जाति मानसिक कल्पनाओं और अंधविश्वासों में होती है। आप जैसे ही समझने लग जाते हो कि जाति सिर्फ़ मन का खेल है, फिर जाति पीछे छूटती है। जाति को दो ही चीज़ें तोड़ सकती हैं — पशुता या चेतना। जो ऊँचा उठ गया, वो भी जाति का ख़्याल नहीं करता और जो एकदम गिर गया, वो भी जाति का ख़्याल नहीं करता। अध्यात्म कहता है, सबको इतना उठा दो कि सब एक बराबर हो जाएँ। अध्यात्म ही जाति-प्रथा को मिटा सकता है, और कुछ नहीं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न जातिप्रथा से संबंधित है। हमने प्राचीन काल से देखा है कि जातिगत भेदभाव बहुत सारे लोगों को झेलना पड़ा है। जैसे महाभारत में भी विवरण मिलता है कि कर्ण को बचपन से ही उसकी जाति के आधार पर बहुत भेदभाव झेलना पड़ा।
और आज भी जब विज्ञान इतना प्रगति कर चुका है और समानता की बातें होती हैं, तब भी बहुत सारे क्षेत्र, खासकर भारत में ऐसे हैं जहाँ पर जातिगत भेदभाव बहुत सारे लोगों को झेलना पड़ता है। और यहाँ तक की हत्याएँ तक हो जाती हैं। लोग ख़ुद अपनी जान दे देते हैं या फिर उनकी जान ले ली जाती है। तो इसका क्या कारण है कि इतना भीतर तक हमारे समाज में जातिप्रथा बैठी हुई है? इसको कैसे ख़त्म किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखो! कुछ ऊँचा होना चाहिए, जिसके सामने जाति आदि न आए। संस्था में इतने लोग हैं, तुम्हें कितनों की जाति पता है? मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि 'कितनों की जाति तुम्हारे लिए महत्त्व रखती है?' मैं पूछ रहा हूँ, तुम्हें पता भी कितनों की जाति है?
प्रश्नकर्ता: नहीं पता, किसी की भी नहीं।




