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कर्तव्य बनाम धर्म बनाम अध्यात्म || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: अभी जो अध्यात्म के बारे में आपने कहा है बस इसी के आगे गीता हम इस बार पढे, जो यहाँ से मिला था। तो उसमे फिर धर्म लग रहा है कि अर्जुन धर्म जान रहे हैं और कृष्ण उनको जो बता रहे हैं अध्यात्म। हमारे मन ने ये महसूस किया। तो धर्म की एक तरह से कृष्ण निन्दा ही कर रहे हैं, जो पूजा-पाठ इस तरह की बात होती है। इसमें जो भेद कर-करके हम लोग देखते हैं, इसका कुछ स्पष्टीकरण चाहिए।

आचार्य प्रशांत: तीन शब्द हैं, अग़र आदर्श स्थितियाँ होतीं, अग़र हम लोग जगे हुए होते तो तीनों शब्दों का बिलकुल एक अर्थ और एक ही दिशा होनी चाहिए थी। ‘कर्तव्य, धर्म और अध्यात्म।’ एक जागृत मन के लिए यह तीनों बिलकुल एक होते हैं, कर्तव्य = धर्म = अध्यात्म।

लेकिन जब व्यक्ति जागृत नहीं होता तो वो इनके अलग-अलग अर्थ कर लेता है। कर्तव्य का अर्थ वो कर लेता है वो सारे काम जो उसको दुनिया के प्रति करने हैं, परिवार के प्रति करने हैं, समाज के प्रति करने हैं, तमाम सब व्यवस्थाओं के प्रति करने हैं। वो सबकुछ जो इनके प्रति करणीय है, उसका नाम वो ले देता है कर्तव्य, और वो सब उसने सीखा कहाँ से? वो सब उसने इन्ही संस्थाओं से, इन्हीं व्यवस्थाओं से सीखा।

परिवार के प्रति क्या कर्तव्य है, उसे किसने बताया? परिवार ने ही। समाज के प्रति क्या कर्तव्य है, किसने बताया? समाज ने ही। तो वो इन सब बातों को कर्तव्य समझ लेता है।

और हमें बनाने वाली कोई सत्ता है, कोई ईश्वर है, दुनिया को चलाने वाली कोई ताक़त है, देवी-देवता हैं, कुछ पारलौकिक शक्तियाँ हैं उनको सन्तुष्ट रखने के लिए उनसे मनवाँछित फल की प्राप्ति के लिए जैसा आचरण करना होता है उस आचरण को वो क्या नाम दे देता है? धर्म। तो उसने कर्तव्य और धर्म में भेद कर लिया। और तीसरे तल पर आता है अध्यात्म, उसका वो कोई अर्थ ही नहीं कर पाता क्योंकि वो उसकी ज़िन्दगी में होता ही नहीं है।

आम आदमी को देखेंगे तो उसकी ज़िन्दगी में आपको ये दो चीज़ें नज़र आएँगी; कभी वो कहेगा देखो मैं अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ, कैसे! कर्तव्य का पालन में वो क्या बताएगा? कि अभी-अभी ख़बर आई है कि फ़लाना कोई बीमार है तो हम ज़रा जा रहे हैं उसको देखने। पूछा जाएगा कि तुम्हारा तो उससे कोई लेना-देना नहीं, फिर तुम क्यों जा रहे हो देखने? तो कहेगा, वो कर्तव्य है भाई, करना पड़ता है। प्रेम कुछ नहीं, रिश्ता कुछ नहीं, सच्चाई कुछ नहीं, कर्तव्य के नाते कुछ बातें करनी पड़ती हैं, सुना है न ये सब? आप करते भी होंगे! तो ये कर्तव्य की चीज़ हो गई।

वैसे ही धर्म में क्या आ गया? कि भई फ़लाना त्यौहार है, इस त्यौहार में इस-इस तरह की व्यवस्था करनी होती है, इस-इस तरीक़े से कर्म करने होते हैं। घर में किसी की मृत्यु हुई है या घर में किसी का जन्म हुआ है तो उस पर इस-इस तरह का उत्सव करना होगा, व्यवस्था करनी होगी, आचरण करना होगा। फ़लाने दिन ये करना है फिर ये करना है, ये करना है उसमें ये सब भी फिर तय हो जाता है कि कितना पैसा कहाँ देना है ये सब। इन सब चीज़ों को किसका नाम दे लेता है? इनके लिए वो नहीं कहेगा कि मैं अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ; इनके लिए फिर वो कहेगा कि मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूँ।

