जो उत्कृष्ट नहीं वो कृष्ण से बहुत दूर || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2020)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कह रहे हैं कि मैं हर विषय, हर क्षेत्र में श्रेष्ठतम हूँ। उन्होंने यह भी बताया है कि अनेक हैं जो मुझ जैसा होने का प्रयास करते हैं, पर हो नहीं पाते।
आचार्य जी, मैं जीवन के हर पहलू में अव्वल होना चाहता हूँ। क्या ये सम्भव है? क्या नीयत भर से काम चल जाएगा या कुछ पूर्व निर्धारित जन्म के साथ मिले गुणों की भी ज़रूरत पड़ती है? समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण क्यों कह रहे हैं कि वो हर विषय, हर क्षेत्र में श्रेष्ठतम हैं, समझिएगा थोड़ा सा। दसवें अध्याय की बात कर रहे हैं प्रश्नकर्ता। पहले तो श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने निर्गुण, निराकार मर्म के बारे में कहते हैं। कहते हैं, ‘देवता हों, ऋषि-मुनि हों, किन्हीं का भी ज्ञान वास्तव में मुझ तक पहुँच नहीं सकता, मेरा वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि मैं ही तो हूँ जिनसे उनका ज्ञान उदित होता है। मैं उनके ज्ञान का विषय नहीं हूँ, मैं उनके ज्ञान का आधार हूँ। मैं उनके ज्ञान के आगे नहीं हूँ, मैं उनके ज्ञान के पीछे हूँ। इसलिए बड़े-बड़ों का ज्ञान भी वास्तव में मुझ तक नहीं पहुँच सकता।’
तो अर्जुन को ऐसा बताया। पर अर्जुन तो अर्जुन! अर्जुन ने कहा, ‘ये बात तो ठीक है। लेकिन फिर ये बताइए कि अगर आपका चिन्तन ही करना है किसी को, तो वो कैसे करे? अभी तो आपने ये बता दिया कि आप अचिन्त्य हैं, कोई आपकी बात नहीं कर सकता, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी असफल हैं, कोई आपकी कल्पना नहीं कर सकता, कोई वर्णन नहीं कर सकता, कोई सोच नहीं सकता, पर मुझ जैसों की भी थोड़ी परवाह करिए। हम तो विचार के लोग हैं, हम तो सीधे-साधे लोग हैं जो सोच में जीते हैं, विचार में जीते हैं, चिन्तन करते हैं। तो चिन्तन करना है आपका, कैसे करें?’
तो बड़ी अद्भुत फिर बात कहते हैं। कहते हैं, ‘विभूतियाँ समझो मेरी!’ श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘विभूतियाँ समझो।’ विभूतियों को समझाते हैं। कहते हैं, ‘देखो, हाथियों में ऐरावत हूँ मैं, देवताओं में इन्द्र हूँ मैं, शस्त्रधारियों में राम हूँ मैं, साँपों में वासुकी हूँ, नागों में शेषनाग हूँ मैं, रुद्रों में शिव हूँ मैं, नदियों में गंगा हूँ, पर्वतों में हिमालय हूँ, इत्यादि।’









