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'कण-कण में भगवान्' का असली अर्थ क्या है? || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: पूछा है कि सबमें ईश्वर को देखना चाहते हैं, कैसे देखें?

समझेंगे इसको, क्योंकि अध्यात्म में इस मुहावरे का बड़ा इस्तेमाल होता है। ‘कण कण में भगवान’, ‘नर-नर में नारायण’ इत्यादि। सुना ही होगा न? 'सबके भीतर परमात्मा का वास है', 'इंसान में भगवान को देखो' इत्यादि। इस तरह की बातें ख़ूब बतायी जाती हैं। इसका क्या मतलब है? या यह सिर्फ़ बोल-चाल की बात है?

लोगों में भगवान को देखने का अर्थ होता है लोगों को भगवत्ता के केंद्र से देखो। लोग तुम्हें वैसे ही दिखायी देंगे जैसे तुम हो।

एक गाय चली आ रही है। तुम बछड़े हो। तुम्हें क्या दिखायी देगा? बोलो जल्दी; माँ। गाय चली आ रही है। तुम दूधिया हो। दूधिया समझते हो, कौन?

प्रश्नकर्ता: दूध बेचने वाला।

आचार्य: गाय चली आ रही है। तुम्हें क्या दिखायी देगा? दूध। गाय चली आ रही है। तुम पुजारी हो, गौपूजक हो। तुम्हें क्या दिखायी देगा? गौमाता। गाय चली आ रही है। तुम जीव प्रेमी हो, तुम पशु प्रेमी हो। तुम्हें क्या दिखायी देगा? कि यह पशु स्वस्थ है कि नहीं, कोई रोग तो नहीं, भूखा तो नहीं। और गाय चली आ रही है और तुम कसाई हो, तुम्हें क्या दिखायी देगा? माँस।

तुम जो होते हो, उसी के अनुसार तुम्हें दुनिया दिखायी देती है, जो तुम हो वैसी तुम्हें दुनिया दिखायी देगी। उत्तर मिल गया न? अब अगर तुम्हें नर-नर में नारायण को देखना है, तो तुम्हें क्या होना पड़ेगा?

प्र: नारायण।

आचार्य: बस, यही जवाब है। नर-नर में नारायण को देखना है तो तुम्हारे भीतर जो नारायण है, उस पर केंद्रित होकर देखो। नारायण को देखने दो। वो नारायण को ही देखेगा। इंसान देखेगा, इंसान दिखेगा। पुरुष देखता है, तो देखा है उसे स्त्री कितनी संवर्धित दिखाई देती है। पचास की भीड़ हो, पर तुम्हारी आँख अगर पुरुष की है, तो उस पचास की भीड़ में जो तीन स्त्रियाँ होंगी — सैंतालीस पुरुष हैं, तीन स्त्रियाँ — वो तुमको ख़ूब बढ़-चढ़ कर दिखाई देंगी।

विन्सेंट वैन गॉग का नाम सुना होगा? वो इम्प्रेशनिस्ट पेंटिंग (प्रभाववादी चित्रकला) करता था। उसका मतलब जानते हो क्या है? वो चीज़ों को वैसे नहीं दर्शाता था, जैसी वो हैं। वो वैसे दर्शाता था, जैसी वो लगती हैं। जैसा उसके ऊपर प्रभाव वो डाल रही हैं, जैसा इम्प्रेशन।

तो अगर वो रात्रि कालीन आकाश का चित्र बनाता, तो उसमें तारे छोटे-छोटे न होते। अभी आप आसमान की ओर देखते हैं तो आपको तारे कितने बड़े दिखाई देते हैं? छोटे-छोटे, छोटे-छोटे। जैसे सुदूर दीए, नन्ही-नन्ही लौ। और वैन गॉग की जो पेंटिंग (चित्र) हैं, उसमें तारे होते हैं, इतने बड़े-बड़े। (हाथों की उँगलियों का प्रयोग कर तारों को दर्शाते हुए)

क्योंकि तारे ही आकर्षित कर रहे हैं। क्योंकि आकाश की ओर देख रहे हो, तो कालिमा तो नेपथ्य में है। भले ही उसका क्षेत्रफल ज़्यादा है लेकिन नेपथ्य में है। उससे आपको कोई मतलब नहीं। आप आकाश की ओर देख रहे हो, आपकी दृष्टि कहाँ जाकर टिक रही है?

