जलता नेपाल: क्यों विफल हो जाती हैं क्रांतियाँ?

Acharya Prashant

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जलता नेपाल: क्यों विफल हो जाती हैं क्रांतियाँ?
यह नेपाल की नहीं, हर देश की कहानी है। दुनिया भर में अनगिनत क्रांतियाँ होती रहती हैं और उनसे कुछ बदलाव भी आते हैं, पर उतने से आपका पेट नहीं भरेगा। बाहरी बदलाव सदा आकर्षक लगता है, लेकिन उसके परिणाम या तो शून्य होंगे या आंशिक। क्रांति सदा भीतर से शुरू होनी चाहिए। एक जगा हुआ आदमी सबसे बड़ी क्रांति होता है। जब भीतरी आज़ादी नहीं होती तो बाहर भी आज़ादी का दुरुपयोग ही होता है। ज़बरदस्त क्रांतियाँ हों, लेकिन ठोस आधार पर और ऊँचे लक्ष्यों के लिए हों। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्कार। मैं नेपाल से हूँ और करीब मैं सात-आठ साल से यहाँ पर काम कर रहा हूँ। मैं जो भी आंदोलन हुए, फ़ॉर एक्ज़ाम्पल 2009 का आंदोलन, इससे बड़ा आंदोलन था। उससे पहले मैं क्लास 10th में पढ़ रहा था उस समय और मैंने जो भी वहाँ पर गृहयुद्ध हुआ, वो भी बहुत ही सामने से देखा हुआ है और उस आंदोलन में भी मैं किसी तरह से मतलब पार्टिसिपेट था 2009 के आसपास। और उसके बाद उस समय जो भी मोस्ट वहाँ की लीडिंग पार्टी थी, आफ्टर प्रोटेस्ट, वो लोग सत्ता में आए। समहाउ, आई वज़ ऑल्सो सपोर्टिंग देम। फिर मेरा भी हार्टब्रेक हो गया। तब तक लगता था कि कुछ होगा, कुछ नई चीज़ें होंगी, क्रांति हो रही है तो कुछ चेंजेस होंगे, पर वो कुछ दिखा नहीं। तो वहाँ से मेरा हार्टब्रेक हो गया कि ये चीज़ कुछ नहीं हो सकती है, कहीं निकल जाओ और अपना करियर देखो। उसी तरह से मैं अभी इधर ही हूँ।

अभी जो आंदोलन है, इसको जेनज़ी आंदोलन बोला जा रहा है। इसमें दो चीज़ें दिख रही हैं। एक तो सप्रेशन दिख रहा है, भ्रष्टाचार, एजुकेशन नहीं है। सारे लोग बाहर हैं, जाना पड़ता है। जो भी युवा वर्ग है, आइधर गल्फ कंट्रीज़ जाते हैं वे लोग। वहाँ पर कोई स्किल वर्क होता नहीं है या उनको इंडिया में आना पड़ता है। वहाँ पर हर तरह से दबाव हुआ है और जो भी मिनिस्टर्स वग़ैरह थे, वे लोग, उनके बच्चे बहुत ही अच्छे पोज़ीशन में हैं।

विद्रोह की शुरुआत कहीं-न-कहीं सोशल मीडिया से भी हो रही थी। टिक-टॉक या इंस्टाग्राम में टैग करो उनको। और वहाँ पे अब क्या होगा, बहुत ही ज़्यादा अस्थिरता है। कोई भी प्रेडिक्शन नहीं कर सकते हैं कि आगे क्या होगा। कुछ युवा नेता हैं, उनको बोला जा रहा है कि तुम आओ और बचाओ हमें। इससे पहले भी एक एंटी मोनार्की रिवोल्यूशन करने की कोशिश की गई।

