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जो उत्कृष्ट नहीं वो कृष्ण से बहुत दूर || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
23 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कह रहे हैं कि मैं हर विषय, हर क्षेत्र में श्रेष्ठतम हूँ। उन्होंने यह भी बताया है कि अनेक हैं जो मुझ जैसा होने का प्रयास करते हैं, पर हो नहीं पाते।

आचार्य जी, मैं जीवन के हर पहलू में अव्वल होना चाहता हूँ। क्या ये सम्भव है? क्या नीयत भर से काम चल जाएगा या कुछ पूर्व निर्धारित जन्म के साथ मिले गुणों की भी ज़रूरत पड़ती है? समझाएँ।

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण क्यों कह रहे हैं कि वो हर विषय, हर क्षेत्र में श्रेष्ठतम हैं, समझिएगा थोड़ा सा। दसवें अध्याय की बात कर रहे हैं प्रश्नकर्ता। पहले तो श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने निर्गुण, निराकार मर्म के बारे में कहते हैं। कहते हैं, ‘देवता हों, ऋषि-मुनि हों, किन्हीं का भी ज्ञान वास्तव में मुझ तक पहुँच नहीं सकता, मेरा वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि मैं ही तो हूँ जिनसे उनका ज्ञान उदित होता है। मैं उनके ज्ञान का विषय नहीं हूँ, मैं उनके ज्ञान का आधार हूँ। मैं उनके ज्ञान के आगे नहीं हूँ, मैं उनके ज्ञान के पीछे हूँ। इसलिए बड़े-बड़ों का ज्ञान भी वास्तव में मुझ तक नहीं पहुँच सकता।’

तो अर्जुन को ऐसा बताया। पर अर्जुन तो अर्जुन! अर्जुन ने कहा, ‘ये बात तो ठीक है। लेकिन फिर ये बताइए कि अगर आपका चिन्तन ही करना है किसी को, तो वो कैसे करे? अभी तो आपने ये बता दिया कि आप अचिन्त्य हैं, कोई आपकी बात नहीं कर सकता, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी असफल हैं, कोई आपकी कल्पना नहीं कर सकता, कोई वर्णन नहीं कर सकता, कोई सोच नहीं सकता, पर मुझ जैसों की भी थोड़ी परवाह करिए। हम तो विचार के लोग हैं, हम तो सीधे-साधे लोग हैं जो सोच में जीते हैं, विचार में जीते हैं, चिन्तन करते हैं। तो चिन्तन करना है आपका, कैसे करें?’

तो बड़ी अद्भुत फिर बात कहते हैं। कहते हैं, ‘विभूतियाँ समझो मेरी!’ श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘विभूतियाँ समझो।’ विभूतियों को समझाते हैं। कहते हैं, ‘देखो, हाथियों में ऐरावत हूँ मैं, देवताओं में इन्द्र हूँ मैं, शस्त्रधारियों में राम हूँ मैं, साँपों में वासुकी हूँ, नागों में शेषनाग हूँ मैं, रुद्रों में शिव हूँ मैं, नदियों में गंगा हूँ, पर्वतों में हिमालय हूँ, इत्यादि।’

क्या कह रहे हैं? वो कह रहे हैं, ‘या तो तुम सीधे मुझ तक पहुँच जाओ। इतनी अगर तुममें अपने मन को शान्त कर देने की, अचल कर देने की क़ाबिलियत हो तो। मन अचल हो गया अगर तो उस अचलता का नाम ही कृष्णत्व है। या तो तुम ये कर लो, और अगर नहीं कर सकते, अगर दुनिया से ही बहुत लिप्त हो तुम, दुनिया में ही तुम्हारा मन डोलता रहता है, तो दुनिया में मुझे देखने का या दुनिया के माध्यम से मुझे याद कर लेने का तरीक़ा बता रहा हूँ।’ उस तरीक़े के पीछे जो सिद्धान्त है, वो समझिएगा।

प्रकृति में किसी तरह की विशिष्टता नहीं होती, विविधता होती है; विशिष्टता नहीं होती। प्रकृति में किसी भी तरह की उत्कृष्टता नहीं होती। कौवे-कौवे सब एक होते हैं। आपको कोई अनुपम, अद्वितीय कौवा नहीं मिलेगा। चूहे-चूहे सब एक होते हैं। आपको कोई ऐसा चूहा नहीं मिलेगा जो आसमान में उड़ने लग जाए या जो चीते से टक्कर ले ले या जो कहे कि मुझे तो गीता का पाठ करना है। चूहा अपने जाति-धर्म का पालन करता रहता है।

