाता है वह आपको बेशर्त अर्पित कर जाता है। ऐसा कोई रिश्ता हो, ऐसी हमारी बड़ी चाहत होती है। बहुत गर्व करता है मन, और बहुत कामना करता है मन, अगर मिल गया हो ऐसा कुछ, या फिर कि मिल जाए ऐसा कुछ।

माँ बच्चे को कहेगी, ‘तू मुझे प्राणों से ज़्यादा प्यारा है।’ किसी विशेष को कह रही है प्राणों से ज़्यादा प्यारा है। कौन? सिर्फ़ वह बच्चा। बाक़ी उसकी ज़िन्दगी में जो अड़तालीस या अट्ठान्नवे, या नौ-सौ-अट्ठान्नवे लोग हैं, उनको नहीं कह रही है। नौ-सौ-निन्यानवे को भी नहीं कह रही है। यह जो एक है एक हज़ार में से, उसका अपना बच्चा, उसको वह कह रही है कि तू मुझको प्राणों से भी ज़्यादा प्यारा है। और माँ को लगता यही है कि वह ठीक ही बोल रही है, सच ही बोल रही है। पर ऐसा होता नहीं है। इसी तरीक़े से महबूब जाएगा प्रियतमा के पास। उससे कहेगा?

श्रोता: ‘प्राणों से प्यारी है।’

आचार्य: 'प्राणों से प्यारी है। दुनिया एक तरफ़, तू एक तरफ़।' ऐसा हो नहीं सकता। वो कहेगा, 'चाँद-तारे तोड़कर तेरे क़दमों में बिछा दूँगा। दुनिया की दौलत लाकर तुझ पर न्यौछावर कर दूँगा।' और महबूबा को बड़ा मीठा लगता है, इसको लगता है ‘क्या बात बोली है!’ दिक्क़त बस छोटी सी है कि यह बात सच कभी हो नहीं सकती।

आपके जीवन में, दोहरा रहा हूँ, कोई विशेष रिश्ता ऐसा नहीं हो सकता जिसमें आप बहुत सहृदय हो जाएँ, दानी हो जाएँ, अकिञ्चन हो जाएँ, प्रेमी हो जाएँ, समर्पित हो जाएँ, बलिदान हो जाएँ। हाँ, एक मन ज़रूर ऐसा हो सकता है जो बाँटने में आनन्द पाता हो।

पर जो मन ऐसा हो जाएगा कि बाँटने में आनन्द पा रहा है, उसका एक रिश्ता ही ऐसा नहीं होता है, उसके?

प्र: सारे रिश्ते।

आचार्य: सारे रिश्ते ऐसे होंगे। और जहाँ कोई ऐसा हुआ कि वह अपने सारे ही रिश्तों में बाँटता फिरता है, उससे सम्बन्धित होने में आपको कुछ सुख मिलेगा ही नहीं। आप कहेंगे ‘तुम तो सभी को देते फिरते हो। तुमने हमें भी दे दिया तो क्या दिया?’ इसलिए तो हमें परमात्मा भी कोई बहुत पसन्द नहीं आता। वह सबको भूखा रखे, हमें रोटी दे तब कोई बात हुई। हम कोई ख़ास हुए न? कई बार तो हमें इससे प्रयोजन भी नहीं होता कि हमें कितना प्रेम मिला, हमें प्रयोजन ज़्यादा इससे होता है कि हमें मिले न मिले, दूसरों को नहीं मिलना चाहिए। 'तू मेरी रह, न रह, दूसरी किसी और की नहीं होनी चाहिए।'

ले-देकर माँग इसकी है कि मैं ख़ासम-ख़ास रहूँ, मैं विशेष रहूँ। दूसरों को कुछ न मिले, मुझे दस ही रुपया मिल जाए, मुझे बर्दाश्त है। दूसरों को कुछ न मिले, मुझे सूखी रोटी ही मिल जाए, मुझे बर्दाश्त है। पर सबको अगर हज़ार-हज़ार बँटे, तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा। सबको अगर भरपूर थाली मिली तो हम खाएँगे ही नहीं। हम सूखी रोटी में जी लेंगे, शर्त यह है कि दूसरे भूखे मरने चाहिए। और यह माँग ख़ासतौर पर हम अपने स्वजनों से करते हैं। किसी और को वह मत दे देना जो तुमने हमें दिया है। हमारा विशेष स्थान आरक्षित होना चाहिए, और हमारी जगह पर कोई और न बैठ जाए। जैसे कि कोई एक ही विशेष स्थान होता है। जैसे कि कोई और उस विशेष जगह पर आये, इसके लिए किसी को उस जगह को छोड़ना आवश्यक है। हम विशेषता में यक़ीन करते हैं, और परम तत्व निर्विशेष है।