अध्यात्म का अर्थ है, न इसका पालन करना, न उसका पालन करना, सर्वप्रथम समझना कि पालन करा कौन रहा है? किन तरीक़ों से करा रहा है? और पालन करने वाला कौन है? ये अध्यात्म है। आम आदमी की ज़िन्दगी में कर्तव्य भी मौजूद होता है, धर्म भी मौजूद होता है, अध्यात्म मौजूद ही नहीं होता इसीलिए उसके कर्तव्य भी झूठे होते हैं, उसका धर्म भी झूठा होता है।

और इसीलिए श्रीकृष्ण को, अर्जुन से कहना पड़ा कि बेटा सारे धर्मों को छोड़ करके मेरी शरण में आओ क्योंकि तुम्हारे सब धर्म झूठे हैं। तुम्हारा एक-एक कर्तव्य झूठा है। तुम बिना जाने, बिना समझे फ़ालतू ही किन्ही लीकों पर किन्ही रास्तों पर चल रहे हो, समझते तुम कुछ नहीं हो। बस करे जा रहे हो, जिये जा रहे हो, माने जा रहे हो। “मामेकम् शरणम् व्रज।”

एक ही रास्ता है उस पर चलना है और वो जो रास्ता है उसे कहते हैं चेतना की ऊँचाई का, चेतना की सफ़ाई का। उसी को कृष्णत्व भी कहते हैं। कृष्ण और कुछ नहीं है। तुम्हारी ही विशुद्ध चेतना का दूसरा नाम हैं कृष्ण। चेतना गन्दी हो तो कह लो जीव है और वही चेतना बिलकुल रगड़-रगड़ के साफ़ हो जाए तो कह दो कि ये चेतना अब कृष्णमयी हो गई। उसमें कृष्ण आकर बैठ नहीं गए, उसमें से गन्दगी हट गई। उसमें कृष्ण सम्मिलित नहीं हो गये, उसमें जो मल निहित था वो साफ़ हो गया। और जो मल बैठा होता है चेतना में, अक्सर वो कर्तव्य और धर्म का नाम लेकर ही बैठा होता है।

बात समझ में आ रही है?

धर्म की आज के समय में जो आपको हानि भी दिख रही है वो इसीलिए दिख रही है क्योंकि हमारा धर्म आचरणवादी, परम्परावादी, वितण्डावादी हो चुका है और उसका अध्यात्म से कोई लेना देना नहीं। हम धर्म का अर्थ ही कुछ ऐसी चीज़ से लेते हैं जो अतीत से जुड़ी हुई है। कुछ चल रहा हो ढकोसला, अन्धविश्वास उसका सम्बन्ध हम तत्काल जोड़ देते हैं धर्म के साथ। ऐसे-ऐसे काम जो कोई आम आदमी अपनी ज़िन्दगी में करे तो आप कहेंगे पागल है, मूर्ख है ये सबके लिए ख़तरा है, विक्षिप्त है, इसको पागल खाने में डालो। वही काम जब धर्म के नाम पर होते हैं तो सम्माननीय हो जाते हैं।

कोई आदमी साधारण तौर पर एक बात बोले, आप कहेंगे पागल है, क्या बोल रहा है। वही बात वो आदमी धर्मगुरु बनकर बोल दे तो आप कहते हैं क्या बात बोली है, क्या बात बोली है और कोई धर्मगुरु भी है ये आप कैसे निर्धारित कर लेते हैं? कोई मापदण्ड नहीं। ज़रा पुराने तरह के वो कपड़े पहनेगा, पुरानी-पुरानी ही बातें करेगा, सब पुराने रस्मों-रिवाज़ों को आगे बढ़ाएगा, उनका अनुमोदन करेगा।

और बार-बार आपको जो बोल दे कि हर बात में जिज्ञासा नहीं की जा सकती; कुछ बाते हैं जो तुम कभी समझ नहीं सकते। उसको हम समझ लेते हैं कि वो धार्मिक व्यक्ति है। जबकि धर्म का अर्थात अध्यात्म का अर्थ ही होता है जानना, बोध। अब बोध होगा कैसे भाई अग़र जिज्ञासा नहीं होगी। लेकिन यहाँ तो अग़र धर्म की चीज़ हो और उसमे कोई जिज्ञासा करने लगे तो हमारे लिए आफ़त हो जाती है बल्कि हमें अपमान सा लगता है। धर्मगुरु अपनी बात, अपना उपदेश्य शुरू करने से पहले ही बोल देते हैं कि देखो बहुत सारी बातें हैं जो तुम्हारे दिमाग से आगे की हैं। बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में सवाल मत करना, जिज्ञासा मत करना।