तो मेरा प्रश्न ये है कि रेवोल्यूशन की शुरुआत हमने बहुत देखी नेपाल में, बहुत सारी हुई मगर कोई भी नया शुरुआत कहीं पे भी नहीं आ पा रही है। उसमें युवा वर्ग को आगे कैसे, क्या करना चाहिए? एंड ऑफ यही होता है कि हम बाहर चले जाएँ या कहीं चले जाएँ और ख़ुद का देख लें। फिर हम जाकर कुछ करें।

आचार्य प्रशांत: देखिए, ये तो वही है, हार्टब्रेक ही है। आप एक जवान आदमी की सारी उम्मीदें और सपने लेकर के सड़क पर उतरते हो। आप दिल से चाहते हो कि बदलाव हो, देश बेहतर बने, खुशहाली आए, लोग पढ़े-लिखें, संपन्नता भी आए। जो भी सब अच्छी चीज़ें होती हैं आएँ, आप ये सब चाहते हो। फिर आप एक दिन देखते हो कि आसमान गूँज रहा है क्रांति के नारों से, आपको लगता है वो दिन आ गया। आपको लगता है कि अब कुछ सचमुच बदलेगा, कुछ नया होगा। और आपकी उम्मीदें उस दिन पूरी तरह से ढह जाती हैं जिस दिन कोई आपको याद दिलाता है कि किसी ने कहा था, "द मोर थिंग्स चेंज, द मोर दे रिमेन द सेम।" अब आप क्या करोगे?

जब तक हालात ख़राब थे, तब तक आपको एक आशा थी कि किसी दिन क्रांति होगी और उस दिन कुछ अच्छा हो जाएगा। अब तो क्रांति भी हो गई, अब किसके भरोसे जियोगे? फिर तो यही बचता है कि चलो कहीं और चलो या अगर यहाँ भी रहना है तो निस्तेज, नाउम्मीद होकर रहो। और कोई बहुत योद्धा बन भी रहा हो, क्रांतिवीर बन रहा हो, तो उसको यही बोलो, कि ‘बेटा इन सब से कुछ होना नहीं है, चुपचाप अपनी ज़िंदगी और अपने करियर पर ध्यान दो। हमने भी बहुत क्रांतियाँ देखी हैं, कुछ होता नहीं है।’

ये नेपाल की नहीं, हर देश की कहानी है, भारत में भी क्रांतियाँ हुई हैं। संपूर्ण क्रांति, जयप्रकाश नारायण को याद कर लीजिए और ये आज़ादी के बाद की बात है, अभी 75। और आज़ादी के पहले तो अनगिनत क्रांतियाँ, छोटे-छोटे स्तर पर, कुछ बहुत बड़ी वाली भी। 1931, 1942 आप कहोगे बड़ी वाली हैं, 1921, और बीच-बीच में न जाने कितनी छोटी-छोटी। कुछ उनसे आते हैं बदलाव।

आप दुनिया भर में अगर देखेंगे आपको रिवोल्यूशन पर रिवोल्यूशन दिखाई देंगे — इंग्लिश, फ़्रेंच, स्पैनिश, जर्मन, अमेरिकन। कुछ तो बदलाव आते ही हैं। गृहयुद्ध आपने कहा, अमेरिकी गृहयुद्ध हुआ तो उससे कुछ तो बदलाव आया ही। लेकिन कितना? कितना? उतने से अगर एक आदमी राज़ी हो जाए, ख़ासकर एक जवान आदमी राज़ी हो जाए, तो फिर बात ही क्या है? उतने से नहीं आपका पेट भरेगा। सचमुच जितना बदलाव आप चाह रहे हो, उसका शतांश भी नहीं ला पाती एक सफल क्रांति भी।

अभी अरब स्प्रिंग हुई थी, वो अरब देशों में थी। कितना बदलाव आ गया? और राजनेता मुस्कुराते हैं, तानाशाह मुस्कुराते हैं। वो कहते हैं, कर लो क्रांति हम तुम्हारी माँगे कभी पूरी, कभी आंशिक मान भी लेंगे। पूरी तरह असफल क्रांतियाँ कम होती हैं, सब क्रांतियों में कुछ माँगे तो मान ही ली जाती हैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से। और यही तो क्रांतियों की सबसे बड़ी त्रासदी है कि ऊपर-ऊपर से देखो तो यही लगता है कि क्रांति में कुछ तो दम था, थोड़ी तो सफलता मिली।

कहाँ मिली? क्या हुआ? क्यों नहीं मिलती?