कोई आपको चूहा नहीं मिलेगा जो किसी कुत्ते के प्रति आकर्षित हो जाए, कोई चूहा नहीं मिलेगा जो किसी बिल्ली को प्रेम प्रस्ताव भेजे। वो तो अपने जाति-धर्म का अर्थात् अपने जीव-धर्म का, अपने जो उसके शारीरिक संस्कार हैं, उनका वो पालन करता रहता है। तो प्रकृति में किसी तरह की विशिष्टता नहीं पायी जाती। आप नहीं कह सकते कि विशिष्ट चूहा है इसको देखो, ये रोज़ सुबह मन्त्रोच्चार करता है। ऐसा नहीं मिलेगा। वैसे ही आपको कोई विशिष्ट शेर नहीं मिलेगा। तो इसका मतलब है — प्रकृति का अर्थ ही होता है एक तरह की अविशिष्टता, साधारणता, सामान्यता, औसतता, *मीडियोक्रिटी*।

प्रकृति में सब एक जैसे हैं, कोई ख़ास नहीं है। जब कोई ख़ास नहीं है, सब एक ही जैसे हैं तो सब क्या हुए? औसत दर्ज़े के। उसी को मैं मीडियोक्रिटी कहता हूँ। आप कहीं जाते हो और आपको तमाम तरह के पक्षी कहीं दिखायी दे रहे हैं, तो आप ये थोड़े ही बोलते हो वो फ़लाना कबूतर, राजू कबूतर, कमल कबूतर; ये थोड़े ही बोलते हो। कबूतर कबूतर, कबूतर माने कबूतर। क्योंकि एक कबूतर दूसरे कबूतर से भिन्न है ही नहीं। भिन्नता है भी तो थोड़ी-बहुत है। रंग थोड़ा अलग होगा, वज़न थोड़ा अलग होगा, कोई थोड़ा ज़्यादा भाग लेता होगा, कोई ज़्यादा ऊँचा उड़ लेता होगा, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। सब कबूतर हैं तो कबूतर ही।

अब ऐसी हालत में जहाँ संसार में किसी क़िस्म की प्राकृतिक उत्कृष्टता सम्भव ही नहीं है, तब भी जादू हो जाता है, उत्कृष्टता दिखायी पड़ जाती है। और हर उत्कृष्टता एक इशारा है, एक संकेत है। आसमान की ओर संकेत है और प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह है। जब सबको एक जैसा होना चाहिए था तो कोई ख़ास हो कैसे गया? जो ख़ास हो गया उसको तुम मानो कि वही अगर भगवान नहीं तो भगवत्ता का प्रतिनिधि ज़रूर है। समझ रहे हो बात को?

सबको एक जैसा होना चाहिए था न दुनिया में? सबको एक जैसा होना चाहिए था, क्योंकि प्रकृति अलग-अलग तो बनाती नहीं। चूहा-चूहा एक जैसा, कौवा-कौवा एक जैसा, शेर-शेर एक जैसा। सबको एक जैसा होना चाहिए था, कोई अलग कैसे हो गया?

ये जो अलग हो जाना है, ये जो ख़ास हो जाना है, विशिष्ट हो जाना है, ये बड़ी अद्भुत बात है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, 'तुम इसी बात का इस्तेमाल कर लो — जो अलग दिखे, तुम उसी को ईश्वरीय सत्ता का प्रतिनिधि मान लो।’ तुम कहो कि अलग तो कोई हो ही नहीं सकता। जब सब एक जैसे हैं, तो ये अलग हुआ कैसे? ज़रूर कोई जादू घटा है, ज़रूर कोई जादू घटा है। तो वो कह रहे हैं, ‘जो सबसे अलग हो, तुम उसी को कृष्ण मान लो। जो सबसे अलग हो, उसी को कृष्ण मान लो।’ और तरीक़ा क्या है? तो पर्वतों में जो सबसे ऊँचा पर्वत है, वो पूजनीय हो गया। शस्त्रधारियों में जो सबसे बलवान और विजेता शस्त्रधारी हैं, वो अलग हो गये। बाक़ी सब एक तरफ़, जो सबसे अलग है, वो बिलकुल दूसरे तल का मानो अब। क्योंकि उसको भी बाक़ियों के जैसा ही होना चाहिए था न! वो बाक़ियों के जैसा नहीं है, इसका मतलब उसमें कुछ तो है जो प्रकृति से बिलकुल अलग है। इसीलिए फिर भारत में जो उत्कृष्टताएँ हैं, उनकी पूजा की गयी।

