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जिन्हें इज्ज़त बचानी हो, वे प्रेम से दूर रहें || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर, युवाओं के संग (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रेम बिना धीरज नहीं, बिरह बिना बैराग। सतगुरु बिन जावै नहीं, मन मनसा का दाग़।।

~ कबीर साहब

आचार्य प्रशांत: प्रेम में इनफाइनाइट पेशेंस (अनंत धैर्य) होता है। जहाँ पेशेंस नहीं है, जहाँ पर उतावला होने की भावना है, जल्दी से कुछ चाहिए, वहाँ प्रेम नहीं है। प्रेम में पेशेंस इसलिए होता है क्योंकि प्रेम को कुछ पाना ही नहीं है। कहता है हम पूरे हैं, हम देना जानते हैं और देने में इम्पेशेंट (आतुर) होने का कोई मतलब ही नहीं होता न। इम्पेशेंस होता है पाने में, जल्दी से मिल जाए।

देने में तो कोई इम्पेशेंस होता नहीं और प्रेम बाँटता है—जैसे कहा था न खुशी बँटती है—प्रेम भी बस देना जानता है तो उसमें कोई इम्पेशेंस होता ही नहीं। इम्पेशेंस तो होता है कलेक्ट (इकट्ठा) करने में, जल्दी मिले।

"विरह बिना वैराग," अभी विरह और वैराग तुम्हारे लिए नए शब्द हैं, इन्हें बाद में समझेंगे।

श्रोता: अभी बता दीजिए।

आचार्य: वैराग्य, वैराग्य मतलब डिटेचमेंट ; विरह मतलब सेपरेशन का दर्द। विरह का मतलब होता है बेचैनी। किससे दूर रहना? किसी बंदी से दूर नहीं रहना, अपनेआप से दूर रहना। कबीर उस विरह की बात करते हैं।

श्रोता: मूवीज़ में जो दिखाते हैं।

आचार्य: मूवीज़ तो कुछ का कुछ बना देती हैं। विरह का मतलब होता है अपनेआप से दूरी। स्माल सेल्फ (छोटा स्व) और कैपिटल सेल्फ (बड़ा स्व) में जो दूरी हो उसको विरह कहते हैं। कैपिटल सेल्फ और स्मॉल सेल्फ में जो दूरी बन जाती है न, माइंड (मन) में और सोर्स (स्रोत) में जो दूरी हो जाती है उसको विरह कहते हैं।

उसमें बेचैनी रहती है। कबीर कह रहे हैं उसी बेचैनी से दुनिया की व्यर्थता दिखाई देती है कि जो मिला उसमे मिल क्या गया यार? सब मिलकर भी बेचैनी है। जब सब मिलकर भी बेचैनी दिखाई देती है तो जो मिला होता है आदमी उससे डिटैच (अनासक्त) हो जाता है। कहता है, 'बेकार है यह, मिल भी गया तो क्या मिला मुझे?'

तो बिरह से क्या आता है? बैराग आता है। वह जो पेन (दर्द) होता है, सफरिंग (पीड़ा) होती है उसी से दिख जाता है, "यार, सब पा लिया तब भी क्या मिल गया? छोड़ ही दो न इसको।"

"सतगुरु बिन जावे नहीं मन मनसा का दाग़।" जब तक टीचर न मिले तब तक मन पर जितने धब्बे लगे हैं, कंडीशनिंग (संस्कार) है, वो ठीक नहीं होते।

ये उनके लिए है जो शिकायतें करते हैं —

पिये का मार्ग सुगम है तेरी चलन अभेड़। नाच न जाने बापुरी, कहे आँगन टेढ़।।

~ कबीर साहब

आचार्य: प्रेम पाना नहीं है। यहाँ पर जो पिया है ये भी सेल्फ है। ये भी सेल्फ है, उसी को पिया, उसी को साहब, उसी को राम कहते हैं कबीर। वो तो सीधा ही है, उसमें कोई दिक्क़त नहीं है, पिया आज मिल जाएँगे, ख़ुद को आज पा लोगे।

तुम्हारा चलना टेढ़ा-मेढ़ा रहा है इसलिए कुछ नहीं पाते हो। और कबीर तुमसे कह रहे हैं कि नाच तुम्हें आता नहीं, "नाच न जाने बापुरी", तू नाच तो जानती नहीं है और बोल रही है आँगन टेढ़ा है। सुना है न, नाच न जाने आँगन टेढ़ा?