ये काम आज ही नहीं हो रहा है ये आदमी की बहुत पुरानी मायावी वृत्ति रही है। इसी कारण श्रीकृष्ण को अर्जुन को गीता का इतना विस्तृत पाठ देना पड़ा। उन सब सवालों के तो जवाब दिए ही जो अर्जुन ने पूछे; उन सब सवालों के भी जवाब दे दिए जो अभी अर्जुन पूछने लायक ही नहीं था। अर्जुन की सामर्थ्य से आगे के थे जो प्रश्न उनका भी कृष्ण ने उत्तर दे दिया। पूरी गीता ही जैसे एक प्रश्नोत्तरी है। सवाल जवाब, सवाल जवाब, सवाल जवाब। जाने बिना, समझे बिना, जिज्ञासा करे बिना जियोगे कैसे भाई!

बड़ी-से-बड़ी भूल ये कि सवाल नहीं करते। फिर कभी भूले-भटके सवाल कर भी दिया तो कोई भी सस्ता जवाब मिल गया तो उसको स्वीकार कर लेते हैं, क्यों? अरे! कोई बडे आदमी हैं उन्होंने बोला है। और वो बड़े आदमी कोई भी हो सकते हैं वो घर के बब्बा हो सकते हैं, पड़ोस के चौधरी हो सकते हैं, कोई बड़ी प्रतिष्ठित पुरानी किताब हो सकती है या कोई बड़े रुतबे वाले गुरु-घँटाल हो सकते हैं। सवाल तो करना ही नहीं है।

और ख़ासतौर पर सवाल तब मत करना जब उत्तर देने वाले तुम स्वयं हो। दूसरों ने अग़र कोई बात कहीं है तो फिर भी एक प्रतिशत सम्भावना है कि हम उस पर प्रश्न उठा लें। पर अग़र जवाब हमारे ही भीतर से उठा है, तब तो पूछो ही मत। तब कौन उस पर सवाल उठाये!

अध्यात्म कहता है, सवाल उठाते रहो, उठाते रहो, उठाते रहो, उठाते रहो, जब तक यही न स्पष्ट हो जाए कि ये सवाल उठाने वाला कौन है। जब तक इस पूरे सवाल-जवाब के खेल का जो केन्द्र है वही बिलकुल खुल न जाए, तब तक पूछो पूछो पूछो रुक मत जाना, जानते रहो, जानते रहो, जानते रहो। तुम्हारी चेतना जानने के लिए ही व्याकुल है।

बढाओ ज्ञान को जब तक कि जानने वाला ही ज्ञान से अघा न जाए। फिर दूर आगे एक बिन्दु आएगा जब ज्ञान की पूरी प्रक्रिया को ही समझ जाओगे, फिर ज्ञान बढ़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। पर वो बिन्दु बहुत दूर है जब तक वहाँ पहुँचे नहीं तब तक तो सारा ज़ोर होना चाहिए सिर्फ़ जानने पर। और बहुत कड़ाई से जानना है, ज़रा भी उसमें रियायत नहीं कर देनी है कि हो गया चलो थोड़ा-बहुत पता चल गया इतना ठीक है, नहीं। थोड़े बहुत से काम नहीं चलना, ज़िन्दगी एक ही है उसको पूरा जीना है। है न? कोई आपसे कहे कि जितनी आपको ऑक्सीजन चाहिए उसकी तीस प्रतिशत दे देंगे, हो गया, ज़्यादा की माँग नहीं करते, तीस प्रतिशत दे तो दिया पासिंग मार्क्स, तो काम चल जाएगा? कैसे जिओगे? हो सकता है जी भी लो। एक तिहाई ऑक्सीजन मिल रही है तो हो सकता है कि कुछ दिन जी भी लो। पर जीवन की गुणवत्ता कैसी हो जाएगी?