अब देखो, पशु होते हैं सारे। बात समझना। पशु होते हैं सारे, सब पशु किसी-न-किसी तल पर आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं। गाय ऐसा पशु है जो न्यूनतम आक्रामक व्यवहार दिखाती है। सब पशुओं में देखा जाए तो एक बेचैनी रहती है। गाय में वो बेचैनी बहुत कम पायी जाती है। गाय बड़ी आसानी से विश्वास भी कर लेती है। तो ये पाया गया कि पशु-पशु सब पशु हैं, गाय में कुछ ऐसा है जो पशुओं से भिन्न है थोड़ा। ये नहीं कहा जा रहा कि गाय पशु नहीं है, पर गाय में एक उत्कृष्टता पायी गयी। जब गाय में एक उत्कृष्टता पायी गयी, तो गाय को एक प्रतीक की तरह दैवीय सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार कर लिया गया। उसे ‘गौमाता’ कह दिया गया।

ऐसा नहीं है कि जो 'गौमाता' कह रहे थे, वो नहीं जानते थे कि गाय है तो पशु ही। है तो पशु ही, पर ज़रा ख़ास पशु है। पशुओं से अलग पशु है। ऐसा पशु तुम नहीं पाओगे जिसका वज़न तुमसे तीन गुना, चार गुना, दस गुना हो, लेकिन उसके बाद भी वो तुम्हें सींग न मारे। ये छोटे-छोटे बच्चे जा रहे हैं और गैया के सींगो से लटक के खेल रहे हैं। और बच्चे की अपेक्षा उस गाय का वज़न है दस गुना, और बच्चा लटका हुआ है गाय से, कुछ कह नहीं रही, वो आराम से बैठी है। वो उत्तेजित भी नहीं हो रही, ऐसा पशु मिलता नहीं है। कृष्ण कह रहे हैं कि जहाँ कहीं ऐसा तुम्हें कोई भी उदाहरण मिले, तुम उस उदाहरण को ही पूजनीय बना लेना। तुम उस उदाहरण को ही मेरा प्रतीक मान लेना।

बात समझ में आ रही है?

एक्सीलेंस जहाँ भी दिखायी दे, डिसटिंक्शन जहाँ दिखायी दे, उत्कृष्टता और विशिष्टता जहाँ भी दिखायी दे, समझ लो ये कृष्ण का काम है, वरना ये हो ही नहीं सकती थी। प्रकृति ने तो पूरा इन्तज़ाम कर दिया था कि इस पृथ्वी पर न कुछ उत्कृष्ट हो और न कुछ विशिष्ट हो।

देखिए, पीपल का पेड़ घास के तिनके की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है। घास में और पीपल में अन्तर होता है। पर पीपल और पीपल में अन्तर होता है क्या? नहीं होता न। प्रकृति ने पूरा इन्तज़ाम कर रखा है कि सब एक जैसे हों। और बहुत लोगों की जो विचारधारा है कि सब एक बराबर है, सब एक बराबर है, वो वास्तव में प्रकृति की बात कर रहे हैं और प्रकृति ने ऐसा करा भी है कि शरीर के तल पर सब एक बराबर होंगे।

लेकिन प्रकृति के इस प्रबन्ध के विरुद्ध अपवाद मौजूद होते हैं, एक्सेप्शंस मौजूद होते हैं। कृष्ण यहाँ पर उन्हीं अपवादों की बात कर रहे हैं। कृष्ण कह रहे हैं, ‘जहाँ कहीं भी वो अपवाद, एक्सेप्शंस दिखायी दें, बोलना कि कृष्ण मिल गये।’ गंगा भी नदी ही है, पर थोड़ी ख़ास नदी है, एक्सेप्शनल नदी है। तो फिर उनको मान लिया गया कि ये दैवीय नदी है। है कुछ नहीं, बहता पानी। पर भारत ने एक ख़ास बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए फिर उनको कहा, ‘गंगा मैया’। बात समझ में आ रही है?

