क्या पता आचार्य प्रशांत भी ढोंगी हों?

Acharya Prashant

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क्या पता आचार्य प्रशांत भी ढोंगी हों?
मैं होऊँगा वैसा, बात बताओ सही है या नहीं है? बोलो, बात सही है कि नहीं है? अगर सही है, तो बात ले लो। मैं तुमसे थोड़ी कह रहा हूँ, मुझे उठा के अपने घर बैठा लो। मुझे आना भी नहीं है तुम्हारे घर, बुलाओगे तो भी नहीं आऊँगा। मैंने एक बात कही है, बस उस बात का ही रिश्ता है हमारा और तुम्हारा। वो बात अगर तुम्हें ठीक लगती है, तो समझ लो। और इधर-उधर की फालतू तो मत बताओ, ये बाबा ऐसा है, कि बाबा वैसा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप जो कुछ भी बोलते हैं, समझाते हैं, वो बात मुझे सचमुच बहुत ही ज़्यादा अच्छी लगती है। लेकिन, क्योंकि आप एक धार्मिक गुरु हैं, इसीलिए आपकी बातों पर पूरी तरीक़े से विश्वास कर पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। पिछले कुछ सालों में धर्म के क्षेत्र में और धार्मिक गुरुओं के साथ इतने घोटाले हुए हैं कि मेरा अब धर्म पर से और सभी गुरुओं, बाबाओं से भरोसा उठ गया है। अब मैं आपको सुनता हूँ, बात सही लगती है, लेकिन दिल में मेरे ये विश्वास है कि यहाँ भी कुछ गड़बड़ हो सकती है।

आचार्य प्रशांत: ऐसा है क्या? आप वाक़ई छाछ फूँक-फूँक के पी रहे हो। 2G स्कैम हुआ था, तो आप मोबाइल नहीं चलाते? बहुत बड़ा घोटाला हुआ था, हज़ारों करोड़ का घोटाला हुआ था। तो उसके बाद आपने मोबाइल चलाना बंद कर दिया?

आप कह रहे हो, पिछले 10 साल में कुछ धर्म गुरु पकड़े गए हैं। कोई बलात्कार में, कोई लूट में, कोई और घपला, कुछ-कुछ, तो अब धर्म पर से ही भरोसा हट गया। कुछ धर्म गुरुओं पर आरोप लगे, जेल हुई, तो साहब, हमारा तो अब धर्म से ही भरोसा उठ गया। हम धर्म को ही नहीं देखना चाहते, उपनिषदों को ही नहीं देखना चाहते। आचार्य जी, क्या पता आप भी ऐसे ही फ्रॉड हों। मैं तो पूछ रहा हूँ, बताओ न? अगर इतना ही आप छाछ फूँक-फूँक कर पीने वाले हैं, तो जब भी किसी भी क्षेत्र में कहीं कुछ भी गलत निकल जाता है, तो उस क्षेत्र से संबंधित जो कुछ है, वो सब त्याग दिया करिए।

एक धर्म गुरु अगर झूठा निकल गया, तो आप सब गुरुओं को और धर्म को ही छोड़ने को तैयार हो। है न? कैफे कॉफी डे में, अभी पिछले साल या पिछले से पिछले साल, कुछ अनियमितताएँ पाई गई थीं। उन्होंने कुछ लोन ले लिया था, उसको चुका नहीं पाए थे, कुछ और इस तरह की बातें थीं। फिर उनके जो एक बड़े शेयरहोल्डर थे, वो शायद सीईओ ही थे, उन्होंने शायद आत्महत्या भी कर ली थी। तो आपने कॉफी पीना छोड़ दिया। धर्म गुरु झूठा निकल गया, तो आप धर्म छोड़ने को तैयार हो। है न?

सैमसंग ने एपल की किसी टेक्नोलॉजी की चोरी करी, करी न? और सैमसंग को पेनल्टी भी भरनी पड़ी, तो आपने सैमसंग के मोबाइल इस्तेमाल करने छोड़ दिए? तो धर्म गुरु झूठे निकल गए, तो धर्म क्यों छोड़ दिया? धर्म छोड़ने को इतनी तत्परता से तैयार क्यों बैठे हो कि बस कोई बहाना मिले और छोड़ दें, बोलो।

बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की का कांड हुआ था, ठीक? वो तो हुआ ही था और उन्होंने स्वीकार भी कर लिया था, इंपीचमेंट प्रोसीडिंग्स भी हुई थी क्लिंटन पर। तो सारे अमेरिकी राष्ट्रपतियों पर से आपका भरोसा उठ गया? कि एक राष्ट्रपति का देखो सेक्सुअल मिसकंडक्ट सामने आया है, तो हम किसी राष्ट्रपति पर भरोसा नहीं करेंगे। तो ओबामा को नोबेल प्राइज़ काहे को दे दिया? अगर एक राष्ट्रपति के सेक्सुअल मिसकंडक्ट से आपका भरोसा टूट ही जाना था, तो ओबामा को नोबेल प्राइज़ क्यों दिया? बोलो न, क्यों नहीं कहा कि ये भी तो उसी व्हाइट हाउस में, उसी गद्दी पर बैठता है, जिस पर क्लिंटन बैठता था।