क्योंकि आप बाहरी परिवर्तन पर आशा टिकाए बैठे थे, इसलिए नहीं मिलती है। आपने सोच रखा था कि आपकी बुरी हालत की ज़िम्मेदार ये व्यवस्था है। और ये सोचना बड़ा लुभावना लगता है कि मैं तो बढ़िया आदमी हूँ, आज मैं दुर्दशा में हूँ तो इस सड़ी हुई व्यवस्था के कारण। ‘बदल देंगे, ढहा देंगे, गिरा देंगे।’ आजकल वो चलता है न, ‘सिस्टम फाड़ देंगे।’ बड़ा अच्छा लगता है। उसमें एक अहंकार है। क्या? मैं तो ठीक हूँ, मैं ठीक हूँ, सिस्टम ख़राब है।

अगर आप ठीक हो तो सिस्टम इतना ख़राब कैसे हो सकता था? क्या सिर्फ़ दोष दूसरों का है? क्या सिर्फ़ दोष जो कुर्सी पर बैठे हैं, उनका है? बहुत सारी क्रांतियाँ तो लोकतंत्रों में हो रही हैं, डेमोक्रेसीज़ में हो रही हैं। जिनके ख़िलाफ़ क्रांति करने की नौबत आ रही है, उन्हें चुना किसने था? और अगर आप वही हो जिसने उन्हें चुना था, तो आपकी क्रांति की गुणवत्ता भी वही होगी जो आपके वोट की थी, कि नहीं?

बाहरी बदलाव सदा आकर्षक लगता है, लेकिन उसके परिणाम या तो शून्य होंगे या आंशिक।

क्रांति शुरू सदा यहाँ होनी चाहिए (अपने हृदय की ओर इंगित करते हुए)। और जितने भी सत्तासीन लोग हैं, वो यहाँ क्रांति शुरू नहीं होने देंगे, शिक्षा व्यवस्था से अध्यात्म को हटाए रखकर। क्योंकि पहली मूलभूत और मौलिक क्रांति तो यही होती है, ख़ुद को जानना, अपने भीतरी बंधनों को पहचानना। जो आपको ग़ुलाम बनाए रखना चाहता है, वो एक काम निश्चित करेगा, वो आपको कभी आपके बारे में जानने नहीं देगा — न तो औपचारिक शिक्षा में स्कूल-कॉलेज में, और न ही जो परिवार और समाज से आपको अनौपचारिक शिक्षा मिलती है, उसमें।

वहाँ सब बातों के लिए जगह होगी, एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ — आत्मज्ञान — के लिए कोई जगह नहीं होगी। क्योंकि वो पहली क्रांति होती है और वो क्रांति हो गई तो बाक़ी क्रांतियाँ अपने-आप हो जाती हैं और सफल हो जाती हैं। नहीं तो फिर क्रांतियाँ बहुत छोटे मुद्दों पर हो जाती हैं, बहुत छोटे मुद्दे। वो छोटे मुद्दे फिर सुलट जाते हैं, उससे क्या होता है।

बांग्लादेश अभी फिर असहज हो रहा है। वहाँ भी युवाओं ने खूब जान दी, खूब खून बहा सड़कों पर। उनको लगा कि हमने तत्कालीन प्रधानमंत्री को हटा दिया, शेख़ हसीना भाग गई, हो गया। अब समय बीत गया है, साल से ऊपर हो गया है। वहाँ भी अब यही प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है, मिला क्या? मिला क्या?

