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कर्म-संन्यासी कर्मफल से मुक्त || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यास्याध्यात्म्चेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर: ।।३.३०।।

विवेक बुद्धि द्वारा समस्त कर्म तथा कर्मफल मुझ परमेश्वर में अर्पित करके निष्काम, ममता-रहित और शोक-शून्य होकर तुम युद्ध करो।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ३, श्लोक ३०)

आचार्य प्रशांत: बस यही है, इस एक शब्द में कृष्ण का सारा आदेश समाहित हो गया – ‘युध्यस्व’ – ‘लड़ो।‘ जैसे पीछे के भी तीन शब्द इसी में आ गए। और उसके पहले भी एक और शब्द है – ‘कर्मसंन्यास’। संन्यास का भी यही अर्थ है यहाँ पर – ‘कर्मफल मुझे सौंप दो, तुम्हारा उससे अब कोई वास्ता नहीं रहा।’ जो चीज़ दूसरे को थमा देते हो, उसके बारे में फिर विचार वगैरह करने की कोई ज़रूरत? ‘तो कर्मफल क्या होगा, वो तुम मुझे सौंप दो’ – इसी को संन्यास कहते हैं।

और ये संन्यासी की सबसे सुंदर परिभाषा है – जिसने कर्मफल अपने हाथ से छोड़ दिया।

हाथ माने यही हाथ नहीं, ये हाथ (सिर की तरफ़ इशारा करते हुए), हमारे हाथ यहाँ होते हैं। सारा काम तो यहाँ (सिर) चलता है न? तो हाथ यहाँ (सिर) होते हैं।

जिसने कर्मफल का विचार करना छोड़ दिया, वो संन्यासी है।

संन्यासी होने के लिए किसी विशेष आवरण, आचरण, परिधान आदि की ज़रूरत नहीं है। जो अपनी गहरी-से-गहरी बुद्धि-विवेक से लगता हो कि ठीक है, वो करो, और कर्मफल की न चिंता, न परवाह – वो संन्यासी है।

कर्म-संन्यास का भी यही अर्थ है। कर्म-संन्यास का अर्थ कर्म से संन्यास नहीं होता है, कि कुछ करेंगे नहीं, बैठकर खाएँगे; वो नहीं कर्म-संन्यासी है। कर्म-संन्यासी कौन है? जिसने कर्मफल का संन्यास कर दिया है। ‘न्यास’ माने क्या होता है? ‘रखना’। कर्मफल जब हमारे हाथ में है ही नहीं तो अपने हाथ में रखें क्यों? सही जगह रख देना कर्मफल को, सम्यक-न्यास – ये संन्यास है।

‘जो सही है वो डटकर करते हैं, आगा-पीछा बहुत सोचते नहीं। सोचते बहुत हैं हम, पर ये जानने के लिए कि क्या सही है करना, इसकी चिंता नहीं करते कि फिर अब आगे क्या होगा। विचार बहुत है, गहरा है विचार हमारा, ये जानने के लिए कि मैं कौन हूँ अतः मुझे करना क्या चाहिए। पर इस बात में हम कोई विचार, ऊर्जा, झंझट लगाते ही नहीं कि अब कर दिया तो हाय राम आगे क्या होगा; उससे संन्यास ले लिया हमने, चिंता से संन्यास ले लिया।‘

‘फ़िक्र का फाँका करे, ताका नाम फ़कीर।‘ फ़िक्र से मुक्त हो गए, यही फ़कीरी है।

समझ में आ रही है बात?

अलार्म वगैरह लगा लीजिए, कहीं लिख लीजिए, कोई घंटा ऐसा तैयार कर लीजिए कि बजाएँ तो आवाज़ आए ‘युध्यस्व’। सब ठीक हो जाएगा; ये अनिर्णय, ये आलस, व्यर्थ का प्रमाद, मानसिक चर्बी, सब उतर जाएगा।

कैसा मज़ा आता न अगर हमारी परंपराएँ हमारे धर्म का अनुशीलन कर रही होतीं। काश ऐसा होता, पर हमारी परंपराओं का धर्म से कोई लेना-ही-देना नहीं है, बस यूँ ही बह रहीं हैं, परंपरा अलग है, धर्म अलग है। अगर हमारी परम्पराएँ धार्मिक होतीं वास्तव में, तो बड़ों के आगे जब बच्चे पाँव छूते, तो बड़े यही आशीर्वाद देते; क्या? ‘युध्यस्व’। ये सब नहीं, कि दूधो-नहाओ।

(श्रोतागण हँसते हैं)

अब एक ये परंपरा है। कोई आ रहा है, वो वीगन है भाई, उसको बोल रहे हो, ‘दूधो-नहाओ’ – ये कौनसी परंपरा है! और ज़बरदस्ती उसको बता रहे हो कि पूत पैदा करो। और वहाँ पर भी लिंगवाद है; पुत्री क्यों नहीं, पूत ही काहे को?