जब भी ऐसा होते देखो कि कोई बाक़ी पूरी दुनिया के प्रति तो हिंसा से भरा हुआ है या उदासीन है या उपेक्षा कर रहा है और सिर्फ़ आपको कहता है कि तुम ही हो जिस पर तन-मन न्यौछावर है, तो सावधान हो जाइएगा, वह झूठ बोल रहा है। अगर कोई ऐसा हो जो शेष जगत के प्रति क्रूर है और भ्रष्ट है, लूट-खसोट करता रहता है, और आपकी झोली भरता रहता है, तो सावधान हो जाइएगा, आप भी लुट ही रहे होंगे किसी और तरीक़े से।

एक डाकू जो डाका डाल-डालकर और लोगों को सता-सताकर अपने बीवी-बच्चों के लिए घर भर देता हो, निश्चित रूप से किसी का सगा नहीं है। जैसे उसने बहुत लोगों का गला काटा है, एक दिन गला वह अपने बीवी-बच्चों का भी काटेगा। हो सकता है किसी धारदार हथियार से न काटे। हो सकता है शारीरिक तौर पर न काटे, तो मानसिक तौर पर काटेगा। काट रहा ही होगा, क्योंकि जो व्यक्ति घर के बाहर हिंसक है, अचानक वह घर के भीतर आकर प्रेमपूर्ण तो नहीं हो जाएगा। जो व्यक्ति दफ़्तर में भ्रष्ट है, वह घर में आकर धर्मात्मा तो नहीं हो जाएगा।

पर हमारी उम्मीद यही रहती है कि पतिदेव दिनभर दफ़्तर में घूस खायें, और शाम को हमें उसी घूस का उपभोग करायें। दिनभर दफ़्तर में घूस खायें, दिनभर तमाम भ्रष्ट तरीक़ों से पैसे कमायें और जब घर आयें तो हमें उन्ही पैसों से ऐश करायें। हमें क्यों ऐश करायें? क्योंकि हम ख़ास हैं। 'बाक़ी दुनिया के प्रति बेगाने रहना पतिदेव, हमारे अपने रहना। दुनिया से जो लूट-लूटकर लाना, हमें खिलाना।' ऐसा हो नहीं सकता। पतिदेव अगर दुनिया को लूट रहे हैं तो पक्का जानिए कि आपको भी लूट ही रहे हैं। हाँ, दुनिया की जेब में हाथ डालते हैं तो दिख जाता है, जेब बड़ी स्थूल चीज़ है। आपके शायद मनोजगत को लूट रहे हैं, आपको पता भी नहीं चल रहा, पर लुट आप भी रही हैं। सावधान हो जाइएगा।

इसी तरीक़े से आपमें अगर जगत मात्र के प्रति, प्राणी मात्र के प्रति वात्सल्य नहीं है, करुणा नहीं है, तो इस धोखे में मत रहिएगा कि आप अपने बच्ची की भी सगी हो सकती हैं। यह नहीं हो पाएगा कि आप एक मेमने के बच्चे को काटकर के उसका माँस खा रही हैं और अपने बच्चे के प्रति बड़े प्रेम से भरी हुई हैं। नहीं हो पाएगा। जो स्त्री बकरी के बच्चे, मुर्गी के बच्चे, भेड़ के बच्चे को खा सकती है, वह किसी-न-किसी तरीक़े से अपने बच्चे को भी खाएगी। यह बात सुनने में ज़रा वीभत्स लग रही होगी, पर दोहराकर कहूँगा, अगर कोई स्त्री किसी और के बच्चे को खा सकती है तो वह अपने भी बच्चे को खा रही है। उसमें किसी के प्रति प्रेम, मैत्री, करुणाभाव नहीं हो सकता।