जहाँ पर क्रांतियाँ दबा दी जाती हैं — चीन ने जिंजियांग में दबा दी, हांगकांग में दबा दी, तियानमेन स्क्वायर आप जानते ही हो। वहाँ हमें लगता है कि अगर हो गई होती क्रांति तो कुछ हो जाता। जहाँ क्रांति हो गई, वहाँ फिर हम पूछते हैं, हो भी गई तो क्या हो गया? क्योंकि ये क्रांतियाँ चाहे सफल हों या असफल, सब बाहरी हैं। इतनी बड़ी क्रांति थी रूसी क्रांति, वहाँ फिर तानाशाह है। ज़ार कहीं चला गया, वो 97% वोट लेकर वापस आया है। और जो दुनिया की सबसे अपने-आप को सशक्त डेमोक्रेसी कहते हैं, देखो वहाँ पर कौन है।

जब भीतर बंधन ही बंधन हों, तब बाहर आपको आज़ादी मिल भी जाए तो आप ऐसे लोगों को चुनोगे। और आप बोलते रहिए भले ही, कि ‘अरे नहीं, नहीं, नहीं, ये तो ग़लत आदमी को चुन लिया अमेरिका ने। देखो भारत के साथ भी बुरा कर रहा है।’ अप्रूवल रेटिंग्स पता है न कितनी है? वहाँ लोग खुश हैं, बड़ा सही बंदा है एकदम सही वोट दिया है।

जब आप भीतरी तौर पर सुलझे हुए नहीं होते, ग़ुलाम ही होते हो, तो बाहरी आज़ादी तो बल्कि भारी पड़ जाती है। और न जाने कितने उदाहरण हैं दुनिया में, जहाँ क्रांतियों के बाद स्थितियाँ और ख़राब हो गईं। जो क्रांतियों के महानायक थे, वो और ज़बरदस्त अत्याचारी तानाशाह निकले।

आप द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में पढ़िएगा, वहाँ पर कई तानाशाहों का नाम आता है — जर्मनी की ओर से, इटली की ओर से, इधर तो रूस में भी बैठे थे, उधर जापान में भी उनको आप कोई लोकतांत्रिक तो नहीं मानोगे। आप पढ़िए, आप हैरान रह जाएँगे। सबको जनता का समर्थन प्राप्त था भाई।

जब भीतरी आज़ादी नहीं होती तो बाहर भी आज़ादी का दुरुपयोग ही होता है।

लेकिन हमें ये बात स्वीकारना अच्छा नहीं लगता, ख़ासकर जवानी में तो बिल्कुल नहीं लगता। वही लगता है, बस सिस्टम फाड़ दो, रेल जला दो, ट्रेन जला दो, बस जला दो, चक्का-जाम कर दो।

मैं इस जज़्बे, दाद देता हूँ। चलो, अच्छा है, किसी में ये दम तो है कि सड़क पर निकल रहा है, कुछ कर रहा है, सामने आ रहा है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन मुझे ये भी पता है कि ये सब असफल जाना है। हमारे यूपी, बिहार में तो 50% से ज़्यादा छात्र होंगे जिन्होंने कभी-न-कभी, किसी-न-किसी तरीक़े के जन आंदोलन में भाग लिया होगा। उसका यही मतलब होता है, हाईवे जाम कर दो, ट्रेन के सामने बैठ जाओ, कहीं किसी सरकारी दफ़्तर में घुस जाओ, जेल की घेराबंदी कर दो, यही सब। धरना-प्रदर्शन झंडियाँ लेकर, दुकानों के शटर गिरा दो। बहुतों ने किया होगा। क्या? क्या मिल गया? हँसते हैं ये सब हँसते हैं, बहुत हँसते हैं।