प्र: तारों पर।

आचार्य: तारों पर। तो आप पर प्रभाव सबसे ज़्यादा किसका पड़ रहा है?

प्र: तारों का।

आचार्य: तारों का। तो वो जो चित्र तैयार हुआ है, उसमें तारे इतने बड़े-बड़े (दोनों हाथों से बड़े-बड़े तारों का आकार बताते हुए)। इतने बड़े-बड़े! तो वैसे ही अगर कोई कमरा हो, जिसमें पचास व्यक्तियों में कुल तीन महिलाएँ हों और आपसे कहा जाए, इसका इम्प्रेशनिस्ट (प्रभाव वादी) चित्र बना दो। तो जानते हो कैसा बनाओगे?

सैंतालीस छोटे-छोटे बिंदु, जिनकी कोई हैसियत नहीं। नगण्य! जो देखने काबिल ही नहीं और तीन बड़ी-बड़ी महिलाएँ। क्योंकि वही आपको दिख रही हैं। बाकी सैंतालीस, उनकी क्या बिसात? वो आपको दिख ही नहीं रहे। और उन महिलाओं में भी आप शरीर को आनुपातिक तरीके से नहीं दर्शाओगे। शरीर जैसा है ही, उसी अनुपात में, उसी प्रपोर्शन में नहीं दर्शाओगे, अगर इम्प्रेशनिस्ट तरीके से दर्शा रहे हो। जहाँ-जहाँ जाकर आपकी नज़र रुक रही है, वो सब संवर्धित हो जाएगा, मैग्निफ़ाई हो जाएगा। तो सोच सकते हो कि किस प्रकार का चित्र उभरेगा। वैसे हम देखते हैं दुनिया को।

जैसे कि कोई किसी कमरे में घुसे और उसी कमरे में एक कोने में सोना रखा हो और पूरा कमरा उस कोने में जाकर समा जाए। उस कमरे के बाकी क्षेत्रफल की कोई औक़ात ही नहीं रही। तुम्हारी पूरी चेतना जाकर केंद्रित हो गयी है बस एक कोने में, जहाँ सोना है। हम ऐसे जीते हैं। हम जो होते हैं, हमारे लिए संसार बस वैसा ही हो जाता है।

आप सोने के लालची हो, तो संसार के बाक़ी हिस्से अब आपके लिए अनावश्यक हो गए। महत्वहीन हो गए। आवश्यक क्या बचा? बस वो कोना जहाँ रखा है सोना। आप लालच के केंद्र से देख रहे थे, आपको सिर्फ़ वही वस्तु दिखाई देगी, जिसके प्रति आपको लालच है।

भूखा आदमी बाज़ार में निकले, पचास दुकानों में वो जो तीन दुकानें होंगी, जहाँ खाना-पीना उपलब्ध है, उन्हीं पर जाकर के उसकी इंद्रियाँ चिपक जाएँगी। तुम भूखे मत रहो, भोजनालय तुम्हें आकर्षित नहीं करेगा। और तुम जब तक भूखे हो तब तक तुम कहो, 'मुझे भोजनालय में नारायण दिखाई दें', यह हो नहीं पाएगा।

नर में, नारी में, रेत में, पहाड़ में, कीड़े में, मकौड़े में, अंधेरे में, रोशनी में, नारायण का वजूद तो हर जगह है। वही-वही है। उसके अलावा है क्या! किसकी सत्ता! किसकी हस्ती!

लेकिन तुम्हें वो नहीं दिखेगा। तुम अंश होकर देखोगे, तुम जैसे अंश बने हो, तुम्हें उसका विपरीत अंश दिखाई देना शुरू हो जाएगा। बस पूर्ण का कोई विपरीत नहीं होता। हर अंश का विपरीत होता है।

तुम काले होकर देख रहे हो, तुम्हें सफ़ेद दिखाई देना शुरू हो जाएगा, आकर्षित करेगा। तुम छोटे होकर देख रहे हो, तुम्हें वो सब आकर्षित करने लग जाएगा जो बड़ा है। गरीब होकर देख रहे हो, तुम्हें धन आकर्षित करने लग जाएगा। हर अंश का विपरीत इस संसार में उपलब्ध है। संसार अंशों का ही तो मेला है। कोई अंश ऐसा नहीं है, जिसका विपरीत नहीं मिलेगा, इसीलिए कहते हैं कि संसार भाँति-भाँति के द्वैतों का संकलन है।