और जिसमें होगा उसमें सबके लिए होगा। यह अलग बात है कि आप इंसान हैं, आपकी पहुँच की एक सीमा है। तो स्थूल तौर पर, शारीरिक तौर पर आपकी करुणा अभिव्यक्त सिर्फ़ उन्हीं लोगों पर होगी जो आपकी इन्द्रियों के दायरे में आते हों। लेकिन कम-से-कम जो आपकी इन्द्रियों के और मन के दायरे में आते हैं उन पर तो करुणा को अभिव्यक्त होने दीजिए न। यहाँ तो करुणा पड़ोसी के बच्चे पर भी अभिव्यक्त नहीं होती। यहाँ तो करुणा, घर के आगे कुत्ते का बच्चा हो, उस पर भी अभिव्यक्त नहीं होती। मन्दिर के आगे भिखारी का बच्चा बैठा हो, करुणा उस पर भी अभिव्यक्त नहीं होती। तो अपने बच्चे के लिए कहाँ से आ जाएगी? जो चीज़ आपके पास है ही नहीं, वह आप अपने बच्चे को भी कहाँ से दे दोगे? और अगर होती तो उसकी पहचान यह होती कि वह सबमें बँटती, उसका बँटना आप रोक नहीं पाते।

लेकिन हमारी बड़ी-से-बड़ी ग़लत-फ़हमी यही रहती है कि हमारे पास प्रेम है तो, पर सिर्फ़ कुछ ख़ास लोगों के लिए है। नहीं साहब, अगर आपके पास होगा तो सबके लिए होगा, और अगर नहीं है तो अपने घरवालों के लिए भी नहीं हो सकता। आप इस गुमान से तो बिलकुल ही बाहर आ जाइए कि दुनिया में आप भ्रष्ट होंगे, लूटेंगे-खसोटेंगे, और जो लूट-खसोट की है उससे आप अपने परिवार का हित कर लेंगे, या परिवार पर प्रेम वर्षा कर लेंगे। ऐसा हो नहीं पाएगा। और जिन्हे यह चाहत हो कि मुझे मिले कोई ऐसा जो सिर्फ़ मुझसे प्यार करता हो, वो इस चाहत से बाहर आ जाएँ।

और बहुत लोगों को यही चाहत होती है। उन्हें यह चाहत बाद में होती है कि मिले कोई ऐसा जो प्यार करता हो। उन्हें यह चाहत पहले होती है कि मिले कोई ऐसा जो सिर्फ़ मुझसे प्यार करता हो। अरे पागल! अगर कोई होगा जो प्यार जानेगा तो क्या वह सिर्फ़ तुमसे करेगा? सूरज से कहोगे सिर्फ़ मेरे घर में रौशनी दे? पगला गये हो? बादल से कहोगे सिर्फ़ मेरे आँगन में बरस? पगलाये हो? पर माँग यही रहती है। और हमें ईर्ष्या भी बहुत उठती है। आज षड्-रिपु में पढ़ रहे थे 'मात्सर्य', भयानक दाह उठती है। 'बादल, पड़ोसी के आँगन में कैसे बरस गये? और तू अगर पड़ोसी के आँगन में बरसेगा, तो मेरे आँगन में मत बरस। मैं छत डलवा लूँगी!'

प्रेम को इससे मतलब ही नहीं होता कि उसकी फ़सल कितनी लहलहाई, उसको मतलब होता है कि दुनिया लहलहाये। और मज़े की बात है कि ईर्ष्या को भी इससे मतलब नहीं होता कि उसकी फ़सल कितनी लहलहाई। वह कहती है कि मेरी फ़सल जल भी जाए कोई बात नहीं, पड़ोसी की फ़सल हरी नहीं रहनी चाहिए। मुझे प्रेम मिले न मिले, कोई बात नहीं, मैं अपना रिश्ता तबाह कर लूँगी, पर मेरे प्रेमी का कोई दूसरा प्रेमपूर्ण रिश्ता नहीं होना चाहिए। और दूसरे के साथ तुम प्रेम न कर पाओ, इसके लिए मैं अपने रिश्ते की भी बलि देने को तैयार हूँ। मुझे प्रेम तो चाहिए ही नहीं, मुझे तो कोई ख़ास चाहिए।

देखिएगा, हमें प्रेम नहीं चाहिए होता, हमें अकड़ चाहिए होती है। हमें गुमान चाहिए होता है कि मिल गया है कोई जो सिर्फ़ हमारा दीवाना है। 'मिल गया है कोई जो दीवाना है', नहीं, 'मिल गया है कोई दीवाना', न, इतने से काम नहीं चलता है। 'मिल गया है कोई जो सिर्फ़ हमारा दीवाना है।' और इसीलिए मैने आरम्भ में ही कहा कि हमें परमात्मा कुछ विशेष पसन्द नहीं आता। क्यों? क्योंकि वह दीवाना तो है, लेकिन अखिल ब्रह्माण्ड का। वह पिता तो है पर सबका। वह माँ भी है तो सबकी, और अगर वह प्रेमी है तो भी सबका। और ये बात तो हमें अखर ही जाती है, जला ही देती है। इसीलिए ऐसा होता है कि जिन भावों को हम आमतौर पर बहुत मीठा समझते हैं, वो वास्तव में मीठा ज़हर होते हैं।

