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मैं इकट्ठा क्यों करता हूँ? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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साधु गाँठ न बाँधई, उदर समाता लेय ।

आगे पाछे हरि खड़े , जब माँगे तब देय ।।

~संत कबीर

वक्ता: साधु बस उतना ही लेगा जितना उसके उदर में समा जाए, बस उतना ही लेगा। उदर अर्थ सिर्फ़ भूख नहीं और कुछ भी होगा। गाँठ नहीं बांधेगा, आगे पीछे हरि खड़े, जब माँगे तब देय। जिन लोगों को वज़न कम करना होता है, उन लोगों को सलाह दी जाती है कि दिन में कई बार खाओ।

श्रोता: पाँच बार।

वक्ता: हाँ, पांच या सात बार खाओ और कम-कम खाओ। पर ये पाँच बार, सात बार खाने का क्या महत्व है कि ज़्यादा बार खाओ? क्यों?

श्रोता: ‘*मेटाबोलिज्म*।‘

श्रोता: ‘इकट्ठा ना हो।‘

वक्ता: इसका मानसिक कारण क्या है?

श्रोता: पता नहीं।

श्रोता१: अगर अंतराल पर खाना ना खाया जाए, तो शरीर को लगता है कि मुझे खाना मिल नहीं रहा, तो वो इक्कठा करने लगता है।

वक्ता: ठीक है, आ रही है बात समझ में। ये भरोसा होना ज़रूरी है कि, ‘’जब माँगूंगा, तब मिल जाएगा। जब ये भरोसा होता है, तो आप इकट्ठा नहीं करते।’’ परिग्रह का कारण ही यही है कि आप भविष्य की सोचते हैं। भविष्य की सोचेंगे, तो चिंता तो होगी ही।

कबीर कह रहे हैं कि, ‘आगे पीछे हरि खड़े, जब माँगे तब देय,’ वो गाँठ बाँधता ही नहीं है। उसे लगता है जब माँगूंगा, तब उपलब्ध हो जायेगा। जब लगातार उपलब्ध हो जाना है, तो संचय कर के क्या? हाथ में चाय है ना, जब पीनी होगी तो चुस्की ले लेंगे या मुह में भर लूँ? पर कोई छुड़ा रहा होगा, तो पक्का मुह में भर लेंगे। एक फिल्म आई थी ‘भाग मिखा भाग‘ उसके पास घी के दो डब्बे थे अब कोई उसके डब्बे छुड़ा रहा है, तो क्या किया उसने? पी लिया, संचय कर लिए, उदर भर लिया।

जब कुछ छूटता सा लगता है, तभी तुम उसकी रक्षा हेतु तत्पर होते हो। अगर तुम्हें किसी चीज़ को बहुत अनुरक्षण देना पड़ रहा है, मेंटेनेंस करना पड़ रहा है, देख-भाल करनी पड़ रही है। तो उसका यही अर्थ है कि डरे हुए हो छूट जाएगी, टूट जाएगी, कुछ अहित हो जाएगा। तुम्हारे लिए अहित की एक ही परिभाषा होती है कि, ‘’मैं कम हो जाऊंगा, मेरा होना कम हो जायेगा।’’ पर जो अपने पूरेपन को साथ ले कर चलता है, वो छोटी- छोटी बातों के होने या ना होने से खुद को जोड़ता नहीं है।

हरि खड़े हैं अब खाना कौन इक्कठा करे? पूर्ण खड़ा हुआ है, मिला हुआ है, ‘आगे-पीछे हरि खड़े’ सर्वत्व वो ही है। पूर्ण मिला हुआ है अब ये दो-चार निवाले जेब में रखेंगे क्या हम? मूर्खता है, उपहास है और अपमानजनक भी है। कौन इक्कठा करे? मिल जाएगा।

ये नहीं कह रहे कबीर कि साधु खाते नहीं है। हरि दे भी रहे हैं तो कबीर कह रहे हैं कि आप मिल गये हैं, तो अब खाए क्यों? हरि कह रहे हैं, ‘’हमारी ही इच्छा है, खा लो’’; साधु कह रहे हैं, ‘’नहीं, यही कर्ता भाव है। खा लेते हैं,’’ पर कितना? जितना उदर में समाता है।

