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जवान! मैदान में उतरो तो सही! || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपका एक वीडियो देखा था, वीडियो का टाइटल था, ‘दम हो तो ही इधर आना!’ उसमें एक लड़के ने सवाल पूछा था कि उसे अपने परिवार के लिए पैसे भी कमाने हैं और समाज के लिए भी कुछ करना है। तो उसमें समझाते हुए आपने कहा था कि दोनों चीज़ें एक साथ नहीं हो सकतीं। आप अपने शरीर की माँगों को भी पूरा करो और समाज के लिए भी कुछ करो, ये सब एक साथ नहीं हो सकता।

आपने उसमें दो उदाहरण दिये थे, स्वामी विवेकानन्द जी का, जिन्होंने इतनी मेहनत की कि उनके शरीर ने जवाब दे दिया; उन्हें भरी जवानी में ही जाना पड़ा। और दूसरा उदाहरण था भगत सिंह का, जिन्होंने सोचा कि मैं अगर अभी चला जाऊँ, तो मैं एक एग्ज़ाम्पल (उदाहरण) बन जाऊँगा। तो वो भी भरी जवानी में ही फाँसी के फन्दे पर झूल गये। तो क्या क्रान्ति का मार्ग इतना मुश्किल है? और ‘हाँ’, तो क्यों है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, मुश्किल उनके लिए थोड़े ही था। जो उस मार्ग पर चले हैं उनके लिए थोड़े ही बहुत मुश्किल था, उनके लिए बहुत मुश्किल होता तो चल ही नहीं पाते। जो काम बहुत कठिन होता है, वो आप हँसते-हँसते कर ले जाते हो क्या? उसमें तो आप परेशान होते हो, रुकते हो, खींझते हो। पर जिन दो व्यक्तित्वों की आपने बात करी, उनके जीवन में हमको न तो रुकाव दिखाई देता है, न ग्लानि दिखाई देती है। स्वयं ही कहा कि हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे का वरण कर लिया, कैसे? हँसते-हँसते।

जो काम बहुत कठिन होता है वो हँसते-हँसते कर पाते हो क्या? तो वेदान्त इसीलिए आवश्यक है, वो आपसे बार-बार पूछता है कि आप जो कुछ भी कह रहे हो, देख रहे हो या अनुभव कर रहे हो, उसका अनुभोक्ता कौन है, कौन उसको प्रमाणित कर रहा है?

आप बाहर से बैठकर के उनके जीवन को देख रहे हो, उनका जीवन आपको कठिन लग रहा है अपने परिप्रेक्ष्य में, उनका जीवन आपको कठिन लग रहा है अपने परिप्रेक्ष्य में। आप जैसे हो, आपके लिए बहुत कठिन है। आप उनसे जाकर पूछिए जिन्होंने जिया है, वो कहेंगे, ‘नहीं, ऐसा तो कुछ विशेष कठिन था नहीं और कुछ विशेष कठिन होता, तो शायद हम उसका वरण ही नहीं करते, और वरण कर भी लेते तो उस पर बहुत आगे चल नहीं पाते। चलते भी तो उलझ-उलझकर गिरते रहते, ठोकर खाते।’ ऐसा तो पर हमने देखा नहीं है।

तो उनके लिए कठिन नहीं था और उनके लिए कठिन क्यों नहीं था? अब इस बात में थोड़ा रहस्य है, समझिएगा।

जो चुनौती को स्वीकार कर लेता है, चुनौती उसके लिए आसान हो जाती है। आसान चुनौती को स्वीकार नहीं किया जाता, स्वीकार करके चुनौती को आसान बना दिया जाता है।

और चुनौती को जब तक आपने स्वीकार नहीं करा है और बाहर बैठकर के, चुनौती से दूर-दूर रहकर के जब तक आप उसका मूल्यांकन कर रहे हैं, दूर से ही उसे नाप-तोल रहे हैं, तब तक वो चुनौती, वो काम, वो राह कठिन ही लगेगी।

कठिन इसलिए नहीं लगेगी क्योंकि वो कठिन वास्तव में है, कठिन इसलिए लगेगी क्योंकि अभी आपने उसको छूने की हिम्मत नहीं दिखायी है, अभी आपने चुनौती को स्वीकारा ही नहीं है। न स्वीकार करके आपने पहले ही, स्वयं को ही क्या घोषित कर दिया है? आपने घोषित कर दिया, ‘इतनी कठिन है कि मैं स्वीकार नहीं सकता।’

जब आपने ही न स्वीकार करके स्वयं को जता दिया है, प्रमाणित कर दिया है कि बात इतनी कठिन है कि स्वीकारने लायक़ नहीं, तो अब आपके लिए वो आसान कैसे हो जाएगी? तर्क यहाँ उल्टा चल रहा है, समझिएगा। हम आमतौर पर कहते है कि आसान है तो स्वीकार लेंगे, आसान नहीं है तो नहीं स्वीकारेंगे, यही सबका तर्क है न अपना?

वेदान्त इसीलिए अति-आवश्यक है, वहाँ ये तर्क नहीं चलता। वहाँ इसके विपरीत तर्क चलता है, वहाँ तर्क ये चलता है — स्वीकार लोगे तो आसान हो जाएगी और नहीं स्वीकारोगे तो कठिन रही आएगी। चल दोगे उस राह पर तो फिर चलते चले जाओगे और बाहर बैठे-बैठे प्रतीक्षा करोगे, नापोगे-तोलोगे, अनुमान लगाओगे तो प्रतीक्षा और अनुमान जीवन भर ही चलते रहेंगे।

कठिनाई आपसे बाहर नहीं, न आसानी आपसे बाहर है। जो कुछ भी आसान या कठिन है, आपके लिए आसान या कठिन है न? इस बात को पकड़िए! मन चाहता है एक वस्तुनिष्ठ सत्यता में विश्वास रखना, वो क्या हुई? एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी में यक़ीन रखना। उदाहरण के लिए, ये मेज़ है मेरी (सामने रखी मेज़ की तरफ़ इशारा करते हुए), मान लीजिए यहाँ पर मेरी क़लम रखी हो वो आगे को गिर जाए – ये मेज़ है और लुढ़कता हुआ मेरा पेन जाकर के आगे गिर गया है। क्या मैं उसको उठा सकता हूँ? कहिए, कठिन है? नहीं, बहुत कठिन है, मैं कैसे उठाऊँ, मेरा हाथ तो जा नहीं रहा?

कैसे उठाऊँ?

मैंने अपनेआप को जो बना रखा है मेरे लिए कठिन है, मैं ज़रा सा अपनेआप को बदलने को तैयार हूँ, मैं इस कुर्सी से उठ जाऊँ, बहुत आसान है नीचे पड़ी क़लम को जाकर के उठा लेना। अब बताइए क़लम उठाना आसान है या मुश्किल है?

श्रोतागण: आसान है।

आचार्य: न आसान है, न मुश्किल है — अभी भी ग़लती कर रहे हैं आप, न आसान है, न मुश्किल है, आप पर निर्भर करता है।

हाँ, चुनाव है! न आसान है न मुश्किल है, उठा लो तो आसान है, न उठाओ तो मुश्किल है। राह कठिन है कि आसान है? चल पड़ो तो आसान है, न चल पड़ो तो कठिन है। तो ये तर्क तो कभी देना ही नहीं कि हम राह इसलिए नहीं चले क्योंकि कठिन थी। नहीं, राह कठिन इसलिए थी क्योंकि आप चले नहीं।

ठीक? समझ में आ रही है न बात?

व्यावहारिकता वगैरह की बात मत करिएगा कि कुछ चीज़ें लेकिन होती हैं जो व्यावहारिक, प्रैक्टिकल नहीं होतीं। जो आप व्यवहार में ला दो वो हो गया व्यावहारिक और जिसका आप व्यवहार, माने आचरण, माने कर्म करो ही नहीं, वो आपके लिए सदा अव्यावहारिक ही बना रहेगा।

समझ में आ रही है बात?

छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी आप बहुत सुविधा से ये तर्क दे दोगे कि काम इसलिए नहीं हुआ क्योंकि असम्भव था, अव्यावहारिक था, अति कठिन था। और हाथ-पाँव नहीं हिलाओ, अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं करो, अपनी चेष्टाओं को केन्द्रित नहीं करो, तो कोई भी काम कठिन ही रहा आएगा। आप झूठ नहीं बोल रहे हैं, आप बिलकुल ठीक बोल रहे हैं। जब आप कहते हैं कि कोई काम कठिन है — आप जैसे बने हुए हैं स्वयं ही जान-बूझकर, चुनाव करके, आपकी स्थिति के लिए तो वो काम निस्सन्देह कठिन है, और कोई दूसरा हो सकता है जिसके लिए बहुत आसान है। आसान है, कठिन है; आपका चुनाव है।

न चलने वालों को एक नहीं सौ बहाने मिल जाएँगे, कठिन है या अभी समय नहीं आया है या अभी तैयारी चल रही है या अभी थोड़ा और जाँच परख लें। और चलने वालों के पास बस एक कारण होता है — चलना ज़रूरी था तो हम चले। न चलने के पक्ष में आपको तर्क जुटाने हैं, तो जितने जुटाना चाहते हैं उससे पाँच और मिल जाएँगे, अड़ोसी-पड़ोसी से भी ले लीजिएगा, वो आपको अतिरिक्त तर्क मुहैया करा देंगे। और कभी आप विचार करिएगा, अधिकांशतः जो आपको तर्क मिलेंगे मन में, वो सही काम न करने के पक्ष में ही मिलेंगे।

आपको कभी कोई चुनाव करना हो, दोराहे पर खड़े हों, चुनना है किधर को जाना है — मन में बहुत तर्क आएँगे। उन तर्कों पर ग़ौर करिएगा, चाहें तो उनको लिख लें। पाएँगे कि अगर पन्द्रह तर्क मन दे रहा है तो उसमें से चौदह सही राह के विरुद्ध ही हैं। तो तर्कों का बाज़ार भरा पड़ा है, बोलिए कितने तर्क चाहिए ग़लत जीवन जीने के लिए? जितने चाहिए होंगे उतने मिलेंगे, और ज़्यादा मिलेंगे।

सही काम के पक्ष में तो वास्तव में एक भी तर्क नहीं होता, या तर्क बस यही होता है कि सही है तो करना है। बाक़ी आगा-पीछा, दायाँ-बायाँ कौन सोचे! ठीक है तो करना पडे़गा।

हाँ, ये ज़रूर हो सकता है कि अभी पूरी सामर्थ्य विकसित नहीं हुई है, तो जितनी गति से हो सकता है उतनी गति से नहीं हो पाएगा, जितनी कुशलता से हो सकता है उतनी कुशलता से नहीं हो पाएगा। पर कुशलता भी तो विकसित होगी राह पर चलने से न? गति भी तो पाँव में तभी आएगी न जब पाँव पहले ज़रा राह पर दौड़ लगाएँगे, तभी तो उनमें कुछ जान आएगी। या बैठे-बैठे आपकी टाँगें मज़बूत हो जाएँगी? ऐसा तो होता नहीं।

मज़बूती भी चुनौती का सामना करने से ही आती है। और तर्क हमारा ये होता है कि पहले ज़रा मज़बूत हो जाएँ, फिर चुनौती में उतरेंगे। ये तर्क लुभाता भी खूब है न, ये बात तो सही है। तो कहेंगे, ‘देखो, अगर हम असमय ही चुनौती वाली राह पकड़ लें और फिर उस राह पर कुछ टूट-फूट हो जाए, दुर्घटना हो जाए, तो फिर तो खेल ही ख़त्म हो जाएगा न? तो पहले ज़रा अच्छे से तैयारी वगैरह कर लें, बीस-चालीस साल लगा लें तैयारी में और जब पूरा भरोसा आ जाएगा कि जीत पक्की है, तब करेंगे यलगार!’

जो उतर ही नहीं रहे मैदान में, उनकी तो एक ही चीज़ पक्की है, न उतरना तो हारने से भी ज़्यादा बुरा है।

हारने में भी एक गरिमा होती है। सही लड़ाई लड़ो और हारो, तो बहुत नहीं बिगड़ जाता, कुछ भी नहीं बिगड़ जाता। सबसे बदहाल तो वो हैं जो मैदान में कभी उतर ही नहीं पाये।

तर्कों पर मत जाइएगा, तर्क आपको इस काम में सहारा नहीं देने वाले। और जो उस राह पर चले हैं, बाहर बैठकर बस दूर-दूर से प्रेक्षक की तरह अवलोकन करेंगे तो यही लगेगा कि हाय राम! कितना कठिन था इनका जीवन।

उनका जीवन आपको कठिन लग रहा है क्योंकि वैसा जीवन न जीने का आप निर्णय करे बैठे हैं। वो तो मज़े में हैं, तीनों जा रहे हैं फाँसी होनी है, मुस्कुरा रहे हैं, कोई गीत गुनगुना रहे हैं — और ये वास्तव में हुआ है, किसी नाटक की पटकथा नहीं है ये, ऐसा ही था। और वहाँ जब खड़े हुए हैं तख़्ते पर और फन्दा पड़ने वाला है, तब भी शोक उनको नहीं है जो शहीद हो रहे हैं, शोक में वो सब खड़े हैं जो उन्हें शहीद होता देख रहे हैं। वो जेलर, वो डॉक्टर, वो जल्लाद, उनकी हालत ख़राब है कि ये हमारे सामने क्या हो रहा है, हमारे हाथों ये क्या हुआ जा रहा है! और जिनको फाँसी लगनी है वो मुस्करा रहे हैं और कोई अन्तर ही नहीं पड़ रहा।

जो दूर से देख रहा है वो परेशान हो जाएगा। उसको लगेगा, ‘ऐसा हो कैसे सकता है, हो कैसे सकता है! कैसे हो सकता है!’ सब हो सकता है, उनके साथ ही नहीं आपके साथ भी हो सकता है। आप अपनी ही शक्तियों से परिचित नहीं हैं इसलिए आपको लगता है कि आप बहुत कमज़ोर हैं, कोई भी ऊँचा काम आपके साथ नहीं हो सकता है। हमने अपना बस दुर्बल, अशक्त रूप जाना है क्योंकि हम अहंकार बनकर जीते हैं। अहंकार तो अशक्त होता ही है।

जब आपने चेहरा ही अहंकार का पहन रखा है, तो इसमें आश्चर्य क्या कि आप दर्पण में देखते हैं और आपको दुर्बलता मात्र दिखाई देती है। आपमें कितनी जान है, कितना बल है, ये आपको पता तो तब चले न जब आप चुनाव करें अपने ही सही केन्द्र से जीने का। और मानव जीवन की त्रासदी ही यही है कि अपरिमित बल अपने ही भीतर संजोये-संजोये हम मर जाते हैं। हमारे ही भीतर अगाध सम्भावनाएँ हैं, अपार बल है और जीवन भर हमें उसका पता नहीं चलता। हम यही कहते रहते हैं, ‘आह! हम कितने कमज़ोर हैं, चुनौती कितनी कठिन है!’

कमज़ोर बने रहना एक निर्णय होता है, आपके अस्तित्व का तथ्य नहीं है कमज़ोरी। और आपको अपनी ही ताक़त से ज़्यादा कुछ चौंकाएगा नहीं। एक बार उसको जगाइए तो, एक बार अपने वास्तविक चेहरे को अनावृत तो करिए; विस्मित रह जाएँगे बिलकुल।

आप कहेंगे, ‘मैं जीवनभर पिद्दी-फिसड्डी बनकर घूमता रहा, मुझमें इतने प्राण थे! मैं इतना बली था मुझे कभी पता ही नहीं चला! और मैं जीवन के सामने, पूरे संसार के सामने बस यूँही दो हड्डी-फिसड्डी, कभी दया की, कभी कृपा की, कभी सहयोग की भीख माँगता रहा!’

