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मन और अहम क्या? वृत्ति और मुक्ति क्या? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
16 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन के बारे में बहुत बोला जाता है कि मन चंचल है, ये है, वो है, लेकिन अगर हम मूल की बात करें तो मन क्या है, क्या वह बुद्धि है या अहंकार? जब हम पैदा हुए, तब से लेकर अब तक की जो याददाश्त है, वो मन है, या कुछ और?

आचार्य प्रशांत: मन पैदा होने से पहले का ही है। पैदा होने के बाद तुम्हारी मेमोरी (याददाश्त) शुरु होती है न? पैदा होने के बहुत-बहुत दो साल बाद, ढाई साल बाद।

प्र: ये मन पहले से ही है; तो फिर इसको जानना असंभव होगा क्या?

आचार्यः क्यों? पहले का होगा; कभी का होगा, ये बहुत पहले का है (तकिया दिखाते हुए), मुझे क्या पता कब का है? लेकिन मैं इसको जान नहीं सकता क्या? है तो मेरे सामने। ताजमहल को तुम नहीं जान सकते? या ये कहोगे कि, "इतना पहले का मैं कैसे जान सकता हूँ?"

प्र: आप टेंजिबल (ठोस, स्पर्शनीय) चीज़ों की बात कर रहे हैं।

आचार्यः मन टेंजिबल नहीं है क्या? ऑनली इनटेंजिबल इज़ ट्रुथ (एकमात्र सत्य ही अस्पर्शनीय है), बाकी सब टेंजिबल हैं। भावनाएँ टेंजिबल नहीं होतीं?

प्र: यदि इस शरीर के आने से पहले भी मन था तो शरीर के जाने के बाद भी मन रहेगा क्या?

आचार्यः शरीर के आने के पहले नहीं; उन्होंने कहा – जन्म के पहले।

मैंने कहा – तुम्हारे जन्म के बाद जो होता है वही मन नहीं है, मन तो तुम्हारे जन्म से भी पहले का है।

प्र: तो, बुद्धि और अहंकार, मन से निकले हैं?

आचार्यः जो पहली दो कोशिकाएँ मिलती हैं माँ के गर्भ में, संस्कार वही से शुरु हो जाते हैं। जन्म तो नौ महीने बाद होता है। और आप कह रही हैं कि मन अगर जन्म से पहले था तो मृत्यु के बाद भी रहेगा। बिलकुल रहेगा पर वो आपका मन नहीं होगा, क्योंकि आपकी तो मृत्यु हो गई। ‘मन’ बचेगा, ये मत सोचिएगा कि आपका मन बच गया। आप ललचाती थीं स्ट्राबेरी आइसक्रीम के लिए; आप ख़त्म हो गईं, ‘मन’ मात्र बचेगा। आपकी कोई सत्ता नहीं बचेगी।

प्र: तो, जो ‘मन’ बचेगा वो दोबारा शरीर धारण करेगा या फिर सबका अलग-अलग मन होता है?

आचार्यः सारे शरीर वही धारण करता है, एक ही ‘मन’ है। व्यक्तिगत मन नहीं होते। जब आप व्यक्ति बन जाते हैं तो व्यक्तिगत मन हो जाता है। अन्यथा मन मात्र है।

‘मन’ क्या है? - मूल जीव वृत्ति को मन कह सकते हैं। वो सब में एक जैसी होती है। आदमी तो आदमी, पशुओं, जानवरों में भी वहीं होती है। मूल जीव वृत्ति क्या होती है? - जीवन बना रहे। जीवन धारण करना ही मूल जीव वृत्ति है। हर वो चीज़ जो जीवित है, वो मन है। मन ही जीवन धारण करता है। लेकिन हर जीव फिर अपना अलग, पृथक व्यक्तिगत जीवन जीता है न? तो फिर उससे व्यक्तिगत मन बन जाता है।