साधु गाँठ न बाँधई, उदर समाता लेय। जितना उदर में समाया, उतना खा गया। उससे ज़्यादा नहीं चाहिए उसे। उस दिन कोई ‘ज़ेन‘ साधक की एक कविता ले के आया था मेरे पास, उसमें लिखा था कि दस दिन का खाना है मेरे पास अब, और मुझे चाहिए नहीं, उसका मतलब भी यही था। चाहे ये कह लो कि उतना खाता है, जितना उदर में समाता है या ये कह लो कि दस दिन का रखता है एक ही बात है, जितने में काम चल जाए, उतना उसके लिए बहुत होता है।

जिन बच्चों को खाना कम मिलता है, उन्हें एक बीमारी हो जाती है जिनमें उनके पेट बड़े-बड़े हो जाते हैं। छोटे बच्चे जो कुपोषण का शिकार होते हैं, उनके पेट फूल जाते हैं। ये बड़ी अजीब बात है, उसे खाने को नहीं मिल रहा, और पेट फूल गया। हमारी भी यही स्थिति है, हमे माँ नहीं मिलती, तो हमारी तिजोरियाँ फूल जाती हैं। हमे भी माँ नहीं मिली हुई है, इसीलिए हमारे मन, अहंकार बहुत फूले हुए हैं। यही तो पेट है ना, जिसमें इकट्ठा किया गया हो, जिसमे संचय किया गया हो, बाहर से ला-लाकर कुछ भरा हो, उसी का नाम मन है, उसी का नाम उदर है। वो खूब भर जाते हैं।

आ ही रहा होगा समझ में फिर की वैभव का असली अर्थ क्या है? अमीरी क्या है? असली धन क्या है? और जिसको आप सामान्यतः धन कहते हो वो क्या है? और उसकी मौजूदगी आपके जीवन के बारे में क्या बताती है? बहुत पैसा है, माने? कुपोषण के शिकार हो। जो ज़रूरत है, वो मिला नहीं इधर-उधर का सब इकट्ठा कर के रख लिया है।

आदर्श मत बना लिया करो इन लोगों को कि, ‘अरे! अरबपति। कॉलेजों में खूब चलता है ये कि यही तो सफ़ल लोग हैं, दंडवत प्रणाम। ‘व्यवसायी‘ देव की आरती और उसमें बड़े से बड़ी मूर्खता ये होती है कि आप व्यापारियों को गुरु बना लेते हैं। किसी ने कोई माल बनाया, वो बाजार में बेचा और वो माल बिक रहा है तो वो व्यक्ति फिर आपके लिए गुरु भी हो जाता है। उसकी लिखी किताबों से आप फिर जीवन दर्शन भी पा रहे हैं। आप जूते बनाते हो, मोबाइल बनाते हो या कुछ और भी बनाते हो, और वो बिक रहा है तो आपकी लिखी किताब खूब बिकेंगी।

और लोग कहेंगे कि ये हैं आज कल के ऋषि, इनसे सीखो कि जीवन कैसे जिया जाता है और सत्य क्या है? और वो अपनी कितबों को भी बहुत भ्रमित करने वाले नाम देते हैं। वो सीधे नहीं कहते कि, ‘’भैया, मैं व्यापारी हूँ, दुनिया में माल कैसे खपाना है, ये मुझे पता है। इसके ऊपर वो किताब लिखें तो पढ़ लो, पर वो किताबों को बड़े भ्रमित करने वाले नाम देते हैं – जीवन कैसे बदलें।

तुम मोबाइल फ़ोन बनाते हो, उसके बारे में कुछ बताओ तो ठीक है। ये सब तुम क्या बता रहे हो कि जीवन क्या है, और जीवन में क्या करने योग्य है। ये हम तुमसे जानेंगे क्या? तुम्हारा स्थान बाज़ार में है, मंदिर में नहीं। मंदिर बाज़ारू नहीं होता। मंदिर में क्रय-विक्रय नहीं होता। इनको जीवन आदर्श मत बना लेना कि किसी की कार बहुत बिक रही है, तो उसकी बातें चल रही हैं। कोई पेट्रोल अच्छा बनाता है, उसकी ‘*रिफायनरी*‘ चल रही हैं, तो उसकी स्तुति गा रहे हो।

