खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।
“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार। “युगन युगन हम योगी।”
‘हाँ! हम युगों-युगों से हैं पर भटक नहीं रहे हैं। हम योग युक्त हैं। समय में हैं, पर केंद्र हमारा कालातीत है। समय में हैं, इससे हमें कोई इनकार नहीं है। युगों से हैं, लगातार हैं। हमारे अलावा और कौन हो सकता है? जहाँ तक समय हैं, वहाँ तक हम हैं। पर मात्र समय नहीं हैं हम। हम उससे जुड़े हुए हैं, जहाँ से समय ही उद्भूत होता है।’ उसी जुड़े होने का नाम है योग। युगन युगन हम योगी।
‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ न आना है, न जाना है। या तो ये मान लो कि हम लगातार उपस्थित ही हैं या ये मान लो कि हम कभी आए ही नहीं। लेकिन आरम्भ और अंत के कोई बिंदु नहीं है जिनके बीच में तुम हमें कह सको कि हम हैं। या जिनके इस पार या उस पार तुम कह सको कि हम नहीं है। ‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ हमारे मिटने का कोई प्रश्न नहीं उठता क्योंकि हम कुछ वस्तु विशेष नहीं है। जब तक कुछ भी है, तब तक हम ही हैं। हम केंद्र से जुड़े हुए हैं, उसी का नाम योग है। तो केंद्र का पूरा जितना विस्तार है, वो भी हम ही हैं। हमारे मिटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ जब तक कुछ भी है, हम ही हैं। हम कोई सीमित शरीर नहीं है, जो कुछ सालों में खत्म हों जाना है। जब तक कुछ भी है, हमारी हस्ती है। कुछ भी का होना, मेरा ही होना है।
‘आवे न जावे, मिटे न कबहूँ।’ हमारा जन्म नहीं होता। हमारी मृत्यु नहीं होती। हमारा होना है। हम शरीर होते, तो जन्म होता, मृत्यु होती। हम कोई विशेष वस्तु होते, तो आना होता और जाना होता। हम तो अस्तित्व मात्र हैं। ऐसा घुल गए हैं कि हमारी व्यक्तिगत सत्ता कुछ बची नहीं है। हमारा निजी कुछ है नहीं। कुछ ऐसा नहीं है, जिसको हम दावा कर सकें कि ये हम हैं, ये हमारा है। बिलकुल कुछ ऐसा नहीं है। और जब आप बिलकुल ये कहने की स्थिति में पहुँच जाते हो, कि कुछ नहीं है, कि हम हैं या हमारा है, तो फिर आप सब कुछ के साथ लय हो जाते हो क्योंकि आपको पहचाना ही नहीं जा सकता अब। आपको अलग करके देखा ही नहीं जा सकता अब।



