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कुंडलिनी के चक्र क्या होते हैं? || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जो चक्रों की बात करते हैं कि एक खुला, दूसरा खुला फिर कुछ अलौकिक सिद्धियाँ इत्यादि आ गईं खुलने से। तो सात चक्रों जैसा कुछ होता है? या ये बस हवा-हवाई बातें हैं?

अचार्य प्रशांत: ये सांकेतिक बात है। जैसे हम कहते हैं मन; और अक्सर मैं भी जब मन कहता हूँ तो मैं ऐसे करता हूँ (सिर पर हाथ रखते हुए) तो यहाँ भी मन थोड़े ही है, संकेत है। वैसे ही जैसे यहाँ मन नहीं है, वैसे ही यहाँ चक्र नहीं हैं, संकेत है।

प्र: ये चक्र किसकी तरफ़ संकेत हैं?

आचार्य: मन के तलों की ओर। चक्र का अर्थ होता है, चक्कर। चक्कर वो जिसमें तुम फँसे हुए हो, वृत्त। सबसे नीचे तुम फँसे रहते हो, पशुता में, कामवासना में। तो उसको तुम बोल देते हो ये कौन सा चक्र है? मूलाधार। फिर उससे उबरे तो किसी और चक्कर में फँस जाते हो वो कहते हैं न; ‘आसमान से गिरे, खजूर में अटके। तो मूलाधार से उठे इधर फँसे, फिर इधर फँसे, फिर इधर फँसे, फिर इधर। फिर समस्त चक्रों से जब मुक्ति मिल जाती है, तब तुम कहते हो ब्रह्मरन्ध्र से फूटकर आज़ाद हो गए। सहस्त्रार कमल खिल गया, तो ये उसको देखो, चक्करों से मुक्ति। चक्र माने, चक्करों से आज़ादी चाहिए। और आज़ादी ऐसे ही कि निचले चक्करों से उठकर, ऊपर के चक्करों में आते जाओ, एक दिन सारे चक्करों को पार कर जाओगे।

प्र: प्रतीकात्मक है।

आचार्य: हाँ, सांकेतिक हैं, कोई चक्र कहीं नहीं हैं।

प्र२: एक गुरु हैं, उन्होंने वो जो आप कह रहे हैं कि सिम्बॉलिक (प्रतीकात्मक) है उन्होंने उसको सही में बताया कि जब मैं बैठा तो शरीर ठंडा पड़ा और अचानक फटाक की आवाज़ आई इत्यादि। ये सब क्या है?

आचार्य: फिर ऐसे तो फिर पीठ में तीन साॅंप भी होने चाहिए। (श्रोतागण हॅंसते हैं)

प्र३: आचार्य जी, ये जो चक्रों का क्रम आपने बताया कि पहले मूलाधार है फिर उससे ऊपर अन्य चक्र हैं तो जैसे कबीर साहब के भजन में एक लाइन आती है कि “या घट अन्दर अनहद गरजे, या ही में उठत फुहारा।” तो ये जो ‘उठत फुहारा’ है, क्या यही है इन सभी चक्रों से ऊपर उठना?

आचार्य: हाँ, यही है, यही है। बात करनी है तो कुछ तो रूपक छवियाँ संकेत देने पड़ेंगे न; प्रतीक बनाने पड़ते हैं, कविता गढ़नी पड़ती है, नहीं तो बात कैसे होगी?

प्र४: पर ये रूपक बहुत सारे लोगों के लिए सीमाएँ भी तो बना देते हैं?

आचार्य: हाँ, ऐसा होता है, पर सन्त भी क्या करें? कैसे बताऍं? फिर तो बता ही नहीं पाऍंगे।

प्र५: आचार्य जी मैं किसी को जानता हूँ, मुझे लगता है कि वो काफ़ी लेजिटिमेट (वैध) हैं उन्होंने अपना एक एक्सपीरियंस (अनुभव) बताया था कि कैसे उन्हें महसूस हुआ कि ऐसा कुछ असली में होता है।