मैंने देखा, एक बच्चा अपनी माँ के साथ खेल रहा है, छोटा है बहुत। बिलकुल तोतली ज़बान में बीच-बीच में बोलता है ‘माँ-माँ’। अब माँ के हर्ष का पारावार नहीं, खेल रही है उसके साथ। माँ थोड़ा दूर गयी उससे। पार्क की एक जगह थी। एक दूसरी स्त्री वहीं से गुज़र रही थी। उसने झुककर के बच्चे को उठा दिया और खिलाने लगी। बच्चे के मुँह से उसके लिए भी निकल गया ‘माँ-माँ’। जो उस बच्चे की व्यक्तिगत माँ थी, ख़ास माँ थी, उसने यह सुन लिया। ऊपर से तो कुछ न बोली, पर जब वह दूसरी स्त्री दूर चली गयी तो बच्चे को एक चपत। ‘सब तेरी माँ हो जाती है? जिसे ही देखो उसे ही माँ बोलेगा?’ हमारे रिश्ते सब ऐसे ही हैं। ऊपर से मीठे हैं, नीचे ज़हर हैं। बच्चे की हिम्मत नहीं पड़नी चाहिए कि वह ख़ास ओहदा किसी और को दे दे। 'दूसरे को अगर तूने कुछ दे दिया तो तेरे-मेरे बीच जो मधुरता है, मैं उसको भी ख़राब कर दूँगी। दूसरे को मत बोल देना। सिर्फ़ मैं।'

समझ रहे हो?

इसीलिए जब किताबों में षड्-रिपुओं का वर्णन हुआ है, तो उसमें मात्सर्य को स्थान ज़रूर दिया गया है। काम, क्रोध, लोभ भर बोलने से बात नहीं बनेगी। मद, मोह, मात्सर्य बोलना ज़रूरी है। ईर्ष्या की बात करना बहुत ज़रूरी है। ईर्ष्या और ख़ास होने की ख़्वाहिश बहुत साथ-साथ चलते हैं। प्रेम तो बस इतना कहता है कि मुझे मिले। ईर्ष्या ज़बरदस्त है। वह बोलती है सिर्फ़ मुझे मिले। और मुझे भले न मिले पर दूसरे को नहीं मिलना चाहिए। बात समझ रहे हो?

और देखिए यही बात आपके सवाल में, ‘आचार्य जी, क्या कोई ऐसा रिश्ता भी होता है, क्या 'कोई ऐसा रिश्ता' भी होता है जिसमें सिर्फ़ देने में ही मज़ा आये, कुछ भी लेने की चाह न हो?’

ऐसा रिश्ता चाहिए, ऐसा जीवन नहीं चाहिए, है न? ऐसा रिश्ता चाहिए, ऐसा मन नहीं चाहिए। एक रिश्ता ऐसा चाहिए ज़िन्दगी में जिसमें खुशबू भरी हुई हो। बाक़ी पूरा जीवन अगर गन्धाता हो, तो भी कोई बात नहीं। एक रिश्ता होना चाहिए, उसी के सहारे जी लेंगे क़सम से। और फिर जिससे ऐसा रिश्ता होता है उसके भी ग़ुरूर का कोई ठिकाना नहीं। वह कहता है, ‘मालूम है, आशिक़ कैसा है हमारा? बाक़ी दुनिया की ओर तो वह नज़र भी नहीं उठाता।’

यह प्रेम नहीं है, यह अहम् है। और हमे कई बार जीवनभर नहीं पता चलता कि हमें दूसरे से जो मिल रहा है, वह प्रेम नहीं है, अहम् की परिपूर्ति है। हम प्रेम माँग ही नहीं रहे। हमें तो मज़ा इस बात में आ रहा है कि दूसरे ने हमें ताज पर बैठा रखा है। हमें ही नहीं, 'सिर्फ़' हमें।

आपका ताज जैसा है सलामत रहे, और आपके ताज के बराबर में उसी ऊँचाई पर वैसे ही दस ताज आ जाएँ तो आप अपने ताज पर लानत भेजेंगे, तुरन्त छोड़ देंगे। आप कहेंगे, 'मज़ा ताज में थोड़े ही था, मज़ा तो इस बात में था कि सिंहासन सिर्फ़ मेरा था।' यह मात्सर्य है। यह ईर्ष्या है। प्रेम हमें इसीलिए नहीं मिलता। इसलिए नहीं कि वह उपलब्ध नहीं है। वह हमें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि वह सबको उपलब्ध है। और हमें वह प्रेम चाहिए जो सिर्फ़ हमारा हो, इसलिए नहीं मिलता।

