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जिसे चाहते हैं हम चुपचाप || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
20 min
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आचार्य प्रशांत: दुनिया में जो कुछ भी है, छोटा-बड़ा, उससे तुम जो भी संबंध बना रहे हो वो वास्तव में सच की ख़ातिर ही बना रहे हो। ये जो पूरा खेल ही चल रहा है, ये खेल एक परम सत्ता के आधार पर और एक परम सत्ता की लालसा में है; ये उसी से आ रहा है खेल, और उसी की ओर जाने के लिए है।

चाहे तुम रात में छत पर बैठकर के चाँद को देख रहे हो, चाहे तुम बाग के किसी छोटे- से फूल के साथ खेल रहे हो, चाहे तुम जीवन में अपने माता-पिता से संबंध बना रहे हो, चाहे अपनी पत्नी से बना रहे हो, अपने पति से बना रहे हो, अपनी बेटी से, अपने बेटे से संबंध रख रहे हो; तुम दुनिया में जो कुछ भी कर रहे हो उसी से कर रहे हो, उसी की ख़ातिर कर रहे हो।

बात समझ में आ रही है?

अब बताओ उसको भूलोगे कैसे? भूलते तो तुम उसे कभी भी नहीं हो, पर फिर भी भूले रहते हो। उसे तुम अगर भूल गए होते तो तुम कुछ करते ही नहीं। तुम्हारा एक-एक कर्म उसी की ख़ातिर है, माने लगातार वो तुमको याद है। लेकिन फिर भी तुम बार-बार ये कहते हो कि “अरे! मैं तो नौकरी की ख़ातिर दफ़्तर जाता हूँ।" नहीं, नौकरी की ख़ातिर नहीं जाते। अगर गौर से देखोगे कि किस वजह से तुम पैसा चाहते हो, ज़िंदा रहना चाहते हो, तो तुम्हें समझ में आएगा नौकरी का असली मकसद।

तुम कहोगे, “नहीं, वो तो मैं बस थक गया था इसके लिए पहाड़ों की ओर आ गया।" नहीं, तुम सिर्फ़ थकान उतारने के लिए पहाड़ों की ओर नहीं आए हो, पहाड़ों की ओर आने का तुम्हारा एक छुपा हुआ और बहुत गहरा मकसद है, बस तुम उससे परिचित नहीं हो पा रहे हो।

देवी-देवताओं से तुम्हारा संबंध कभी डर का होता है, कभी आशा का होता है, कभी सम्मान का होता है; इस पूरे खेल में तुम माँग क्या रहे हो देवताओं से, देखो तो सही? शांति माँग रहे हो। पानी पीकर के क्या कर रहे हो तुम? अपने शरीर की आयु बढ़ा रहे हो। भोजन खाकर के क्या कर रहे हो तुम? अपने-आपको और कर्म करने के काबिल बना रहे हो। सब ग्रहों से, सूरज-चाँद-तारों से क्या रिश्ता रखते हो तुम? जब उनको देखते हो तो मन में क्या भाव उठता है? सूरज को देखकर कहते हो, “बहुत बड़ा है।“

जो बड़े से बड़ा है उसकी आस में हो तुम।

विज्ञान में प्रयोग करते हो, छोटे-छोटे अणुओं को देखते हो, और अणुओं के भी जो और छोटे कण हैं, सबअटॉमिक पार्टिकल्स (उप-परमाणविक कण) हैं, उनको देखते हो; वहाँ भी क्या खोज रहे हो? वहाँ भी तुम वही खोज रहे हो जो तुम बृहद् से बृहद्तर को देखने में खोज रहे हो।

आदमी दोनों दिशाओं में भाग रहा है, देखा है तुमने? वो न्यूक्लियस (नाभिक) के अंदर भी घुस रहा है, और कॉसमॉस (ब्रह्मांड) में भी घुसा जा रहा है। ये क्या कर रहे हैं हम? उसे चैन ही नहीं मिल रहा; उसे चैन मिल रहा होता तो पूरी फ़िज़िक्स (भौतिकी) न्यूटन के साथ खत्म हो गई होती। ये जो बीच की दुनिया है, जो आँखों से अनुभव में आती है, इसके तो सारे नियम समझ लो तुम्हें न्यूटन के काल में ही उपलब्ध हो गए थे। अब क्या चल रहा है फ़िज़िक्स में? अब ये चल रहा है कि जो दो सिरे हैं; एक उधर का, बहुत दूर का, बहुत विशाल का और जो दूसरा सिरा है वो बहुत सूक्ष्म का; उनकी खोजबीन करो क्योंकि वहाँ पर न्यूटन के नियम लागू ही नहीं होते। ये तुम क्या खोज रहे हो? तुम्हें चैन नहीं मिल रहा है?