पर अभी तो कहते हो नहीं, एक धर्म गुरु मान लो, ऐसा एक या पाँच निकल गए तो अब हमको तो कोई भरोसा ही नहीं रहा, कुछ भी। कहीं ऐसा तो नहीं कि तैयार ही बैठे हुए थे कि बस मौका मिले और धर्म से दूर भागें। बात इसमें है ही नहीं कि कौन सा धर्म गुरु ख़राब निकल गया या पकड़ में आ गया, बोलो। या आपने जूते पहन रखे हैं यहाँ पर, नाइकी और ये सारी कंपनियाँ बीच-बीच में कितनी बार पकड़ी जाती हैं। इन्होंने अपनी बांग्लादेश में, पाकिस्तान में और इधर साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज़ में इन्होंने चाइल्ड लेबर का कई बार इस्तेमाल कर रखा होता है। ये पकड़े भी जाते हैं, स्वेटशॉप। आपने नाइकी पहनना छोड़ दिया? बोलो। कोल स्कैम हुआ था, तो आपने बिजली का इस्तेमाल करना छोड़ दिया? कि नहीं मैं तो अब देखो, कोयला घोटाला हुआ था न इतना बड़ा, मनमोहन सिंह उसी मारे चुनाव हार गए। तो ये बिजली भी उसी कोयले से आ रही है, तो अब से हम बिजली का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

कोल स्कैम हुआ, तो बिजली नहीं छोड़ रहे। तो धर्म गुरु का स्कैम हुआ, तो धर्म काहे को छोड़ रहे हो? मैच फिक्सिंग हुई इतनी क्रिकेट में, क्रिकेट देखना छोड़ दिया? इतनी मैच फिक्सिंग हुई क्रिकेट में, क्रिकेट देखना छोड़ दिया क्या? तो धर्म के क्षेत्र में अगर कुछ घोटाले हो गए, तो धर्म कैसे छोड़ दे रहे हो? जवाब दो।

चलो कहो, नहीं मैं धर्म नहीं छोड़ रहा, हमारा तो जी बस धर्म गुरुओं पर से यकीन हटा है। तो कुछ क्रिकेटर्स ने घोटाला करा था, तो बाक़ी क्रिकेटर्स पर आज भी तुम्हारा यकीन कैसे है? बोलो। अगर एक क्रिकेटर घोटाला कर रहा है, तो सभी कर रहे होंगे। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है। बाक़ी क्रिकेटर्स पर कैसे तुम्हारा यकीन है? बताओ। वहाँ पर अभी भी तुम देखे जा रहे हो, बल्कि आईपीएल बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है। और जो सब घोटाले में दोषी पाए गए थे, उनमें से कोई एमपी बन गया, कोई प्रतिष्ठित क्रिकेट कमेंटेटर है, सब अपना आगे बढ़ रहे हैं। वहाँ क्यों नहीं कहते कि नहीं, नहीं, ये तो एक बार पकड़े गए अब हम तो कुछ कर…।

धर्म छोड़ने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है?

और ये खूब चल रहा है। दो या तीन नाम हैं, वो दो-तीन नाम लेकर बार-बार, बार-बार जुमले उछाले जाते हैं कि देखो, आप भी उन्हीं जैसे होओगे। क्यों, तुम्हारे दिमाग़ में ये क्यों नहीं होता कि आप गौतम बुद्ध जैसे होओगे? हज़ारों दूसरे भी तो उदाहरण हैं। तुम्हारे दिमाग़ में ये क्यों नहीं आता कि विवेकानंद जैसे हो गए? तुम्हारे दिमाग़ में ये कहाँ से आ गया सभी झूठे होते हैं? सभी झूठे होते हैं तो गौतम बुद्ध भी झूठे थे, राम भी झूठे थे, श्रीकृष्ण भी झूठे थे। जब तुम बोलते हो, अरे ये सब फ्रॉड होते हैं, सारे बाबे फ्रॉड होते हैं। बाबा हूँ नहीं, पर मान लो बाबा हूँ भी। तो फिर तो रमण महर्षि को भी फ्रॉड होना चाहिए था न, उनको भी बोलो फ्रॉड। तुमने तो कह दिया, सारे ही फ्रॉड होते हैं।