वो दुनिया का पहला अजूबा है — आपकी अपनी सोयी हुई, छिपी हुई ताक़त।

और चूँकि हम अपनी ही ताक़त से परिचित नहीं हैं, तो इसलिए जब हमें किसी दूसरे का दर्शन होता है विकट स्थितियों से जूझते हुए, तो हमें उस व्यक्ति को देखकर के भय भी लगता है और दया भी आती है। भय ये लगता है कि बाप रे! इतनी बड़ी चुनौती है, इसके सामने किसका बस चलेगा! और दया आती है कि अरे-अरे-अरे! बेचारा जवानी में ही मारा जाएगा!

आप समझ ही नहीं रहे हो कि जो उस चुनौती से जूझ गया है, निश्चित रूप से उसके भीतर कुछ ऐसा है जो उस चुनौती से कहीं बड़ा है, नहीं तो जूझता कैसे? बस उस बड़ी चीज़ का प्रमाण जूझे बिना नहीं मिलता। आप यहाँ बैठे-बैठे प्रमाण माँगोगे कि आचार्य जी बस एक बार आश्वस्त कर दीजिए कि हमारे भीतर भी अनन्त शक्ति है, फिर तो हम जीवन की सब चुनौतियों से जूझ जाएँगे। बैठे-बैठे मैं प्रमाणित नहीं कर सकता।

वो चीज़ ऐसी है कि प्रकट तभी होती है जब उसे पुकारा जाता है। वो चीज़ ऐसी है कि उद्घाटित तभी होगी जब उसकी आवश्यकता पड़ेगी। गीता मिलती ही नहीं अर्जुन को अगर भाग गये होते। इतने समय से साथ थे श्रीकृष्ण के, गीता मिली थी क्या अर्जुन को? वो चीज़ ऐसी है कि तभी मिलेगी जब आप दोनों सेनाओं के बीच में खड़े हो जाओगे। जो मैदान में उतरे ही नहीं, उनको नहीं मिलती। आप कहें, ‘पहले गीता मिले, फिर जाकर के हम रथ पर चढ़ेंगे कि गांडीव को हाथ लगाएँगे’, ऐसा नहीं होने वाला।

आप पहले मैदान में उतर जाइए, फिर गीता मिलेगी। कोई गारंटी ? गारंटी कुछ नहीं है, श्रद्धा चाहिए। तो मतलब हम ये मानकर चलें न कि हम उतर जाएँ तो आ ही जाएगी मदद? नहीं, आप कुछ मानकर मत चलिए, आप यही मानकर चलिए कि आप जो हैं, जैसे हैं, पर्याप्त हैं। आप स्वयं जो अधिकतम कर सकते हैं वो करने के लिए उतरिए, पर देखा यही गया है कि एक बार आपने कह दिया कि मैं अपना अधिकतम करूँगा, तो उस अधिकतम की ही परिभाषा बदल जाती है।

आप अपना जो अधिकतम जानते हैं, आपका अधिकतम उससे कहीं अधिक होता है। आप जिन चुनौतियों को सोचकर बैठे होते हैं कि आपको तोड़ देंगी, जब आप उन्हें स्वीकार लेते हैं तो आपको पता चलता है वो आपको तोड़ नहीं रही हैं, वो आपको विकसित कर रही हैं, वो आपको जगा रही हैं। जीवन में बल पाने का और कोई तरीक़ा है नहीं। जीवन से जूझे बिना आत्मबल विकसित होगा नहीं। तो क्या आत्मबल विकसित करने के लिए जूझ जाएँ? नहीं, आवश्यक है इसलिए जूझ जाओ!

‘तो माने इतना तो आप हमें भरोसा दे रहे हैं न कि जूझेंगे तो परिणाम अच्छा ही होगा?’ नहीं, ऐसा कुछ आवश्यक नहीं है, परिणाम अर्जुन का नहीं अभिमन्यु का भी हो सकता है। और अभिमन्यु के गुरु तो कृष्ण स्वयं थे। अर्जुन के भी गुरु कौन हैं? श्रीकृष्ण हैं, अभिमन्यु के भी थे। अंजाम अभिमन्यु वाला भी हो सकता है।

‘तो थोड़ा सा इंतज़ार कर लेते हैं फिर अभी, इतनी भी क्या जल्दी पड़ी है। बातें ही कुछ ख़ौफ़नाक सी हैं, भगत सिंह, अभिमन्यु! भगत सिंह तक तो फिर भी ठीक था तेईस साल, अब मामला और ख़तरनाक होता जा रहा है, सोलह साल!’

ठीक?

प्रतीक्षा का कोई उपचार नहीं है। बलहीनता का चुनाव ही आपको करना है तो कोई उसका उपचार नहीं है।

‘तो आचार्य जी, बार-बार आप बोलते हैं कि सत्य बिना बल के मिलता नहीं है — “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो।” तो माने बल पहले आएगा न? अभी आप बोल रहे हैं चुनौती चुनो, उससे बल विकसित होगा। पर बल होगा तभी तो आत्मा का चयन होगा। तो देखिए वेदान्त भी बोलता है बल पहले आता है। आप बोले बल बाद में अपनेआप आ जाएगा, तुम तो बस कूद जाओ। आपकी बात श्रुतिसम्मत लगती नहीं कुछ।’

ये जिस बल की बात हो रही है उसका दूसरा नाम प्रेम है। प्रेम ही बल है। जो आवश्यक है उसके प्रति प्रेम होना चाहिए, वही बल है। मन का आत्मा के प्रति प्रेम ही मनोबल है। लेकिन प्रेम भी नहीं होता है जब तक अनुमति नहीं देंगे अपनेआप को। वो भी प्रतीक्षा करेगा, वहाँ भी ‘हाँ’ बोलनी पड़ती है। मत बोलिए ‘हाँ।’

भक्ति के कवियों ने तो ऐसे भी कहा है कि सत्य—उनकी भाषा में कहें तो—परमात्मा प्रेमी है, वो प्रणय निवेदन करता अनन्त काल से खड़ा हुआ है। और हम सब बेसुध सी प्रेमिकाएँ हैं जो बस ‘हाँ’ नहीं बोलतीं कभी। वो प्रतिपल प्रेम निवेदन करता रहता है, पर हमारे पास कान ही नहीं है उसका प्रेम-गीत सुनने के लिए। वो बार-बार बोलता रहता है, ‘मुझे प्रेम है तुमसे’, हम ही स्वीकार नहीं करते।

जीवन की हर चुनौती बस प्रश्न है जैसे एक — मुझे तो है, क्या तुम्हें भी है प्रेम? और हमारा जवाब ‘ना’ में ही होता है, ‘हाँ’ नहीं बोलते। पचास और चीज़ें हैं जिनको ‘हाँ’ बोले रहते हैं। वो पचास और चीज़ें तो, जिनका आपने नाम लिया, भगत सिंह को भी उपलब्ध थीं, शंकराचार्य को भी उपलब्ध थीं।

चुनाव हमेशा यही होगा — प्रेमी का हाथ पकड़ना है कि दुनिया का साथ पकड़ना है? दोनों एक साथ हो नहीं पाते। और दुनिया चीज़ तो है ही बहुत आकर्षक, कि नहीं? हमारे लिए। ये भूलिएगा नहीं किसकी बात हो रही है। हमारी बात हो रही है, हमारे लिए बहुत आकर्षक है वो।

