क्यों हमेशा बंधनों में पाए जाते हैं हम? || आचार्य प्रशांत, दार्शनिक रूसो पर (2020)

आचार्य प्रशांत: पहला सवाल, यूरोपियन दार्शनिक जाँ जाक रूसो का प्रसिद्ध कथन है- “मनुष्य मुक्त पैदा होता है किन्तु हर जगह वह बेड़ियों में जकड़ा हुआ है (मेन इज़ बोर्न फ्री, बट एवरीवेयर ही इज़ इन चेन्स)” कृपया इसको समझायें।
भारत की और पश्चिम की दृष्टि अलग रही है। पश्चिम ने बाहर की ओर देखा है और बाहर के जगत में बड़ी खोजें की हैं, तरक्की की है। पश्चिम के अनुसार अन्धकार भी बाहर है और ज्ञान भी बाहर है, बेड़ियाँ भी बाहर हैं और मुक्ति भी बाहर ही है। अन्दर क्या है यह जानने में पश्चिम में विशेष रुचि दर्शायी नहीं है। दर्शायी भी तो बहुत आगे तक नहीं बढ़ा वह।
तो रूसों के इस कथन को इसी आधार पर समझना होगा। रूसो देख रहे हैं कि आदमी की परतन्त्रता का, बेड़ियों का प्रमुख कारण समाज है। तो उन्होंने उसी मुताबिक अपने कथन में आपके सामने एक नक्शा रख दिया है। जो कहता है कि जो नवजात शिशु है वो तो मुक्त है, स्वतन्त्र है, मेन इज़ बोर्न फ्री। लेकिन फिर वो जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे समाज की रीतियों, व्यवस्था, प्रथाओं, शिक्षा, संस्कारों की बेड़ियों में जकड़ता जाता है, ऐसा खाका खींच रहे हैं रूसो। भारत ने ऐसा नहीं देखा। भारत सामाजिक रूढ़ियों को या विचारों, परम्पराओं, संस्कारों को दूसरे स्थान का बन्धन या समस्या समझता है। भारत ने ये जाना कि आदमी की प्रथम समस्या स्वयं आदमी ही है। हमारे भीतर ही हमारा सबसे बड़ा शत्रु बैठा हुआ है। भारत की आँखों से देखें तो जो नवजात पैदा हो रहा है वो मुक्त नहीं है। रूसो कह रहे हैं न “मेन इज़ बोर्न फ्री।” नहीं, भारतीय दर्शन ऐसा नहीं कहता, वेदान्त के ऋषि ऐसा नहीं कहते। वेदान्त के अतिरिक्त, दर्शन की जो अन्य शाखाएँ हैं वो भी ऐसा नहीं कहतीं, भारतीय दर्शन की बात कर रहा हूँ।
भारत ने जाना है कि जो बच्चा पैदा हो रहा है वो अपने भीतर सम्पूर्ण अहम् वृत्ति लिये हुए है बीज रूप में और यही जो वृत्ति है उसकी गुलामी का, दासता का, बन्धनों का, सब समस्याओं, दुखों का मूल कारण है। जब अहम् वृत्ति वो अपने अन्दर लेकर ही पैदा हो रहा है, तो हम कैसे कह सकते हैं कि मनुष्य मुक्त पैदा होता है। यही जो भीतर की अहम् वृत्ति है ये आगे चलकर के फिर अहंकार की तमाम शाखाएँ, प्रशाखाएँ, फल-फूल, पत्तियाँ बनती हैं और तमाम तरीक़ों से फिर हम पाते हैं कि इंसान अब समस्याओं में है।