तुम्हारे अनुभव की जो दुनिया है उसमें तो न्यूटन के नियमों से काम चल जाता है न? ये गिलास में पानी कितना भरा हुआ है? (अपने सामने रखे गिलास की ओर इशारा करते हुए) इसमें सरफेस टेंशन (पृष्ठ-तनाव) कितना होगा? ये यहाँ पर रखा हुआ है तो कितने डिग्री (अंश) तक‌ मैं इसको मोड़ सकता हूँ कि ये गिरे नहीं? ये सब तुमको जो क्लासिकल फ़िज़िक्स (पारंपरिक भौतिकी) है उससे तुम तय कर सकते हो। पर तुम्हारा मन भर ही नहीं रहा है इससे, तुम और इसके अंदर घुसकर के देखना चाहते हो कि मामला क्या चल रहा है।

क्यों ये सब तुम पता करना चाहते हो? ये तुमसे कह रही हैं ऋचाएँ: तुम जो परम सत्य है उसकी खोज में हो; चाहे तुम उसको तलाश रहे हो अपने प्रेमी के साथ अपने संबंधों में, और चाहे तुम उसको तलाश रहे हो स्पेक्ट्रोस्कोपी में। चाहे तुम उसको तलाश रहे हो कि “ सबअटॉमिक पार्टिकल्स से जो वेव्स (तरंग) निकलती हैं उनकी वेवलेंग्थ (तरंग-दैर्घ्य) में जो एकदम माइनर (गौण) परिवर्तन आते हैं उसको देख कर मैं समझना चाहता हूँ कि अंदर चल क्या रहा है,” और चाहे तुम उसको तलाश रहे हो अपनी प्रेमिका की आँखों में।

तलाश तो तुम्हें एक की ही है और तलाश हम सब रहे हैं क्योंकि हम सब लगातार कुछ-न-कुछ करे जा रहे हैं, व्यर्थ ही तो नहीं कर रहे न?

तुम एक कमरे का दरवाज़ा भी खोलते हो तो तुम्हारी आँखें कुछ तलाशती हैं, कुछ देख रही हैं। अगर तुम कुछ नहीं तलाश रहे होते तो तुम्हारी आँखें बंद होतीं न? आँखें खुली हैं, क्यों? क्योंकि उन्हें किसी नए की अभी प्रतीक्षा है, तलाश है। सोचो तो सही; आँखें आसानी से बंद क्यों नहीं करते? खुली ही रहती हैं; तभी तो सोना इतना अच्छा लगता है, सोने के वो क्षण होते हैं जब आँखों को जबरन बंद होना पड़ता है। जब तक तुम्हें नींद नहीं आ गई, कोशिश करो आँखें बंद करने की, देखते हैं कितनी देर तक कर पाओगे। वो इतनी मुश्किल चीज़ हो जाती है कि फिर कहा जाता है कि ये तो ध्यान की एक विधि है, कि तुम जगे तो हुए हो लेकिन आँखें बंद कर रखी हैं। आँखें ये बंद होना क्यों नहीं चाहतीं, बताओ न मुझे? क्यों नहीं बंद होना चाहतीं? कुछ ढूँढ रही हैं भई!