कह रहे हैं अपनी हरकतें ठीक करो, अपने मन को ध्यान से देखना शुरू करो। सब कुछ आज ठीक हो जाएगा। तुम क्या दिक्क़तें गिना रहे हो? कोई दिक्क़त कहीं है ही नहीं। दिक्क़तें तुम्हें सिर्फ़ इसलिए लगती हैं क्योंकि तुम ठीक नहीं हो रहे। फिर तुम कहते हो दुनिया में परेशानियाँ हैं। दुनिया की परेशानियाँ आज ठीक हो जाएँगी। तुम जो कहते हो दुनिया से हमें कष्ट है, वो सारे कष्ट आज मिट जाएँगे, तुम अपनेआप को तो ठीक करो।

मैंने तुमसे कहा था न, अपने लिए खुशी इकट्ठा करो, दुनिया को अभी छोड़ दो। तुम्हें मिल गया, दूसरों को अपनेआप मिल जाएगा। तुम्हें मिल गया, दूसरों को अपनेआप मिल जाएगा। उसका नीचे वाला भी अच्छा है —

नेह निबाहै ही बनै, सोचै बनै न आन। तन दे मन दे शीश दे, नेह न दीजै जान।

~ कबीर साहब

नेह से अर्थ प्रेमी है। स्नेह से आता है नेह। कि प्रेम को तो निबाहो और उसमें सोचने की ज़रूरत नहीं है, थॉट (विचार) को बीच में मत आने दो। "तन दो मन दो शीश दो," जो भी दे सकते हो दे दो, लेकिन "नेह न दीजै जान," प्रेम ख़त्म न हो। वो ज़िंदगी से भी बड़ी चीज़ है।

जो जाता है जाए, प्रेम नहीं जाना चाहिए। दुनिया ने जो दिया है, दुनिया वही वापिस ले जा सकती है, उसको ले जाने दो। प्रेम दुनिया का नहीं है, दुनिया उसे न ले जाए। दुनिया ने इज़्ज़त दी है, दुनिया तुम्हारी इज़्ज़त छीन भी सकती है, ठीक है।

आप कल तक बोलते थे कि मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ, आज तुमको मैं कमीना लगता हूँ, कोई बात नहीं। तुम्हीं ने मन में अपने इज़्ज़त पाली थी, तुम्हीं अपने मन से इज़्ज़त हटा लो, इसमें मेरा क्या है, मेरा क्या बिगड़ गया? हाँ, प्रेम मेरा है वो मैं तुमको नहीं छीनने दूँगा। प्रेम मेरा है।

प्रेम मतलब समझ रहे हो?

प्रेम का मतलब है दुनिया में सुकून से जीना। प्रेम का मतलब है कि सब ठीक है, कोई दुश्मनी नहीं है। प्रेम का मतलब है — मेरे पास है और मैं तुमको भी दे सकता हूँ। वो बड़ी चीज़ है। तुम कहती थी न, हम जिये हैं अपनी लाइफ , ये अगर प्रेम ने जिया है तो ही लाइफ है, प्रेम में नहीं जिया तो कोई लाइफ है ही नहीं। प्रेम में नहीं जिया है तो कोई लाइफ नहीं है। बात कुछ जम रही है या नहीं?

प्रश्नकर्ता: हम अपने सेल्फ को जानें और उससे प्रेम करें, वही प्रेम है क्या?

आचार्य: सेल्फ का स्वभाव ही है प्रेम का। मन का स्वभाव है कॉन्फ्लिक्ट (टकराव) का। मन प्रेम नहीं जानता, मन अट्रैक्शन (आकर्षण) और कनफ्लिक्ट दो चीज़ें जानता है। अट्रैक्शन रिपल्शन (प्रतिकर्षण), यही सब। मन इन्हीं में रहता है। कोई ये सोचे कि मन से प्रेम कर लेगा तो नहीं कर पाएगा। इसी को कह रहे हैं कि सोचो मत, "तन देे मन दे शीश दे प्राण दे।"

"नेह न दीजै जान" — वह न जाए बस।

पिया चाहै प्रेम रस, राखा चाहै मान। दोय खड्ग एक म्यान में, देखा सुना न कान।।

~ कबीर साहब

आचार्य: कबीर कह रहे हैं कि तुम कितने बुद्धू हो, प्रेम रस भी पीना चाहते हो और मान भी रखना चाहते हो। मान माने? इज़्ज़त। कह रहे हैं कि प्रेम तो काम ही बेइज़्ज़ती का है। जिन्हें इज़्ज़त रखनी हो, जिन्हें अपनी प्रतिष्ठा बचानी हो, वो प्रेम की सोचे भी नहीं क्योंकि जो प्रेमी होगा उसे बड़े जूते पड़ेंगे।

