माँ कोई मिथिकल कैरेक्टर नहीं हैं, इतना ही समझ लोगे तो पर्याप्त होगा। ये समूची प्रकृति, ये अस्तित्व, पूरा ब्रह्मांड जिसमें दृश्य और दृष्टा दोनों शामिल हैं, इसी को कहा जाता है माँ। और चूँकि वो बड़ी माँ हैं तो, माने एक तो होती हैं जिन्होंने इस व्यक्तिगत शरीर को, एक व्यक्ति मात्र को जन्म दिया, तो उनको हम क्या कहते हैं? माँ, माताजी। तो इसीलिए, क्योंकि वो ब्रह्मांड की ही जन्मदात्री हैं, तो उनको हम क्या बोलते हैं? बड़ी माँ। अगर इतना भी समझ लोगे कि माता से आशय क्या है, तो बहुत तरह की मूर्खताओं और अंधविश्वास से बच जाओगे।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम शिखा है, मैं 23 वर्ष की हूँ। मैं 11–12 साल से नवरात्रि का व्रत करती आई हूँ। तो आपसे सीखा है कि जो हम सब करते हैं, कि भगवान के नाम पर घी का हवन करते हैं, हलवा–पूरी चढ़ाते हैं, ये खाना है, ये नहीं खाना है, सुबह से शाम तक यही दिमाग़ में चलता है। और दुर्गा सप्तशती का भी पाठ करती आई हूँ, लेकिन आपसे सुना तो मैं उसको अच्छे से समझ पाई हूँ।
मम्मी का फ़ोन आया था दो दिन पहले, बोली कि नवरात्रि आ रही है तो अभी व्रत रहना है, कैसे क्या करोगी। तो मैं बोली, नहीं, इस बार तो मैं व्रत नहीं रखूँगी। कही, तब कैसे क्या करोगी? कही, तो उद्यापन कर दो। मैं बोली, उद्यापन का क्या मतलब है? तो भगवान से छुट्टी लेना होता है? कह रहीं, कि नहीं तो ये तो करना ही पड़ता है। मैं बोली, कि नहीं, ये तो नहीं करूँगी। कही, तब क्या करोगी?
आचार्य जी, मैं आपसे पूछने आई हूँ। वैसे तो हर दिन माता रानी के लिए विशेष है, इस नवरात्रि क्या किया जाए कि महामाया मोक्षदायिनी बने?
आचार्य प्रशांत: इस नवरात्रि दुर्गा सप्तशती को पूरे हृदय से, पूरी निष्ठा से समझा जाए।