‘युध्यस्व!’ – यही आशीर्वाद दीजिए, यही सलाह दीजिए। बेटा आकर चरण स्पर्श कर रहा है, ये सब नहीं कि ‘बताओ वत्स क्या चाहिए?’ और वो बोल रहा है, ‘एप्पल’, और फिर वो बोल रहे हैं, ‘तथास्तु।‘ वो जो भी बोले, आपको क्या बोलना है? ‘युध्यस्व! जो चाहिए, लड़कर हासिल कर, माँग नहीं! हाथ का कटोरा नहीं बनना चाहिए। पात्रता दिखा, जा जीतकर आ! युध्यस्व!’

यही वास्तविक वात्सल्य भी है। अर्जुन कृष्ण के लिए वत्स जैसे ही हैं। वत्स माने? (बच्चा) तो वात्सल्य यही है। अगर अर्जुन कृष्ण के लिए वत्स समान हैं तो वही करिए न जो कृष्ण अर्जुन को सिखा रहे हैं। क्या सिखा रहे हैं? या ये कहा था कि अर्जुन बोल रहा है, ‘भाग जाऊँगा’, और कृष्ण ने कहा, ‘तथास्तु, भाग’? उन्होंने तो पकड़ लिया, ‘भाग कहाँ रहा है? रुक! जो सही है वो कर!‘

वात्सल्य इसमें नहीं है कि छोटे ने जो माँगा, उसको थमा दिया; वात्सल्य इसमें है कि छोटे को लड़ा दिया। जब छोटा लड़ जाएगा, तो बड़ा हो जाएगा। है न?

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ।।३.३१।।

जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्या-रहित होकर मेरे इस मत का सदा अनुष्ठान करते हैं, वे भी कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ३, श्लोक ३१)

‘जो बात अभी मैं सिखा रहा हूँ, जो उसको जान लेता है वो वर्तमान में आनंद में रहता है और भविष्य के सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।‘

वर्तमान का आनंद किसमें है? सही कर्म करने में। आगे के दुख से मुक्ति किसमें है? चूँकि सही कर्म करा है इसलिए आगे कर्मफल के भागी बनोगे ही नहीं; क्योंकि कर्मफल उनको ही मिलता है जो कर्मफल माँगते हैं। हम माँगते हैं न कर्मफल? आप आज जो भी करते हैं वो किसलिए करते हैं? कि आगे कर्मफल मिले; भविष्य पर दृष्टि रखकर ही तो करते हैं! आप कर्मफल माँगते हो, इसलिए कर्मफल मिलता है। जो भविष्य पर दृष्टि कर ही नहीं रहा उसे कोई कर्मफल नहीं मिलता। उसी को कृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि कर्म-बंधन से मुक्त हो गया।

भविष्य के दुखों का निर्माण आप इसी पल में कर लेते हो क्योंकि आप आज जी ही भविष्य के लिए रहे हो। जो भविष्य के लिए जी रहा है उसने भविष्य के सब दुखों का निर्माण कर लिया है। कितनी अजीब बात है, क्योंकि भविष्य की ओर जब हम देखते हैं तो माँगते सुख हैं। आज हम जो भी करते हैं इसलिए करते हैं कि भविष्य में सुख मिलेगा। और कृष्ण सिखा रहे हैं, ‘तुम आज यदि कुछ भी कर रहे हो भविष्य की कामना से, कि ऐसा करूँगा तो भविष्य में फ़लाना लाभ हो जाएगा, तो तुम्हें भविष्य में और कुछ नहीं, बस दुख ही मिलेगा।‘