जिन्होंने वो दूसरी राह चुनी, उनको आकर्षक लगती ही नहीं थी दुनिया। मुक्ति के लिए, आज़ादी के लिए प्रेम है। अब प्यार में पड़ गया है जवान आदमी, उसे बाक़ी दुनिया दिखायी कहाँ देती हैं फिर? मूल समस्या हमारी वही है, घिचपिच, खटपट, सौ झमेले। उन्हीं में पचे-पिसे जा रहे हैं, वही सब बहुत महत्वपूर्ण लगने लग जाता है। दाल में तड़का ठीक से लगना चाहिए। अब ये चीज़ प्रेम के साथ कुछ ठीक से चलती नहीं है। वहाँ वो बाहर खड़ा हुआ है, द्वार पर आवाज़ दे रहा है और यहाँ ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि मिक्सर तो चला दिया पर अदरक नहीं मिल रही, तो ग्रेवी में स्वाद नहीं आएगा आज।

वो बाहर खड़ा होकर के आपको सुन्दर-से-सुन्दर प्रेम-गीत सुना रहा है और आपके सामने आपका मिक्सर चिंघाड़ रहा है, कुछ सुनाई देगा? वो बाहर बोल रहा है, ‘ओउम्!’, आप बोल रहे हैं, ‘अदरक!’ (श्रोता हॅंसते हुए)

अब या तो जीवन में यही सब चला लो और इन मुद्दों की ख़ासियत ये है कि ये छोटे होते हैं, पर बहुत सारे होते हैं। और जब ये इकट्ठा हो जाते हैं तो ऐसा ही होता है जैसे आप पर सौ मच्छर टूट पड़े हों एक साथ। कभी अनुभव करा है, हुआ है आपके साथ?

किसी मैदान वगैरह में जाइए खाली और संध्या समय हो, तो आप पाते हैं कई बार बहुत सारे मच्छर अचानक आ गये आपके ऊपर। ऐसे ऊपर देखो तो दिखता है सौ घूम रहे हैं और फिर वो आपसे आकर चिपक जाते हैं। वो मच्छर ही हैं, पर इतने सारे होते हैं कि…। उसका एक ही तरीक़ा है, मैदान में अगर फुटबॉल खेलने गये थे, तो फुटबॉल का पीछा करते रहो। मच्छरों की फिर शामत आ जाएगी, उन्हें आपका पीछा करना पड़ेगा।

मच्छरों पर ध्यान दो ही मत, आप मच्छरों के लिए थोड़े ही गये थे वहाँ पर, किसके लिए गये थे? फुटबॉल के लिए गये थे न? तो फुटबॉल के पीछे दौड़ते रहो, मच्छर कुछ नहीं कर पाएँगे। खडे़ हो गये और मच्छरों को देखने लगे, मच्छरों से ही निपटने लगे तो मच्छर खा जाएँगे आपको। जीवन इन्हीं मच्छरों से भरा हुआ है और सबके जीवन में मच्छर-ही-मच्छर हैं।

कोई यहाँ ऐसा बैठा है जिसके पास आज, कल, परसों में निपटाने के लिए कम-से-कम दस-से-पन्द्रह काम न हों? बहुत सारे तो यहाँ ग्लानि में बैठे होंगे, कह रहे होंगे, ‘अपना जो हम मूल कर्तव्य है, शाश्वत धर्म है, उसकी उपेक्षा करके देखो आ गये हैं यहाँ पर, ये मनोरंजन कर रहे हैं आध्यात्मिक क़िस्म का। चिमटे में जंग लगा हुआ है, छुड़ाना था; कार में डेंट लग गया है, निकलवाना था; नया पार्लर देखा है, वहाँ मुँह पुतवाना था। उसकी जगह आकर के यहाँ पर बैठ गये हैं, पता नहीं करेंगे क्या दिन तक।’ बहुतों को ऐसे ही…!

कहेंगे, ‘कर्तव्य पथ से विमुख कर दिया, जाने कौनसा मायावी महोत्सव है!’ असली जीवन तो वही है न? हमारा बस चलता तो हम भगतसिंह को भी सब्ज़ी मंडी भेज देते। और हम कहते, ‘ये देखो, ये है असली होनहार कर्तव्य-परायण बालक। टिंडा है, तोरई है, धनिया है, कितना अच्छा बच्चा है और पूरे मोहल्ले के लिए लेकर आता है।’ ऐसों की हम बहुत कद्र करते हैं तभी तो वो, किसी ने कहा है न कि भगत सिंह सबको चाहिए, पर पड़ोस के घर में।

अपने घर में अगर पैदा हो जाए तो बड़ी समस्या हो जाती है। अपने घर में तो हमको टिंडी-तोरई वाला ही चाहिए। वही छोटी-छोटी दो कौड़ी की चीज़ें, उन्हीं को बना लो सबसे क़ीमती, चढ़ा लो बिलकुल सिर पर, फिर मुझे बताओ कौनसा प्रेम, कौनसा बल, कौनसी चुनौती, कौनसी राह? फिर तो चुनौती यही बचती है कि धनिया ख़रीदा उसके साथ मिर्ची मुफ़्त नहीं दी, आज आर-पार का फ़ैसला कर दूँगा, ठेला सरकार की ईंट-से-ईंट बजा दूँगा! ‘ठेले वालों भारत छोड़ो!’

प्रेम का मतलब होता है — ज़िन्दगी में बाक़ी सारे मुद्दे महत्वहीन हो गये, गौण हो गये, बस एक चीज़ बची है जिसने जीत लिया है हमको पूरा। वो जो एक चीज़ होती है, वो जीवन में एक ठोस केन्द्रीयता लाती है। कैसी केन्द्रीयता? आटा कैसा होता है? चूर्ण बिलकुल, बिखरा हुआ, है न? आटा ऐसा ही होता है न?

तो केन्द्रीयता लाने का मतलब होता है जब आप उसमें पानी डाल देते हो और फिर उसको गूँथ देते हो तो कैसा हो जाता है? ठोस हो जाता है न? फिर ज़िन्दगी वैसी हो जाती है। नहीं तो ज़िन्दगी कण-कण आटे की तरह हज़ार जगह बिखरी हुई होती है; कोई फूँक मार दे उड़ जाएगी। आटे को फूँक मारा, क्या होता है? और उसकी लोई बना दो फिर भी उड़ता है क्या?

हमारी ज़िन्दगी ऐसी है, इतनी बिखरी हुई है कि किधर से भी उस पर हवा लगती है, कोई फूँक मार दे, कुछ हो जाए, वो उड़ने लग जाती है। उसमें कोई दम ही नहीं है, कोई बल नहीं है।

बल तब आता है जब ये सब सौ हिस्से जुड़कर एक हो जाएँ, उसको प्रेम कहते हैं। एक मुद्दा बचा है, वो एक हो गया, एकीकरण हो गया, क्रिस्टलाइज़ेशन हो गया एक तरह का।

नहीं तो आप यही पाएँगे। और ये जीवन का नर्क होता है कि हर छोटी चीज़ आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जा रही है। किसी ने कुछ बोल दिया, यूँही अनायास बोल दिया, आपको लगेगा आपको आहत करने के लिए बोला है। छः घंटे आप सोचोगे, ‘उसने ऐसी बात बोल कैसे दी! और अगर बोल दी तो मैं चुप कैसे रह गया, अब बदला लूँगा अगली बार!’

