जो सच का प्रेमी होता है, उसके हाथ में थोड़ा-सा संसाधन भी कमाल कर देता है। रावण की पूरी सेना और सारे अस्त्र-शस्त्र, माँ सीता के एक तिनके के आगे विफल हो गए — जीत तो बस उस तिनके की हुई। उन्होंने श्रीराम, अर्थात् सत्य को ही स्वीकार किया। जो शिव-शक्ति का संबंध है, वही राम-सीता का संबंध है। सीता के रूप में शक्ति हमको सिखा रही है कि राम को अपने आगे-आगे चलने दो। जब एक बार राम जीवन में आ जाएँ, तो फिर डर, लालच, स्वार्थ के कारण विचलित मत होना।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैंने आपकी किताब पढ़ी थी दुर्गा सप्तशती जिसमें आपने मतलब माँ दुर्गे के सारे रूपों के बारे में विवरण किया अच्छे से काफी अच्छी पुस्तक थी। मैंने बहुत ही मतलब रुचि से पढ़ी है उसको। तो उस किताब में माँ दुर्गा के सारे रूपों के बारे में बताया गया है।
लेकिन जैसे हम माँ सीता को भी देखते हैं, उनको हम लोगों ने सिर्फ़ एक शांत स्वभाव या फिर एक ऐसी सहनशील स्वभाव में देखा है। तो आपकी पुस्तक जो मैं बोल रही हूँ दुर्गा सप्तशती उससे हमें माँ दुर्गा की शक्तियों के बारे में पता चलता है और उनसे कई सीखें मिली है। माँ सीता से हमको क्या सीख लेनी चाहिए? क्योंकि हमने उनको सिर्फ़ सहन करते हुए देखा है और थोड़ा कष्ट काटते हुए ही देखा है। लेकिन सीख आप कुछ बता सकेंगे तो और क्या वो सही था जो उन्होंने देखा भी है?
आचार्य प्रशांत: अर्थ को उठाना पड़ेगा, उठा दोगे तो सब सही दिखाई देने लग जाता है। जो शिव-शक्ति का संबंध है वही राम-सीता का संबंध है। “सियाराम मैं सब जग जानी।” ठीक है? एक बार ऐसे देख लिया फिर सारी बात साफ हो जाएगी। प्रकृति है सीता, आत्मा है राम। प्रकृति को बोलो, 'ये (शरीर की ओर इंगित करते हुए) है प्रकृति।' इसको बोलो पीछे-पीछे चलती रहे आत्मा के, यही सत्यनिष्ठा है, यही सतीत्व है। बहुत सुंदर साखियाँ गाई हैं ज्ञानियों ने सती के लिए, सती माने वो नहीं उसका संबंध सती प्रथा से मत लगा देना।




