प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जो चक्रों की बात करते हैं कि एक खुला, दूसरा खुला फिर कुछ अलौकिक सिद्धियाँ इत्यादि आ गईं खुलने से। तो सात चक्रों जैसा कुछ होता है? या ये बस हवा-हवाई बातें हैं?
अचार्य प्रशांत: ये सांकेतिक बात है। जैसे हम कहते हैं मन; और अक्सर मैं भी जब मन कहता हूँ तो मैं ऐसे करता हूँ (सिर पर हाथ रखते हुए) तो यहाँ भी मन थोड़े ही है, संकेत है। वैसे ही जैसे यहाँ मन नहीं है, वैसे ही यहाँ चक्र नहीं हैं, संकेत है।
प्र: ये चक्र किसकी तरफ़ संकेत हैं?
आचार्य: मन के तलों की ओर। चक्र का अर्थ होता है, चक्कर। चक्कर वो जिसमें तुम फँसे हुए हो, वृत्त। सबसे नीचे तुम फँसे रहते हो, पशुता में, कामवासना में। तो उसको तुम बोल देते हो ये कौन सा चक्र है? मूलाधार। फिर उससे उबरे तो किसी और चक्कर में फँस जाते हो वो कहते हैं न; ‘आसमान से गिरे, खजूर में अटके। तो मूलाधार से उठे इधर फँसे, फिर इधर फँसे, फिर इधर फँसे, फिर इधर। फिर समस्त चक्रों से जब मुक्ति मिल जाती है, तब तुम कहते हो ब्रह्मरन्ध्र से फूटकर आज़ाद हो गए। सहस्त्रार कमल खिल गया, तो ये उसको देखो, चक्करों से मुक्ति। चक्र माने, चक्करों से आज़ादी चाहिए। और आज़ादी ऐसे ही कि निचले चक्करों से उठकर, ऊपर के चक्करों में आते जाओ, एक दिन सारे चक्करों को पार कर जाओगे।
प्र: प्रतीकात्मक है।
आचार्य: हाँ, सांकेतिक हैं, कोई चक्र कहीं नहीं हैं।