जिनकी शक्लें तुम इतनी बार देख चुके हो उनकी भी देखते हो। मेरी शक्ल काहे को देख रहे हो? बंद करो आँखें, मुझे देखा नहीं क्या? मुझमें तुमने अभी तक वो नहीं देखा जो मुझमें है और तुम देखना चाहते हो, इसीलिए तुम्हारी आँखें मुझे देखे ही जा रही हैं, देखे ही जा रही हैं, देखे ही जा रही हैं। कहीं न कहीं तुम्हें पता है कि मैं जो हूँ वो तुम आजतक देख पाए नहीं हो, इसीलिए आँखें हमेशा देखती रहेंगी, देखती रहेंगी; देखे जा रही हैं, देखे जा रही हैं। नहीं तो मैं तो बोल रहा हूँ, आँख बंद करके सुनते काहे नहीं, क्यों देख रहे हो?

बात समझ में आ रही है?

तुम्हारे सेंसरी फील्ड में, तुम्हारी इंद्रियों के क्षेत्र में कोई भी चीज़ यूँ ही नहीं आ रही है, जो भी चीज़ आ रही है वो एक नई आशा है और एक नई चुनौती है; उसमें ब्रह्म है। पर कैसे है, कहाँ है, कुछ पता ही नहीं चल रहा है, तो तुम उसको ऐसे देखते हो आँखें फाड़ के, और फिर विफल अपने-आपको घोषित न करना पड़े इसलिए कह देते हो, “जानता हूँ इसको, ये तो पत्थर है।" तुम्हें पता ही होता कि वो पत्थर है तो तुम्हें उसे बार-बार देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पत्थर भी जब तुम्हारे सामने आता है तो भी तुम उसे फिर से देखते हो, क्योंकि तुम्हें पता है कि तुम आज तक उसे देख पाए नहीं हो।

समझ में आ रही है बात?

हम कुछ भी आज तक नहीं देख पाए इसलिए आँखें बंद होने का नाम नहीं ले रही हैं।

बाबा फरीद याद हैं? क्या? “कागा रे कागा! खइयो न तू नैना मोरे, इनमें पिया मिलन की आस।" आँखें खुली हुई हैं, मर भी गए हैं तो आँखें ऐसे खुली हुई हैं; अभी पिया मिलन की आस है। और कभी आँखें ऐसे देख रही हैं, चाँद को देख रही हैं, कभी कुछ देख रही हैं, कभी कुछ। अरे जिधर को भी देख रही हैं उधर कुछ-न-कुछ है, तो कुछ-न-कुछ तो हमेशा ही देख रही हैं वो; क्यों देख रही हैं? उनमें पिया मिलन की आस है। और ये बात आँखों पर ही लागू नहीं होती, कानों पर लागू होती है, नाक पर भी लागू होती है, तुम्हारी पूरी खाल पर लागू होती है, तुम्हारी पूरी हस्ती पर लागू होती है।

तुम एक खोज हो, तुम एक प्यास हो, और तुम्हारे पूरे परिवेश में जो कुछ है तुम उसमें तलाश रहे हो।

तुम ऐसे भी कह सकते हो कि तुम्हारी तलाश इतनी तीव्र, इतनी सघन है कि तुमने इतना ज़बरदस्त अपने इर्द-गिर्द परिवेश रच लिया है, कि “यहाँ तो मिले, यहाँ तो मिलेगा, यहाँ तो मिलेगा, यहाँ नहीं मिल रहा तो वहाँ मिलेगा। चाँद में नहीं मिल रहा तो सूरज में मिलेगा, सूरज में नहीं मिल रहा तो अगली आकाशगंगा में मिलेगा; कहीं तो मिलेगा।“

समझ में आ रही है बात?

नहीं तो ऋषियों को क्या पड़ी थी कि वो कहें कि “तुम्हीं अग्नि हो, तुम्हीं जल हो।“ तुम्हीं अग्नि हो, तुम्हीं जल हो; माने ये कोई बात है? तुम्हीं अग्नि हो, तुम्हीं जल हो; सुनने में ही बात अजीब लगती है। इसीलिए अध्यात्म बहुत लोगों के गले नहीं उतरता क्योंकि जब कहा जाता है, “तुम्हीं अग्नि हो, तुम्हीं जल हो,” तो वो अग्नि और जल के बारे में सोचने लगते हैं। जबकि कहा भी जाए कुछ भी; चाहे अग्नि की बात हो, चाहे जल की बात हो, पत्थर की बात हो, कीड़े-मकोड़े की बात हो; अगर ग्रंथ आध्यात्मिक हैं तो तुम्हें किसके बारे में सोचना है? अपने बारे में सोचना है; मौलिक भूल यहीं हो जाती है।