पहली चीज़ तो यह कि उसकी इज़्ज़त जाएगी। क्योंकि इज़्ज़त कहाँ होती है? सामने वाले के मन में। अब उसके मन में है तो कभी भी हटा भी सकता है। मेरी इज़्ज़त मेरे पास है क्या, किसके पास है? तुम्हारे मन में है। तुम्हारे मन में एक ख़्याल आ गया है इज़्ज़त का तो है, तुम्हारे मन में बेइज़्ज़ती का आ गया तो नहीं है।

कबीर कह रहे हैं कि प्यार का रस पीना चाहता है और साथ में इज़्ज़त भी बचा कर रखना चाहता है। अरे पगले, एक म्यान में दो तलवार रहती है क्या? जहाँ प्रेम है वहाँ इज़्ज़त नहीं हो सकती। बड़ी भयानक बात बोली है कबीर ने।

जानते हो इसका मतलब क्या बोल रहे हैं? कह रहे हैं कि जितने इज़्ज़तदार लोग हैं प्रेम नहीं जानते। प्रेम तो बेइज़्ज़ती लेकर के आता है। जितने ही समाज में इज़्ज़तदार लोग हैं—तुम कैपिटल लव की बात कर रही थी न, बेटा कैपिटल लव भी बड़ी बेइज़्ज़ती लेकर के आता है, बड़ी दिक्क़तें लेकर आता है, सुविधाएँ नहीं होती हैं उसमें।

तभी तो कबीर को सूरमा खड़ा करना पड़ता है कि लड़। जो इज़्ज़त की बहुत परवाह करते हों वो प्रेम को भूल जाएँ। अब क्या करोगे, नाक कट जाएगी? (श्रोताओं को असमंजस में देखते हुए) बोल रहे हैं, "अरे सर, सिर कटाने को तैयार हैं नाक नहीं कटा सकते।"

क्या नाक कटाने को तैयार हो? सिर कटाना, याद रखना आसान है। लोग सिर कटा देते हैं नाक बचाने के लिए। बिलकुल लोग नाक बचाने के लिए सिर कटा लेते हैं। तो कबीर जब तक सिर कटाने की बात कर रहे थे तब तक फिर भी ठीक था, अब कबीर काहे की बात कर रहे हैं? नाक कटाने की। कह रहे हैं नाक भी कटवा लो।

कौन तैयार है भाई? कुछ ही तो तैयार हो।

किसी की नाक उसकी ख़ुद की होती है? नाक माने इज़्ज़त। इज़्ज़त कहाँ होती है?

प्र२: मतलब जो भी अब तक लेकर आया है वो कुछ भी नही बचेगा?

आचार्य: तुम्हारा था ही कहाँ कि बचेगा? वो तुम्हारा था कहाँ कि बचेगा? किसी और का था, वो वापिस भी ले सकता है। किसी ने तुम्हें इज़्ज़त दी है, वापिस ले ले, तो तुम्हारा क्या बिगड़ गया? उसके मन में है।

मैं अपने मन में तुम्हें दे रहा हूँ पाँच सौ रुपए और मैं अपने मन में तुमसे वापिस ले रहा हूँ पाँच सौ रुपए। तुम्हारा क्या बिगड़ गया, कितना बिगड़ा?

(प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए) सारा, मैं तुमसे वो पाँच सौ रुपए वापिस ले रहा हूँ जो तुम्हें मैंने मन ही मन दिए थे। और ये रो रही है, "पाँच सौ का नुक़सान हो गया, हाय राम पाँच सौ का नुक़सान हो गया।" क्यों? मन ही मन पाँच सौ दिए थे, वो वापिस ले लिये।

प्र: आपके बारे में कई छात्र कहते हैं कि "मैं सर का बहुत इज़्ज़त करता था, लेकिन उन्होंने आज ऐसी बात कह दी कि थोड़ी-सी भी इज़्ज़त देने का मन नहीं कर रहा।"

आचार्य: (हँसते हुए) मत दो। तुम्हारी थी, रखो। मुझे मिली भी कहाँ थी? तुम्हारे मन से तुम्हारे मन में ही ट्रैवल कर रही थी। तो अब आज तुम वापिस जाकर बताओगे कि तुम क्या सीखकर आए हो, बेइज़्ज़ती।

प्र३: रिस्पेकट आपको तो बहुत अच्छा लगेगा?