आचार्य: महसूस तो तुम्हें कुछ भी हो सकता है, वो तो तुमपर निर्भर करता है न कि तुम क्या महसूस कर रहे हो? शोले में असरानी की पीठ पर मूली रखी है, उसे महसूस हुआ की बन्दूक रखी है। महसूस तो तुम्हें कुछ भी हो सकता है, तुम असरानी हो तो तुम्हें बन्दूक लगेगा। अनुभव स्वयं अपना प्रमाण थोड़े होता है कभी, तुम किस फेर में हो? इसको पेट में कुछ ठंडा-ठंडा लग रहा था तो? लड़कियाँ देखते हो बोल देते हो हॉट-हॉट हैं तो? अनुभव से ये थोड़े ही सिद्ध हो जाता है कि तुम जिस वस्तु की बात कर रहे हो, सत्य वहाँ है। अनुभव विषय में नहीं, विषयेता में है। अनुभोक्ता वो है।

तो कोई बताए, मुझे ऐसे अनुभव हुए, वैसे अनुभव हुए, तो वो झूठ नहीं बोल रहा है उसे अनुभव हुए हैं। पर अनुभव-तो-अनुभव है, कुछ भी हो सकता है अनुभव। मूली के चक्कर में बेचारा गब्बर सिंह मारा गया। ये दोनों जेल में ही रहे आते तो क्यों मरता गब्बर? पर असरानी को हो गया अनुभव, क्या? कि लगा दी है बन्दूक और पहले उसको ये अनुभव कराया गया था कि जेल में बन्दूक आ चुकी है। अब ये करा दिया अनुभव, हो गया उसको अनुभव। अनुभव तो कुछ भी हो सकता है, पहले उसका मन तैयार किया गया, अनुभव ग्रहण करने के लिए। कि जेल में बन्दूक आ चुकी है और फिर लगा दी मूली। हो गई बन्दूक, मारा गया गब्बर।

गब्बर मारा गया, हीरो की जान गई, मज़ा आया ठाकुर को। जो तुमसे बताए अपने अनुभव और बड़े विश्वास के साथ बताए वो ठीक ही बता रहा है, उसे हुआ होगा अनुभव। पर जब वो बोले मेरा ऐसा अनुभव था तो हाथ जोड़कर कहना, अनुभव-तो-अनुभव है। जेल में बन्दूक आ चुकी है। हुए होंगे आपको बड़े आध्यात्मिक अनुभव, अनुभव आप अपनी कसौटी थोड़े ही होता है, अनुभव स्वयं अपना प्रमाण थोड़े ही होता है।

प्र६: सर, कल मैंने आपको जो आवाज़ की बात बताई थी जो आपने कहा था कि भ्रम है। आज आख़िरी दिन है तो पूछ लेता हूँ, मतलब भ्रम है या कुछ भी है तो इसमें वैसे एक रिसर्च भी की थी किसी ने, तो पता किया था कि जो गहरे लोग होते हैं उन्हें भी आती है, जब सब शान्त होता है, पूरा मौन होता है तब उन्हें भी अन्दर से कुछ होता है, आवाज़ आती है।

आचार्य: अनुभव होता है, आवाज़ नहीं आती है। जब तुम कहते हो, आवाज़ आती है तो तुम सारी बात आवाज़ पर डाल रहे हो, आवाज़ आ रही है, आवाज़ का आना एक बात है और आवाज़ का अनुभव होना एक बात है। बन्दूक का अनुभव हो गया, बन्दूक आई थी क्या? बन्दूक आई नहीं, अनुभव तब भी हो गया।

आवाज़ नहीं आई, आवाज़ के बिना ही आवाज़ का अनुभव हो जाता है। तुम्हें क्या लगता है, तुम ऐसी दुनिया में रह रहे हो, जहाँ तुम्हें अनुभव मात्र उसका है जो सत्य है; पगले हो क्या? यहाँ तो कुछ भी नहीं होता और लोगों को लगता है बहुत कुछ हो गया। लोग परछाइयों से डर जाते हैं, लोग शक में जान दे देते हैं, लोग संदेह में जीवन बर्बाद कर लेते है, तुम ऐसी दुनिया में थोड़े ही जी रहे हो, जहाँ सिर्फ़ सत्य का अनुभव हो, सत्य का तो वास्तव में कोई अनुभव होता ही नहीं है।

तुम्हें सौ अनुभव हो सकते हैं, हो गए तो हो गए। इसी को तो कहते हैं, “भासना” भासित होता है, है नहीं।

प्र: मैं ये नहीं कह रहा कि ये जो है, ये सत्य है। पर ये आवाज़ मुझे ख़ुद आती है, इसलिए मैं कह रहा हूँ।

आचार्य: अनुभव होता है, तुम्हें अनुभव हो रहा है ज़रूरी नहीं है कि वो चीज़ है इसलिए अनुभव हो रहा है, तुम्हें आप अपना अनुभव हो रहा है। किसी वस्तु का नहीं हो रहा है, किसी विषय का नहीं हो रहा, विषयी का अनुभव हो रहा है।

प्र: तो आप कह रहे कि मैं चाहकर उसे बन्द कर सकता हूँ?