ये क्या मूर्खता है? और मैं बता रहा हूँ, ये बात ये नहीं है कि एक या दो या पाँच लोग पकड़े गए हैं कोई कांड में। बात ये है कि तुम बस इंतजार कर रहे थे कि ऐसा कोई घोटाला सामने आए और हम अध्यात्म से दूर भागें। क्योंकि अध्यात्म में भोगने को नहीं मिलता न, यहाँ बार-बार बताया जाता है, त्याग, संयम, त्याग, संयम। और उधर, सब अप्सराएँ तैयार हैं, अपना जिस्म ले लुभा रही हैं, अध्यात्म के मारे उन पर हम टूट नहीं पा रहे। दुनिया भर की रंगीनियाँ हमें आकर्षित कर रही हैं, उनको हम भोग नहीं पा रहे। बाजार हर तरह के मजे लेकर के हमको निमंत्रण दे रही है। हम बाजार के निमंत्रण स्वीकार नहीं कर पा रहे क्योंकि अध्यात्म कह रहा है कि देखो, सच्चाई पर ध्यान दो, ये रोशनियाँ तो दो दिन में बुझ जानी हैं। अध्यात्म बिल्कुल पुट ऑफ कर देता है।

वो हमको उत्तेजित कर रहे हैं। हाँ, वो हमें अराउजल दे रहे हैं। और अध्यात्म की बातें सुनते हैं तो…। और हमको तो अराउज़ल चाहिए न, वहाँ पर हमको हर तरीक़े से बुलाया जा रहा है, रिझाया जा रहा है, विज्ञापन, बाजार, कंपनियाँ, भोग, ये सब बिल्कुल खींच रहे हैं, खींच रहे हैं। लेकिन तभी पीछे से अध्यात्म की आवाज आ जाती है, कि बेटा तुम किसी झूठी चीज़ में फँस रहे हो कष्ट मिलेगा। ये आवाज बहुत बुरी लगती है। तो इस आवाज से बचने के लिए ऐसा करते हैं कि इस आवाज को बदनाम कर देते हैं। कह देते हैं कि धर्म चीज़ ही झूठी है। क्यों? क्योंकि दो-चार धर्म गुरु पकड़े गए हैं, तो धर्म ही झूठा हो गया। बहुत बेईमानी भरी है न अंदर? असली बात बताओ। क्यों? क्यों नहीं सुनना चाहते मेरी बात?

और जो वीडियो मेरा जितना हार्ड हिटिंग होता है, उस पर उतने ज़्यादा कमेंट आते हैं ये बोलते हुए, कि ये भी साहब, उन्हीं जैसा है। ये भी वैसा ही है। उस कमेंट के आने का मतलब ही यही है कि तुम्हें चोट लगी है। तुम्हें पता है, मेरी बात सही है। तो मेरी बात से बचने के लिए तुम अपने आप को ये बहाना दे रहे हो कि नहीं, नहीं, इस आचार्य की बात मत सुनना, ये भी तो वैसा ही है।

मैं होऊँगा वैसा, बात बताओ सही है या नहीं है? बोलो, बात सही है कि नहीं है? अगर सही है, तो बात ले लो। मैं तुमसे थोड़ी कह रहा हूँ, मुझे उठा के अपने घर बैठा लो। मुझे आना भी नहीं है तुम्हारे घर, बुलाओगे तो भी नहीं आऊँगा। मैंने एक बात कही है, बस उस बात का ही रिश्ता है हमारा और तुम्हारा। वो बात अगर तुम्हें ठीक लगती है, तो समझ लो। और इधर-उधर की फालतू तो मत बताओ, ये बाबा ऐसा है, कि बाबा वैसा है।

किसी डॉक्टर के पास जाते हो, इलाज कराने। तो पहले उस डॉक्टर की कुंडली देखते हो, ये डॉक्टर कैसा है? इसके, इसकी बीवी के साथ संबंध कैसे हैं? तो मैं डॉक्टर हूँ। जो बात कह रहा हूँ, वो बात तुम्हारे फायदे की है तो स्वीकार कर लो और कोई बात कहनी नहीं है। इतने अच्छे तुम हो नहीं कि मैं तुमसे कोई व्यक्तिगत संबंध बनाऊँगा, प्रेम का नाता बनाऊँगा, तुमको बाहर कहीं डेट पर ले जाऊँगा। इतनी ऊँचाई तुम्हारी नहीं है अभी। तो तुम मुझे व्यक्तिगत तौर पर क्या लांछन दे रहे हो? मैं तुमसे व्यक्तिगत रिश्ता बनाना भी नहीं चाहता।

