लोग बदतमीज़ी करते हैं, हमें क्या करना चाहिए? || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: मुझे ये जानना था कि ऐसा क्यों होता है कि हर मालिक चाहते हैं कि उनके एम्प्लॉईज़ उनके ग़ुलाम ही रहें। मतलब आप सैलरी दे रहे हो, कोई भी काम कर रहा है तो उस हिसाब से क्यों नहीं रहता, उनको क्यों हमेशा यही रहता है कि हम उनको आगे रह-रहकर उनसे बात करें या उनसे गुड मॉर्निंग करें, ये करे वो करें? उनके अन्दर ये भाव क्यों रहता है कि अगर हम एम्प्लॉई हैं, तो हम एम्प्लॉई के जैसे ही रहें?
आचार्य प्रशांत: हमारे घरों में सब काम करने वाले लोग लगे रहते हैं, वो भी तो काम ही कर रहे हैं न; मेहनत करते हैं उसका पैसा लेते हैं, उनमें से कितनों को हम अपने सामने, बग़ल में बैठा लेते हैं? बहुत कम होता है। अब तो फिर भी थोड़ा होना शुरू हो गया है, लोगों को इतनी जागरुकता आ गयी है, नहीं तो कहाँ करते थे?
और आमतौर पर जो लोग घरों में लगे होते हैं न, कई बार तो ये बेचारे जातियों में भी तथाकथित निचली जातियों से होते हैं। ग़रीब तो होते ही हैं, जातिगत आधार पर भी वो शोषित होते हैं। कई बार दिखता है कि सीधे इनको झारखंड या छत्तीसगढ़ से, हो सकता है ये शेड्यूल ट्राइब (पिछड़ी जाति) हों, वहाँ से लाया गया है।
मैंने देखा है, रेस्तराँ में हम बैठे होते हैं, और मियाँ बीवी और परिवार बैठकर खाना खा रहा होगा और एक लड़की होगी—प्रैम (छोटे बच्चे की बग्गी) बोलते हैं न उसको—तो वो प्रैम में बच्चे को लेकर उधर खड़ी हुई है; आपने भी देखा होगा।
मियाँ-बीवी मौज कर रहे हैं और वो एक लड़की है और वो लड़की भी कई बार पन्द्रह-सत्रह साल की होती है, बस आमतौर पर लड़कियाँ ही होती हैं। और कुछ एकदम वहाँ पर प्रत्यक्ष चिन्ह,