और मन उलझा रहेगा अगले दो दिन तक कि कैसे उससे बदला लेना है। जिसने बोला था वो कब का भूल गया, उसका उद्देश्य भी नहीं था आपको चोट देना। वो यूँही बोल गया था, आप दो दिन तक उलझे हुए हैं, ‘फ़लानी बात बोल दी।’ और जो बात बोली गयी थी, ये भी सम्भव है कि उससे दस गुनी ज़्यादा बड़ी बात आपने कल्पित कर ली हो। एक चीज़ उसने बोली हो, नौ चीज़ें आपने सोची हों।

ये क्यों होता है? क्योंकि जीवन ऐसा ही है, खाली, रिक्त! उसे कल्पनाओं से भरना पड़ता है। ‘चाय में शक्कर ज़्यादा हो गयी’, और ये बात तीन दिन से याद है। ‘ऑटो वाले को नोट दिया था सौ का कि दो-सौ, पाँच-सौ का और उसको साठ रूपये लौटाने थे; बीस-बीस के तीन नोटों की जगह दो ही नोट देकर भाग गया बेईमान!’ और चार महीने हो गये हैं ये बात भूल नहीं रही है। कहीं कोई ऑटो वाला दिखता है तो आँखें तलाशती हैं, वही तो नहीं। (श्रोता हॅंसते हुए) हर ऑटो स्टैंड में घुसकर के बिलकुल तोड़-फोड़ का जी चाहता है।

‘बड़ा चालाक था, एकदम ताड़ गया कि मैं जल्दी में हूँ, तो तीन नोटों की जगह दो नोट दे गया। और मैंने भी लिये, गिनने का समय नहीं था खट से जेब में डाल लिये। भाग गया शातिर!’

और कम-से-कम दस लोगों से इस कहानी को बताया जा चुका है! पौराणिक कथा हो गयी! (श्रोता हॅंसते हुए) जहाँ कोई समूह मिला नहीं कि पाठ आरम्भ! मिले हैं ऐसे लोगों से कि नहीं जिनके पास ज़िन्दगी के पाँच क़िस्से होते हैं जिसको वो पाँच-सौ बार दोहराते हैं; कोई मिल जाए।

और सुनने वाले भी मज़े लेने लगते हैं, उन्हें भी पता है कि अगली बात क्या बताएगा, फिर क्या बताएगा और किन शब्दों में बताऍंगे। तो वो लिपसिंग (बिना आवाज़ होठों से बोलना) करना शुरू कर देते हैं। (आचार्य जी होंठ हिलाते हुए) उन्हें पता है कि आप अब क्या बोलने जा रहे हो। इससे क्या पता चलता है? इससे ये पता चल रहा है कि ज़िन्दगी में कोई असली चीज़ है ही नहीं, तो कोई फ़िज़ूल की चीज़़ उठाकर के उसी में प्राण और समय लगाये जा रहे हैं।

दो-दो, चार-चार घंटा नेटफ्लिक्स, ओटीटी, टीवी सीरियल्स, न्यूज़ की चीखा-चिल्ली, मनोरंजन, यूट्यूब, ये चल रहा है औसतन प्रतिदिन दो-से-चार घंटे, सबकुछ मिला दो तो। इतने सारे माध्यम हो गये न, सब को मिला दो तो कभी दो घंटे, कभी चार घंटे। इससे क्या पता चलता है? आप कल्पना कर सकते हैं—भगतसिंह का नाम लिया, आपने दो नाम लिये थे भगत सिंह और विवेकानन्द—आप कल्पना कर सकते हैं कि विवेकानन्द के पास दो मिनट का भी समय था अपनेआप को ऐसा मनोरंजन देने का? न उनके पास समय है, न आवश्यकता।

आप उनके सामने मनोरंजन लेकर भी जाएँगे, उन्हें उसमें कुछ मनोरंजक लगेगा ही नहीं। आप कहेंगे, ‘देखो तो, बहुत बढ़िया है, हँसी आ जाएगी!’ वो उसको देखेंगे और फिर भौंचक्के होकर के आपका मुँह ताकेंगे। (श्रोता हॅंसते हुए) कहेंगे, ‘इसमें हँसी जैसा या आनन्द जैसा क्या है? मैं चाहता हूँ आनन्दित होना। आनन्द तो बहुत अच्छी बात है, ऊँची बात है, पर इसमें आनन्द है कहाँ?’ वो आपसे पूछेंगे।

आप कहेंगे, ‘नहीं, पर मज़ा तो बहुत आया, देखो! सब हँस रहे हैं, इतना बड़ा हॉल है, बैठे हुए हैं।’ स्टैंडअप कॉमेडी है मान लीजिए, सब हँस रहे हैं! वो कहेंगे, ‘पता नहीं कैसे हँस रहे हैं, ख़ैर हटाओ, हमारे पास काम बहुत है, हम इस पर ज़्यादा बातचीत कर नहीं सकते तुमसे।’

ये जो खाली जीवन है न, इससे बड़ा गुनाह कुछ नहीं होता। ब्लासफ़ेमी (गुनाह) यही है — जीवन को बर्बाद कर देना। पड़े हुए हैं। या उलझे भी हुए हैं तो व्यर्थ की सौ चीज़ों में। और मन टुच्चेपन में संस्कारित हो जाता है, उसको लत लग जाती है टुच्चई की। टुच्चई समझते हो? क्षुद्रता! छोटी चीज़ों को पकड़े रहने की आदत लग जाती है उसको। कोई छोटी चीज़ होगी वो, आप कहीं कतार में लगे हैं किसी ने आपसे कन्धा रगड़ दिया! आप उस पर बहस कर लेंगे और बहस नहीं भी करें चुप खड़े रहे तो आधे घंटे तक सोचेंगे, ‘अच्छा! कन्धा रगड़ दिया!’

‘भारत का दुर्भाग्य देखो, लोग कन्धा रगड़ रहे हैं! एक वो ज़माना था जब सब देवताओं के पास अपना-अपना वाहन होता था, क्या वो कन्धा रगड़ते थे, पर आज देखो!’ ये चल रहा है। कोई आपका कन्धा छूकर निकल गया, कितनी बड़ी बात हो गयी! उसके बाद आकर के वापस इतनी बड़ी फेसबुक पोस्ट लिखेंगे, ‘दुनिया रसातल में जा रही है! कलयुग नहीं, घोर कलयुग है! हमारा कन्धा रगड़ गया कोई। हमारे कोई अधिकार नहीं, हमारे तन की कोई पवित्रता नहीं?’

प्रेम का एक बड़ा लक्षण होता है — याद्दाश्त का कम हो जाना। सधुक्कड़ी आती है जब भुलक्कड़ी आती है। आदमी भुलक्कड़ होने लगता है, व्यर्थ की चीज़ें भूलने लग जाता है, असली चीज़ से प्रेम हो जाता है, व्यर्थ को चाहकर भी याद नहीं रख पाता।

नानक साहब एक दफ़े सौदा नाप रहे थे, ‘नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह, तेरह, तेरा, तेरा!’ अटक गये, अटक ही गये। और जानने वालों के जीवन से न जाने कितने ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिसमें ऊपरी तौर पर उनकी नासमझी ही दिखाई देती है — बाज़ार गये थे कुछ लाने के लिए पैसा छोड़कर के, या बाँटकर के वापस आ गये।

हमारे लिए तो ये एक राष्ट्रीय आपदा जैसा हो जाएगा! ‘गुड़ की दुकान पर पाँच-सौ का नोट छोड़कर आया है, बंटी! अब गुड़ उन्मूलन समिति बनानी पड़ेगी।’ और जिनको प्रेम हो जाता है, वो गुड़ और नोट और सौदा क्या, वो स्वयं को ही छोड़ने लग जाते हैं। और उनको कोई बड़ी बात लगती नहीं क्योंकि वो भूलने लग जाते हैं।

क्या आप भूल पाते हैं?

अपनी प्रेमशीलता को, अपनी सत्यनिष्ठा को नापने का ये एक अच्छा तरीक़ा है — क्या आप छोटी और व्यर्थ की चीज़ों को भूल पाते हैं आसानी से?