यहाँ जितने लोग बैठे हैं, सब के व्यक्तिगत मनों को टटोलें तो ऊपर-ऊपर सब में विभिन्नता दिखेगी – इन्हें चाय पसंद है, उन्हें कॉफी पसंद है, इन्हें कुछ और पसंद है, उन्हें कुछ और पसंद है (उपस्थित श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए)। पर इन सारी बातों में साझी बात क्या है? - कि सबको कुछ-न-कुछ पसंद है। तो ये जो वृत्ति है कि कुछ पसंद होगा, कुछ नापसंद होगा – ये ‘मन’ है। और चाय पसंद होना या कॉफी पसंद होना, ये व्यक्तिगत मन है।

व्यक्तिगत मन आपकी मृत्यु के साथ गया। मन मात्र तब तक बचा रहेगा जब तक ये ब्रह्मांड है। वो ब्रह्मांड के साथ ही आया था और जब तक अस्तित्व है तब तक रहेगा। आप ऐसे भी कह सकते हैं कि अस्तित्व का ही नाम ‘मन’ है; ‘मन’ ही अस्तित्व है।

प्र: क्या यही बात आत्मा के सन्दर्भ में भी बोल सकते हैं कि आत्मा पहले आई थी फिर व्यक्तिगत हो गई?

आचार्यः आत्मा तब भी है, जब अस्तित्व नहीं है। मन सिर्फ तब तक है जब तक अस्तित्व है। आत्मा तब भी है जब समय भी नहीं है, मन सिर्फ तब है जब अस्तित्व अर्थात समय है। और व्यक्तिगत मन तो बहुत ही छोटा है, वो तो सिर्फ तब तक है जब तक अस्सी साल आप जी रहे हो।

आत्मा अनादि-अनंत है। मन का आदि भी है और अंत भी है। और व्यक्तिगत मन, वो तो हमारी आँखों के सामने ही पैदा होता है और हमारे ही साथ मर जाता है।

प्र: अहंकार सिर्फ इंसानों में होता है या जानवरों में भी होता है?

आचार्यः सब में होता है बेटा! जो भी कोई अपनी जान बचाने के कोशिश करे, जो भी कोई जीवित है, उसका नाम अहंता है, अहंकार है।

प्र: तो जानवर तो दुखी ही नहीं होते सिर्फ हम ही दुखी होते हैं?

आचार्यः तुमसे किसने कह दिया कि जानवर तो दुखी ही नहीं होते? फिर तुम किसी जानवर के साथ रहे नहीं हो। अभी मैं वहाँ कुत्तों के साथ खेल रहा था जब तुम लोग कबीर साहब गा रहे थे, वो (कुत्ते) कितने खुश थे। उसके बाद वो (कुत्ते) तुम लोगों की चप्पलें उठा-उठा कर ले गए, क्या तुम्हें पता है? मैं तुम्हारी चप्पलें सड़क से बटोर कर लाया हूँ, नहीं तो ले कर भाग गए थे वो अपना खुशी में नाचते-नाचते (श्रोतागण हँसते हैं)। किसी जानवर के साथ रहो तो पता चलेगा, वहाँ भी होता है ये सब कुछ।

प्र: लेकिन उनकी इक्वीवेलॅन्ट (बराबर) संवेदना नहीं होती है।

आचार्यः इक्वीवेलॅन्ट हो न हो, फीलिंग्स (भावनाएँ) हैं न? जीवेषणा है न? जीवेषणा समझते हो? जीने की इच्छा। जहाँ जीने की इच्छा है वहीं अहंता है, क्योंकि कौन जी रहा है? जीव जी रहा है। वो कह रहा है न कि 'मैं जीना चाहता हूँ।' तो बस हो गया, अहंकार आ गया, अहंता आ गई। अहम् – 'मैं जीना चाहता हूँ।'

प्र: आचार्य जी, आपने कहा कि जिस समय शरीर जन्मता है उस समय व्यक्तिगत मन का जन्म होता है। तो, मन को शरीर में कौन लाता है, आत्मा या प्रकृति?

