क्या हम शरीर और मन के अतिरिक्त भी कुछ हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हम शरीर और मन के अतिरिक्त भी कुछ हैं?
आचार्य प्रशांत: अगर शरीर और मन है, तो कौनसी आत्मा? तुमने पूछा, 'शरीर और मन के अतिरिक्त कुछ होता है?' माने तुमने दो का होना तो पक्का मान ही रखा है, किसका?
श्रोतागण: मन और शरीर।
आचार्य: और तुम कह रहे हो, 'ये दोनों तो हैं ही भाई साहब, कोई तीसरा भी हो तो बता दो।' तो मैं कह रहा हूँ, 'अगर ये दोनों हैं ही, तो तीसरे को छोड़ो तुम फिर।' तुम ये तो पूछ ही नहीं रहे कि ये शरीर क्या है, ये मन क्या है। तुम कह रहे हो, 'शरीर और मन के बारे में आप कुछ मत बोलिएगा गुरुजी, वो तो निसन्देह हैं ही, उनके अतिरिक्त कुछ होता हो तो बताइएगा।' तो फिर गुरुजी कहते हैं, 'अरे! तुम तो ज्ञानी हो, पहले ही जानते हो कि क्या है, क्योंकि अगर शरीर है और मन है तो फिर अखिल संसार है। फिर तो सत्य तुमने इन्हीं को बना लिया, अब तुम्हें किसी वैकल्पिक सत्य की क्या ज़रूरत?' और सत्य दो-चार तो होते नहीं, कि एक सत्य हो, फिर उस सत्य का कोई विकल्प भी मौजूद हो।
अध्यात्म में ‘है’ शब्द बड़ा पावन होता है, ‘है’, ‘अस्ति’। जो कह दे 'है', वही आस्तिक हो गया, ‘अस्ति’। तुमने एक आध्यात्मिक चर्चा में ‘है’ शब्द हल्के में उछाल दिया, कि शरीर और मन तो हैं। अब अगर शरीर और मन ही ‘अस्ति’ हैं, तो और क्या चाहिए? मन है तो समूचा संसार है न। फिर तो शरीर है, मन है, संसार है। ठीक है, यही है तो यही है।
जहाँ तक मन की बात है, जहाँ तक संसार की बात है, ‘इनमें’ आत्मा नहीं है। आत्मा का अनुसन्धान शुरू ही तब होता है जब कोई तन-मन की तरफ़ थोड़ा उदासीन हो जाता है, जब एक बे-रुख़ी छाने लगती है। “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!” कि हो तो भी ठीक, न हो तो भी ठीक, हमारी बला से! यहाँ से हमें कुछ बहुत मज़ा आ नहीं रहा है। जब चित्त से ऐसी उदासीनता उठती है, जो कभी ऊब बनती है कभी आह, तब अध्यात्म की शुरुआत होती है।