जो ये सब हमारे नेता, पॉलिटिशियन हैं, वो बहुत हँसते हैं। कहते हैं चलो अच्छा है, कोई नया युवा नेता उभरा है, कुछ भीड़ इसने इकट्ठा कर ली है, बहुत जज़्बा है, नारे लगवा रहा है। अच्छा है, अच्छा है, करने दो। कहते हैं, अगर ये सफल हो गया तो हमारे जैसा हो जाएगा, अगर असफल हो गया तो धूल हो जाएगा, करने दो। इसकी सबसे बड़ी हार ये होगी कि ये सफल हो जाए। क्योंकि अगर ये सफल हो गया तो बिल्कुल हमारे ही जैसा हो जाएगा, करने दो।

सबसे बड़ी क्रांति होता है एक जगा हुआ आदमी। क्रांति की इकाई व्यक्ति है।

समझ रहे हैं आप? ये समाज क्या चीज़ होता है? समाज तो एक सिद्धांत है, चैतन्य इकाई तो व्यक्ति है न। तो क्रांति भी व्यक्ति के स्तर पर ही संभव है।

व्यक्ति सब सोए हुए हैं, बुझे हुए हैं, और भीड़ कह रही है — क्रांति, क्रांति। तो मज़ाक है बस, और क्या है। मशाल की आग बाद में चाहिए, पहले इधर (अपने हृदय की ओर इंगित करते हुए) चाहिए।

वास्तविक क्रांति होती है स्कूलों में, कॉलेजों में। कॉलेज बंद कराके नहीं, नारे लगवाके नहीं, कॉलेज खुलवाके, क्लासरूम चलवाके, वो है क्रांति। जब एक योग्य शिक्षक बैठा होता है अपने छात्रों के सामने, वहाँ हो रही है क्रांति। फिर चाहे वो समाजशास्त्र पढ़ा रहा हो या विज्ञान पढ़ा रहा हो, वहाँ हो रही है क्रांति। इसीलिए तानाशाहों को यूनिवर्सिटीज़ पसंद नहीं आतीं। देखिए, अमेरिका में हार्वर्ड का क्या चल रहा है अभी। क्योंकि वास्तविक क्रांति तो शिक्षा ही है, दुनिया भर की शिक्षा ही नहीं, बाहरी शिक्षा, भीतरी शिक्षा भी। वो है क्रांति पर वो लगती नहीं है क्रांति जैसी। वहाँ तो लगेगा कि हाँ, सब बड़े अनुशासन से, व्यवस्था से बैठे हैं, शांत और मौन होकर सुन रहे हैं। तो ये क्रांति थोड़ी है? वही असली क्रांति है। आत्मा का मौन उद्घोष लाखों की भीड़ के नारों से ज़्यादा प्रबल होता है।

लोग कहते हैं न, भारत में ज़्यादा क्रांतियाँ क्यों नहीं हुईं? क्योंकि भारत उन जगहों में से है, बहुत दुख की बात है, बड़े अफ़सोस से कहना पड़ता है जहाँ पिछली शताब्दियों में मन को सबसे ज़्यादा जकड़ कर रखा गया। और क्रांति की शुरुआत तो असली यहाँ (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) से ही होनी है न। जब मन को इतना बाँध दोगे रूढ़ियों में, मान्यताओं में, तो कौन-सी क्रांति।

उसके बाद अगर कुछ तरीक़े के आंदोलन होंगे भी तो छोटे-छोटे उद्देश्यों के लिए हो जाएँगे। बहुत संकीर्ण उद्देश्यों के लिए आंदोलन हो जाएँगे, उनसे कुछ होना नहीं। कोई वर्ग आंदोलन कर देगा कि आरक्षण होना चाहिए, दूसरा वर्ग आंदोलन कर देगा कि आरक्षण नहीं होना चाहिए। एक राज्य में आंदोलन होगा कि फलानी नदी का पानी रोककर रखो। दूसरे राज्य में आंदोलन होगा कि हमें पानी चाहिए। टैक्स बढ़ा देगी सरकार, तो उसके ख़िलाफ़ कुछ लोग सड़कों पर उतर आएँगे। इस किस्म के आंदोलन हो जाएँगे। इनसे कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं आ जाना।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। वहाँ पर सोशल मीडिया बैन के बाद ये देखा जा रहा है कि युवाओं में बहुत आक्रोश है और उस आक्रोश के वजह से वहाँ पर पार्लियामेंट में आग लगा दी गई है। जो प्राइम मिनिस्टर की वाइफ़ हैं, उनको ज़िंदा जला दिया गया। और इसी आक्रोश वाले प्रोटेस्ट में जो युवा हैं, उनमें से कम-से-कम 19 युवाओं की मृत्यु हो गई है।