जैसे कोई मैथ्स का टीचर आपको एक सिद्धांत बता रहा हो, और आप बोलें, "आपको पता है, ये मकर राशि है।" अरे, वो तुम्हें उसके हॉरोस्कोप से क्या करना है? कौन सी राशि है? कर्क राशि है, मकर राशि है, मीन राशि है, इससे मैथ्स का क्या संबंध है? बोलो। या जात देखना शुरू कर दो। तुमको पता है, ये फलानी जात का है। अरे वो गणित पढ़ा रहा है, तुम उसकी जात देख रहे हो।

आप ये जो तर्क है कि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है, हर जगह नहीं लगाते हो साहब। आप उपयोगिता देख लेते हो, जैसे गणित में आप सिद्धांत की उपयोगिता देख लेते हो। राजीव गांधी की सरकार गिर गई थी बोफोर्स मसले पर, और करीब-करीब प्रमाणित है कि उसमें दलाली खाई गई। लेकिन आपने जब देखा कि वो जो तोप है, बोफोर्स, वो उपयोगी है तो कारगिल में आपने उसी तोप का इस्तेमाल करा और पाकिस्तानियों को बाहर खदेड़ा।

या आपने कहा कि साहब, इस तोप के प्रोक्योरमेंट में तो दलाली खाई गई थी, तो ये तोप ही बहुत गड़बड़ है। नहीं, आपने ये नहीं कहा। आपने कहा, दलाली खाई गई होगी लेकिन तोप तो सही है न, तो हम इस तोप का इस्तेमाल करेंगे। तो मैं जैसा भी होऊँगा, छोड़ो न मुझे। मेरी बात तो सही है न, मेरी बात का तोप की तरह इस्तेमाल करो। हो सकता है पीछे दलाली खाई गई हो, क्या पता। पर तोप का तो करोगे, या तुम ये कहोगे कि कारगिल आ गया नहीं, बोफोर्स नहीं लगाएँगे, इसमें तो दलाली खाई गई थी? ऐसे करोगे?

अभी पिछले साल बॉलीवुड में इतनी आत्महत्याएँ हुई, इतना शोर मचा, ये सब हुआ। तुमने फिल्में देखनी छोड़ दी? बोलो। फिल्में देखनी छोड़ दी क्या? तो दो-चार धर्म गुरु अगर झूठे साबित हो गए हैं, तो तुम धर्म कैसे छोड़ दे रहे हो? बोलो।

अरे, ये तो छोड़ो, तुमने फिल्में देखनी छोड़ दी। बॉलीवुड के दो बड़े-बड़े स्टार, जो चार-चार, पाँच-पाँच बार जेल में रह आए हैं बाकायदा एकदम साफ़-साफ़ दोषी पाए गए हैं, अच्छे बढ़िया वाले अपराधों के दोषी। वो तुम्हारे दो सबसे बड़े सुपरस्टार हैं। तुमने तो जो दोषी थे, उनको भी नहीं छोड़ा। उनको भी पकड़े हुए हो। और यहाँ कह रहे हो कि एक धर्म गुरु झूठा निकल गया, तो हम दूसरे को भी छोड़ देंगे। जो फिल्म स्टार झूठा निकल गया तुम उसको भी नहीं छोड़ते, उसकी भी फिल्में सुपरहिट कराई जा रहे हो, बल्कि उन पर बायोपिक्स बन रही हैं, और वो बायोपिक्स सफल होती हैं। वहाँ पर ही क्यों नहीं बोलते? क्योंकि वहाँ तुम्हें भोगने को मिलता है न। बढ़िया आइटम नंबर है, मज़ा आ रहा है, रॉन्ची सीन्स ये वो। तो वहाँ काहे को बोलोगे कि ये नहीं देखना।

अध्यात्म में इच्छाओं पर, डिजायर्स पर चोट पड़ती है। काले इरादों, गरमागरम इरादों पर कोई आकर पानी डाल देता है। जैसे गरमा गरम काला तवा हो, बिल्कुल, और उस पर आकर अध्यात्म पानी डाल दे, तो आवाज उठती है, छन। कहते हो, "अरे, क्या हो गया? ये अध्यात्म चीज़ ही गंदी है।" एकदम तैयार हो रहे थे गरमा गरम आज तो, और बीच में ये कान में रामचरितमानस के पद पड़ गए, सारा उत्साह ठंडा हो गया। सोचो, तुम किसी शॉपिंग मॉल में हो, और वहाँ कबीर भजन बजने लग जाएँ, बिक्री आधी रह जाएगी बता रहा हूँ। इसलिए बाजार का अध्यात्म से 36 का आँकड़ा है। बाजार कभी नहीं चाहेगा कि अध्यात्म सफल हो, और बाजार हर तरह की साजिशें करेगा, अध्यात्म को गिराने की।