हर शिखर प्रकृति के विरुद्ध एक अपवाद होता है, प्रकृति के ख़िलाफ़ एक चुनौती होता है। शिखर आ कहाँ से गया? प्रकृति को तो शिखर पसन्द ही नहीं है, वो तो ये चाहती है सब एक जैसे रहें और देखो न, प्रकृति के इन्तज़ाम में सब एक जैसे हैं कि नहीं? जो तुम्हारे साथ होता है (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए), वही उसके साथ होता है शारीरिक तल पर (दूसरे श्रोता की ओर इशारा करते हुए)। मानसिक तल पर भी जो तुम्हारी वृत्तियाँ होती हैं, वो उसकी वृत्तियाँ होती हैं, लेकिन बीच-बीच में अजूबा हो जाता है। कुछ ऐसा हो जाता है जो होना नहीं चाहिए था। जैसे प्रकृति के खेल में बाधा पड़ गयी हो, जैसे कुछ अलग, कुछ अजीब हो गया हो।

कृष्ण कह रहे हैं, ‘जहाँ कहीं भी तुम वैसे अपवाद देखो, उन अपवादों का इस्तेमाल कर लेना, मुझे याद कर लेना। हाथियों में ऐरावत को देखो, मुझे याद कर लो क्योंकि सब हाथी एक तरफ़, ऐरावत एक तरफ़।’

तुम्हारे मन में ये सवाल उठना चाहिए कि ऐरावत आ कहाँ से गया। फिर कहो कि प्रकृति से तो नहीं आ सकता। इसका अर्थ है कि प्रकृति से आगे की भी कोई सत्ता है, उसी का नाम ‘कृष्ण’ है। प्रकृति से सामान्य साधारण हाथी ही तो आ सकते थे न, ये ऐरावत कहाँ से आ गया? ये ऐरावत प्रकृति से तो नहीं आया है, प्रकृति से थोड़ा आगे का है। तो ऐरावत को देखना तो याद करना कि प्रकृति से बड़ा भी कोई है, प्रकृति का बाप भी कोई है। और वहीं तुम्हें पहुँचना है, उसी की तलाश में हो तुम, वही तुम्हें चाहिए।

कृष्ण कह रहे हैं कि वास्तव में कृष्णत्व कुछ और नहीं है, उत्कृष्टता की ही पूजा का नाम कृष्णत्व है। कृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं, ‘ वरशिप ऐक्सिलेंस , उत्कृष्टता की पूजा करो, ऊँचाइयों की पूजा करो।’ हर ऊँचाई कृष्णत्व का प्रतीक है। बात आ रही है समझ में?

और न जाने कितने उदाहरण देकर के उन्होंने समझाया इस बात को! जितने भी प्राकृतिक उदाहरण अर्जुन की दृष्टि में सामने थे, उन सबको लिया है कृष्ण ने और कहा, ‘देखो, इनको अगर देखोगे तो फिर इनमें मैं ये हूँ, पशुओं को अगर देखोगे तो मैं सिंह हूँ। बाक़ी जानवरों को देखना और फिर शेर को देखना, तब कहना — कुछ बात तो है! और बात तो कुछ होगी।

देखो, ये सिंह होता है, क्या ये जंगल का सबसे भारी पशु है? है क्या? इससे न जाने कितने भारी हैं बल्कि सिंह से ज़्यादा भारी तो बाघ ही होता है। क्या सिंह सबसे द्रुतगामी पशु होता है, सबसे तेज दौड़ता है? नहीं, सिंह से ज़्यादा तेज़ तो चीता दौड़ता है। क्या सिंह उड़ सकता है? क्या तैर सकता है? पेड़ पर चढ़ सकता है? पेड़ पर भी नहीं चढ़ता वो। बाघ चढ़ता है, तेंदुआ चढ़ता है, शेर को चढ़ता नहीं पाओगे। फिर भी सिंह जंगल का राजा क्यों कहलाता है? कुछ बात है! उसी बात का नाम कृष्णत्व है।