आचार्य प्रशांत: सुबह भी आँख पूरी तरह खुली नहीं होती है। आप सूरज की रोशनी नहीं देखते हो, आप स्क्रीन की रोशनी देखते हो। ठीक कह रहा हूँ? किस-किस की आँख खुलती है स्क्रीन की रोशनी देखकर? (लगभग सारे श्रोता अपना हाथ उठाते हैं)। पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ता है सुबह-सुबह कान में? चिड़िया चहचहाती हैं सुबह उठते हो तो? या क्या आवाज़ आती है पहली? बीप बीप बीप, नोटिफ़िकेशन। यही आता है न? ये है।

नेपाल भर की बात नहीं है, ये चीज़ तो हर जगह की है भारत की है, पूरी दुनिया की है। मैं क्रांतियों का बड़ा पक्षधर हूँ, मैं तो चाहता हूँ कि ज़बरदस्त क्रांति हो। और इसके लिए मैं युवाओं का मुँह तकता हूँ कि हो क्रांति। जवान लोग थे, गोलियाँ चली हैं, वॉटर कैनन रहा है। और कितने तरीक़े के काम पुलिस ने किए होंगे। आमतौर पर जनतंत्र में होता नहीं है कि पुलिस नागरिकों पर ही गोली चलाए। ये सब हुआ है। काठमांडू जला है धू-धू करके।

मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ कि जो लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और जान दे रहे हैं, उन्होंने ऊर्जा भी दिखाई है, साहस भी दिखाया है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा साहस और तुम्हारी ज़िंदगी व्यर्थ न जाए, खून अगर बहे तो फिर रंग भी लाए। बहुत अच्छी बात है, बहुत ताक़त की, जोश की बात है कि जवान आदमी सड़कों पर खून बहाने को राज़ी है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन अफ़सोस मुझे तब होता है जब मैं ये सारी चीज़ व्यर्थ जाते देखता हूँ।

बिल्कुल सही बात है, सरकार में भ्रष्टाचार है। और युवा सोशल मीडिया का उपयोग उस भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए भी कर रहे थे। और बिल्कुल हो सकता है कि सरकार ने जो पाबंदियाँ लगाई थीं, उनमें एक सरकार का उद्देश्य ये भी हो कि सोशल मीडिया पर जो एंटी करप्शन बातें हो रही थीं, उन पर बंदिश लगाई जा सके। बिल्कुल हो सकता है ये सब कुछ। मैं ये सब बातें जानता हूँ, रोज़ पढ़ रहा हूँ। कई दिनों से ये सब चल रहा है। लेकिन फिर भी मैं समझना चाहता हूँ, भीतरी आज़ादी कहाँ है? जिन राजनेताओं के ख़िलाफ़ इतना ग़ुस्सा फूटा, उनको वोट किसने दिया था? भीतरी आज़ादी अगर हो तो क्या हम ऐसे राजनेता चुनेंगे पहले? बोलो।

