जो आवश्यक है उसके साथ रहो। पूजा आवश्यक है, पूजा का कोई विशिष्ट रूप आवश्यक नहीं है। भजना आवश्यक है, भजन का कोई विशिष्ट प्रकार आवश्यक नहीं है। लेकिन ये बात भी समझना कि विशिष्ट प्रकारों से वही छूटते हैं जिनके मन में भजन गहराई से प्रवेश कर गया हो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बिना पूजा के या बिना कीर्तन के क्या हम उस रास्ते पर चल सकते हैं? जैसे किसी को अंदर से पूजा या कीर्तन नहीं स्वभाविक आता है, तो क्या उस रास्ते पर हम चल सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो! सारे रास्ते ऊपर-ऊपर से अलग दिखते हैं, थोड़ा नीचे जाओगे तो एक होते हैं। कोई आवश्यक नहीं है कि कोई उस तरह की पूजा या कीर्तन करे ही जैसा कि परंपरागत तौर पर होता आया है।
एक उपनिषद है- आत्मपूजा उपनिषद, उसको पढ़ना। आकार में बहुत ही छोटा उपनिषद है, एक-पन्ना दो-पन्ना बस। उससे पूछोगे तो वो कहेगा, दीप क्या है, मैं बताता हूँ। भीतर की ज्योत का जलना दीपक है। तो पूजा में तुम जो कुछ करते हो, उसका असली अर्थ उसमें लिखा हुआ है। वो कहता है, बाहर-बाहर तुम जो कुछ कर रहे हो, उसके अत्यांतिक अर्थ हैं। वो अत्यांतिक अर्थ महत्वपूर्ण है। बाहर की रवायत उतनी कीमती नहीं है।
तुम्हें क्या लगता है, तुम यहाँ बैठे हुए हो, तुम पूजा नहीं कर रहे हो? तुम्हें क्या लग रहा है, मौन में कीर्तन नहीं होता? तो पूजा और कीर्तन अगर तुम्हें सुहाते नहीं हैं, तो उसकी एक बड़ी वजह ये हो सकती है कि तुम्हें उनका वो रूप नहीं सुहाता जो तुम परंपरागत तरीके से देखते आए हो। पर आवश्यक थोड़े ही है कि उनका वही रूप हो।