आचार्यः प्रकृति का खेल है। क्यों परेशान हो उसमें? इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। दो कोशिकाएँ मिली हैं, चैतन्य कोशिकाएँ हैं, वो मिलती हैं, वो वही करती हैं जो करने के लिए संस्कारित हैं। तो वहाँ पर रासायनिक प्रक्रियाएँ शुरु हो जाती हैं, दो कोशिकाएँ चार बनती हैं, आठ बनती हैं और खेल आगे बढ़ता है।

प्र: सत्य को जानना इतना मुश्किल क्यों है? प्रकृति और मन दोनों ही इसके विरोध में रहते हैं।

आचार्यः क्योंकि आप इसलिए थोड़े ही हो कि आप ट्रुथ (सत्य) वगैरह रियलाइज़ (जानना) करो। सबसे पहले तो आप एक शरीर ही हो। शरीर के लिए कोई ट्रुथ वगैरह नहीं होता। शरीर के लिए तो मिट्टी होती है। शरीर को सत्य नहीं चाहिए। शरीर को भोजन चाहिए, सुरक्षा चाहिए, सेक्स (संभोग) चाहिए। ये सब शरीर को चाहिए। और आपका तादात्म्य, आईडेंटिफिकेशन किसके साथ है सबसे ज़्यादा?

प्र: शरीर के साथ है।

आचार्यः शरीर के साथ ही है, और शरीर को सत्य चाहिए ही नहीं, तो फिर आपको सत्य क्यों चाहिए होगा? आप शरीर हो, शरीर को क्या चाहिए – रोटी, कपड़ा, सुरक्षा। जब शरीर को ये सब कुछ चाहिए तो आपको सत्य क्यों चाहिए होगा?

भई, जिन लोगों को सत्य नहीं मिलता, उनको कोई बीमारी लग जाती है क्या? बल्कि वो ज़्यादा हट्टे-कट्टे रहते हैं। यहाँ जितने हट्टे-कट्टे घूम रहे हों उन्हें क्या सत्य मिल गया है? शरीर को तो सत्य चाहिए ही नहीं। बल्कि जितना अक्सर आपको रूपवान शरीर दिखेगा, समझ लीजिए कि सत्य से दूरी उतनी ज़्यादा। कोई यदा-कदा विरला अपवाद मिल जाए तो अलग बात है। इसी से समझ लो कि शरीर का तो अपना एक अलग हिसाब-किताब है। वो ये कह ही नहीं रहा कि लिबरेशन , आज़ादी मिले।

प्र: तो किसको आज़ादी चाहिए?

आचार्यः जो तुम हो। शरीर मात्र थोड़े ही हो।

प्र: तो क्या मैं मन हूँ?

आचार्यः (व्यंग्य करते हुए) पता नहीं तुम कौन हो। मुझे तो ये पता है कि पौने दस बज रहा है। और रोज़ खाना कितने बजे खा लेतीं थीं? बताओ – बताओ!

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: नौ बजे।

आचार्यः नौ बजे। शरीर तो माँग रहा होगा खाना? माँग रहा है कि नहीं? तो अगर तुम शरीर मात्र हो तो खाना खाने क्यों नहीं बैठ जातीं? इधर लाओ खाना (एक स्वयंसेवक को इशारा करते हुए), इनके सामने रख देते हैं। देखते हैं खाएँगी कि नहीं। शरीर को तो चाहिए भोजन कि नहीं चाहिए, सही बताओ?

प्र: चाहिए।

आचार्यः चाहिए। तो अभी भोजन वहाँ पर रखा है, उसको खा क्यों नहीं लीं?

प्र: क्योंकि मन को कुछ और चाहिए।

आचार्यः वो तुम हो। अभी तुम्हारा उसी से तादात्म्य है। लेकिन ये भी हो सकता है कि तुम कहो कि - “हटाओ ये सब क्या बातचीत, फालतू! खाना कहाँ है, इधर लाओ।” तब तुम क्या हो जाओगी?