यहाँ कह दिया “तुम्हीं बृहस्पति हो, तुम्हीं शुक्र हो, तुम्हीं सूर्य हो, तुम्हीं चंद्रमा," और हम किसके बारे में सोचने लग गए? बृहस्पति-शुक्र-सूर्य-चंद्रमा के बारे में। (गहन चिंतन का अभिनय करते हुए) “अच्छा! तो ब्रह्म जो हैं वो बृहस्पति भी है, सूर्य भी है, चंद्रमा भी है। पर उसमें से एक पर आयरन मिलता है, एक पर नहीं मिलता। एक पर थोड़ी-सी वाटर वेपर (जलवाष्प)है, एक पर नहीं है। एक तो पूरे तरीके से गैसियस (गैसीय) है एक का तापमान बहुत ज़्यादा है। एक का जो ऑर्बिट है वो एलिप्टिकल (वर्तुलाकार) भी नहीं है।“ अब तुम ये सब बातें, बेवकूफ़ियाँ, इन पर दिमाग लगा रहे हो, जबकि ये सोचना ही नहीं है।

बात ये है कि ऋषि भीतर के वैज्ञानिक थे, उन्हें सूर्य-चाँद-तारों का तो ज़्यादा कुछ पता भी नहीं था। कोई निश्चित-सी बात नहीं है कि उनको आज जितने ग्रह हैं सबका नाम पता हो। हो सकता है कुछ न ज़्यादा जानते हों, पर एक चीज़ थी जिसके बारे में वो सबकुछ जानते थे, किसके बारे में? तुम्हारे अंतःस्थल के बारे में, भीतर के बारे में।

समझ में बात आ रही है?

तो जब वो कह रहे हैं, “तुम्हीं आग हो, तुम्हीं पानी हो," तो आग और पानी को छोड़ो, किसको देखो? अपने आपको देखो। “मेरा आग से जो रिश्ता है और मेरा पानी से जो रिश्ता है इनमें कुछ साझा है, और इन दोनों ही रिश्तों पर ब्रह्म का साया है,“ ये समझाया जा रहा है तुमको। और ये दोनों विपरीत हैं; आग और पानी एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन इन दोनों से ही तुम्हारा जो रिश्ता है उन दोनों ही रिश्तों पर ब्रह्म का साया है; नहीं तो तुम न आग से रिश्ता बनाते, न पानी से रिश्ता बनाते।

तुम्हारा हर रिश्ता ब्रह्म की बुनियाद और ब्रह्म की आस पर है।

स्पष्ट हो रही है बात?

तो ये सब जो श्लोक रहे हैं इनका अनर्थ बहुत हुआ है। उनका वास्तविक अर्थ हम कर नहीं पाए हैं क्योंकि हमारी दृष्टि ही ऐसी होती है, कि सामने कोई बात कह दी गई तो दृष्टि उस बात पर चली जाती है, उस बात के माध्यम से स्वयं पर नहीं आती। जबकि इन श्लोकों का इस्तेमाल हमें करना है दर्पण की तरह; इनमें स्वयं को देखना है।

हम ऐसे लोग हैं जो जब पाते हैं; तुम्हारे घर में दर्पण आया, अमेज़न से आया, कहीं से, या तुम ख़रीद के ले आए कहीं दुकान-वुकान से और वो पैक करके उन्होंने दे दिया। क्या? दर्पण, शीशा, मिरर। ठीक है? और तुम उसको लाकर के उसको देख रहे हो। किसको देख रहे हो? पहली तो तुमने हरकत ये करी कि तुमने उसको अनरैप (अनावृत) नहीं किया। क्या नहीं किया तुमने उसे? अनरैप नहीं किया; तुमने उसे खोला नहीं, तुमने उसे अनावृत नहीं करा। यही काम हम श्लोक के साथ करते हैं, श्लोक को हम क्या नहीं करते? अनरैप नहीं करते, और फिर अगर हमने कभी अनावृत कर भी दिया; तो हमने दर्पण लिया और उसको इधर-उधर, पलट-पुलुट के देख रहे हैं। हम दर्पण को देख रहे हैं; हम दर्पण में स्वयं को नहीं देख रहे।