फिर शायर दिवाने होकर घूमते रहते हैं, "कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमान नहीं मिलता।" अरे, सब मिला हुआ है! पर तुझे अपने लिए आरक्षित ज़मीन, रिज़र्वड आसमान चाहिए। वह नहीं मिलेगा, भाई! आसमान किसी के लिए आरक्षित हुआ कभी? है तो सबका है, नहीं तो फिर नहीं है। और ऊपर वाले से हमें बड़ी-से-बड़ी शिकायत यही है, ‘तू सबका क्यों है? तू सबका है क्यों?’ और इसीलिए बड़ा आनन्द आता है जब आप किसी दिन बताते हैं कि आज सपने में कृष्ण-कन्हैया आये थे। कुछ तो बात यह कि दर्शन हुए, और उससे ज़्यादा बड़ी बात यह कि सिर्फ़ हमें दर्शन हुए। मन्दिर में होते हैं तो सबको होते हैं दर्शन, आज तो सपने में आये थे। 'मैदान मार लिया बिलकुल, हम ही भर ने देखा है, और जो हमने देखा, क़सम से किसी और ने नहीं देखा। अब लो, बहाते रहो लार! और हमने क्या देखा, पूछना हो तो खुशामद करो हमारी, तब बताएँगे क्या देखा।'

ग़ौर करना, तुम्हारी ज़िन्दगी में भी कहीं तुम वंचित इसलिए तो नहीं हो असली चीज़ से कि तुम उस चीज़ को सिर्फ़ अपने लिए माँग रहे हो? जो सिर्फ़ अपने लिए माँगेगा, वह अपने लिए भी नहीं पाएगा। और जो कहेगा, 'देने वाले मुझे मिले-न-मिले, सबको मिले', वह पाएगा कि सबके साथ-साथ उसे भी मिल गयी है, और लोगों ने हमें बताया कि कई बार लोगों से पहले मिल जाती है तुमको अगर तुम पहले लोगों के लिए माँग लो। पर जहाँ तुममें यह कामना उठी कि पहले मुझे मिले, या सिर्फ़ मुझे मिले, तहाँ तुम प्यासे मरे।

और यह बात मैं ख़ासतौर पर प्रेमियों से, पिताओं से, माँओं से बोल रहा हूँ, क्योंकि प्रेम और ममता में ही बहुत ज़्यादा आसक्ति, मोह और वर्चस्व की चाह रहती है।

एक बड़ा संन्यासी हुआ। उसका संन्यास अद्भुत था। वह घर पर रहते हुए भी संन्यस्त था। सब दुनियादारी उसकी चलती थी, पर संन्यास उसका खरा था। उसकी माँ से किसी ने एक बार पूछा, बोला, 'आप तो बहुत खुश होंगी, आपका लड़का संन्यासी भी है, घर भी नहीं छोड़ रहा, सारे काम भी करता है?' बोली, ‘काहे की खुशी? पहले सिर्फ़ मेरा था, अब सबका है। जिसको देखो वही चला आता है, कि आप मेरे भाई हैं, कि आप मेरे बाप हैं। कोई उसे स्वामी बोल रहा है, कोई सहोदर बोल रहा है। कुछ निजी बचा ही नहीं मामले में। अरे! हो तो मात्र हमारा हो, नहीं तो ऐसे क्या?’

पतियों को बड़ी समस्या हो जाती है पत्नी अगर बोध की दिशा में चली जाए, उसमें थोड़ी भक्ति जगने लगे। वह परमात्मा से भी होड़ में लग जाते हैं। वो कहते हैं, ‘तेरे प्यार पर तो सिर्फ़ मेरा हक़ होना चाहिए। तू उसको भी वह प्यार क्यों दे रही है जो मेरे 'हिस्से' का है।' अब इस शब्द से तुम्हें समझ में आएगा कि मूल गड़बड़ क्या है। मान्यता में मूल खोट यह है कि हम सोचते हैं कि प्यार भी सीमित मात्रा में होता है। देखो, कुछ चीज़ें या तो होती नहीं हैं या अनन्त होती हैं। प्रेम छोटा-मोटा नहीं हो सकता, या तो होगा या नहीं होगा। और होगा तो कितना होगा? अनन्त होगा। लेकिन हमें अक्सर यही लगता है कि हमारे हिस्से का प्यार किसी और को चला गया।