हमारी आज़ादी की तो ये हालत है कि इंसान भी नहीं चाहिए हमें बंधक बनाने के लिए, ऐल्गोरिद्म काफ़ी होता है। हमें बेड़ियाँ अब ऐल्गोरिद्म पहनाता है, इंसान की ज़रूरत भी नहीं रही। और AI के आने के साथ ऐल्गोरिद्म और ज़्यादा और ज़्यादा पैने होते जा रहे हैं। जितना आप अपने आप को नहीं जानते, उससे ज़्यादा ऐल्गोरिद्म आपको जानता है। वो तत्वज्ञानी हो चुका है। आपको आत्मज्ञान हो न हो, उसको आपके ज़ेहन का, आपके मन का पूरा ज्ञान है। वो ये तक जानता है कि आप अगर दिन में लॉग-इन करो तो आपकी फ़ीड में क्या आना चाहिए और अगर आप रात में 2:00 बजे देखो तब क्या दिखाना है। आप देख लीजिएगा, जो सामग्री वो आपको रात में दिखाता है, दिन में नहीं दिखाएगा। जो सामग्री वो आपको किसी ख़ास दिन पर दिखाता है, वो दूसरे दिनों पर नहीं दिखाएगा।

बिल्कुल, आज़ादी होनी चाहिए। और आज़ादी के लिए क्रांति होनी चाहिए, विद्रोह होना चाहिए। युवाओं को सड़कों पर बेशक उतरना चाहिए। पर अधूरी क्रांतियाँ कुचल दी जाती हैं और ख़तरा ये रहता है कि कई अधूरी क्रांतियाँ सफल मान ली जाती हैं। उन्होंने जो वहाँ पर बलिदान दिया है, खून बहाया है, मैं सम्मान कर रहा हूँ उसका। पर चूँकि उन्होंने खून बहाया है, इसीलिए दुख भी है मुझे कि खून बहा है तो फिर अब तुम्हारी कुर्बानी सार्थक भी तो होनी चाहिए। बिल्कुल हों, ज़बरदस्त क्रांतियाँ हों, जैसी हुई हैं वैसी हों। उससे और ज़्यादा सघन हों, तेज हों, प्रज्वलित हों। मैं कहूँ हर देश में हों, बिल्कुल होनी चाहिए। लेकिन और ठोस आधार पर और ऊँचे लक्ष्यों के लिए।

कहाँ है युवा जो पृथ्वी की ही आसन्न अकाल मृत्यु को रोकने के लिए विद्रोह करने को तैयार हों? बताओ, बोलो। अमेरिका में इस समय क्लाइमेट के ख़िलाफ़ दुनिया का सबसे बड़ा अपराध चल रहा है। ऑयल-गैस, इनके खनन के, इनके रिफाइनमेंट के और फिर इनके निर्यात के लाइसेंस को फास्ट-ट्रैक किया जा रहा है। माने, तेज गति से फॉसिल फ्यूल निकाला भी जाएगा, प्रोसेस भी किया जाएगा, एक्सपोर्ट भी किया जाएगा। और ये सब सूचना पब्लिक डोमेन में न पहुँचे, इसके लिए जितने भी इंफॉर्मेशन डिसमिनेटिंग प्रोग्राम थे, किसी को डिफ़ेन्ड किया जा रहा है और किसी को बैन किया जा रहा है।

कर रहे हैं क्या युवा कोई क्रांति? कर रहे हैं? कोई क्रांति नहीं दिखाई दे रही। क्रांतियाँ चाहिए, पर सही मुद्दों के लिए चाहिए, गहरे मुद्दों के लिए चाहिए।

अभी कल रात की या परसों रात की बात है, वो जो फ्लाईओवर है नोएडा में, जो सेक्टर 18 से फोर्टिस की तरफ़ जाता है, उस पर एक गाड़ी चल रही थी। किसी ने देखा था? रात के 11 बजे के आसपास का समय होगा। और जल रही थी, भयानक जल रही थी। इस कद्र जल रही थी कि गाड़ी का मेक-मॉडल कुछ पता नहीं चल रहा था, इतना वो आग की लपटों में घिरी हुई थी। कुछ नहीं पता चल रहा था कौन-सी गाड़ी दूर से, ट्रैफिक जाम लगा हुआ था।

ट्रैफिक जाम लगा हुआ था और उस तरफ़ जब तक मैं पहुँचा था, तो फायर-ब्रिगेड आ गई थी। वो उसे पानी डाल रही थी, पर उसके बाद भी वो जल रही थी। ट्रैफिक जाम क्यों लगा हुआ था?