नहीं भूल पाते तो, “जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय।” बहुत पढे़-लिखे थे दोनों — भगत सिंह भी, विवेकानन्द भी। उनको कोई जाकर के बोलता, ‘भाई, देखो, भारत में तो वैसे भी इन दिनों बहुत ज़्यादा उच्च-शिक्षा प्राप्त लोग होते नहीं हैं। तुमने इतनी ऊँची पढ़ाई करी है और तुम्हारे जो सब सहपाठी हैं, बैचमेट लोग, वो क्या ऊँची-ऊँची नौकरियाँ पा रहे हैं और तुम्हीं लोग पीछे छूट गये।‘ वो ऐसे देखते उसके चेहरे की ओर जैसे किसी एलियन को देख लिया हो। कहते, ‘क्या बोल रहा है और किस भाषा में बोल रहा है? हमें समझ में ही नहीं आ रहा, ये क्या होता है?’

और आपसे आकर कोई बोल दे कि आपका फ़लाना बैचमेट आगे निकल गया, आपकी क्या दशा होती है? मोहल्ले में कोई है जिसका घर और बड़ा हो गया, आपकी क्या दशा होती है? रिश्तेदारी में कोई है जिसने और बड़ी गाड़ी ख़रीद ली, आपकी क्या दशा होती है? उनकी सोचिए न, उन्हें क्यों नहीं फ़र्क़ पड़ रहा था? और आप तो आज के होंगे; जो भी हैं, इंजीनियर, सीए, एमबीए। वो तो उस समय पर जब बहुत कम लोग पढ़ते थे उस समय पर उन्होंने बहुत ऊँची शिक्षा हासिल कर रखी थी। और वो शिक्षा वगैरह उससे क्या पाना है, उससे क्या उगाहना है उसको वो बिलकुल… क्या किया? भूल गये।

आप उनसे पूछें कि कोई जॉब वगैरह लेकर सेटल होने का कभी सोचा नहीं? तो वो क्या बोलते? बोलते, ‘बात तो आपने कुछ लगता है रोचक सी कर दी, पर हम तो भूल ही गये, याद ही नहीं आया। ऐसा नहीं है कि हमें कोई बड़ा भारी त्याग वगैरह करना पड़ा है, ये जो आप बात बोल रहे हैं वो हमको याद ही नहीं आयी।’

आपको चुनौती कठिन इसलिए लगती है क्योंकि आपको वो सब बातें बहुत ज़्यादा याद रह जाती हैं। उनको वो बात याद ही नहीं आयी। और आप जितना याद करेंगे आपको उतना कठिन लगेगा उन बातों को नकारना, उनके पार जाना। आप कहेंगे, ‘अरे! कैसे चले जाएँ पार! बड़ा नुक़सान हो जाएगा।’

वो भूल गये, बस भूल गये। भुलक्कड़ होना सीखिए। वही बल का अनिवार्य लक्षण है, अपनी दुर्बलता को भूल जाना। जो सही है वो करना है, बल कितना है ये किसे कहना है! ‘न’, जो सही है बस करना है। और वही प्रेम का भी अनिवार्य लक्षण है। अब प्रेम है तो है, बाक़ी बातें? भूल गये!

नहीं भूला जा रहा? चेहरों पर मजबूरी पुती हुई है, ‘कैसे भुला दें?’ कम-से-कम तीन-चार सौ फ़िल्मी सैड सॉन्ग सुन लिये हैं और सबमें यही है कि ‘याद न जाए बीते दिनों की!’ पूरी दुनिया ही आपको बार-बार याद दिलाने में जुटी हुई है कि भूल मत जाना बस! और भूल गये तो जैसे जीवन में कोई कमी आ जाएगी, भूल गये तो जैसे अतीत से बेवफ़ाई हो जाएगी; भूल मत जाना!

एनिवर्सरी (सालगिरह) भूल कर दिखाइए फिर! (श्रोता हॅंसते हुए) ‘बेवफ़ा-बेवफ़ा!’ (आचार्य जी गुनगुनाते हैं, श्रोतागण ज़ोर से हॅंसते हैं) और जब तक भूलोगे नहीं, तब तक बात बनेगी नहीं, नहीं बनेगी। और जिनको बड़ी चोट लगती हो आपके भुलक्कड़ होने से, उनसे कह दीजिए कि चोट तुम्हें लगती है न! तो याद दिलाने का फ़र्ज़ भी तुम्हारा है। हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होती चीज़ तो हम याद रख लेते। नहीं है! पर तुम्हारे लिए है महत्त्वपूर्ण, तो तुम ही याद दिला दिया करो कि कल हमारा जन्मदिन है, कल विवाह की वर्षगाँठ है, परसों नुन्नू के मुंडन की पाँचवीं एनिवर्सरी है। हमें नहीं याद रखना ये सब।

आपको क्या लगता है विवेकानन्द, जो उनके सब जान-पहचान के लोग थे और वो तो सामाजिक क्षेत्र में थे, बहुत लोगों को जानते थे। और जिनको जानते थे वो सब-के-सब सन्यासी तो थे नहीं, मठ के अन्दर थे सन्यासी। रामकृष्ण, विवेकानन्द ये लोग तो पूरी दुनिया से मिल-जुल रहे हैं, विशेषकर विवेकानन्द। और जिनको जानते होंगे उनके घर सालगिरह नहीं पड़ती होगी?

और तब तो और कर्मकांड था और पचास तरीक़े की चीज़ें आती थीं। फ़लाने के घर श्राद्ध है, फ़लाने का ये है, वो है — आपको क्या लग रहा है विवेकानन्द ये सब याद रखते थे, भगतसिंह ये सब सोचते होंगे? और जब आप इन बातों पर ध्यान नहीं देते, तो जो उल-जुलूल क़िस्म की भीड़ होती है वो भी आपके पास से स्वयं ही छटनी शुरू हो जाती है।

जिस तरह के हमारे मित्र होते हैं, मैं ख़ासकर युवा लोगों से पूछ रहा हूँ, बाईस-तेईस साल के थे भगतसिंह! आप पूछिए, सोचकर देखिए — भगतसिंह के कैसे रहे होंगे दोस्त? हमारे जैसे दोस्त हैं, उनके हो सकते थे क्या? ये काम होता है प्रेम का — जीवन में जितने मक्खी-मच्छर, कीट-पतंगे होते हैं वो सबको भगा देता है; भगा नहीं देता, वो सबके लिए अनाकर्षक हो जाता है, वो स्वयं ही भाग जाते हैं।

गुड़ हटा दो, उसके बाद मक्खी को भगाने की ज़रूरत बचती है क्या? गुड़ हट गया, मक्खियाँ ख़ुद ही भाग जाती हैं।

कमज़ोरी कोई एक बार किया गया चुनाव नहीं है, कमज़ोरी का चयन किसी एक विशेष दिन घटने वाली घटना नहीं है। दुर्बलता को हम प्रतिदिन चुनते हैं सौ छोटे-छोटे तरीक़ों से।

जिस चीज़ की उपेक्षा करनी चाहिए थी, आपने उस चीज़ को याद रखना चुना, ये दुर्बलता का चयन है। जिन लोगों को आपके आस-पास नहीं होना चाहिए था, आपने उनको समेटे रहना चुना, ये दुर्बलता का चयन है। कुछ है जो आप जानते हैं कि आवश्यक है, उसको आपने मजबूरी की आड़ लेकर के ठुकरा दिया, या विलम्बित कर दिया, ये दुर्बलता का चयन है।

दुर्बलता का चयन दिन में सौ बार करते-करते, करते-करते हम अब ऐसे हो गये हैं कि प्रेम और बल को चुनना हमें असम्भव सा लगने लगा है। आप क्या सोच रहे हैं, आप जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं और दिनभर जिस प्रकार के निर्णय करते हैं, उन निर्णयों के साथ ही आप एक दिन चमत्कारिक रूप से ये निर्णय भी कर लेंगे कि आप भगत सिंह हैं? नहीं कर पाएँगे।

जब दिन के सौ निर्णय धनिया और हींग और जीरा, इसी क़िस्म के हो रहे हैं, तो आप यकायक भगत सिंह होने का निर्णय कैसे कर लेंगे? दुर्बलता का हमने सघन अभ्यास करा है, वो यूँही नहीं हमारे सिर चढ़ गयी, रोज़-रोज़ उसका अभ्यास करते हैं। हमारा बस चले तो हम ये दिखाएँ कि झाँसी की रानी रसोई में कड़ाही में लगी हुई हैं, कढ़ी बना रही हैं।

कौन ये सब करे कि यहाँ पीठ पर बच्चा बँधा हुआ है और दो टाँगों पर है घोड़ा और हाथ में तलवार है और सामने ब्रिटिश हुकूमत है। कौन ये सब करे! क्योंकि जो मैदान में उतर गया है और हाथ में तलवार लिये हुए है, उसको साथ-ही-साथ आप हींग और जीरा और कढ़ी और कड़ाही तो नहीं दिखा पाओगे, या दिखा पाओगे?

