जो ये बात समझ गया वो ज़िन्दगी से ठोकर नहीं खाएगा || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपसे जो एक चीज़ सीखी — संवेदनशीलता, कि आप लगातार ज़िन्दा हो, हर सेकंड में संवेदनशील हो। पर मेरे साथ ऐसा होता है कि एक-दो सेकंड के लिए ही संवेदनशीलता आती है, उसके बाद चली जाती है।
अभी आपको भी सुन रहा था तो बीच-बीच में सब भूल जा रहा था, और कभी लग रहा था कि पता नहीं क्या बोल रहे हैं आप। फिर झटका लगा कि अरे! इतने बेवकूफ़ हैं क्या हम सही में?
आचार्य प्रशांत: ये बात हम सब पर लागू होती है, हमारे पास एक बड़ी गड़बड़ ताक़त होती है। वो ताक़त होती है — जो जैसा चल रहा है उसको सामान्य मान लेने की। जो कुछ भी चल रहा है, उसको सामान्य मान लेने की। हम — आप अपने दिमाग पर ग़ौर करिएगा — सबके साथ होता है; हम नॉर्मल (सामान्य) को राइट (सही) मान लेते हैं। ठीक है? हम जो सामान्य है उसको सच मान लेते हैं।
आज ही मैं देख रहा था, किसी ने एक बात लिखकर के भेजी, कोई वीडियो था जो कि आज की हालत को बदलने का आह्वान कर रहा था। तो उस पर किसी ने लिखकर के भेजा कि एक्सेप्ट द न्यू नॉर्मल, एक्सेप्ट द न्यू नॉर्मल। (नये सामान्य को स्वीकार करें।) कि अब जो चल रहा है, बस उसको स्वीकार कर लो।
और वो बात उस व्यक्ति के कहने की नहीं है, वो बात तो स्वतः हो ही जाती है, सबके साथ हो जाती है। कि हम जीवन में जिस भी हालत में होते हैं, हम उसी को ठीक मानना शुरू कर देते हैं। इसको आप कंडिशनिंग (संस्कारित) भी बोल सकते हो, इसको आप एक्लीमेटाइज़ेशन (अनुकूलन) भी बोल सकते हो। शरीर के पास ये ताक़त कुछ सीमा तक होती है।