तुम घरों में देखोगे, एक बच्चा होगा तीन-चार साल का। उसके पीछे दूसरा बच्चा आ गया। यह जो तीन-चार साल वाला होता है, इसको बड़ी अड़चन हो जाती है। इसको लगता है मेरे हिस्से का प्यार उस छोटे वाले को मिलने लग गया। अब यह ना-नुकुर करता है, अब यह बहानेबाज़ी करता है। अब यह अचानक से एक गड़बड़ बच्चा बन जाता है, प्रॉबलम चाइल्ड बन जाता है। कल तक जो बच्चा सबकी आँख का तारा था, अब वह उद्धमी हो गया है। वह गिलास पटकता है, पत्थर मारता है, शोर मचाता है। वह खाता-पीता नहीं है। मान्यता क्या है उसकी? कि माँ का या बाप का प्रेम सीमित था जैसे एक सेब सीमित होता है। पहले पूरा सेब मेरा था, अब सेब के दो फाँक होते हैं, एक इधर आती है, एक उधर जाती है।

अब इस मान्यता में भी गहरे घुसना। सीमित क्या होता है हमेशा? पदार्थ सीमित होता है। यह पानी सीमित है (पानी का गिलास उठाते हुए)। आप मुझे एक गिलास पानी दें, और वह दो लोगों में बँट जाए, तो निश्चित रूप से मुझे कम मिलेगा। है न? यही गणित मैं प्रेम पर भी लगा देता हूँ। यह गणित ठीक है, पर यह गणित किस पर लागू होना चाहिए? सिर्फ़ पदार्थ पर। प्रेम पदार्थ नहीं होता। अब यहीं से एक बात और खुलती है। बहुत लोगों का प्रेम पदार्थ ही होता है, मटीरियल लव (भौतिक प्रेम)। तो उनका अनुभव भी फिर यही रहा है कि अगर मुझे मिला तो दूसरे के आने पर आधा हो जाएगा।

अब यहीं से तुम अपनेआप को पकड़ लो। अगर तुम्हें यह लगता है कि किसी दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवे के आने से तुम्हें जो प्रेम मिलता है वह बँट गया तो इसका मतलब तुम्हारा प्रेम पहले ही पदार्थगत मात्र था, बहुत भौतिक था, बहुत मटीरियल था। कैसे मटीरियल था?

उदाहरण के लिए, अब तुम कहते हो कि पहले आप मुझे छ: घंटे देते थे। अब उसके आने पर आप मुझे देते हैं सिर्फ़ तीन घंटे। और समय तो पदार्थ होता है। समय तो एक सांसारिक वस्तु है। पदार्थ ही है न? इसका मतलब तुम प्रेम को किससे नाप रहे थे? समय से। यह तुमने गड़बड़ कर दी न? प्रेम ऐसे थोड़े ही नापा जाता है कि तुमने मेरे साथ समय कितना बिताया। बताओ, कृष्ण ने मीरा के साथ कितना समय बिताया था?

लेकिन हम तो ऐसे ही नापते हैं न कि पहले तुम मेरे साथ दो घंटा बिताया करते थे, अब तुम एक ही घंटा बिताते हो, मेरे हिस्से का प्रेम आधा हो गया है। इससे यही पता चल रहा है तुम्हारा प्रेम अभी आधा नहीं हुआ है, पहले ही शून्य था। जैसे अभी तुम कह रहे हो कि मेरा प्रेम दो घंटे से कम होकर एक घंटे का हो गया, कोई बड़ी बात नहीं, तुम पदार्थ के अनुसार आगे बढ़कर कहो, पहले मुझे दस किलो प्रेम मिलता था, अब पाँच ही किलो मिलता है। अगर तुम प्रेम की समय में लम्बाई नाप सकते हो तो फिर उसका वज़न भी नाप सकते हो। जिस चीज़ की लम्बाई होती है उसका तो वज़न भी होता है, होता है कि नहीं? पदार्थ के पास तो दोनों चीज़ें होती हैं, आकार और वज़न।