तो ऑक्सीजन के बिना शरीर की जो हालत हो जानी है न; बोध के बिना, समझ के बिना वही हालत जीवन की हो जाती है। इसीलिए कृष्ण अर्जुन को ये बिलकुल नहीं कहते कि अर्जुन आदेश है युद्ध कर।

एक श्लोक चाहिए था गीता में, पहला, क्या? ‘अर्जुन मैं कौन हूँ? भगवान। तू कौन है? इन्सान, भक्त। तो बेटा धनुष उठा और फ़ायर। और सवाल-जवाब तो तुम कर ही मत देना ये बत्तमीज़ी की निशानी होती है। अनुशासन में रहो और बड़ों ने जो कहा है मानो। चलो मारो उसको, ऐसा भी तो हो सकता था न?

इन विस्तृत अठारह अध्यायों की क्या ज़रूरत थी? पर नहीं, आदेश नहीं दिया गया है। समझा रहे हैं, समझा रहे हैं, श्रम समझिए। कितना श्रम किया है समझाने में, समझिए।

मान्यता से, अन्धानुकरण से और अन्धविश्वास से बहुत बहुत दूर रहिए। जहाँ तक इस विश्व की, इस ब्रह्माण्ड की बात है यहाँ कुछ ऐसा नहीं है जिस पर आपको सवाल नहीं उठाना चाहिए। दुनिया माने दुनिया, जो भी चीज़ दिमाग की ज़द में आ सकती है; जो भी चीज़ मस्तिष्क और विचार की सीमा में आ सकती है वो चीज़ प्रश्न की भी सीमा में आनी चाहिए।

प्रश्न किस पर नहीं उठ सकता? प्रश्न उसी पर नहीं उठ सकता जिसके बारे में विचार ही नहीं किया जा सकता। जब विचार ही नहीं किया जा सकता तो प्रश्न क्या करेंगे? तो उसकी बात करना ही व्यर्थ है। बाक़ी हर वो चीज़ जिसकी बात हो सकती है उसपर सवाल भी उठेगा और साफ़ सवाल उठेगा। भले ही वो चीज़ दिखाई देती हो, चाहे न दिखाई देती हो।

कोई बोले सूक्ष्म तरंगे हैं, तो आइये बात करते हैं अब तरंग का तो ये, ये अर्थ होता है। बताइए तरंग का क्या अर्थ है आपका? तरंग माने क्या? और तरंग तो गति करती है। आप जिस तरंग की बात कर रहे हैं क्या वो गति करती है? और अग़र वो गति करती है तो किस माध्यम से गति करती है? बताइए तो थोडा, समझाइए हमको आप क्या बोल रहे हैं? तरंगें! कौनसी तरंग है भाई! ट्राँसवर्स है? लॉ्गच्युडनल है? क्या तरंग? किस गति से बढ़ती है? कितनी देर में एक जगह से दूसरी जगह पहुँचती है?

जैसे ही आप ये सब सवाल पूछेंगे तो फिर मामला ज़रा कडवा होने लगेगा। व्याख्याता झुँझलाने लगेंगे, कहेंगे ये क्या पूछा तरंग की गति पूछ ली, हाँ भाई, पूछेंगे। क्योंकि तरंग शब्द ही कहाँ से आया है? संसार से। और संसार में जो कुछ है वो विज्ञान के अन्दर आता है। संसार में कुछ भी नहीं है जो विज्ञान से बाहर का है। विज्ञान का अर्थ ही है हर उस चीज़ का अनुसन्धान करना, प्रयोग करना, जाँच करना, खोजबीन करना जो इस संसार के भीतर की है।

और संसार की परिभाषा क्या? हर वो चीज़ जिसके बारे में सोचा जा सकता है, कहा जा सकता है वो चीज़ संसार की ही है। तो कोई ये न कहे कि संसार में कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनके बारे में विज्ञान कुछ नहीं कह सकता, ये मूर्ख़ता का वक्तव्य है।

बस एक है जिसके बारे में विज्ञान कुछ नहीं कह सकता, वो, वो है, जो निर्गुण, निराकार है। और विज्ञान बड़ी ईमानदारी से कह देता है कि हमें उसके बारे में कोई बात करनी ही नहीं है। विज्ञान बहुत ईमानदारी से कह देता है कि हमें तो बात ही बस दुनिया की चीज़ों के बारे में करनी है। उसकी तो हम बात करना ही नहीं चाहते जो न दिखाई दे सकता है, न सुनाई दे सकता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिसके बारे में कोई कथन नहीं कहा जा सकता। विज्ञान कहता है हम उसके बारे में कोई दावा नहीं करते।