या इस तरह का आपने कोई चित्र देखा है? या ऐसी कोई जगह देखी हो, झाँसी के किले वगैरह में वहाँ पर? ‘यही वो कड़ाही है जिसमें वो कढ़ी बनाती थीं।’ हमारे लिए वही सबसे महत्वपूर्ण है, हमारे लिए ही नहीं, हमारे पूरे संसार के लिए। ‘ माय मम्मा इज़ द बेस्ट (मेरी माँ सबसे अच्छी हैं) व्हाय (क्यों)? शी मेक्स ग्रेट कढ़ी (वो बहुत बढ़िया कढ़ी बनाती हैं)’ यही कर लो!

वहाँ उनसे उनकी माँ ने पूछा कि बेटा! कुछ सोचा है शादी वगैरह? बोले, ‘हो गयी मेरी तो। प्रेम एक से करूँ, विवाह दूसरे से, ये बात तो वैसे भी ठीक नहीं होती। तो मेरा तो जिससे प्रेम, उसी से विवाह।’ किससे प्रेम? बोले, ‘आज़ादी! वही दुल्हन है।’

और यहाँ पाँच-पाँच, सात-सात साल लग जाते हैं जीवनसाथी डॉट कॉम… (सभी श्रोतागण हँसते हैं) हँसने भर की बात नहीं है न। लगे हुए हैं दिनभर चार घंटे, क्या कर रहे हैं? एक के बाद एक देख रहे हैं। ‘क्या है, ये बढ़िया माल आया! बाक़ी तो सब ठीक है, माया का बिलकुल पुतला है, ऊपर से नीचे तक, सीटीसी कितनी है?’

वो एक झटके में बोल गये कि कैसी बातें कर रही हो माँ? और माँ-बाप भी उनके ऐसे ही, बोले, ‘ठीक!’ पिता ने अंग्रेज़ों से दर्ख़ास्त कर दी, तो पिता को कड़ा उन्होंने पत्र लिखा। बोले, ‘कैसे पिता हैं आप? मुझे लज्जित मत करिए।’ और अब माँ भी ऐसी, फाँसी से पहले माँ मिलने आयीं, रोने-धोने, आँसुओं का कोई काम ही नहीं।

और माँ न कढ़ी लेकर आयी थीं, न गंगाजल। एक उनके पत्र थे जो उनके जाने के बाद इतिहास की धरोहर बन गये। और एक हमारे पत्र होते हैं, तब कागज़ पर चलते थे, अब ईमेल पर चलते हैं, व्हाट्सप पर चलते हैं, पर वो भी पत्र ही होते हैं। हमारे पत्र ऐसे होते हैं कि कोई हमसे हमारी अन्तिम इच्छा पूछे तो हम कहेंगे, ‘सब डिलीट कर देना प्लीज़! (श्रोता हॅंसते हुए) दो-सौ साल तक प्रेत बनकर भटकूँगा नहीं तो। ये जो मेरा गुप्त पत्राचार है यदि सार्वजनिक हो गया तो!’

बहुतों को तो मरते-मरते यही रहता है, कहते हैं, ‘फ़ोन किधर है, इधर ले आओ! (श्रोता हॅंसते हुए) और सब अगर डिलीट नहीं कर सकता, तो फैक्ट्री सेटिंग ही रिस्टोर तो कर दूँ, कुछ इज़्ज़त है भाई! लोगों को दिख गया इसमें क्या-क्या है तो!’(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

तो ये होता है ज़िन्दगी और ज़िन्दगी – और मौत और मौत में अन्तर। और मर जाना ही है! हाँ? वो तेईस में चले गये, तो आप भी कौनसा एक-सौ-तेईस तक जियोगे? बस ये है कि जीवन में चंद सुविधाएँ जोड़कर के, कमज़ोरियों को प्रश्रय देकर के, चंद साल और जोड़कर के जीवन व्यर्थ भर कर लेना है पूरी तरह से।

प्र२: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न एक मेरी व्यक्तिगत दुविधा से है। आप जैसा बोलते हैं कि युवा होने का अर्थ है सुडौल शरीर होना, मज़बूत छाती और मज़बूत कन्धे। और आचार्य जी, आप हम लोगों को सलाह भी देते हैं कि खेलकूद में रहना चाहिए, शरीर को वर्जिश प्रॉपर्ली (भरपूर) देनी चाहिए।

पर जब शरीर को व्यायाम और खेलकूद और वर्जिश दी जाती है तो वो उसी तरह प्रपोशनली (अनुपात में) विकसित भी होता है, उसी तरह उसमें बदलाव आते हैं, चीज़ें अच्छी दिखने लगती हैं। और जब ऐसा होता है तो लोगों की तरफ़ से फिर प्रशंसा या कहें कि लोग नोटिस करने लगते हैं। जिसकी वजह से अगर सामने वाला नोटिस कर रहा है, तो सम्भावना है कि ख़ुद में देहभाव भी आ जाए कि ‘हाँ’, मेरी देह की वजह से मुझको प्रशंसा मिल रही है या ऐसा कुछ है।

तो आचार्य जी, इसमें फिर सामंजस्य से कैसे बैठाया जाए?

आचार्य: शरीर बनाकर के तुमको रैम्प पर थोडे़ ही जाना है! तुमको कुरुक्षेत्र में जाना है। दो होते हैं जिनका शरीर सुगठित होता है — एक रैम्प पर चलने वाला मॉडल और एक कुरुक्षेत्र का योद्धा। कुरुक्षेत्र के योद्धा में देहभाव आ सकता है? वो तो देह को लेकर के गया है क़ुर्बान करने! शरीर उसका भी सुगठित है, मज़बूत है, माँसपेशियाँ उभरी हुई हैं बिलकुल। लेकिन उसमें देहभाव कैसे आ जाएगा, वो तो देह की आहुति देने गया हुआ है।

यदि तुम देह बने बैठे हो तो देह की आहुति दे पाओगे क्या? तो मैंने तुमसे कहा है कि शरीर को मज़बूत रखो, इसलिए थोड़े ही कहा है कि शरीर को मज़बूत करके तुम शरीर की रोटी खाने लग जाओ, शरीर की प्रशंसा पाने लग जाओ। शरीर को मज़बूत इसलिए करना है ताकि जब भेंट चढ़ायी जाए तो किसी मज़बूत चीज़ की चढ़ायी जाए।

जिन लोगों को ज़िन्दगी में उत्कृष्ट काम करने होते हैं, उनके लिए बहुत बार ज़रूरी होता है कि अपनी देहगत कमज़ोरियों से बचकर रहें। आपको कोई ऊँचा काम करना है और कह रहे हो, ‘अरे! सिरदर्द हो गया, पेटदर्द हो गया, क्या बताएँ! कुछ उठा रहे थे, हाथ में, कलाई में लोच!’