वैज्ञानिक से विज्ञान सीखो, व्यापारी से व्यापर सीखो पर जीवन या तो जीवन से सीखो या गुरु से, ना व्यवसाई से ना वैज्ञानिक से। जीवन जीने की कला है, हल्का होने की कला और व्यवसायी वो जिसने इकट्ठा किया है। जिसका उदर भारी है, उससे थोड़ी सीखोगे। जीवन जीने की कला है, ज्ञान से मुक्त होने की कला और वैज्ञानिक वो, जिसने ज्ञान संग्रहित किया है, उससे थोड़ी सीखोगे।

व्यापारी और वैज्ञानिक दोनों एक मामले में नास्तिक होते हैं। उन्हें ये भ्रम होता है कि सत्य जाना जा सकता है। एक कहता है: ‘’सत्य को जान कर के बुद्धि में कैद कर लूँगा,’’ और दूसरा कहता है, ‘’जीवन में जो ही पाने योग्य है, उसे पा कर के तिजोरी में कैद कर लूँगा।’’ एक ने ऊँचे से ऊँचा स्थान ज्ञान को दिया होता है, और दूसरे ने ऊँचे से ऊँचा स्थान धन को दिया होता है। इन दोनों की ज़िन्दगी में समर्पण नहीं होता। इन दोनों की ही जिंदगी में ये भाव नहीं होता कि, ”जो उच्चतम है, ना मैं उसको मानसिक रूप से जान सकता हूँ, ना ही किताबों में लिख सकता हूँ, और ना ही अपने बैंक अकाउंट में कैद कर सकता हूँ।”

अपने बूते जीते हैं ये, कबीर समान नहीं होते ये लोग कि, ‘आगे-पीछे हरि खड़े, जब माँगू तब दे।’ ये भरोसा नहीं होता इन्हें कि जब मांगेंगे तो मिल जायेगा। ये तो कहते हैं कि अर्जित करना पड़ेगा कमाओ, जानो, आगे बढ़ो, शोध करो। नदी, पत्थर, पहाड़, पति जैसे नहीं होते ये लोग, कि जो है और बिना जाने हैं। जो बौद्धिक रूप से नहीं जानता, वो वास्तव में सब कुछ जान जाता है। हाँ, बौद्धिक रूप से नहीं पता होता, उसे शब्दों में बताने के लिए कहो तो शायद कुछ नहीं बता पाए, पर उसे पता सब कुछ होता है।

मैं तो इसीलिए पूछता हूँ ‘*क्लोरोफिल*‘ का पता तुमको है, या पत्ती को है? और बड़ी हासमय बात होती है, लोगों को सोचना पड़ता है कि कहीं हमे ही ज़्यादा पता हो क्लोरोफिल के बारे में। तुम्हे क्लोरोफिल का ज्ञान है पर क्लोरोफिल क्या है, ये पता पत्ती को है। हाँ, उससे कहो बताओ अपना ज्ञान तो नहीं बता पाएगी। उससे कहो कुछ तो बताओ फार्मूला वगैरह, उसे कुछ ना पता होगा पर फिर भी सब कुछ पता है।

तुम्हारे पार बस थोथा ज्ञान है। जिस के पास बौद्धिक ज्ञान नहीं होता, वो सब कुछ जान जाता है। बस सब जानने का वो दावा नहीं कर सकता, कोई प्रमाण नहीं है उसके पास। जानोगे सब पर सिद्ध नहीं कर पाओगे और यदि सब जाना है, तो सिद्ध करोगे भी किसको। हसरत भी नहीं बचेगी, और कोई सिद्ध करने के लिए भी नहीं बचेगा। किसको सिद्ध करना है?

