मन और अहम क्या? वृत्ति और मुक्ति क्या? || आचार्य प्रशांत (2018)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन के बारे में बहुत बोला जाता है कि मन चंचल है, ये है, वो है, लेकिन अगर हम मूल की बात करें तो मन क्या है, क्या वह बुद्धि है या अहंकार? जब हम पैदा हुए, तब से लेकर अब तक की जो याददाश्त है, वो मन है, या कुछ और?
आचार्य प्रशांत: मन पैदा होने से पहले का ही है। पैदा होने के बाद तुम्हारी मेमोरी (याददाश्त) शुरु होती है न? पैदा होने के बहुत-बहुत दो साल बाद, ढाई साल बाद।
प्र: ये मन पहले से ही है; तो फिर इसको जानना असंभव होगा क्या?
आचार्यः क्यों? पहले का होगा; कभी का होगा, ये बहुत पहले का है (तकिया दिखाते हुए), मुझे क्या पता कब का है? लेकिन मैं इसको जान नहीं सकता क्या? है तो मेरे सामने। ताजमहल को तुम नहीं जान सकते? या ये कहोगे कि, "इतना पहले का मैं कैसे जान सकता हूँ?"
प्र: आप टेंजिबल (ठोस, स्पर्शनीय) चीज़ों की बात कर रहे हैं।
आचार्यः मन टेंजिबल नहीं है क्या? ऑनली इनटेंजिबल इज़ ट्रुथ (एकमात्र सत्य ही अस्पर्शनीय है), बाकी सब टेंजिबल हैं। भावनाएँ टेंजिबल नहीं होतीं?