कोई भी एक सिरा पकड़ो, उसका विपरीत सिरा कहीं-न-कहीं उपलब्ध है। और उसी की तलाश में तुम घूम रहे हो। जो पहाड़ में रहते हैं, उनको पाताल उपलब्ध है। जो पाताल में रहते हैं, उनको पहाड़ का लोभ है। गरम देश में रहते हो, ठंडा है, उसका आकर्षण हो सकता है।

हर अंश का विपरीत उपलब्ध है। बस पूर्ण का कोई विपरीत नहीं है। जब पूर्ण होकर के देखते हो, तो कोई अंश नज़र नहीं आएगा। तब नारायण-ही-नारायण है। मतलब समझना इसका। नारायण को देखने का अर्थ होता है, उसको देखना जो शांति दे, असली शांति!

ठीक?

अंश को जब तक देख रहे हो, देखते ही उपद्रव मच जाता है। उस उपद्रव को तुम शांति का नाम भले दे लो। पुरुष होकर के जब स्त्री को देखते हो, तो भीतर कैसा घमासान उठता है, कि नहीं? एक अंश ने दूसरे अंश को देखा और मच गयी खलबली। होता है ऐसा कि नहीं?

भूखा वैसे ही परेशान था कि भूखा था, पर भूखा जब भोजन को देख ले, तो एकदम ही तड़प जाता है। गरीब यूँ ही परेशान था कि निर्धन हूँ, पर निर्धन जब धन को देख ले, तो और बौखला उठता है। जैसे उसके घाव पर किसी ने….?

प्र: मरहम लगा दिया हो।

आचार्य: मरहम लगा दिया हो?

प्र: नमक डाल दिया।

आचार्य: नमक, मसाला, मिर्ची, सब घिस दिया हो। अंश जब भी देखेगा — पहली बात वो दूसरे अंश को देखेगा। दूसरी बात, जिसको भी देखेगा — जलेगा, भुनेगा, और उपद्रव उठेगा उसमें।

पूर्ण मात्र ऐसा है जिसको देख कर तुममें उपद्रव नहीं उठेगा, शांति उठेगी। शांत तुम तभी हो सकते हो, जब तुम्हें तलाश नहीं है। अंश को तो हमेशा तलाश रहेगी। अंश, अंश को तलाशेगा शांति की ख़ातिर और शांति की जगह पाएगा अशांति।

नारायण को देखने का मतलब है, हम पूर्ण हैं, पूर्ण को ही देखते हैं और कोई अशांति हममें उठती नहीं। ठीक वैसे जैसे नारायण को देखकर कोई अशांति नहीं उठती। ठीक वैसे जैसे कहा जाता है कि 'वो मिल जाए, तो चैन आ जाए।'

हमें वो मिल गया है। हम चैन में जीते है। इसका प्रमाण यह है कि दुनिया में अब हम कुछ भी देखें, हमें बेचैनी नहीं होती। दुनिया में अब हम कुछ भी देखें, सुंदर-से-सुंदर, लुभावना-से-लुभावना कि कुत्सित-से-कुत्सित, सुसज्जित हो, चाहे कुत्सित हो हममें बेचैनी नहीं उठती। इस स्थिति को कहते हैं, संसार में सार को देखना, नर में नारायण को देखना।

अब आप सामने वाले की हक़ीक़त को देख सकते हो, क्योंकि आप उसे लालच या डर की निगाहों से नहीं देख रहे। और इस बात का बड़ा महत्त्व है। क्यों? क्योंकि हम यह सोच लेते हैं कि नर में नारायण को देखने का मतलब है कि उसकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों को बिलकुल दरकिनार कर देना और कहना, 'प्रभु! आप तो नारायण हैं।' ना!

इसका अर्थ दूसरा है। इसका अर्थ यह है कि अब मुझे तुझसे कोई लालच नहीं रहा। न मैं तुझसे डरता हूँ। तो अब मैं साफ़-साफ़ देख सकता हूँ कि तू कौन है, तेरे इरादे क्या हैं और तेरा इस जगत पर प्रभाव क्या पड़ रहा है। अब मैं ख़री-ख़री बात कर सकता हूँ — यह है नर में नारायण को देखना।

जब तक तुम नर में अंश को देख रहे हो और उस अंश से तुम्हारा लोभ और स्वार्थ जुड़ा हुआ है, तब तक तुम कोई ख़री-ख़री बात नहीं कर सकते। तब तक तुम नपी-तुली, चिकनी-चुपड़ी और झूठी बात ही करोगे।

नारायण होकर जब देखते हो, तो फिर संतों जैसी वाणी हो जाती है तुम्हारी। 'ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।' न लालच है तुमसे और न द्वेष है तुमसे।

आ रही है समझ में?

