जितनी देर में हम बात कर रहे हैं, जितनी देर में लोगों ने ये बात सुनी होगी थोड़े कुछ चंद मिनट उतनी देर में गई। अब हमें कभी उनके दर्शन नहीं होंगे गए। अब ऐसा भी नहीं है कि किसी और जन्म में वो लौट कर आएँगी। वो इतिहास बन गई वो कभी नहीं लौट कर आने की है। ये हम कर रहे हैं और इस भयानक तबाही से हम गुजर रहे हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
यशवंत राणा: नमस्कार, मैं राणा यशवंत आपका स्वागत करता हूँ। एक सिलसिला है जो ठहरता तो है लेकिन रुकता नहीं है। बीच में थोड़ी देर का ठहराव था तो बहुत सारे सवाल होने लगे थे कि ये सिलसिला चलना ही चाहिए। वो चलने लगा है। आचार्य प्रशांत जी के साथ मेरी बातचीत फिर से शुरू हो गई है, और आज मैं आचार्य जी के साथ हूँ। आचार्य जी बहुत-बहुत स्वागत है आपका।
आचार्य प्रशांत: आभार।
यशवंत राणा: दरअसल हम जो सवाल चर्चा में लाते हैं, जिन पर बहुत गंभीर बातें करते हैं। हमें इसका अंदाजा नहीं होता है कि हमारी जिंदगी पर और आने वाली पीढ़ियों के ऊपर उनका कितना असर होने वाला है। जो वक्त सामने आ रहा है वो अपने साथ कितने खतरे लेकर के आ रहा है। वो कितना भयावह है। सिर्फ हम चर्चा करते हैं और चर्चा करने के बाद अपनी जिंदगी में रम जाते हैं। सवाल है पेड़ों के काटे जाने का। और मैं हैदराबाद विश्वविद्यालय के बगल में 400 एकड़ का जंगल जो काटे जाने का फैसला है उस पर आऊँ, उससे पहले दो-तीन जानकारी आपके सामने रखना चाहता हूँ। इस दुनिया में हर साल 1 करोड़ हेक्टेयर, 1 करोड़ हेक्टेयर पेड़ काटे जाते हैं। और हर मिनट फुटबॉल का जो मैदान होता है उस मैदान के बराबर के 27 मैदान काटे जाते हैं।
काटे जाने के अपने-अपने कारण हैं: विकास है, उसके अलावा बहुत सारी चीजें हैं। हैदराबाद आज की तारीख में एक बड़ा मसला है। कि 400 एकड़ का जो जंगल है विश्वविद्यालय के ठीक बगल में, उसको काट करके