तुम शॉपिंग मॉल में घुसते हो, वहाँ पर अधनंगी देवियों की तस्वीरें लगी रहती हैं। वही तुम्हें और प्रेरित करती हैं, भीतरी तौर पर ख़र्चा करने के लिए। तुम सोचो, वहाँ पर शॉपिंग मॉल में घुसो और वहाँ संतों के चित्र लगे हुए हैं, राम और श्रीकृष्ण के कट-आउट्स हैं, गौतम बुद्ध की मूर्ति रखी हुई है। बिक्री ही नहीं होने की, मॉल ठप पड़ जाएगा। तो मॉल के लिए बहुत ज़रूरी है कि आम जनता को अध्यात्म से दूर कर दिया जाए, और जो लोग घटिया रोटी खाते हैं, गंदे कामों की रोटी खाते हैं, उनके लिए बहुत ज़रूरी है कि तुम्हें अध्यात्म से दूर कर दिया जाए। तुम्हारे घर में अगर आध्यात्मिक माहौल है, तो तुम ये घटिया एक्टर्स, एक्ट्रेसेस और मॉडल्स के फैन बनोगे क्या?

तो अब अगर उस एक्टर को, एक्ट्रेस को या मॉडल को अपना फैन बेस बढ़ाना है, तो उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि तुम्हें अध्यात्म से दूर कर दिया जाए। अगर तुम्हें अध्यात्म से दूर नहीं करा, तो उस फिल्म प्रोड्यूसर का, डायरेक्टर का, एक्टर का, मॉडल का धंधा चलेगा ही नहीं। तुम उसकी फिल्म देखने ही नहीं जाओगे। देखोगे भी तो थूक दोगे कि ये क्या बनाया है, हँस दोगे।

अब समझ में आ रही है बात? कि ये जो कुछ कांड हो गए हैं, उन कांडों को इतनी जोर-शोर से भुनाया क्यों जा रहा है? ताकि जितने काले धंधे चल रहे हैं, वो चलते रहें, चलते रहें। मुझे कोई दुनिया का क्षेत्र बता दो जिसमें स्कैम या स्कैंडल नहीं हुए। तुमने उस क्षेत्र को त्याग दिया क्या? बताओ।

हम भली-भाँति जानते हैं कि सेना में भी घोटाले होते हैं। ठीक। डिफेंस डील्स में कट्स, कमीशंस खूब चलते हैं। दुनिया भर में चलते हैं। रंगदे बसंती पिक्चर आई थी, देखी थी। वो जो उसमें सेना से, एयरफोर्स से संबंधित घपला दिखाया गया था, वो मात्र काल्पनिक नहीं था। ऐसा होता है, दुनिया भर में होता है। तो तुमने भारतीय सेना को त्याग दिया? तुमने कह दिया कि सेना में घपले होते हैं, तो सेना में जितने अफसर हैं और जितने जवान हैं, ये सब भ्रष्ट हैं? तुमने कह दिया, दूध का जला तो छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है? कुछ लोग वहाँ कमीशन खाते हैं, तो जितने हैं, सब भ्रष्ट हैं। तुमने कह दिया क्या ऐसा? तुमने नहीं कहा न। तो फिर दो-चार धर्म गुरुओं के कारण तुमने कैसे बाक़ी सबको भी नकार दिया?

हवा कहीं की गंदी हो जाती है, तो साँस लेना नहीं छोड़ देते, वहाँ जाते हैं जहाँ हवा साफ़ है। दम घुट रहा है, मर रहे हो, पर बात समझ में नहीं आ रही।

अभी पिक्चर आई थी हर्षद मेहता पर। स्टॉक मार्केट ने पैसा लगाना छोड़ दिया क्योंकि वहाँ तो स्कैम हुआ था। इतना बड़ा स्कैम हुआ था, स्टॉक मार्केट में पैसा लगाना छोड़ दिया क्या? पर नहीं, वहाँ तो लगाओगे काहे की मुनाफा होता है न। वहाँ ये थोड़ी बोलोगे, दूध का जला छांछ भी फूँक-फूँक के पीता है।

स्टीव स्मिथ, डेविड वार्नर पकड़े गए थे बॉल टैम्परिंग में। अभी-अभी इंडिया ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ नहीं देखी, फिर तुमने? कि भाई, ये दो पकड़े गए क्या पता बाक़ी भी ऐसे ही हो। आचार्य जी, आपको देखते हैं तो लगता है, कहीं आप भी दूसरों की तरह न हों। तो क्यों नहीं बोलते विराट कोहली तुझे देखते हैं लगता है कहीं तू भी स्टीव स्मिथ की तरह ना हो? काहे नहीं बोलते?