और जब कहा जा रहा है, 'ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर', तो उससे पहले ही कहा जा चूका है, 'माँगे सबकी खैर।' नारायण के केंद्र से देखो, सच्चाई के केंद्र से देखो। उत्सुक होकर, आग्रही होकर, संशयी होकर मत देखो। स्थिर होकर, पूर्ण होकर, श्रद्धा से देखो। मात्र देखो, पाने के लिए नहीं देखो।

देखने में और राह देखने में बड़ा अंतर है। अंतर समझते हो न? एक आदमी है, जो अपनी खिड़की से बाहर देख रहा है। और एक आदमी है जो अपनी खिड़की से बाहर राह देख रहा है। ज़मीन-आसमान का अंतर है। हम देखते नहीं हैं, हम राह देखते हैं। अब नारायण नहीं दिखाई पड़ेंगे। नारायण उनके लिए हैं, जो मात्र देखते हैं।

नारायण उनके लिए हैं, जिन्होंने नारायण को पा ही लिया। यह बड़ी अजीब बात है। जो नारायण को पाने निकले, नारायण उनके लिए नहीं हैं। जो नारायण की राह देख रहे हैं, नारायण उन्हें कभी नहीं मिलेंगे। जो नारायण को पाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें बस कोशिश ही मिलेगी।

नारायण की राह नहीं देखी जाती। नारायण हो कर के दुनिया की तमाम राहों को देखा जाता है। आँखों से नारायण नहीं दिखते। आँखों के पीछे हैं नारायण। आँखों के पीछे हैं नारायण।

निर्भय होकर के दुनिया को साफ़-साफ़ देखो। बिलकुल साफ़-साफ़! डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। आ रही है बात समझ में? अब जगत तुम्हारे लिए ख़तरा नहीं है। अब संसार तुम्हारे लिए पीड़ा नहीं है। अब तुम्हारे चेहरे पर विकृति नहीं छाई रहेगी। अब तुम्हारे चेहरे पर एक सहज सौन्दर्य, एक निर्मल, झीनी मुस्कान रहेगी।

तुम्हारा चेहरे ऐसा नहीं होगा, जैसे पता नहीं कितनी घोर यंत्रणा से गुज़र रहे हो। जैसे पराँठा मरोड़ दिया गया हो। पराँठे को उठाकर मरोड़ दो और फिर कोशिश करो कि अब यह दोबारा गोल-गोल हो जाए बिलकुल, अपने नैसर्गिक रूप को पा ले यह अब, हो सकता है?

हममें से बहुतों के चहरे निचोड़े गए पराँठे समान हो जाते हैं। 'ऐंठा पराँठा!' ऐसे नहीं! जीवन ऐंठ के लिए थोड़े ही मिला था। जन्म देने वाला तुम्हारा दुश्मन थोड़ी ही था कि तुम्हें यंत्रणा, सज़ा, विकृति भुगतने के लिए भेजे। कोई पारलौकिक आनंद न भी होता हो, तो भी कम-से-कम जीवन इसके लिए तो नहीं है कि तुम उसे दुख में गुज़ारो।

नहीं होता होगा कोई स्वर्ग तुल्य सुख, पर कम से कम एक सहज स्थिति में तो जी सकते हो न? हम सहज स्थिति में भी नहीं जीते। मैं तो किसी पारलौकिक सुख की बात करता ही नहीं। मेरी दृष्टि में सहजता ही उच्चतम आदर्श है। अधिकतम प्राप्य है। पर वो सहजता भी हमें कहाँ उपलब्ध है!