जो बिलकुल निराश होकर – निराश माने? निराश माने वो नकारात्मक बात नहीं जो हमारी संस्कृति में, हमारी भाषा में वो बन गई है। अध्यात्म में निराश होना बहुत ऊँचे स्थान की बात है। निराश होना उतनी ही ऊँची बात है जितना निरहंकार या निर्मम होना। हमारी भाषा में तो निर्मम होना भी ऊँची बात नहीं है; न निराश होना, न निर्मम होना। पर अध्यात्म में निराश होना बहुत ऊँची बात है।

और वेदान्त कहता है, “आशा हि परमं दुखं”। आशा से बड़ा दुख कोई दूसरा होता नहीं; और निराशा आनंद है, निराशा मुक्ति है। निराश होना सीखिए – आशा से मुक्ति। आशा से मुक्त होना सीखिए।

‘पर जिएँगे कैसे फिर? आशा नहीं है तो जिएँ किसके लिए? आशा हमारे लिए इतनी बड़ी बात है, कैसे जिएँ?’

जिएँ!

जो कर्तव्य-कर्म में डूबा होता है, उसके पास समय नहीं होता आगे की आशा करने का, उसके पास अभी ही बहुत कुछ है; उसका आँचल भरा हुआ है, वो खाली नहीं है कि भविष्य के सपने करेगा।

समझ में आ रही है बात?

भविष्य के लिए आशा करने का अर्थ होता है वर्तमान के साथ एक तरह की गद्दारी या बेईमानी। तुमने कुछ छोड़ दिया न, कि आगे मिलेगा, तुमने ध्यान उस पर लगा दिया न, कि आगे कुछ मिलेगा; और ये भी तुमने तय कर लिया है कि आगे कुछ पाने के लिए तुम्हें बचे भी रहना है। अगर तुम्हें आगे बचे ही रहना है भविष्य के लालच में, तो फिर वर्तमान में तुम टूटना भी बर्दाश्त थोड़े ही करोगे!

उदाहरण के लिए, अर्जुन यदि लड़ें राज्य और सिंहासन की इच्छा से, तो क्या वो लड़ाई में मृत्यु स्वीकार कर सकते हैं? तर्क से देखो! लड़ने का उद्देश्य ये है कि मैं जीतकर के राज्य भोगूँगा; अब क्या आप जान देकर के लड़ाई करोगे? क्योंकि लड़ ही इसीलिए रहे थे कि आप लड़ाई में बचे रहो; बचे रहोगे तभी तो आगे सुख भोगोगे राज्य का!

लेकिन जो सिर्फ़ लड़ने के लिए लड़ रहा है, वो लड़ाई में जान भी दे देगा। जो राज्य भोगने के लिए लड़ रहा है, वो पूरी तरह से लड़ नहीं पाएगा, वो अपनेआप को बचाएगा। उसको चोट लग गई होगी, वो पीछे हट जाएगा, कहेगा, ‘यदि हाथ ही कट गया तो फिर राज्य का सुख भी कैसे लूटेंगे? तो ज़रा अभी पीछे हो जाओ, और अगर हार भी मिल रही है तो बर्दाश्त कर लो, फिर कभी दोबारा आकर के राज्य की कोशिश करेंगे; या कहीं और कोई छोटी-मोटी सम्पदा, कहीं से कुछ लूटेंगे, जीतेंगे और उसका सुख ले लेंगे। पर अभी पीछे हट जाओ।‘ क्योंकि उद्देश्य युद्ध नहीं है, उद्देश्य राज्य का भोग है।

अर्जुन को भोगने के लिए नहीं कहा है, ‘भोगस्व’ तो बोला नहीं। क्या बोला? ‘युध्यस्व’ – ‘लड़ो!’ और बात वहीं ख़त्म कर दी। इसीलिए तो ये शब्द मुझे इतना प्यारा लगता है; इसके न आगे कुछ है, न पीछे कुछ, बात वहीं ख़त्म हो जाती है। युद्ध के बाद क्या होगा? वो खाली स्थान है, मौन है, आकाश है, उसके बाद कुछ नहीं है। यही निष्कामता है – ‘युद्ध है, युद्ध के बाद क्या होगा ये तो मालूम नहीं, पर युद्ध आवश्यक है तो करेंगे।‘