ये मुझे बात ही नहीं समझ में आती। इतनी जल्दबाजी क्या है धर्म में खोट खोज के निकालने की? मंसूबे क्या हैं? स्टॉक मार्केट में अगर कोई स्कैंडल होता है, तो आप क्या करते हो? आप कहते हो कि जो रेगुलेटरी प्रोसेस है, उसको और मजबूत करेंगे। है न? आप बोलते हो, जो लूप होल्स हैं, उसको प्लग इन करेंगे। या आप ये बोलते हो कि स्टॉक मार्केट ही ख़त्म कर दो। जल्दी बोलो। आप ये तो नहीं करते न कि स्टॉक मार्केट ही ख़त्म कर दो, यहाँ तो सब करप्ट हैं, ऐसा तो नहीं कहते। तो फिर?

धर्म में अगर दो-चार कांड निकल गए, तो तुम ये देखो न कि वो कांड हुए क्यों थे और जिन वजहों से हुए थे, उन वजहों को ठीक करो। और जो वजह थी, वो यही थी कि आप अंधविश्वासी हैं। वो वजह दस साल पहले भी थी, आज भी है। कुछ कांड सामने आ गए हैं, कुछ सामने नहीं आ पा रहे। जो थोड़े कम चालाक थे, वो पकड़े गए हैं। जो महाधूर्त हैं, वो पकड़े नहीं जा रहे। ऐसा ही है खेल कि बलात्कारी को पकड़ लो और हत्यारे को नहीं पकड़ पा रहे।

बलात्कारी भी कैसे शिखर पर पहुँच गया था? क्योंकि अंधविश्वास — न जाँचना, न परखना, न सवाल पूछना, जो पट्टी पढ़ा दी गई, उसको स्वीकार कर लेना। और हत्यारे भी शिखर पर कैसे पहुँच रहे हैं? ऐसे ही। वो पट्टियाँ पढ़ाई जा रही हैं, तुम सुन रहे हो, कोई पूछने वाला नहीं, कोई सवाल नहीं करने वाला। कोई सवाल करे, तो उससे कहो, "अच्छा, तू बहस बहुत लड़ाता है। अच्छा, तेरी बुद्धि ज़्यादा चल रही है।" एसे सवाल करेगा?

और जितना तुम सवाल नहीं कर रहे उतना उनको और ढील मिल रही है, एक से बढ़कर एक मूर्खताएँ फैलाने की। ख़ुद ही तुमने वो कांड करवाए हैं, अंधविश्वास की चपेट में रह-रह के। और अब तुम कह रहे हो, देखो, कांड हो गए, तो धर्म को ही छोड़ दो।

ये जो कुछ हुआ है न, वो आप लोगों की बरकत है। उन सब लोगों को महागुरु और इतना ऊँचा स्थान दिया किसने? आपने ही तो दिया। क्यों दिया? तब तो झाँसे में आ जाते हो। कोई अपना पैसा दिखा करके, अपनी राजनीतिक पहुँच दिखा करके, अपना ग्लैमर दिखा करके बिल्कुल आपको प्रभावित कर लेता है। उसको एकदम ऊपर बैठा देते हो, और आदमी वो खोखला है।

और एक दिन उसका कांड सामने आएगा। वो नीचे गिरेगा, तो आप कहोगे, "अरे, धर्म ही गंदी चीज़ है। देखो, जिस आदमी को ऊपर बैठाया, वो नीचे गिर गया।" तुम ये नहीं मानोगे कि तुमने गलत आदमी को ऊपर बैठाया था, ये नहीं मानोगे। जो बात माननी चाहिए, वो ये है कि ये तो दोष हमारा है कि हमने गलत आदमी को इतनी इज़्ज़त दे दी थी, उसको गुरु मान लिया था। आदमी गलत था, हमने उसे गलत इज़्ज़त दी। अपना दोष स्वीकार करो न, कि तुम्हें आदमी की पहचान नहीं है। और तुम आज से दस साल पहले भी गलती कर रहे थे और आज भी कर रहे हो, बताए देता हूँ। तुमने पहले भी जिन लोगों को इज़्ज़त के सिंहासन पर चढ़ा दिया था, वो गलत थे और आज भी तुमने जिनको महागुरु बना रखा है, वो महागलत हैं।

उल्टा, चोर कोतवाल को डांटे। गलत जगह का घटिया खाना खा कर के बीमार पड़ जाते हैं, फूड पोइजनिंग हो जाती है। तो प्रतिज्ञा कर लेते हो कि आज के बाद से मैं कभी खाना नहीं खाऊँगा? बोलो। तब काहे नहीं कहते, दूध का जला…।

प्रश्नकर्ता: जैसे आपने बोला कि ये हमारी गलती थी कि मैंने गलत आदमी को ऊपर चढ़ा रखा है, गुरु बना रखा है, बलात्कारी था वो। तो ये चीज़ तो मुझे बाद में पता चली न कि वो आदमी गलत है। जब वो मुझे पट्टी पढ़ा रहा था, उस समय तो मेरे अंदर कुछ और था। उस समय मैं उसकी बातें कुछ और सुन के, मतलब समझ के सुन रहा था। तो उस टाइम मुझे कैसे पता चलता कि ये आदमी गलत है?