उसकी आँखों में कुछ है, उसके नज़रिये में कुछ है। न वो सबसे तेज़ दौड़ पाता है, न वो सबसे शक्तिशाली है लेकिन जीतता वही है, राजा वही है। कुछ बात है! जब भी कुछ ऐसा दिखायी दे जो होना नहीं चाहिए, फिर भी हो रहा है और बड़ा ख़ास है, कहना — ये आदमी का काम नहीं है, ये प्रकृति का काम नहीं है, ये कृष्ण का काम है।

कृष्ण कह रहे हैं कि ऐसे मौक़ों का फ़ायदा उठा लो। जहाँ भी कुछ ख़ास दिखायी दे, तुरन्त हाथ जोड़ लो, सिर झुका दो। कह दो कि लो, प्रमाण मिल गया आपके होने का। ये जो अभी मेरे सामने है, यही प्रमाण है आपके होने का। आप न होते, तो ये विशिष्टता हो नहीं सकती थी। आप न होते तो दुनिया में एक्सीलेंस कहाँ से आती? कहाँ से आती?

इसका मतलब है कि वो लोग जिनके जीवन में किसी भी तरह की उत्कृष्टता नहीं है, ऊँचाई नहीं है, वही वो लोग हैं जिनके जीवन में कृष्ण कहीं नहीं है। बस प्रकृति है, शरीर है, देह है, मलमूत्र है — यही सब है। अपनेआप से सवाल पूछिए — कोई भी क्षेत्र है जीवन का जिसमें आप उत्कृष्ट हैं, विशिष्ट हैं, एक्सीलेंट हैं? अगर नहीं हैं तो कृष्ण से तो बहुत ही दूर हैं आप। हाथी, गधा, कुत्ता, घोड़ा इन्हीं की श्रेणी में आते हैं। कहाँ हैं एक्सीलेंस, कहाँ है?

किस चीज़ में आप पर्वतराज हिमालय की भाँति हैं, बताइए? कूड़े के ढेर में भी कुछ ऊँचाई होती है, उतनी ऊँचाई है बस आपके जीवन में। आप कहते हैं, ‘मुझे ये भी आता है, मुझे वो भी आता है, मैं इसमें पारंगत हूँ, मैं उसमें निपुण हूँ।’ वो ऊँचाइयाँ उतनी ही है जितनी कूड़े के ढेरों की होती है।

हिमालय जितनी ऊँचाई जीवन के किसी भी क्षेत्र में है क्या आपके पास? और अगर नहीं है तो कूड़े से बेहतर जीवन कैसे है आपका? और उस पर भी शर्मनाक बात ये है कि हम में से ज़्यादातर लोग उस कूड़े की रक्षा करना चाहते हैं। जब मौका मिलता है, उस कूड़े से ऊपर उठने का, ऊँचाइयाँ पाने का, तो हम चिहुँक जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, हमारा पेट ख़राब हो जाता है।

बात समझ में आ रही है?

किताबें पढ़ने से और बार-बार बोलने से कि मैं तो साहब, कृष्ण भक्त हूँ या आध्यात्मिक आदमी हूँ, आप दो कौड़ी के आध्यात्मिक नहीं हो गये। अध्यात्म अगर है आपके जीवन में तो विशिष्टता दिखायी देगी। विशिष्ट कहाँ हैं आप?

कबीर साहब विशिष्ट हुए, नानक साहब विशिष्ट हुए, तो उनका साहित्य आज तक पढ़ा जा रहा है। ज़बरदस्त साहित्यकार हो गये। अगर वो भक्त थे, तो उनकी भक्ति का प्रदर्शन उनके साहित्य की गुणवत्ता में होता है। होता है कि नहीं? उनका साहित्य आज तक पढ़ा जा रहा है। आप भी कहते हो आप बड़े भक्त हो, आपका साहित्य दो कौड़ी का है। आप लिखो कुछ, चार लोग नहीं उसको पढ़ने को राज़ी होंगे।

अगर वास्तव में आपमें कृष्णत्व होता, तो आप जगत पर छा गये होते। जगत में आपकी कोई हैसियत नहीं है, कोई काम आपको करना नहीं आता और आप बोलते हो, ‘मैं आध्यात्मिक आदमी हूँ।’ झूठे! ख़ुद को धोखा देते हो। एक काम नहीं है जो बलपूर्वक कर सको। एक काम नहीं है जिसमें तुम जंगल में शेर जैसे हो सको। एक काम नहीं है, जिसमें तुम हाथियों में ऐरावत जैसे और घोड़ों में उच्चश्रवा जैसे हो सको। लेकिन दावा यही है कि हम तो आध्यात्मिक हैं। बैठकर के आध्यात्मिक किताबें पढ़ रहे हैं, करना कुछ नहीं आता।

