प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ। आपने बताया था कि कोई भी चीज़ के लिए पूछो कि यह ज़रूरी है कि नहीं, अगर ज़रूरी नहीं है तो उसे हटा दो। मैंने यह करना शुरू किया, सब कुछ हटाने लगा जैसे पहले यूट्यूब पर घंटों कॉमेडी वीडियो देखता था, वह अब खत्म हो चुका है। यूट्यूब पर गाने कुछ भी नहीं सुनता हूँ क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं है। फेसबुक वगैरह उतना आवश्यक नहीं है।
अब जब सब हटा दिया, तो दो-तीन महीने से काफ़ी ज़्यादा अकेलापन महसूस हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: जो हटाया है, उसके पास दोबारा चले जाओ।
प्र: लेकिन उससे कुछ फायदा नहीं होता।
आचार्य: फिर से और पास जाओ।
‘*लोनलीनेस*’ (अकेलापन) अपनेआप को बहुत होशियार समझती है। यह जो अकेलापन है, जो आंतरिक निर्जनता, तन्हाई है, यह सिर्फ़ यही नहीं कहती, “मैं परेशान हूँ”, ये यह भी कहती है, “मैं परेशानी का समाधान जानती हूँ।” बहुत होशियार समझती है अपनेआप को। यह कहती है, "अकेलापन दूर करने के लिए यहाँ जाओ, वहाँ जाओ।" जब बहुत शोर ही मचाने लगे यह, तो इसकी सलाह मान लो। यह जहाँ को भी भेज रही है, वहाँ चले जाओ। वहाँ जाओ, मुँह की खाओ, और परेशान हो, नाक कटाओ, मुँह काला करो, वापस आ जाओ। और कोई तरीक़ा नहीं है।
या तो इतनी उसमें विनम्रता होती या समझ होती कि वो उपदेश से मान जाती। पर उपदेश तो तुम ख़ूब ही देख रहे हो, और फिर भी वो अकेलापन, सूनापन मानता नहीं। वह कहता है, “चाहिए! चाहिए!” तो ऐसे में मैं कहा करता हूँ कि - "उसकी बात मान ही लो।" वह तुमसे कह रहा है, "जाओ कॉमेडी देखो, गाने देखो, सेक्स देखो", जो भी देखने को कह रहा है, वह तुम कर ही डालो। कर डालो, और फिर भीतर से छूटेगी भभगति हुई ग्लानि, ख़ुद ही समझ जाओगे कि समय बर्बाद किया। और फिर अगली बार जब यह अकेलापन आवाज़ देगा, तो इसकी आवाज़ क्षीण होगी। आवाज़ तब भी देगा, पर अब उसकी आवाज़ कमज़ोर होगी; तुम इतनी आसानी से उसकी आवाज़ पर विश्वास नहीं करोगे। और फिर उसके बाद और क्षीण होगी, और क्षीण होगी। फिर शनैः शनैः मिट जाएगी।