अगर लम्बाई नाप ली, 'क्या मुझे सिर्फ़ एक ही घंटा दोगे?' तो वज़न भी नाप लेना। रंग भी कह देना। कहना, 'पहले तुम मुझे सफ़ेद वाला प्रेम देते थे, अब काला वाला देते हो, गन्दे आदमी!' लगा लो जितनी तोहमत लगानी है, लेकिन जितना तुम ऐसे इल्ज़ाम लगाओगे, उतना ही तुम साबित करोगे कि तुम्हारा प्रेम शुरुआत से ही आन्तरिक था ही नहीं। ऐसा था (हाथ की ओर इंगित करते हुए)। यह क्या है? यह पदार्थ है। तुम्हारा प्रेम जिस्मानी था।

तुम्हारे प्रेम का सम्बन्ध चीज़ों से था। तुम्हारे प्रेम का सम्बन्ध आत्मा से नहीं था। तुम्हारा प्रेम रूहानी नहीं था। और जब भी प्रेम भौतिक होगा, वह तुम्हारे लिए कष्ट का कारण बनेगा-ही-बनेगा। और जब भी प्रेम कष्ट का कारण बनने लगे, तुरन्त समझ जाओ कि तुम्हारे प्रेम में पहले ही खोट थी। शोक मत मनाओ, बुरा मत मानो, प्रेम में चोट लगे तो इसको सुधार का मौक़ा जानो। समझ जाओ कि पहले जिसको मैं प्रेम समझ रहा था, उसमें कुछ विकार थे, और अब चोट लगी है तो मौक़ा मिला है कि उन विकारों को दूर कर दें।

बात समझ में आ रही है?

अहंकार छोटा सा होता है, कटा-कटा। इसीलिए वह जो चाहता है अपने लिए चाहता है। उसकी व्यक्तिगत भूख ही उसके लिए बहुत बड़ी बात है, 'मुझे मिल जाए, मुझे मिल जाए!' अहम् प्रेम नहीं माँगता। डरे हुए आदमी को प्रेम नहीं चाहिए न? डरे हुए आदमी को तो ढाँढस चाहिए, दिलासा चाहिए, सान्त्वना चाहिए। इसी तरीक़े से जो आदमी डरा हुआ है, जो आदमी अहम् केन्द्रित जीवन जी रहा है, उसे प्रेम चाहिए ही नहीं, तो मिलेगा कहाँ से! उसे तो अपनी बदहवासी से निकलने के लिए सहारा चाहिए। और डरा हुआ आदमी अपने सहारे को कैसे पकड़ता है? जकड़ लेता है।

यही रहती है आम प्रेमी की वर्चस्व की माँग, पज़ैसिवनैस (आधिपत्य की तीव्र इच्छा)। वह प्रेम है ही नहीं। वह कब्ज़े की कोशिश है क्योंकि तुम बहुत डरे हुए हो। तुम इतने डरे हुए हो कि तुम्हें जो मिल रहा है, तुम उसी को जकड़े ले रहे हो। अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा है जो आपको जकड़े ही ले रहा है, तो कृपा करके कम-से-कम उसे प्रेम का नाम न दें। समझ रहे हैं?

इस मामले में मैं एक और चीज़ की ओर इशारा करूँगा, माँ-बच्चे का जो रिश्ता होता है, भारत में पुराने समय से माँ-बच्चे के रिश्ते को बड़ा दैवीय माना गया है। माँ को ममता की मूरत कहा गया है, देवी तुल्य कहा गया है। लेकिन हमें थोड़ा सम्भल कर रहना होगा। थोड़ी सावधानी ज़रूरी है। जन्म भर दे देने से माँ के मन से दोष थोड़े ही दूर हो जाते हैं। जन्म तो पूरे तरीक़े से भौतिक बात है। जानवर भी जन्म देते रहते हैं। जन्म देने से मन थोड़े ही विकसित हो गया।

मन में अगर ये सब भरे ही हुए हैं, काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य, तो बच्चे से भी जो रिश्ता होगा वह काम से भरा हुआ होगा, लोभ से भरा हुआ होगा, मद और मात्सर्य से भरा हुआ होगा। और इन्हीं सबके मिल जाने के बाद माँ का बच्चे के प्रति जो रवैया रहता है उसको कहते हैं 'ममता'। ममता से बहुत सावधान रहें माँएँ।

'मेरा है, मेरा है।' उसकी अब देखभाल तो बहुत करोगे, बच्चे की रख-रखाव भी बहुत करोगे, लालन-पोषण करोगे, पर भाव लगातार यही रहेगा कि चीज़ मेरी है, इसलिए सम्भाल रही हूँ। और यह बहुत ख़तरनाक भाव है। मैं इस बच्चे की ख़ास, ये बच्चा मेरा ख़ास, मैं इसलिए इस बच्चे को सम्भाल रही हूँ।