यही गलती हम श्लोकों के साथ करते हैं; हम श्लोक को देखना शुरू कर देते हैं, “इस श्लोक का क्या अर्थ है?” अरे! श्लोक का तो कोई अर्थ होता नहीं, श्लोक का कोई अर्थ नहीं होता; जिनसे श्लोक आ रहे हैं वो अर्थों के पार चले गए थे। ‘अर्थ' का तो मतलब होता है ‘मतलब’; उनके लिए कोई अर्थ नहीं बचा था अब। अर्थ माने होता है प्रयोजन, अर्थ माने होता है लाभ; जिनसे श्लोक आ रहे हैं उन्हें अब कोई लाभ चाहिए नहीं, तो वो अर्थ क्या रखेंगे श्लोक में?

श्लोक अर्थ नहीं रखते, श्लोक रखते हैं दार्पण्य। दार्पण्य समझ रहे हो? अ मिरर लाइक क्वालिटी (दर्पण के समान गुण); उसमें तुम्हें खुद को देखना है, श्लोक मत देखना शुरू कर दिया करो, श्लोक का इस्तेमाल करो स्वयं को देखने के लिए; यहीं पर चूक हो जाती है।

आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: जो आपने आचार्य जी, श्लोकों के बारे में कहा, कि इंसान ढूंढता रहता है, या तो वो पीछे को जा रहा है एटम्स , परमाणु में जा रहा है या फिर वो आगे, कॉसमॉस की ओर जा रहा है। तो जैसे पॉलीमैथ्स (बहुज्ञ) होते हैं, जो काफी विषयों में रूचि रखते हैं; तो सामान्यतः जो लोग पॉलीमैथ होते हैं, जैसे द विंची के बारे में हम लोग पढ़ते हैं या रविंद्रनाथ टैगोर के बारे में; तो इसका आध्यात्मिकता के साथ कोई संबंध है?

आचार्य: नहीं, ये तो प्रकृति के गुणों की बात है, ऐसा इसमें कुछ नहीं है।

तुम पचास जगह डूबकर मिटो चाहे एक जगह डूबकर मिटो, ‘मिटना' आख़िरी बात है।

कोई पचास जगह डूबकर मिट रहा है तो इस बात का उसको कोई अतिरिक्त श्रेय नहीं मिलेगा। तो कोई पॉलीमैथ है, वो पचास क्षेत्रों में प्रवीणता रखे हुए है; बात ये नहीं है कि आपकी पचास क्षेत्रों में प्रवीणता है कि नहीं है, बात ये है कि उनमें से क्या कोई एक या दो या तीन भी क्षेत्र थे जिनमें आप डूबकर मिट पाए? और कोई ऐसा भी हो सकता है जो बस किसी एक क्षेत्र का हो, लेकिन उसका कुछ ऐसा संबंध है उस क्षेत्र से कि उसमें वो अपने-आपको खो देता है।

तो ये बात, जो आप प्रतिभा वगैरह की बात करते हैं कई बार, उसमें कुछ खास नहीं रखा हुआ है; प्रतिभा तो प्राकृतिक होती है। अध्यात्म में बात प्रतिभा की नहीं होती है, नीयत की होती है, “नीयत है कि नहीं है?” जिनको हम प्रतिभा कहते हैं, उनमें से बहुत कुछ तो ऐसी हैं जो आपके मस्तिष्क पर और आपके जींस पर निर्भर करती हैं।

प्र: एक्चुअली (असल में) इसी से प्रश्न आया, क्योंकि इन तीनों श्लोकों में कहा गया है कि ‘वो’ हर जगह आप ढूँढते हैं; आप पीछे की ओर भी जा रहे हैं, आप हेलीकॉप्टर का निर्माण भी कर रहे हैं और आप अणु तक भी पहुँच गए। तो इसीलिए मुझे लगा कि इसमें आपस में कोई संबंध है।

