अध्यात्म अपनेआप में आनंद है। और आनंद जानते हो क्या है? आनंद सुखों का परमसुख है। तभी तो मैं कह रहा हूँ कि आध्यात्मिक आनंद में जो लीन है, वो हर दुख को मौज में झेल जाता है। तुम छोटा-मोटा सुख लेकर करोगे क्या? तुम्हें परमसुख कितना मिला, गौरसे समझो! उसकी पहचान ही यही है कि तुम अब कितना दुख पी पाते हो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या सांसारिक रहकर भी आध्यात्मिक हो सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म अपनेआप में आनंद है। और आनंद जानते हो क्या है? आनंद सुखों का परमसुख है। तभी तो मैं कह रहा हूँ कि आध्यात्मिक आनंद में जो लीन है, वो हर दुख को मौज में झेल जाता है। तुम छोटा-मोटा सुख लेकर करोगे क्या? तुम्हें परमसुख कितना मिला, गौरसे समझो! उसकी पहचान ही यही है कि तुम अब कितना दुख पी पाते हो। नीलकंठ महादेव को जानते हो न? वो इतने परमसुख में हैं, इतने परमसुख में हैं, कि कंठ में क्या धारण करे हैं?
श्रोतागण: विष
आचार्य प्रशांत: और विष भी हल्का-फुल्का नहीं, कौनसा विष है? यही कुम्भ वाला विष। प्रयाग में कुम्भ तो मना रहे हो ये कुम्भ, अमृत का कुम्भ था और इस अमृत के कुम्भ से पहले क्या निकला था? हलाहल विष। उसको कौन धारण करे बैठा है?
श्रोतागण: शंकर ।