तो शुरुआत कैसे करनी है? शुरुआत ऐसे करो कि सबके जीवन में कोई-न-कोई तो ऐसा होता है जो बड़ा अनूठा, बड़ा न्यारा, ख़ासम-ख़ास होता है। होता है कि नहीं? जिसके सन्देशों से मोबाईल फ़ोन भरा होता है, जिसका ख़याल दिमाग में घूमता रहता है। वह कोई भी हो सकता है। वह दोस्त हो सकता है, माँ-बाप हो सकते हैं, बेटी-बेटे हो सकते हैं, या ज़ाहिर सी बात है, पति-पत्नी हो सकते हैं, प्रेमीजन हो सकते हैं। उनके प्रति तुम अच्छे-से-अच्छे बनकर रहना चाहते हो। चाहते हो न?

देखो, कितनी मशक़्क़त करके तुम पैसा कमाते हो, और बच्चा है छोटा तुम्हारा, तुम उसके लिए चीज़ें खरीद लाते हो। और बच्चे को फिर बिल थोड़े ही थमाते हो? या ऐसा भी करते हो कि आज यह बिल नहीं चुका पाएगा तो जितनी रसीदें हैं उनका एक फोल्डर बनाये लेते हैं, जिस दिन बच्चू अट्ठारह साल के होंगे उस दिन कहेंगे, 'चल, सूद समेत चुका। इतना तेरे लालन-पोषण पर खर्च हुआ है।' ऐसा करते हो क्या?

यहाँ कई माँ-बाप बैठे होंगे, उनसे पूछ रहा हूँ। किनके-किनके घर में ऐसी फाइलें हैं, जिनमें सारे बिल , सारी रसीदें सब जमा हैं कि छुन्नू लाल, तुम्हारे डायपर से लेकर, स्कूल फीस से लेकर, जितने तुम पर खर्चे हुए हैं, सब हमने लिख रखे हैं। है भई कोई, बताओ। पता नहीं ज़माना आगे बढ़ रहा है, कुछ हो ही गया हो ऐसा! ऐसा तो नहीं है। तो अच्छा होता तुम जानते तो है। जानते हो? कम-से-कम अच्छे होने की कोशिश तो करते हो। हम सभी करते हैं। अब मेरी अपील (याचना) यह है कि जैसे एक के प्रति अच्छा होना जानते हो वैसे ही?

श्रोतागण: सबके प्रति अच्छा हो जाओ।

आचार्य: चलो इन्सान हो, देवता वाले काम नहीं कर पाओगे, पर अपने बच्चे को अगर सौ प्रतिशत दे पाते हो, तो कोशिश करो कि दूसरों को साठ-सत्तर — अच्छा, ज़्यादा हो गया — तीस-चालीस? (श्रोतागण हँसते हैं) तीस-चालीस? नहीं, कर लेते हैं मोल-भाव, कहीं पर तो आकर रुको! अपने बच्चे को अगर सौ रुपया दे देते हो बिना सोचे, बेशर्त, यूँही उस पर खर्च कर डाला, तो दूसरे पर बीस-तीस तो कर दो, या बहुत ज़्यादा है यह? अपनी बीवी पर अगर लाख कर देते हो — नहीं, मैं दूसरों की बीवी नहीं कह रहा हूँ (श्रोतागण हँसते हैं) — तो और भी लोग हैं ज़रूरतमन्द दुनिया में। दस-बीस हज़ार उनके ऊपर भी खर्च कर दो, कि नहीं? बोलो!

ज़रूरी है। अभी उनसे बात करी जो देने वाले हैं। अब जो पाने वाले छोर पर खड़े हैं उनसे कह रहा हूँ, तुम्हें इतना कुछ मिलता है, जब देखो कि दूसरों को कुछ मिल रहा है तो बुरा मानना बन्द करो। बल्कि हर्ष मनाओ कि सिर्फ़ अगर मुझे मिलता तो पाप लगता, भला हुआ कि दूसरों को भी मिला, अच्छा हुआ। दस चीज़ अगर मुझे मिल रही हैं तो कम-से-कम दो-चार चीज़ें दूसरों को भी दे दो, भाई।

होना तो यह चाहिए कि दस मुझे मिल रहा है तो दूसरों को बीस मिले। पर इतना बड़ा अगर दिल नहीं भी है तुम्हारा तो बोलो दस मुझे मिल रहा है अगर तो दो-चार दूसरों को भी मिले। आधिपत्य मत कर लो, 'मेरी सल्तनत! मेरा कब्ज़ा!'

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