आचार्य प्रशांत: अपने भीतर कुछ रख के नहीं सुना जाता। अपने भीतर जो रख के सुना जाता है न, उसको ही बायस बोलते हैं, पूर्वाग्रह बोलते हैं। किसी के सामने ये अंदर रख के नहीं बैठा जाता कि ये तो है ही महागुरु, तो इसकी सारी बातें ठीक होंगी ही।

यहाँ तीन दिन से बैठे हो। मैं प्रवचन दे रहा हूँ या सवाल-जवाब हो रहे हैं। वही तो बोल रहा हूँ न कि ग्लैमर में, झाँसे में तुरंत आ जाते हो। कोई बहुत बड़ा विशाल मंच हो, जिस पर कोई बैठ गया हो किसी फिल्मी एक्ट्रेस के साथ और विदेशी एक्टर-एक्ट्रेस हो, तो फिर तो कहना ही क्या। और वो वहाँ पर बैठ के बातचीत चल रही है, और तुरंत ऐसे हो जाते हो कि "अरे, अरे, ये तो बहुत बड़े आदमी होंगे, बहुत बड़े आदमी होंगे।"

इसी को तो कंडीशनिंग बायस कहते हैं न, और यही फिर आगे चलके बिगोटरी बन जाता है। अरे, कुछ भेजा भी लगाओगे, कुछ बात भी पूछोगे, कुछ समझोगे भी? पर हम जैसे डल डाउन कर दिए गए हैं। हमारे भीतर से कोई सवाल ही नहीं उठता।

अभी मैं थोड़ी देर पहले रील्स का जिक्र कर रहा था, इंस्टाग्राम। उस पर आजकल एक चलन है, एक नमूना पकड़ लिया है। वो श्रीकृष्ण जैसी साज-सज्जा करके आ जाता है, बिल्कुल फूल लगा करके, और ये कुछ भी बोल रहा है श्रीकृष्ण के नाम पर। ये दुनिया के किसी भी धर्म में, किसी भी देश में स्वीकार नहीं किया जाता। बोल रहा है, ऐसे आएगा, बोलेगा “श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अपने दोस्तों का साथ नहीं छोड़ता, भगवान उसका साथ नहीं छोड़ते," और इसके पाँच मिलियन व्यूज हैं।

बताओ कहाँ?

और ये तो मैंने फिर भी मतलब थोड़े से एक स्तर की बात बोल दी कि दोस्तों का साथ नहीं छोड़ता, भगवान साथ नहीं छोड़ते। इस बात में कुछ सच्चाई हो भी सकती है।

वो ऐसी-ऐसी बातें बोल रहा है, श्रीकृष्ण बन के। वैसे ही महादेव के नाम पर चल रहा है। मेरे महादेव कहते हैं, "अरे, मुझे बताओ, कहाँ कहा है महादेव ने? दिखाओ किस किताब में कहा है? किस किताब में महादेव ने वो कहा है? वो जो तुम महादेव बन करके उनके नाम पर फैला रहे हो। और वो आएगा, "हर हर महादेव, जय जय शंभू," करेगा इधर-उधर, ऐसे करके दिखाएगा मैं कुछ पी रहा हूँ और एक शिवलिंग ले घूम रहा हूँ, ये सब कर रहा है।

तुम सवाल ही नहीं पूछते न। तुम ही हो न जिसने उसके व्यूज बढ़ाए हैं, लाइक्स बढ़ाए हैं, शेयर करा है। वो कैसे वायरल हो गया? फिर इसी तरीक़े से तुम फालतू के गुरुओं और बाबाओं को भी वायरल कर देते हो। तुम पूछते ही नहीं, सोचते ही नहीं।

वो बोल रहे हैं, "मैं तो आज तक कोई किताब नहीं पढ़ी। मैंने तो बस ये किताब पढ़ी है।" तुमने कोई किताब नहीं पढ़ी, तो योगा का तुमने आविष्कार करा है? कहाँ से आ गया? तुम बिल्कुल जैसे खोपड़े में कुछ हो ही नहीं। कोई तुम्हारे भीतर से ना विरोध उठता है, ना प्रश्न उठता है, ना जिज्ञासा उठती है।

और फिर जब कांड सामने आ जाता है, तो कहते हो, "अरे, धोखा हो गया। इसने हमें बेवकूफ़ बना दिया।" उसने नहीं बेवकूफ़ बनाया। तुम बेवकूफ़ बनने को तैयार बैठे हो कि कोई भी आए, बेवकूफ़ बना जाए। कुछ समझ में आ रही है बात?