ऐसे लोगों को मैं बोलूँगा, बाक़ी सब किताबें छोड़कर के श्रीमद्भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय ‘विभूति योग’ बार-बार पढ़ो और थोड़ी शर्म करो। भूलना नहीं कि प्रकृति के ख़िलाफ़ जाना, प्रकृति से ऊपर उठना अपनेआप नहीं हो जाता, मेहनत लगती है।

तुम अगर किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा नहीं बना पाये हो, तुम किसी भी क्षेत्र में ऊँचाई हासिल नहीं कर पाये हो, तो उसकी वजह तुम्हारी क़िस्मत नहीं है, उसकी वजह तुम्हारी प्रमाद-प्रियता, आलस्य-प्रियता और झूठ-प्रियता है। बहाने मत बनाना कि मैं क्या करूँ, मेरा तो अतीत ऐसा है, वैसा है। बेकार की बात! जिसको चाहिए हो, उसको ऊँचाई मिल जाती है। तुम्हें नहीं मिली है, तुम्हें चाहिए नहीं थी।

आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता कह रहे हैं, ‘आचार्य जी, मैं जीवन में हर पहलू में अव्वल होना चाहता हूँ।’

तुम प्रश्न पूछने में तो अव्वल हो लो पहले! सवाल तक तो ऐसा पूछ रहे हो और किसी क्षेत्र में क्या अव्वल हो जाओगे? किसी एक क्षेत्र में अव्वल हो नहीं और अरमान हैं हर क्षेत्र में बुलन्दी हासिल करने के। कैसे भाई? किसी एक क्षेत्र में अव्वल हो जाओ, यही बहुत बड़ी बात है, किसी भी एक क्षेत्र में।

और जो लोग अव्वल हैं, सर्वप्रथम उनका सम्मान करना सीखो। कोई भी किसी भी क्षेत्र में यूँ ही अव्वल नहीं हो जाता। मैं तो हमेशा से बोलता आया हूँ कि जो आदमी जिस भी क्षेत्र में ऊँचा उठा हुआ है, उसमें कोई-न-कोई आध्यात्मिक गुण भी होगा ज़रूर। भले ही वो अपनेआप को नास्तिक बोलता हो, भले ही उसने कभी कोई आध्यात्मिक ग्रन्थ पढ़ा न हो, पर फिर भी उसने अप्रकट तरीक़े से आध्यात्मिक साधना की ज़रूर है, वरना उसको ऊँचाई मिल ही नहीं सकती थी।

तो जो लोग ऊँचे उठे हुए हों, उनसे सीखा पहले करो और उनकी निन्दा बाद में किया करो। कि कोई बोले कि फ़लाना टेनिस खिलाडी है, अब वो किसी काम का नहीं रहा। ‘क्यों, भाई? काम का क्यों नहीं रहा है?’ बोले, ‘उसकी जो अब वर्ल्ड रैंकिंग है, एटीपी रैंकिंग है, चौहत्तर की हो गयी है। टॉप टेन क्या, वो टॉप फ़िफ़्टी में भी अब नहीं है। दुनिया के शीर्ष पचास खिलाड़ी में भी अब नहीं है। चौहत्तरवीं वरीयता हो गयी उसकी। बेकार है! बेकार है!’

भाई, वो अभी भी दुनिया के चौहत्तरवें नम्बर का खिलाड़ी है। तुम मुझे एक क्षेत्र बता दो दुनिया कि किसी भी गतिविधि का, जिसमें तुम दुनिया के शीर्ष एक हज़ार लोगों में भी आते हो। और जो चौहत्तरवें नम्बर का खिलाड़ी है, उसको तुम ऐसे देख रहे हो जैसे शु! बर्खास्त! बेकार! बताना ज़रा कि क्या तुम दुनिया के किसी भी क्षेत्र में शीर्ष एक लाख लोगों में भी आते हो? और एक लाख बड़ी संख्या दिखते हुए भी अनुपातिक रूप से बहुत छोटा आँकड़ा है, क्योंकि दुनिया में लोग हैं आठ अरब। इन आठ अरब लोगों में तुम किसी भी क्षेत्र में शीर्ष एक लाख लोगों में आते हो क्या?