लेकिन जो भी ऐसी चीज़ है जिसके बारे में कुछ भी कहा जा सकता है। वो चीज़ विज्ञान की ही सीमा के भीतर आती है। कुछ भी आपने कह दिया किसी चीज़ के बारे में वो तत्काल अब कहाँ आ गई? वो विज्ञान के क्षेत्र में आ गई। अब उस पर प्रयोग होगा अनुसन्धान होगा। जिज्ञासा करनी है, बात पूछनी है, समझना है। भारत को, सनातन धर्म को सबसे ज़्यादा अग़र किसी चीज़ ने बर्बाद करा है तो वो है जिज्ञासा के अभाव ने। अन्धविश्वास और अन्धे अनुकरण ने। अतीत में आपने भारत की जो भी तबाही देखी है और आज भी जितनी दुर्दशा है भारत की, उसके लिए अग़र कोई एक चीज़ केन्द्रीय रूप से ज़िम्मेदार है तो वो यही है झूठा धर्म और झूठा कर्तव्य।

अध्यात्म का अभाव और दबंग धर्माधीशों और सामाजिक नेताओं का वर्चस्व। भारत की चेतना को ही कुन्द कर दिया। भारत की चेतना को ही जैसे मूर्ख़ता की ओर धकेल दिया कि कुछ भी बोल दो, भारतीय मान लेगा। न वो सवाल पूछता है, न वो अनुसन्धान करता है, न वो प्रयोग करता है।

उसको बोल दो फ़लाने पर्वत पर फ़लानी आत्माएँ रहती हैं वो मान लेगा हाँ हाँ, ज़रूर ज़रूर। उसको बोल दो फ़लाने बाबाजी चले आ रहे हैं और उनको मोक्ष मिला हुआ है कतई इनलाइटण्ड हैं, कहेगा अरे! अरे! अरे! बाबाजी बाबाजी तुरन्त जाकर चरणों से लिपट जाएगा। वो पूछेगा नहीं कि क्या मिला हुआ है? पूछेगा ही नहीं। क्या मिल गया भैया इनको और कैसे? पूछेगा ही नहीं। वो तुरन्त कहेगा नहीं वो तो। उसको दो-चार बातें संस्कृत में बोल दो वो तत्काल एक़दम दण्डवत हो जाएगा, गिर जाएगा।

उसके जीवन में जो एक बड़ा केन्द्रीय महत्वपूर्ण रिश्ता होता है विवाह का। विवाह के भी अवसर पर पण्डित कौनसा मन्त्र फूँक रहे हैं वो सवाल भी नहीं करेगा कि भाई तुम्हें जो मन्त्र फूकने हैं फूँको पर हमें कम-से-कम अनुवाद कर के तो दे दो, मुझको और श्रीमती जी को, हमको पता तो हो कि हमारे बारे में क्या-क्या बातें बोल गये तुम।

भाई जो भी बोल रहे हो हमारे ही बारे में बोल रहे हो न? न जाने क्या-क्या बोल रहे हो और आग के चक्क़र लगावा रहे हो। ये मामला क्या है? आप सोचिए न कितनी ये मूर्ख़तापूर्ण और लज्जास्पद बात है कि आपका जो गहरे से गहरा सम्बन्ध है किसी दूसरे जीव के साथ वो ही किन मन्त्रों के ऊपर प्रतिष्ठित हो रहा है आप कभी जानना नहीं चाहते।

और कितनी ही बार तो मन्त्र बोलने वाले ख़ुद भी नहीं जानते वो क्या बोल रहे हैं। आधा मन्त्र बोलकर आगे बढ़ जायेंगे, कभी अशुद्ध उच्चारण कर रहे होंगे, सब चलता है। क्यों चलता है? क्योंकि आपकी ही जिज्ञासा नहीं है जानने की। अभी मैं बोल रहा हूँ तो बहुत लोगों को अजीब लग रहा होगा। कह रहे हैं वो तो होता ही रहता है पीछे से, पूछना थोड़े ही होता है। संस्कृत है न, तो जो भी बोला जा रहा होगा संस्कृत में वो ठीक ही होगा। काहे भाई! संस्कृत में गाली-गलौच नहीं हो सकती? जो कुछ भी होता है संस्कृत में ठीक ही होगा? और आपको कैसे पता वो संस्कृत भी है? जब आपने उत्सुकता ही नहीं करी जानने की कि क्या बोला जा रहा है तो आपको ये भी कैसे पता कि जो बोला जा रहा है वो संस्कृत ही है। और अक्सर वो शुद्ध संस्कृत नहीं होती।

