जाप भर करने से क्या होगा अगर बोध नहीं हुआ? समझ जागने के बजाय, वह रुक जाती है जब आप रटने में विश्वास करने लगते हैं, और चेतना जड़ हो जाती है। मंत्र अथवा श्लोकों को रटकर समझ नहीं पाएंगे। साफ़ उच्चारण एक प्रशंसनीय बात है, पर उच्चारण भर से काम नहीं चलेगा। वेद का अर्थ ही होता है ‘जानना’, ‘बोध’; अतः उनके मंत्रों को रटकर दोहराना बहुत अपर्याप्त है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, बचपन से मेरे पिताजी ने मुझे श्लोक और भगवान के बारे में बताया और आगे वेदों में रुचि उत्पन्न हुई। वे मुझे वेद के ऑडियो कसेट दिलाते थे, फिर मैं सुन-सुनकर बच्चों को वो वेद पढ़ाती थी। जैसे मैंने सुन लिया, 'गणानान्त्वा', तो फिर बच्चे दोहराए। उसके बाद गुरु भी मिल गए और उन्होंने अच्छे से वेद को सिखाया।
और मैं सोच रही हूँ कि वेद अभी लुप्त से हो गए हैं, उच्चारण स्पष्ट नहीं है, तो वेद सिखाना मेरा कर्तव्य है। ये मानते हुए, मैं जितना हो सके बच्चों को वेद सिखाती हूँ। तो अगर मैं इसी को लक्ष्य मानकर जीवन इसी सेवा में बिताऊँ, तो फिर मैं लक्ष्य को प्राप्त कर पाऊँगी?
आचार्य प्रशांत: लक्ष्य क्या है?
प्रश्नकर्ता: जैसे जीवन आता है भगवान की प्राप्ति के लिए। जीवन जो भगवान ने दिया वो भगवान की प्राप्ति के लिए, तो भगवान की प्राप्ति ये हो पाएगी न? क्योंकि मुझे ये संतोष तो मिलता है कि जो भगवान का जो श्वास है वेद, वो सबके मुख से मुझे सुनने को मिलता है, वो आनंद तो मैं प्राप्त कर रही हूँ। तो उसी से मेरा जीवन सफल हो जाएगा न?