आचार्य: कोई ज़रूरी नहीं है कि एक ही व्यक्ति हर जगह ढूँढ रहा हो। ये भी हो सकता है कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसकी चाँद-तारों में कोई रुचि ही न हो, या अणुओं में कोई रुचि ही न हो; वो कहाँ ढूँढ रहा है? वो अपनी दुकान में ढूँढ रहा है, व्यापार में ढूँढ रहा है। तो बात ये नहीं है कि हर व्यक्ति हर जगह ढूँढेगा, बात ये है कि जो जिस भी क्षेत्र का है उसी क्षेत्र में कुछ ढूँढ रहा है; ऐसा भी कोई हो सकता है जो सौ क्षेत्रों का हो, ऐसा भी कोई हो सकता है जो बस एक ही क्षेत्र का हो।

प्र: आचार्य जी, आपके वीडियो के कमेंट्स (टिप्पणियों) में भी मैंने यही चीज़ अक्सर देखी है, और स्वयं भी कभी-कभार ये प्रश्न तो आता ही है कि जैसे अभी हम पॉलीमैथ की बात कर रहे थे, तो आप में भी प्रतिभा तो काफी रही है विभिन्न क्षेत्रों में। तो मस्तिष्क की जो क्षमता रहती है, विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रतिभा दिखाता है या डूबकर कर पाता है, क्या उससे अध्यात्म में भी कुछ-न-कुछ प्रगति होती है? क्योंकि समझना तो अंततः दिमाग से ही शुरू होता है।

आचार्य: नहीं। अगर इंसान पैदा हुए हो तो उस न्यूनतम तड़प के साथ पैदा हुए हो जो तुमको सच की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त है। ठीक है?

तो इस बात को कभी मन में मत आने देना कि कोई पैदाइशी रूप से आध्यात्मिक होने के लिए ज़्यादा निपुण होता है या प्रवृत्त होता है; नहीं। बात इसमें पैदाइश की नहीं है, इंसान पैदा हुए हो न, इतना काफ़ी है। तो एक जो समझ लो कि न्यूनतम तुमको पात्रता चाहिए, जो क्वालीफाइंग थ्रेशोल्ड (योग्यता सीमा) चाहिए मेंटल कैपेबिलिटी (मानसिक क्षमता) की, उससे ऊपर हो तुम।

हर इंसान में बेचैनी है न? तो बस हो गया, हर इंसान अध्यात्म की पात्रता रखता है। पात्रता इसलिए रखता है क्योंकि बीमारी रखता है; जो बीमारी रखता है वो दवा की पात्रता तो रखता ही रखता है न? तो तुम बेचैन हो इतना काफ़ी है। अब ये ज़रूर हो सकता है कि तुम एक चीज़ को लेकर बेचैन हो, और कोई बहुत प्रतिभा-संपन्न व्यक्ति है वो सौ चीज़ों को लेकर बेचैन है। तुम्हारी बेचैनी कुल इतनी-सी ही है कि भई मैं सोशल मीडिया देख रहा हूँ, “अरे! क्या होगा कल?" कोई हो सकता है ऐसा ज़बरदस्त तरीके का बहुज्ञ, उसको पचास क्षेत्रों की चिंताएँ हैं; तो क्या फ़र्क पड़ गया उसको, चिंता तो चिंता है न?

जो कोई चिंतित है वो आध्यात्मिक होने के लिए सुपात्र है।

प्र: ये बात इसीलिए भी मेरे दिमाग में आई थी क्योंकि मैं ओशो को भी सुना करता था तो वो भी कहते थे कि “आध्यात्मिकता अमीरों की बात है, जो मानसिक रूप से या शारीरिक रूप से संपन्नता रखते हैं।“

आचार्य: अमीर खुश हो जाएँगे ये बात सुनकर के, इसलिए ऐसी बातें कही जाती हैं; अमीरों को आकर्षित करती हैं ऐसी बातें। फिर जब अमीर आते हैं तो अपने साथ अपनी अमीरी भी लेकर के आते हैं, तो ऐसी बातें इसलिए बोली जाती हैं।

ये बातें अमीरों की होतीं तो कबीर साहब और भक्ति काल के जितने भी संत हुए हैं: रैदास साहब, दादू दयाल, सहजोबाई— कौन इनमें से अमीर था? वास्तव में जो पूरा भक्ति आंदोलन ही था, उसमें अधिकांश संत निर्धन भी थे, तथाकथित पिछड़ी जातियों से भी थे; अमीरी का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। तो ये कहना कि अध्यात्म अमीरों की बात है, एकदम बेकार है। दो-चार उदाहरण तुमको मिल जाएँगे, तुम कह सकते हो, “राम और कृष्ण और बुद्ध, महावीर, ये सब राजकुमार थे।“ जीसस भी राजकुमार थे क्या?