ये हम समझते ही नहीं हैं, लेकिन भविष्य का विचार हमारी पूरी जीवन-ऊर्जा चूस लेता है; वो हमें पंगु कर देता है, हमें लकवा मार जाता है भविष्य की सोच-सोचकर। भविष्य का इतना हम विचार करते हैं कि आज हम किसी दिशा में बढ़ ही नहीं पाते, हमारी सारी ऊर्जा खा गया भविष्य। सपने, डर, असुरक्षा, आकांक्षा, आशा-निराशा – खा गया, यही सबकुछ खा गए हमें। एक भी कदम किधर को भी बढ़ाते हैं तो सौ विचार आ जाते हैं। फिर उस कदम में कोई जान ही नहीं रह जाती, फिर बस सतर्कता और सावधानी बचते हैं।

दोहरा रहा हूँ – सारा विचार सही कर्म जानने के लिए होना चाहिए, विचार का क्षय कर्मफल जानने में नहीं होना चाहिए। कर्मफल को कर्म में ही निहित जानो। कर्मफल की अगर भीतर से कभी जिज्ञासा उठे भी, तो स्वयं को बोल दो, ‘कर्म अगर सही है, तो जो भी कर्मफल होगा मैं उसी को सही मान लूँगा। कर्म यदि सही है तो जो भी कर्मफल आएगा, मैं मान लूँगा कि वही सही था।‘ – बस ये उत्तर है।

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।।३२।।

लेकिन जो असूयायुक्त होकर मेरे इस मत का अनुष्ठान नहीं करते, उन अविवेकी मनुष्यों और सब प्रकार के ज्ञान से रहित व्यक्तियों को विनष्ट ही समझना।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ३, श्लोक ३२)

‘जो अज्ञान से बँधकर, अँधेरे से बँधकर, जहाँ कोई रोशनी नहीं है (‘असूया’), मेरी बात नहीं मानते, उनको नष्ट ही समझ लेना; भविष्य में नहीं नष्ट होंगे, वो वर्तमान में ही नष्ट हैं। उनका आगे नहीं कुछ बुरा होगा, वो हैं ही नहीं कि उनका आगे कुछ बुरा हो; वो नष्ट हो चुके हैं।‘

लगभग वही बात है जब अर्जुन को कहते हैं, ‘तुम मरे हुओं को मारने से डर रहे हो क्या अर्जुन? जिस क्षण ये मेरे विरुद्ध खड़े हुए थे, ये उसी क्षण मर गए थे। इनकी देह हिल-डुल रही है, ये मरे हुए हैं, इनको मारने से क्या तुम कतराते हो!’

वैसे ही यहाँ कह रहे हैं, ‘जो अँधेरे में है वो मुर्दा है, पहले से मुर्दा है; वो लाश है, वो स्वयं को भ्रम में रखे है कि वो ज़िंदा है।‘ हाँ, वो साँस ले रहा है, वो बोल रहा है, आगे-पीछे कर रहा है, पर वैसे ही जैसे अभी आप लोग सुन रहे थे, “जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिनु प्राण।“

दुनिया की सारी आबादी ऐसी ही है। पुराने समय में वो एक खाल का (झोला होता था), उसमें फूँका जाता था और वो फिर... तो वो जो खाल का झोला होता था लोहार का, उसमें से हवा आ-जा रही है, और फिर ऐसे (हथेली से फूलने और पिचकने का इशारा करते हुए) हो रहा है, ऐसे हो रहा है, लगता था जैसे वो साँस ले रहा हो। तो उसी को प्रतीक बनाकर कबीर साहब कह रहे हैं कि वो जो लोहार की खाल होती है, जिससे वो अपनी धमनी फूँकता है, उससे भी तो हवा आती-जाती है; और वो भी खाल होती है जो संकुचित होती है और फिर फैलती-फूलती है और आदमी का फेफड़ा भी वैसा ही होता है। तो साँस तो वो लोहार की खाल भी ले रही है, पर प्राण कहाँ हैं उसमें?

ज़्यादातर लोग हम ऐसे ही हैं – हमारे फेफड़े साँस ले रहे हैं, हममें कोई प्राण नहीं हैं। हम एक अस्तित्वगत वेंटिलेटर (जीवन-रक्षक प्रणाली) पर हैं, जिसने हमारे शरीर को तो ज़िंदा रखा हुआ है, हमारी चेतना को नहीं।

समझ में आ रही है बात?

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