पर नहीं, साहब! ऊँचाई के प्रति सम्मान ही नहीं है। ऊँचाई के प्रति सम्मान नहीं है, इसीलिए जिसकी वरीयता चौहत्तरवीं है, उसको बोलते हो — ‘हुंह, बेकार!’ और ऊँचाई के प्रति सम्मान नहीं है, इसीलिए तुम कहीं पर भी हज़ारवीं वरीयता भी नहीं रखते।

अध्यात्म हो, ज्ञान शाखा हो, प्रेम शाखा हो — ये सब व्यक्तिगत जीवन में प्रकट होते हैं, क्या बनकर? उत्कृष्टता बनकर। किसी-न-किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता होगी उसमें ज़रूर। हो नहीं सकता कि आध्यात्मिक आदमी हो और हर क्षेत्र में फिसड्डी हो। हो नहीं सकता।

कबीर साहब का साहित्य संसार देखो। दोहों में उन्होंने जैसी शब्द-संरचना करी है, शब्द-विन्यास करा है, उसको देखो। वो आम आदमी के बूते की बात है? सन्त तो सन्त हैं, वो कवि कितनी ऊँची कोटि के हैं, ये देखो न! इतना ऊँचा साहित्य — और मैं सिर्फ़ साहित्य की बात कर रहा हूँ, भक्ति की नहीं — इतनी ऊँची कोटि का साहित्य कैसे रच लिया उन्होंने? क्योंकि वो भक्त थे। भक्ति थी, इसलिए साहित्य में उत्कृष्टता आई। मज़ाक थोड़े ही है। आ रही है बात समझ में?

तुलसीदास ने रामचरितमानस कब रची? जब उनके बोध-चक्षु खुल गये। उससे पहले उन्होंने रच ली थी क्या? उससे पहले कुछ नहीं था। पर आँखें खुली नहीं कि फिर मानस जैसा कालातीत ग्रन्थ उन्होंने तैयार कर दिया। वो ग्रन्थ आ ही नहीं सकता था बिना आध्यात्मिक दृष्टि की प्राप्ति के। आध्यात्मिक हुए तो देखो, कितना बढ़िया ग्रन्थ उन्होंने लिख ड़ाला! ऐसा ग्रन्थ, ऐसी ऊँचाई का ग्रन्थ आध्यात्मिक आदमी ही लिख सकता है।

और क्षेत्रों को भी देख लो। ये कोई संयोग ही नहीं है कि तुम दुनिया की साधारण आबादी में जो लोग वीगन हो रहे हैं, उनका अनुपात ले लो और दुनिया में जो लोग सेलिब्रिटीज कहे जाते हैं, उनमें जो लोग वीगन हो रहे है उनका अनुपात ले लो।

समझे बात को, क्या बोल रहा हूँ?

मान लो दुनिया में आठ अरब लोग हैं। ठीक है? आठ अरब में से बस तुम जो मान लो हज़ार-दो-हजार ऐसे लोग हैं जिन्हें सेलिब्रिटी कहा जा सकता है, उनको अलग करो और फिर देखो कि इनमें कितना अनुपात है, कितना प्रतिशत है, कितना प्रपोरशन है वीगन का। उनमें देखो, और जो दुनिया की शेष आबादी है, निन्यानवे दशमलव नौ-नौ-प्रतिशत, उनमें देखो कि कितना अनुपात है वीगन का। तुम पाओगे कि जो सेलिब्रिटीज हैं, उनमें विगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार) शेष जनता की अपेक्षा शायद दस गुना, बीस गुना ज़्यादा प्रचलित है।

ऊँचा आदमी ही ऊँचे काम करेगा, हर किसी के बस का नहीं होता। और मैं कह रहा हूँ, विगनिज़्म से ज़्यादा आध्यात्मिक काम आज दूसरा है नहीं। और मैं जिन दो हज़ार सेलिब्रिटीज की बात कर रहा हूँ, इसमें से चार-पाँच सौ या हज़ार तो ऐसे होंगे जो ऐसे क्षेत्रों में हैं जिसमें सीधे-सीधे शरीर की ज़रूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए, खेल या फ़िल्में। जो आदमी फ़िल्मों में है, उसको शरीर का बहुत ख़्याल रखना है। जो आदमी खेल में है वो तो शरीर से ही खेल रहा है, लेकिन वो फिर भी वीगन हो रहे हैं।

बात समझ में आ रही है?