कुछ भी उठाना है, क्या हुआ? ‘वो कलाई मुड़ गयी है!’ तो नहीं हो पाएगा न? आप जो बता रहे हो उससे मैं आशय ये निकाल रहा हूँ कि देह बना रहे हो, पर कुरुक्षेत्र में नहीं उतर रहे हो। ये तो भारी विडम्बना हो जाएगी कि शरीर वगैरह बना लिया, एकदम मज़बूत हो गये और गये हैं शहर के मेले में घूम रहे हैं, स्टारबक्स में कॉफी पी रहे हैं।

जो कह रहे हो वो बिलकुल समझ रहा हूँ कि फ़ीमेल अटेंशन (स्त्रियों से ध्यान) मिलना शुरू हो जाता है। तुमसे मैंने ये कहा था कि बॉडी बनाकर स्टारबक्स में बैठ जाओ? ये कहा था? भीम का शरीर बहुत मज़बूत है, किसके लिए? हिडिम्बा के लिए कि दुर्योधन के लिए? (सभी श्रोतागण हँसते हुए)

घटोत्कच वगैरह का इरादा है क्या? वो भी यही बोलकर के आयी थी। द्रौपदी का तो ये था कि वो तो अनायास ही मिल गयीं, अर्जुन लेकर के आये और कुन्ती ने बाँट दीं। तो भीम भी, ठीक है चलो! झोली में फल आ गिरा। पर हिडिम्बा का तो ये हुआ था कि बढ़िया भीम का शरीर देखा, ‘क्या मस्त बॉडी है! येहीछ चाहिए!’ (श्रोता ज़ोर हॅंसते हैं)

तो ये करना है?

तो तुम फिर कहाँ घूम रहे हो जहाँ तुमको लोगों की प्रशंसा वगैरह मिल रही है? कुरुक्षेत्र में तो कोई नहीं करता है किसी सूरमा की बॉडी की प्रशंसा! कि कर्ण सामने खडे़ हुए हैं, अर्जुन बोले, ‘वाह! क्या डोले।’ (सभी श्रोतागण बहुत ज़ोर से हँसते हुए)

हमने तो ऐसा कोई श्लोक महाभारत में पढ़ा नहीं कि संजय उवाच, अर्जुन बोले, ‘वाह डोले!’ (श्रोता हॅंसते हुए) इसका क्या करना है? (शरीर को इंगित करते हुए) यज्ञ करना है। ये तुम्हें सुख देने के लिए नहीं है, हालाँकि इससे सुख मिलने शुरू हो जाते हैं। पर ये इसलिए नहीं है कि तुम इससे व्यक्तिगत सुख पाने लग जाओ।

ये दुष्टों का नाश करने के लिए है, सुन्दरियों को रिझाने के लिए नहीं है। इंस्टाग्राम पर बैठकर के अलग-अलग अदाओं में फोटो डालने के लिए नहीं है ये।

कोई मज़बूत काम उठाओ, और जब उठाओगे तो पाओगे कि उसमें शारीरिक बल और सौष्ठव की भी ज़रूरत पड़ रही है। मैं नहीं कह रहा कि कोई अगर देह से कमज़ोर है किसी कारण से, जन्मगत कारण भी हो सकता है, मैं नहीं कह रहा कि कोई अगर देह से कमज़ोर ही है तो वो जीवन में कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। बिलकुल कर सकता है, पर अगर देह से मज़बूत हुआ जा सकता है तो क्यों नहीं?

क्यों एक ज़बरदस्ती की दुर्बलता पालकर रखी जाए? तो मैं इसलिए कहा करता हूँ कि शरीर को तगड़ा रखो, कोई ढंग का काम करोगे, बाधाएँ आएँगी, ऐसा होगा कि खाये-पिये बिना काम करना पड़ा एकाध-दो दिन। अब ये न हो कि चक्कर खाकर गिर गये।

चार लोग लगे थे किसी ढंग के काम में, एक उसमें बिलकुल सूरमा भोपाली। वो हर दो घंटे में पछाड़ खाकर गिर रहा है, मुँह से झाग-वाग मार रहा है। बाक़ी तीन क्या कर रहे हैं? वो भी काम छोड़कर के इसको छीटें-वींटे मारते रहते हैं, इसका ख़याल रखते हैं। ऐसा नहीं हो जाना है कि स्वयं तो कुछ कर नहीं पा रहे और साथियों पर भी भार बन रहे हो।

इसलिए कहा है मैंने कि शरीर बनाओ! सुन्दरता के लिए नहीं, मज़बूती के लिए। हाँ, मज़बूती में ही अपनी एक सुन्दरता होती है, वो बात अलग है।

समझ में आयी कुछ बात?

तुम्हारे पास कोई संसाधन हो या तुम अपने लिए कोई संसाधन विकसित कर लो और उसके बाद उसका सही इस्तेमाल न करो, तो वो संसाधन बोझ बन जाता है। क्या करोगे उसका? तो शरीर भी संसाधन ही है न? जीवन यज्ञ में अपने पास जो कुछ है सबकी आहुति देनी है। शरीर भी एक संसाधन है, उसकी भी आहुति देनी है।

आहुति अगर नहीं दे रहे हो तो शरीर बोझ बन गया। ज़िन्दगी पूछेगी तुमसे, ‘ये कन्धे, ये छाती, ये क्यों फुलाये हैं?’ क्या जवाब दोगे? सेल्फ़ी लेने के लिए, लड़की पटाने के लिए, ये तुम्हारा उत्तर होगा? और ज़िन्दगी तो पूछेगी कि इस पर रोज़ के दो घंटे लगाते हो, व्यायाम करते हो, किसलिए?

क्या बोलोगे?

यही बात जीवन के सारे संसाधनों पर लागू होती है। जो कुछ भी तुम्हारे पास है, बुद्धि है मान लो तुम्हारे पास। जीवन पूछेगा, ‘बुद्धि किसलिए मिली थी? किसी कम्पनी में सेल्स का काम करने के लिए? किसी बैंक में फाइनेंस का काम करने के लिए?’

बुद्धि इसलिए मिली थी?

बुद्धि तुम्हें दी गयी थी इसलिए कि तुम उसको बेचकर के कुछ पैसा कमाओ, अपना पेट पालो, बुद्धि तुम्हें इसलिए मिली थी? या बुद्धि इसलिए मिली थी कि बुद्धि के प्रकाश से अन्धकार की छाती चीर दो? पर देखो, बुद्धि का क्या कर रहे हो, ज़माने के बाज़ार में बुद्धि को बेचकर के पैसा कमा रहे हो।

कह रहे हो, ‘मुझे कोडिंग आती है या एमबीए कर रखा है, फाइनेंस आता है, तो बुद्धि को बेचता हूँ और पैसा कमाता हूँ।’

ऐसों से मैं पूछता हूँ, ‘ये वेश्या वृत्ति नहीं है क्या?’ कोई तन बेचे तो उसको बोल देते हो कि बाज़ारू है और कोई मन बेचकर के अपना पेट पाल रहा है, वो बाज़ारू क्यों नहीं है? बुद्धि बेचकर के पेट चला रहे हो तो बाज़ारू नहीं हो क्या? तन पर वो बात लागू होती है, मन पर वो बात लागू होती है, धन पर भी वही बात लागू होती है।

जीवन पूछेगा, ‘ये जो सब पैसा कमा रहे हो, किसके लिए?’ फॉर हूम? करते क्या हो इस पैसे का? कहाँ जा रहा है पैसा? कितना कमा रहे हो, उससे कहीं आवश्यक प्रश्न है ख़र्च कहाँ कर रहे हो? वो जो आता है वो जाता कहाँ है? किन ख़र्चों में? और अगर ख़र्चों में नहीं जा रहा, तो बैंक के लॉकर में जा रहा है, कहाँ? क्यों? किसलिए?

जो चुनौती को स्वीकार कर लेता है, चुनौती उसके लिए आसान हो जाती है। आसान चुनौती को स्वीकार नहीं किया जाता, स्वीकार करके चुनौती को आसान बना दिया जाता है।

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