आचार्य: लग सकता है।

प्र३: और बेइज़्ज़ती बुरा लगेगा?

आचार्य: लग सकता है। नहीं, कुछ चाहिए नहीं था। जब अच्छा लगेगा तो उसके साथ भी खेल लेंगे, (स्वयं को संबोधित करते हुए) "साले! बहुत अच्छा लग रहा है।" और जब बुरा लग जाएगा उसके साथ भी खेल लेंगे, "कमीने! बुरा मान गया।" ठीक है।

पिये का मारग कठिन है, जैसे खांडा सोए। नाचन निकसी बापुरी, घूँघट कैसा होए।।

~ कबीर साहब

आचार्य: "पिये का मारग कठिन है।" पिया माने? अभी हमने क्या कहा, पिया माने? कठिन है। अभी थोड़ी देर पहले कहा था सुगम है, अभी कहा था सुगम है। और तब कहा था कि तुम्हें नाचना नहीं आता इसलिए तुम बोल रहे हो कि आँगन टेढ़ा है।

अब वही कबीर उलटी बात कह रहे हैं, कह रहे हैं, "न.. कठिन भी है।"

कब कठिन है? कबीर कह रहे हैं कि पिया से जो मिलने जाएँ उन्हें घूँघट ओढ़कर नहीं जाना चाहिए। पिया से तो नाचते नाचते ही मिला जाता है, घूँघट ओढ़कर नहीं मिला जाता। "नाचन निकसी बापुरी, घूँघट कैसा होए।" अब घूँघट से उनका क्या अर्थ है? पर्सनैलिटी , शरम, मास्क, ये सब शब्द याद आ रहे हैं?

जो पिया से मिलने निकले हैं वो नकली घूँघट, नक़ली चेहरे, पर्दे ये सब छोड़ दें क्योंकि तुम नाच ही नहीं पाओगे। आँखों के सामने बहुत पर्दा-वर्दा डाल दिया तो नाच नहीं पाओगे।

किनके लिए सुगम है? जो सीधे-सीधे जाकर मिल जाए। किनके लिए कठिन है? जो अभी भी चेहरा लेकर के घूम रहे हैं, 'हम तो ऐसे ही हैं।' ऐसे में उनके लिए पिये का मार्ग बहुत कठिन है।

कबीर कह रहे हैं, अरे पगलिया—पगलिया कौन है, किसको कबीर कह रहे हैं? कबीर किसको एड्ड्रेस (संबोधित) कर रहे हैं? जब कह रहे हैं पगली पिया से मिलने जा रही है, तो पिया से मिलने कौन जा रहा है? पिया क्या है?

श्रोता: कैपिटल सेल्फ।

आचार्य: तो उनसे मिलने कौन जा रहा है?

श्रोता: स्मॉल सेल्फ।

आचार्य: यानी कि माइंड। तो पिया तुमको कह रहे है, माइंड को कह रहे हैं कि तू नाच रही है, पिया से मिलना है, घुँघट हटा।

प्र४: खांडा क्या होता है?

आचार्य: खांडा माने तलवार। "पिया का मार्ग कठिन है जैसे खांडा सोय।" जैसे तलवार की धार पर चलना मुश्किल बात है न!

प्र४: 'सोए' मतलब?

आचार्य: सोए मतलब जैसे, दैट।

बैलेंस (संतुलन) बनाना होता है, न इधर गिरो न उधर गिरो। तलवार की धार। जैसे रस्सी पर चलना होता है; तो रस्सी तो फिर भी थोड़ी मोटी होती है। रस्सी पर लोग चल जाते हैं, तलवार की धार पर चलो तो कैसा रहेगा? इतनी तीखी, महीन। तो कबीर कह रहे हैं पिया से मिलना उतना ही कठिन है जितना तलवार पर चलना, खांडे पर चलना, रेजर्स एज।

नाचने को निकली है और घुँघट करके बैठी हुई है। मिलना है सेल्फ से और पर्सनैलिटी ड्रॉप करने को तैयार नहीं है, तो क्या मिलेगा? जो ख़ुद से मिलना चाहता हो उसे अपने सारे झूठों को पीछे छोड़ना पड़ेगा। बड़ी तगड़ी ईमानदारी से अपनेआप को देखना पड़ेगा, मेरा सच क्या है। जिसमें वो ईमानदारी नहीं है वह कुछ नहीं पाएगा।

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