प्र: शरीर।

आचार्य: ठीक।

प्र: अर्थात मैं मन भी हूँ और शरीर भी।

आचार्य: जब तुम वो हो जाओ; जो अपनी पसंद-नापसंद पर भी नहीं चलता, तब तुम मन भी नहीं हो। जब तुम वो हो जाओ जो अपनी प्रकृति पर नहीं चलता, तब तुम शरीर नहीं हो।

प्र: तो अगर मैं पसंद-नापसंद पर चलूँ?

आचार्यः तो तुम मन हो। और अगर तुम अपने पेट की भूख पर चल रही हो तो तुम?

प्र: शरीर हूँ।

आचार्य: हम अभी जिस अवस्था में हैं, जैसा हम जीवन बिताते हैं – संस्कृति के मध्य, सभ्यता के मध्य, नगर के मध्य, हम शरीर कम हैं और मन ज़्यादा हैं। पशु शरीर ही ज़्यादा है। यहाँ तुम एक पशु को ले आओ और यहाँ चल रही है बहुत ऊँची बातचीत, वो कहेगा – “खाना बताओ, किधर रखा है? इधर लाओ।”

प्र: मेरी जीवन जीने की इच्छा मर ही गई है। मुझे नहीं लगता मेरी जीवन जीने में कोई विशेष रुचि है। मैं जीवन के लिए कोई योजना ही नहीं बनाता।

आचार्यः वो तब पता चलेगा जब कोई जीवन ले रहा होगा। (आचार्य जी मज़ाक करते हुए) निकालना ज़रा वो हथियार!

(श्रोतागण हँसते हैं)

कैसी बातें करा करते हो तुम लोग। अभी एक छोटी-सी खरोंच लग जाए तो बैंडेज (पट्टी) खोजने निकल पड़ोगे।

प्र: आठ माह से मेरे पाँव में चोट लगी है लेकिन मैं उसे ठीक करने के लिए व्यायाम तक नहीं करता।

आचार्यः बेटा, ऐसे बहुत लोग करते हैं, इससे ये नहीं सिद्ध हो जाता कि जीने की इच्छा नहीं है। यहाँ पर डाएबिटीज वाले लोग होंगे जो शक्कर खा लेते हैं, इनको माइग्रेन की दवा बताई गई है, ये खाती नहीं हैं। मैं अपनी दवाइयाँ कई बार भूल जाता हूँ। तो इससे ये थोड़े ही सिद्ध हो जाता कि मुझमें जीवेषणा नहीं है, मैं जीना नहीं चाहता। इससे बस ये सिद्ध होता है कि मैं जीना तो चाहता हूँ, पर इतना पगला हूँ कि जो मैं चाहता हूँ वो भी नहीं कर रहा। क्यों अपने-आपको वो दर्शा रहे हो जो तुम हो ही नहीं? अभी कोई गर्दन पर चढ़ बैठे और गर्दन दबाए तो पता चलेगा कि जीना चाहते हो कि नहीं।

प्र: अशांति होगी तो विरोध तो आएगा ही।

आचार्यः तो और क्या होता है, जीने की इच्छा और क्या होती है?

प्र: जीने की इच्छा के लिए तो और कुछ भी करना होता है।

आचार्यः यही करना होता है कि जो कुछ मृत्यु ला रहा हो अपनी ओर, उसको हटाना होता है। वो तुम भी करोगे। जीने की इच्छा में और कुछ थोड़े ही करना होता है। अब इन्हें जीने की इच्छा है तो ये कुछ कर रहे हैं क्या, ऐसे-ऐसे (हाथ घुमाते हुए)? नाच थोड़े ही रहे हैं जीने की इच्छा है तो। जीने की इच्छा तो इसी से सिद्ध होगी न कि जब कोई मारना चाहेगा, तो स्वयं को बचाएँगे।

प्र: मैं जब समय का सदुपयोग कर रहा होता हूँ तब यदि कोई मेरा समय लेना चाहे तो मैं उसका विरोध करता हूँ। लेकिन कई बार मैं ऐसे ही खाली रहता हूँ, तो क्या उस वक़्त मैं समय का सदुपयोग कर रहा हूँ?