आप देखिए जो चीज़ सिद्ध करना चाहेंगे आप सिर्फ़ उसी के पक्ष वाले उदाहरण बताकर के सिद्ध करने लगेंगे, लेकिन अगर आप वाकई सच जानना चाहते हैं तो पूरी बात देखनी होगी। फिर आप देखिए कि अध्यात्म में जो शीर्ष सितारे रहे हैं वो कौन रहे हैं, ऐसे पचास-सौ के नाम लिखिए और फिर उसमें से गिनिए कि कितने अमीर थे और कितने गरीब थे; ये हुई वैज्ञानिक दृष्टि न? कि मैं देखूँगा कि पचास या सौ शीर्ष संत कौन-से हुए हैं। और शीर्षता आप किसी भी आधार पर चुन लें, और फिर देखिए कि उनमें से कितने ऐसे थे जो बहुत अमीर थे; उनका अनुपात आप बहुत ज़्यादा नहीं पाएँगे।

ऐसा कुछ नहीं है। देखो संतई तो जोड़ी ही गई है त्याग के साथ और निर्धनता के साथ; संतो को तो नाम ही—गरीबदास। सूफ़ियों के यहाँ चले जाओ, उनकी पहचान ही क्या है? ऐसा कौन-सा सूफ़ी जिसकी चादर में, जिसके कंबल में छेद न हो और फ़िर ऊपर से उस पर पैबंद न लगा हो। ये जो नई चीज़ आई है अध्यात्म में अभी, कि गुरु लोग भी हेलीकॉप्टर पर चलेंगे, और महँगी घड़ियाँ और महँगी गाड़ियां और बाइकें और धन का इतना अश्लील प्रदर्शन करेंगे, ये बिल्कुल एकदम नई-नई बात है। इसको ये नहीं मान लेना चाहिए कि जहाँ पैसा है वहाँ अध्यात्म की ज़्यादा संभावना हो जाती है। इसका बस यही मतलब है कि अब इधर दो-चार गुरु आ गए हैं जिनको पैसे का ज़्यादा लालच रहता है, तो उन्होंने अब सच को भी शीर्षासन करा दिया। वो कह रहे हैं कि “देखो पैसा तो ज़रूरी ही है अध्यात्म के लिए।" ऐसा कुछ भी नहीं है।

अध्यात्म का अनिवार्य संबंध है त्याग से। अगर आप त्यागना नहीं जानते तो काहे का अध्यात्म? अहंकार तो चाहता ही है पकड़ना। जहाँ ऑस्टेरिटी (संयम) नहीं है, जहाँ लालच है, जहाँ और इकट्ठा करने की भावना है; पैसा लेकर भोगते ही हो ना? जहाँ भोगने की अभी लालसा बची ही हुई है वहाँ कौन-सा अध्यात्म? ये जो शब्द है ‘त्याग' और ‘सादगी', ये अध्यात्म के शब्दकोश से ही बाहर हुआ जा रहा है।

पचास-सौ साल पहले आपको लाज आती किसी संत के सामने जाकर के अपने धन का प्रदर्शन करने में, और संत को तो और ज़्यादा लाज आती खुलेआम अपने पैसे का प्रदर्शन करने में, नुमाइश लगाने में। अभी ये पिछले कुछ दशकों से नज़ारा एकदम बदल गया है; अपने आपको गुरु बोलेंगे, संत बोलेंगे, अपनी गाड़ियों की प्रदर्शनी लगाएँगे, अपने पैसे की प्रदर्शनी लगाएँगे, और वो भी बिल्कुल छाती ठोककर, कहेंगे, “ये देखो।“ फिर जब इस तरीके के काम होते हैं तो उसके अंजाम भी बहुत बुरे होते हैं।

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