चाहे जोकोविक हो, चाहे विराट कोहली हो, और वो अपने-अपने क्षेत्र के नम्बर एक हैं। वो अपने क्षेत्र के नम्बर एक हैं और वो वीगन हैं। इन दोनों बातों में बहुत ताल्लुक है। जो नम्बर एक है वही वीगन हो सकता है। फिसड्डियों के बस की नहीं है। ये उत्कृष्टता के काम हैं। ये सब उत्कृष्टता के काम एक साथ चलेंगे। उत्कृष्ट आदमी के साथ ही तो होंगे उत्कृष्टता के दो काम। नम्बर एक होना अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता का काम है, वीगन होना आज के समय में उत्कृष्टता का काम है। ये साथ-साथ चलेगा। और जितने फिसड्डी लोग हैं, ये चिकन लैग पीस!

धीरे-धीरे तुम देखना, समय ऐसा आएगा कि जो आदमी ज़रा सी भी समझ रखता है, ऊँचाई रखता है, गहराई रखता है, उसको तुम पाओगे कि वो या तो वीगन हो रहा है या कम-से-कम शाकाहारी हुआ जा रहा है। और दुनिया के ये जितने बोझ समान लोग होंगे — मन्दबुद्धि, क्रूर, पाशविक लोग, इन्हीं को पाओगे कि ये अभी भी मटन , मुर्गा चबाये जा रहे हैं। ये भेद तुम्हें साफ़-साफ़ दिखायी देगा।

समझ में आ रही है बात?

अब भई, क्रिकेट खेलता है कोई, वो आध्यात्मिक काम तो नहीं है न! ऐसा ही लगता है कि ये तो भई, क्रिकेट खेल रहा है। लेकिन देखो, उसने आध्यात्मिक काम कर दिया। इसका मतलब क्रिकेट में भी ऊँचाई उसको मिली अपने अध्यात्म के साथ ही थी। कोई टेनिस का चैम्पियन है, अब टेनिस खेलना अध्यात्म तो नहीं है, पर देखो, उसने अपने अध्यात्म का परिचय दे दिया। क्या बनकर? वीगन बनकर। इसका मतलब टेनिस में उसको ऊँचाई मिली अध्यात्म के साथ ही थी।

इस दुनिया में जितनी ऊँचाइयाँ हैं, उनका सम्बन्ध अध्यात्म से है। और अगर तुम्हारे पास ऊँचाई नहीं है जीवन के किसी भी क्षेत्र में, तो समझ लेना आध्यात्मिक तो हो नहीं तुम और चाहे जो होगे — फिसड्डी, लल्लू, लोलू। ऐसे लोगों के लिए न गीता है, न विम्बल्डन है।

और यही दशा दुनिया के ज़्यादातर लोगों की है। उनको टेनिस कोर्ट पर खड़ा कर दो, उन्हें टेनिस खेलना नहीं आता, उनके हाथ में गीता दे दो, उन्हें गीता नहीं समझ में आती। उन्हें समझ में क्या आता है? किसी तरह खाने को मिल जाए बढ़िया, पेट भरकर खा लें, छोटा-मोटा कमा लें, शादी कर लें, बच्चे पैदा कर लें, तोंद बढ़ाकर सोएँ — ये उनकी ज़िन्दगी होती है।

कहाँ इस ज़िन्दगी में एक्सीलेंस के लिए कोई स्थान है? किसी एक पहलू में अव्वल हो जाओ, हर क्षेत्र में अव्वल होना बेटा, बहुत दूर की बात है। हर क्षेत्र में अव्वल होना! तुम कौन हो जो हर क्षेत्र में अव्वल हो जाओगे? किसी एक क्षेत्र में ही अव्वल हो जाओ और अव्वल में भी मैं ये नहीं कह रहा हूँ नम्बर एक हो जाओ। मैं कह रहा हूँ तुम दुनिया के शीर्ष हज़ार लोगों में भी आ जाओ किसी क्षेत्र में, तो भी समझ लेना तुमने अपने अध्यात्म का परिचय दे दिया।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=HUmxheZPzQY&t=5s

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