आचार्यः तो तुम्हारी दृष्टि में वही सदुपयोग है। कितने लोग कुछ ना करने को बहुत बड़ा सदुपयोग मानते हैं। गोवा किसलिए जाते हैं लोग? वहाँ बीच (समुद्रतट) पर पड़े हुए हैं, कुछ नहीं कर रहे हैं और इस बात के हज़ारों-हज़ारों, लाखों-लाखों खर्च कर रहे हैं।

प्र: वो कुछ करते हैं, फिर उसके बाद विश्राम के लिए जाते हैं। विराम के लिए सब जाते हैं।

आचार्यः तुम भी तो ब्रेक (अवकाश) लेते हो, और क्या करते हो? बाकी टाइम खोपड़ा चलाते हो। कुछ करने का यही मतलब थोड़े ही है कि हाथ-पाँव चलाए जा रहे हैं। (सिर की ओर इशारा करते हुए) ये यहाँ जो चक्की चल रही है लगातार, उसका क्या है?

प्र: जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए तो मैं कुछ नहीं कर रहा।

आचार्यः तो बहुत लोग कुछ नहीं कर रहे, तो?

प्र: नहीं, आप वोट ले लीजिए इसमें।

आचार्यः बहुत लोग हैं जो कुछ नहीं कर रहे, वोट लेने की बात नहीं है। उनके कर्मों को देखो न, बहुत लोग हैं जो कुछ नहीं कर रहे, तो?

प्र: नहीं, किसी को लग रहा है कि नशा सेवन करने से उसकी ज़िंदगी अच्छी हो जाएगी तो वो ले रहे हैं, मैं वो भी नहीं कर रहा हूँ।

आचार्यः समझो तुम्हारी जीवेषणा कहाँ है। इतना देर से तुम जीवित रहने की कोशिश कर रहे हो मेरे सामने। मैं तुम्हें मारना चाहता हूँ; और तुम तर्क दे देकर जीवित रहना चाहते हो, ये है जीवेषणा। ना होती तुममें जीवेषणा, तुम मेरी एक बात पर कहते, "ठीक है।" अपने-आपको बचाए रखना चाहते हो यही कहलाती है जीवेषणा, अन्यथा इतने तर्क नहीं आते। ये तुम किसको बचा रहे हो तर्क दे-देकर? जिसको तुम बचा रहे हो न, वही जी रहा है। ये जीवेषणा है। इसी का नाम अहंकार है।

प्र: तो अहंकार कभी मन के साथ होता है, कभी शरीर के साथ?

आचार्यः उसे किसी-न-किसी का साथ चाहिए।

प्र: तो फिर अहंकार को चाहिए फ्रीडम (मुक्ति)?

आचार्यः हाँ, और कौन माँगेगा? अहम् माने ‘मैं’। फ्रीडम और कौन माँगेगा? ‘मैं’ माँगूँगा या मोबाइल फ़ोन माँगेगा?

प्र: तो, उसे मुक्ति मन के साथ रहने से मिलेगी या शरीर के साथ?

आचार्यः मन के साथ मिलता हो तो उसके साथ रह लीजिए।

प्र: तो, मुक्ति मिल जाएगी?

आचार्यः अगर मिलता हो तो ज़रूर लीजिए।

प्र: नहीं मिलता न।

आचार्यः तो मत लीजिए।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: तो, मैं यदि अपने जीवन को देखूँ तो मैं यहाँ मन के साथ हूँ या शरीर के साथ?

आचार्यः आप बंधी हुई हैं।

प्र: तो मुझे मुक्ति कब मिलेगी?

आचार्य: गड़बड़ हो गई!

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: अगर मैं हमेशा मन के साथ या शरीर के साथ बंधी हुई हूँ तो मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी और कब मिलेगी?