घास का तिनका होता है, उसमें कुछ ख़ास नहीं होता, लेकिन फिर भी उसको देखने भर से स्वास्थ्य का पता चलता है। हमें देखने भर से स्वास्थ्य का पता नहीं चलता। जब हममें स्वास्थ्य नहीं, तो हमारी दृष्टि में कहाँ से स्वास्थ्य होगा? हम कहाँ से नर में नारायण को देखेंगे? हमें कैसे संसार की हक़ीक़त का पता चलेगा? इतने संदेही मत रहो, ज़रा श्रद्धा रखो।

मान लो कि बहुत दूर तक तुम्हें नहीं भी दिखाई देता पर जितना दिखाई देता है, कम-से-कम उसके प्रति तो आँखें मत बंद करो।

हो सकता है कि आख़री आसमान तुम्हारी पकड़ से दूर हो, पर जहाँ तक उड़ सकते हो, उतना तो उड़ो। आत्यंतिक, पारमार्थिक सत्य से हो सकता है तुम्हारा परिचय न हो, पर सच की जितनी दूर तक तुम्हें छवि दिखाई देती हो — छवि ही सही, सीमित ही सही — कम-से-कम उतनी दूर तक तो जाओ।

कोहरे में चल रहे हो, बहुत दूर तक नहीं दिखाई देता, दो कदम तो दिखाई देता है मार्ग? या यह कहोगे कि कोहरा है, तो दो कदम भी नहीं चलेंगे। ऐसा करते हो कभी? धीमे चलो, थम-थम के चलो। कम-कम चलो, पर चलो तो सही। इतना भी मत डरो, इतना भी मत अटको। नारायण को मौका तो दो, तुम्हारी सेवा करने का।

नारायण से बड़ा ख़िदमतगार तुम्हें दूसरा नहीं मिलेगा। वो बड़ा स्वामी भक्त सेवक है। तुम तो उसकी भक्ति नहीं कर पाए, उसे ही मौका दे दो कि तुम्हारे ख़ातिर कर दे। वो ख़ूब ख़ातिर करता है। तुम उसमें विश्वास व्यक्त करो। देखो, कैसी सेवा करेगा तुम्हारी। तुम्हें वो सब दे देगा, जिसकी तुम्हें चाह भी नहीं थी।

बिना माँगे बहुत कुछ मिलेगा। जैसे ऐसा सेवक मिल गया हो जो अपनेआप सुबह उठाने आ जाता हो, जो अपनेआप राह बताने आ जाता हो, जो अपनेआप तुम्हारे लिए वाहन भी तैयार कर दे। वाहन में ईंधन भी डाल दे और रुपिया-पैसा भी न माँगे। अब यह पता नहीं कौन किसका सेवक है। पता नहीं, फिर वो सेवक है कि स्वामी। पर तुम सेवक ही मान लो उसे।

इसी नाते उसे अपना लो कि ख़ूब सेवा करेगा तुम्हारी। किसी भी नाते अपनाओ, अपनाओ तो सही। नारायण को अपना लो, कण-कण में नारायण दिखाई देगा। दुनिया डरावनी लगनी बंद हो जाएगी। गुत्थियाँ सुलझने लगेंगी। मुश्किलें आसान होने लगेंगी। अधिकांश मुश्किलें दिखाई देनी ही बंद हो जाएँगी। उन्हें आसान करने की भी ज़रूरत पड़ेगी नहीं। दिखाई ही नहीं दे रही हैं अब।

जब दुनिया मुश्किलों से भरी न दिखाई दे, तब समझना कि तुम्हें दुनिया में अब परमात्मा दिखाई देता है। जब दुनिया दुश्मन-सी न दिखाई दे, तब जान लेना कि दुनिया में अब परमात्मा दिखाई देता है।

'तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है, अँधेरों में भी मिल रही रोशनी है।'

यह है दुनिया में भगवान को देखना। दुनिया में वो तब दिखाई देगा, जब पहले तुम्हारे दिल में होगा। लोग यह तो चाहते हैं कि कण-कण में नारायण दिखने लगे, और जो इधर (अपने अंदर) कण है, उसमें होगा कि नहीं होगा पहले? बाकी हर जगह रहे, हमारे भीतर न रहे। दूर-दूर रहे तो अच्छा है न? दूर हैं, देख रहे हैं। 'हाँ! यह रहा, घूम रहा है परमात्मा।'

वहाँ तब दिखेगा जब….? यह बात पाँचवी बार बोल रहा हूँ, पर ज़रूरी है।

वहाँ तब दिखेगा जब यहाँ (दिल में) होगा और यहाँ जब होगा, तब जो कुछ भी दिखेगा उसी का नाम परमात्मा है।

ठीक?

उसका कोई रूप, रंग, आकार होता है क्या कि घूमेगा? हर रूप उसका है, हर रंग उसका, हर आकार उसका। तुम शांत हो, तो हर रंग में शांति है, यही परमात्मा है। तुम शांत हो, तो हर आकार में निराकार है, यही परमात्मा है।

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