आचार्य: तुम चाहकर नहीं उसे बन्द कर पाओगे, तुम बदलकर उसे बन्द कर पाओगे। तुम कुछ और हो गए तो वो बन्द हो जाएगा। तुमने पी रखी है, यहाँ चाँद-तारों का तुम्हें अनुभव होगा कि नहीं होगा? होगा। अब तुम चाहो की चाॅंद-तारे न दिखाई दें तो तुम्हारी चाहत कभी पूरी होगी? पर चाॅंद-तारे दिखाई देने कब बन्द होंगे? जब उतर जाएगी। तुम बदल गए, तुम्हारे अनुभव बदल जायेंगे। तुम तो बदलो, अनुभव सब बदल जाऍंगे, मिट जाऍंगे, अनुभवों से आगे निकल जाओगे। जो शक में जी रहा है उसके लिए तो जेल में बन्दूक आ ही चुकी है न?

प्रश्नकर्ता: लेकिन आचार्य जी, जैसे कल मैं ओशो की किताब पढ़ रहा था उसमें ऐसा लिखा था कि हज़ारों साल से मेडिटेटर्स (ध्यानियों) को आवाज़ आती है।

आचार्य: मेडिटेटर्स को वो आवाज़ आती है, ठीक है। तो ग़लत क्या लिखा है? मेडिटेटर्स को वो आवाज़ आती है वो आवाज़ है नहीं। इन दोनों बातों में अन्तर तो समझो! फलानों को वो आवाज़ आती है, क्या ये यही बात है कि वो आवाज़ वस्तुतः है? वो आवाज़ वस्तुत: नहीं है।

प्र: सर, वो तो आएगी ही। क्योंकि मेडिटेट (ध्यान) ही उसपर करा जा रहा है जो मन्त्र मेडिटेशन है या साउण्ड मेडिटेशन है।

आचार्य: नहीं जो उनपर नहीं भी करते हैं तो भी उनको आतीं हैं आवाज़ें।

प्र७: जो आप बोल रहे हैं वो तो बहुत ही गहरी बात है। मतलब, अब मैं ऐसे देखता हूँ तो मुझे लगता है कि जीवन के सारे अनुभव मुझ तक ही सीमित हैं जो मैं अनुभव करना चाहूँ वो अनुभव कर लूँ और जब मैं अनुभव करना छोड़ दूँ तो सत्य के पास हूँ।

आचार्य: जब मैं स्वयं को छोड़ दूं।

प्र: जब मैं स्वयं को छोड़ दूँ तो अनुभव छूट गए और फिर वही एक चीज़ रह जाती है।

आचार्य: असल में अध्यात्म में ये भूल बड़ी गहरी और बड़ी व्यापक है। ऐसी व्यापक है कि इसमें बड़े-बड़े गुरु भी फँस गए हैं। और गहरी ऐसी है कि जब तुम फँसते हो तो छोड़ने का मन नहीं करता। ध्यान अपनेआप में एक बड़ा नशा बन सकता है क्योंकि अब तुमको आवाज़ें आ रहीं हैं और आवाज़ें; भजन-कीर्तन जैसा लग रहा है, रंग दिखाई दे रहे हैं अकृतियाँ दिखाई दे रहीं हैं, तारा मंडल नाच रहे हैं, ध्यान में ये सबकुछ होता है।

तो ध्यान अपनेआप में फिर एक आदत बन जाती है। जैसे कोई नशा करता हो छुपकर, ऐसे लोग छुप-छुपकर ध्यान करते हैं।

प्र: यही झीनी माया है।

आचार्य: हाँ, बढ़िया! बिलकुल ये झीनी माया है। मोटी माया ये है कि कोई रुपया-पैसा वासना इत्यादि में फँस गया और झीनी माया है कि कोई भगवान की मूर्ति में फँस गया है, कोई ध्यान की क्रियाओं और विधियों में फँस गया है। वो भी झीनी माया ही है।

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