कोई पूछे क्या है? ऐसे ही जियोगे? “अरे कुछ पता तो होना चाहिए कि ब्रह्मांड क्या चीज़ है, ‘यूनिवर्स‘ का कुछ पता हो। हवा क्या है इसके ‘*कोम्पौज़िशन*‘ पता हो, पानी के अंदर कौन से ‘*बांड*‘ हो ये पता हो, ‘*न्युक्लियस*‘ में क्या चल रहा है ये पता हो, चारों तरफ़ कौन-कौन से फीड्स व्याप्त हो ये पता हो।”

तुम जाकर ऐसे कबीर से पूछो वो कहेंगे, ‘’हाँ सब पता है।’’ तुम पूछोगे क्या पता है? वो कहेंगे, ‘’आगे-पीछे हरि खड़े।’’ यही तो है और क्या है। तुम पूछो आगे क्या है? पीछे क्या है? चारों दिशा क्या है? वो कहेंगे, ‘’हरि और क्या जानना है, अब क्या बचता क्या है जानने के लिए? तुम्हें पता होगा कि दूरियाँ कितनी है, बड़ी-बड़ी मैथ्स कि इक्वेशन में तुमने तथ्यों को कैद कर रखा होगा, बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं में जा के आंकड़े इकट्ठे किये होगे तुमने। कबीर से पूछोगे, वो कहेंगे – ‘आगे पाछे हरि खड़े’ और क्या, और है क्या? और क्या जानना है?

जिन्हें नहीं पता होता, वो कहते हैं, कौन है? जिन्हें पता होता है, वो कहते हैं, ‘वही तो है।’ बार-बार जब पूछ रहे हो कौन है, कैसा है, क्या है? तो इसका यही मतलब है कि नहीं पता। नहीं तो है बस, और क्या है वही तो है। इतनी क्या जान लगानी; जानने के लिए, उसके अलावा और हो क्या सकता है? क्यों फ़ालतू में जिंदगी जहन्नुम कर रहे हो, रगड़े जा रहे हो, रगड़े जा रहे हो कि ज्ञान में वृद्धि हो। सारे ज्ञान का निचोड़ बस इतना ही है कि वही है, बात ख़त्म।

हाँ, अब तुम्हें सीधे-सीधे कान नहीं पकड़ने है, तो जितना घूम के पकड़ना हो पकड़ना। बात तो बस इतनी सी है कि आगे पाछे हरि खड़े।

श्रोता: सर, एक सवाल है मैंने ओशो की बहुत ‘*वीडियोस*‘ देखी हैं और उनमें से एक विडियो में तो सिर्फ़ उनकी पुस्तकालय दिखाई गयी है। कहते हैं उन्होंनें हजारों किताबे पढ़ी हैं। तो मेरा सवाल ये है कि अगर ओशो वो किताबे ना पढ़ते, तो क्या तब भी वो ओशो होते?

वक्ता: अगर वाले सवाल नहीं करने चाहिए। तुम्हारा अभी अगर पढ़ने का ही मन कर रहा है, तो मैं कुछ भी कहता रहूँ तुम क्या करोगे? पढ़ोगे, पढ़ो। मुझे बार-बार याद दिलाना पड़ता है कि ये बातें आचरणगत नहीं है कि कोई पूछे कि आज क्या जाना? तो कहो कि कुछ जानो मत। कोई पूछे कि क्या जाना, तो कह दो आगे-पीछे हरि खड़े। अगर अभी तुम्हारी अवस्था यही है कि तुम कुल-बुला रहे हो ज्ञान के लिए, तो तुम्हें क्या करना पड़ेगा? ज्ञान इकट्ठा करना पड़ेगा और तुम करोगे। याद रखना मैं तुम्हे कोई उपदेश नहीं दे रहा हूँ। किसी को बदलने में और किसी को उपदेश देने में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

उपदेश में आदमी उपदेश के बाद भी रहता वही है, जो उपदेश से पहले था। उसने बस तुम्हारा उपदेश इकट्ठा कर लिया होता है। और जब कोई बदलता है, उसमें इकट्ठा करने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्यूंकि इकट्ठा किसने किया? जो पहले था या जो बाद में हैं और क्यूंकि बदलाव लगातार है इसलिए इकट्ठा होने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। उसका तो जन्म ही बिलकुल आखिरी बिंदु पर हुआ है, तो कुछ इक्कठा होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बच्चा क्या कागज़ात लेकर पैदा होता है, या गाड़ी की चाबी? नंगा पैदा होता है ना।

बदलने का मतलब है तुम बस अभी-अभी पैदा हुए हो बिलकुल शुद्ध जाते हो, बिलकुल ताज़े पैदा हुए हो। तुम्हें कुछ दे नहीं रहा हूँ, तुम्हे पैदा कर रहा हूँ।

YouTube Link: https://youtu.be/1W3PxBLd3Zw

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