कोई आयेगा बोल देगा, हमारे ग्रन्थों में ऐसा लिखा है, हमारी परम्परा ऐसा कहती है। ओ रुक-रुक-रुक-रुक। पूछेंगे ही नहीं, कहेंगे ही नहीं रुकने को कि बता तो कौनसे ग्रन्थ में लिखा है। कोई कहेगा, हमारी परम्परा ऐसे कहती है। ये कहाँ से तुमको परम्परा मिल गई, किसने बताई है? हमारी परम्परा माने क्या? आज आ रहा था दिल्ली से यहाँ पर बहुत लेट वगैरह थी फ्लाइट)। तो विमान में कुछ यूरोपियन लोग भी बैठे हुए थे, महिलाएँ थी, कुछ पुरुष भी थे। और बाक़ी लोग इधर आ रहे थे, मैं समझता हूँ विमान ज़्यादातर उत्तर भारत के लोगों से भरा हुआ था। वही बनारस आने वाले लोग, काफ़ी लोग तो बनारस के ही रहे होंगे।

अब भारतीय स्त्रियों में जो सबसे लम्बी स्त्री थी विमान में, वो यूरोपियन स्त्रियों में जो सबसे छोटे क़द की स्त्री थी विमान में उससे कुछ नहीं तो चार इंच छोटी थी। सबसे लम्बी भारतीय स्त्री सबसे छोटी यूरोपियन स्त्री से क़रीब चार इंच छोटी थी। ये यूँ ही नहीं हो गया, यूँ ही नहीं हुआ है ये। शरीर तो क़रीब-क़रीब एक ही था। उत्पत्ति एक ही जगह से है।

जानने वालों ने अध्ययन करके बताया हुआ है कि जेनेटिकली (आनुवंशिक रूप से) भी बड़ी समानताएँ हैं और आपकी जो संस्कृत भाषा है ये यूरोपीयन भाषाओं से बहुत मिलती-जुलती है। ऐसा लग रहा है कि जैसे जड़ें एक ही हों। जड़ें एक हैं तो लोग भी अग़र एक नहीं तो आस-पास के तो ज़रूर रहे होंगे। ऐसा कैसे हो गया? क़द में भी छोटे रह गए, प्रयोग, विज्ञान, अनुसन्धान में भी पीछे रह गए, अर्थव्यवस्था में भी पीछे रहे गए, ऐसा कैसे हो गया? वो ऐसे ही हुआ है कि आम भारतीय बड़े अनुशासन से अपने कर्तव्य का पालन करता है। कुछ हद तक वो अपनी दृष्टि में धर्म का भी पालन करता है, लेकिन आध्यात्मिक वो बिलकुल नहीं होता। जैसे हम सब डरे बैठे हों कि जान कैसे लें, समझ कैसे लें, पूछ कैसे लें।

जब तुम जानोगे नहीं, समझोगे नहीं, पूछोगे नहीं तो विज्ञान हो, कला हो, अर्थव्यवस्था हो, जीवन का कोई भी क्षेत्र हो उसमें कैसे प्रगति होगी? कैसे फलोगे-फूलोगे?

अध्यात्म माने समझ लीजिये कि आत्म_जिज्ञासा। आत्मा वगैरह के प्रति जिज्ञासा नहीं कि आत्माएँ उड़ रही हैं, और ये और वो, उनके प्रति जिज्ञासा करनी है। आत्माओं के प्रति जिज्ञासा करोगे तो फिर मेरे पास मत आओ। उसके लिए बहुत लोग हैं वो उड़ती आत्माओं के बारे में बहुत बातें बताएँगे।

वो बताएँगे कि फ़लाना उन पर अग़र अभीमन्त्रित धागा फेंक के मारो तो दो-चार आत्माएँ फँस भी जाती है। और जब वो फँस जाएँ तो उनको ताँबे के बर्तन में रखना। ताँबे के बर्तन में रखना और एकादशी के दिन गुड़ मिलाकर पी जाना। उससे तुम में सब आत्माओं का ज़ोर आ जायेगा। ये सब बेहूदी बातें करनी हों तो उसके लिए बहुत घूम रहे हैं गुरू लोग।

आत्म जिज्ञासा माने ये जो जीवन है उसको जानना। अपना चलना-फिरना, अपना विचार, अपने डर, अपनी कुँठाएँ, अपनी आशाएँ, अपने सपने, अपने घाव, अपनी ज़िन्दगी, अपना ज़मीर। इसे कहते हैं अध्यात्म। आ रही है बात समझ में?

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