लेकिन जैसे हम अपनी निजी ज़िंदगी में हैं, वैसे ही फिर हम धर्म के प्रति भी हैं न। तुम अपने लिए लड़की चुनने जाओगे, तुम कहाँ देखोगे कि उसकी चेतना की गुणवत्ता क्या है? तुम तो यही देखोगे न, उसका शरीर कैसा दिख रहा है, कपड़े कैसे सजधज के आई है, कितने पैसे वाली है, कितने बड़े-बड़े लोगों से उसका नेटवर्क है, उसकी फैमिली की क्या समाज में हैसियत है। यही सब तो देखते हो।

वैसे ही तुम अपने गुरुओं का भी चयन करते हो। तो मस्त, वो कपड़े पहनते हैं, बिल्कुल डिजाइनर। जैसे डिजाइनर कपड़ों वाली लड़की तुम्हें आकर्षित कर लेती है, वैसे डिजाइनर कपड़ों वाला गुरु। जैसे गाड़ी ख़रीदने जाते हो, तो कहाँ देखते हो कि अंदर इंजन इसका कैसा है। तो वैसे देखते हो, वही अभी आया था न, आई मीन लव वि द शेप ऑफ यू। तो वही है। कुछ भी वो डाल रहे हैं। तुम पूछ भी नहीं रहे, क्या है, क्यों है, किस लिए, कैसे हो सकता है? बताओ।

जानते हो वो कैसे ऊपर बढ़ते हैं? तुम्हारे भीतर डर बैठा करके। वो कहीं हमारे पास सिद्धियाँ हैं, शक्तियाँ हैं। हम मुर्दे को ज़िंदा कर सकते हैं। भूतों से बातें करते हैं। पंगे कौन ले, रिस्क कौन ले। क्या पता हो ही, अकल्ट, ज़्यादा मैंने बोला तो रात में मेरे बिस्तर पर ऐसे मेरी आँख खुलेगी, देखूँगा, एक साँप बैठा हुआ है। ये बोला हुआ है लोगों ने कि डर सा लगता है, कि सांप वांप भेज दिया, तो क्या होगा? या अगर कहीं सही में धर्मात्मा आदमी हो, तो भगवान जी मुझे श्राप न दे दें। इस किस्म का तो डर बैठा हुआ है। डर भी है, डलनेस भी है, लेज़ीनेस भी है कि कौन इतना सवाल-जवाब करे, अरे, बोल तो दिया न।

आप साफ़-साफ़ देखो कि एक मध्यम वर्गीय आदमी को जो चीज़ें अपनी निजी ज़िंदगी में बहुत प्रभावित करती हैं, जिनसे वो इंप्रेस्ड रहता है, बल्कि डोमिनेटेड रहता है, वही चीज़ें अपने गुरुओं में खोजता है। एक तो मनोरंजन, दूसरा अंग्रेज़ी। तुम शीर्ष चार-पाँच आज के जो गुरु हैं, ऑनलाइन, इनको सबको देख लो, ये सब अंग्रेज़ी में है। देख लो, क्योंकि अंग्रेज़ी से अंग्रेज़ों को कोई फ़र्क़ न पड़ता हो, हिंदुस्तानी झट से इंप्रेस हो जाता है।

श्रोता: कुछ स्पिरिचुअल प्रतीक भी पकड़े हैं।

आचार्य प्रशांत: प्रतीक भी बाद में आते हैं। कोई प्रतीक को आप उतनी कीमत नहीं दोगे अगर वो झन्नाटेदार अंग्रेज़ी न चल रही हो। और इतने भी हम पढ़े-लिखे हैं नहीं कि पूछे कि जिस एक्सेंट में बोल रहा है, ये न हिंदुस्तानी है न विदेशी है। ये कौन सा एक्सेंट है?

वही एक विचित्र तरह का अनपढ़ एटीट्यूड है हमारा कि अभी इसने इस शब्द को ऐसे उच्चारित करा, ऐसे तो न उत्तर भारत में बोलते हैं, न दक्षिण भारत में बोलते हैं, न यूएस में बोलते हैं, न यूके में बोलते हैं। ये कौन सा ख़ास उच्चारण है? वो उच्चारण जानबूझकर गढ़ा गया है, बहुत मेहनत के साथ गढ़ा गया है, सिर्फ़ आपको इंप्रेस करने के लिए, डोमिनेट करने के लिए। क्या आपको लगे ये कोई बहुत पढ़े-लिखे आदमी है?

इन सब आधारों पर तो धर्म चल रहा है कि कौन कितना सुंदर दिखता है, किसके पास कितना पैसा है, किसके पॉलिटिशियंस से संपर्क हैं, किसकी बॉलीवुड में पैठ है। और फिर तुमको ताज्जुब हो जाता है कि कांड क्यों हो गए?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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