आचार्यः अब जाकर-के दूसरे दिन की रात को खरे सवाल आने शुरु हुए हैं। अच्छा है! बस इतना जान लीजिए कि इसके (मन के) साथ भी नहीं मिलेगी और इसके (शरीर के) साथ भी नहीं मिलेगी। इसके (मन के) साथ जो उम्मीद रखी है और इसके (शरीर के) साथ जो आशा रखी है, दोनों को हटा दीजिए। यही मुक्ति है।

प्र: ना मन की बात मानूँ, ना शरीर की बात?

आचार्यः बात मानो न मानो अलग प्रश्न है, ये जान लीजिए कि यहाँ भी नहीं मिलेगा, यहाँ भी नहीं मिलेगा। ना तो शारीरिक सुख में मिलेगा, ना मानसिक सुख में मिलेगा। दोनों के पीछे दौड़ना बंद कीजिए, यही मुक्ति है।

प्र: तो कोई इच्छा भी नहीं रखूँ?

आचार्यः अभी से सोच लीजिए कि इच्छा भी नहीं रखूँगी, ये भी नहीं रखूँगी तो क्या बचेगा। ठीक है, रखिए। ये जो सारे आप सवाल कर रही हैं, ये कौन कर रहा है?

प्र: मैं कर रही हूँ।

आचार्यः अहम् तो किसी के साथ जुड़ा होता है। अभी किसके साथ जुड़ी हुई हैं आप?

प्र: मन के साथ।

आचार्यः मन के साथ ही जुड़ करके सवाल पूछ रही हैं कि मन के साथ नहीं रहूँगी तो क्या होगा?

प्र: तो अगर मैं मन के साथ ना जुड़ूँ, तो मैं अपनी बात कन्वे (संप्रेषित) कैसे करूँगी?

आचार्यः हो जाएगा, यही तो श्रद्धा है। क्या पता कन्वे करने की ज़रूरत ही ना पड़े। कन्वे तो तभी करते हैं न जब दूरी होती है। सारी दूरियाँ ‘मन’ बनाता है। (मुस्कुराते हुए) जादू होता है!

प्र: मन के बिना हम क्या कर सकते हैं इस दुनिया में?

आचार्यः ये सवाल कौन पूछ रहा है?

प्र: मेरा मन पूछ रहा है।

आचार्यः तो मैं जाकर-के एक हलवाई की दुकान से पूछता हूँ कि, "तेरे अलावा मुझे खाना कहाँ मिलेगा?" तो वो क्या जबाव देगा?

प्र: कहीं नहीं।

आचार्यः कहीं भी नहीं। तो आप मन होकर के पूछेंगी कि मन ना होते हुए हम क्या कर सकते हैं, तो क्या जबाव मिलेगा?

प्र: मैं अपने अहंकार से बिना जुड़े कैसे रहूँ?

आचार्यः उसका तरीका ये नहीं है कि ये सवाल पूछें कि, "अगर अहंकार नहीं होगा तो क्या मिलेगा?" उसका तरीका है कि पूछो कि, "जब अहंकार है तो क्या मिल रहा है?"

प्र: कुछ नहीं मिल रहा।

आचार्यः तो बस इतना काफी है। अब और क्यों पूछ रहे हो कुछ? क्योंकि आगे की सोचने की आदत लग गई है। कि, “ये तो छोड़ दें पर आगे की कुछ गारंटी दो न। मन भी छोड़ दिया, शरीर भी छोड़ दिया, आगे कुछ मिला नहीं तो...” ये आप बाज़ार में निकली हैं क्या?

प्र: उस अवस्था के बारे में कल्पना करना भी मुश्किल है।

आचार्यः कल्पना करने में कठिनाई ही नहीं है, पाप है। सत्य अचिन्त्य है, और आप उसको कल्पित करना चाहती हैं। वो अकल्प है, उसकी कल्पना नहीं हो सकती। आप तो सिर्फ इतना कह रही हैं कि कल्पना मुश्किल है, मैं कह रहा हूँ कल्पना असंभव है, पाप है।

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