श्रोता: देखने के लिए।

आचार्य प्रशांत: नहीं, देख नहीं रहे थे।

श्रोता: वीडियो बना रहे थे।

आचार्य प्रशांत: गाड़ियों के ऊपर खड़े होकर के बना रहे थे। डिवाइडर है, डिवाइडर के उस पार गाड़ी जल रही है और इस पार गाड़ियों के ऊपर खड़े होकर कोई बोनट पर ऐसे चढ़ा हुआ है, एक तो गाड़ी के ऊपर ही खड़ा हुआ था छत पर, वहाँ से बना रहे थे कि यहाँ से बढ़िया सीन आएगा, कोई ऑब्स्ट्रक्शन नहीं है। और उसके पीछे लगाओ सनसनीख़ेज़ म्यूज़िक और उसको चढ़ा दो, व्यूज़ बटोरो, लाइक्स बटोरो, जो भी उससे फिर मिलता हो।

19 जवान मौतें! उनको ऊँची से ऊँची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि संपूर्ण क्रांति हो। वो क्रांति करने ही निकले थे, क्रांति होनी चाहिए। समझ में आ रही है बात? गुस्सा अच्छी बात है। हमें चाहिए जवानी का जुनून, हमें चाहिए तमतमाए तेवर, सही उद्देश्य के लिए। नहीं तो जो हमें बंधन में रखते हैं वो जीत जाएँगे, एकदम जीत जाएँगे।

छोटा-सा लक्ष्य दोगे अगर क्रांति को तो आग ठंडी पड़ जाएगी। वो लक्ष्य मिल जाएगा। अगर लक्ष्य बस यही है कि सरकार गिरानी है तो सरकार गिर जाएगी। सरकारें तो इतनी आती हैं चली जाती हैं। अगर लक्ष्य बस इतना-सा है कि कोई नियम बन गया है, वो नियम वापस होना चाहिए, तो वो नियम वापस हो जाएगा। स्थितियाँ लेकिन बदलेंगी नहीं पूरे तरीक़े से, अंदरूनी आज़ादी चाहिए। और उसका मतलब ये होता है कि मुझे पता हो मेरे मन पर कब्ज़ा किसने कर रखा है। मुझे पता हो कि मैं अपने ऊपर किसी को हावी नहीं होने दूँगा यहाँ पर (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए)। और यहाँ जो आप पर हावी होता है न, वो ज़रूरी नहीं है कि ताक़त दिखाकर और डराकर ही हावी हो। वो लुभाकर भी हावी होता है, बरगला कर भी, भ्रमित करके भी हावी होता है।

ये होती है अंदरूनी आज़ादी — ग़ौर से देखना कि कौन भीतरी तौर पर मुझ पर हावी है, कौन चढ़ा बैठा है मेरे विचारों पर, मेरी मान्यताओं पर। कहाँ से आ रही हैं मेरी धारणाएँ, मेरे संस्कार। उसको ग़ौर से देखना और ग़ौर से देखने मात्र से ही बेड़ियाँ पिघलने लगती हैं, हमारी नज़रों में आग होती है। यही होती है संपूर्ण क्रांति।

हाँ, उसके बाद फिर दिखाई दे कि बाहर कोई है, जो अभी भी ज़ंजीरें लेकर खड़ा है, तो फिर बाहर भी भिड़ जाओ उससे। पर भीतरी तौर पर अभी ग़ुलाम हो और बाहर बंदूकें, तलवारें, मशालें, तो बात बनेगी नहीं। है कि नहीं है?

छोटी चीज़ के लिए शोर मचाओगे तो छोटी चीज़ तुमको दे दी जाएगी, शोर ख़त्म।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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