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जैसी नीयत वैसी नियति || आचार्य प्रशांत, वेदान्त पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
18 min
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आचार्य प्रशांत: वही विषय है, वही ध्येय है महर्षियों के, देवताओं के ध्यान का। वो ऐसे ही नहीं महर्षि कहला रहे हैं, कि आँख बंद करके ध्यान कर रहे हैं आलू, दही वाली चाट और गुलाब-जामुन का, और कहला रहे हैं बाहर से महर्षि।

महर्षि कौन है? बस एक ही उसकी पहचान है, कि उसका ध्येय सच्चाई होती है। उसको बेवकूफ़ बन कर नहीं जीना। और कोई बहुत दिव्यता की बातें मत जोड़ो उसके साथ। उसकी एक ही माँग है, क्या? कहता है, 'बहुत बेवकूफ़ बन लिये। आगे बढ़ते हैं तो लगता है ज़मीन है और वहाँ पानी भरा हुआ है।'

जैसे दुर्योधन के साथ हुआ था, याद है? उसको लग रहा है कि ये तो समतल ज़मीन है, पर वहाँ पानी है, गिरा धम्म! फिर थोड़ी देर बाद आगे बढ़ा तो लगा पानी है, तो उसमें वो अपनी धोती-वोती उठाकर के प्रवेश कर रहा है कि ये तो पानी है। वो पानी है ही नहीं वहाँ, वो ज़मीन थी। यही हाल हमारा है। यही मौक़ा था जब दुर्योधन महर्षि बन सकता था। यही मौक़ा था जब उसे दिखायी देता कि कैसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन सब मिलकर के धोखा देते हैं। अगर यहाँ धोखा हो रहा है तो क्या भरोसा है पूरी ज़िंदगी धोखा नहीं खाया और आगे भी नहीं खाता रहूँगा।

इतना-सा एक अवसर किसी सुयोग्य प्रार्थी के लिए काफ़ी होता है। यही फिर एपिफेनिक हो जाता है। अंग्रेज़ी में एपिफेनिक का मतलब समझते हो? सडन रियलाइज़ेशन। खट से आँख खुल गयी। जैसे ज़ेन कहानियों में होता है, कि भिक्षु जा रहा था, जा रहा था, जा रहा था, तभी उसने क्या देखा सामने? उसने देखा एक गधा और घोड़ा साथ-साथ चले जा रहे हैं, एंड ऐट दैट मोमेंट बावो वाज एनलाइटेंड (और उसी क्षण बाओ प्रबुद्ध हो गया)।

अब लोग अपना सिर खुजाते हैं, सिर फोड़ लेते हैं, कहते हैं इसमें उसने ऐसा क्या देखा कि तत्काल उसको बोध हो गया! ऐसा क्या था कि गधा और घोड़ा साथ जा रहे थे और ये देखा उसने और बिलकुल! हम तो रोज़ गधा और घोड़ा भी साथ देखते हैं, घोड़ा और घोड़ा भी साथ देखते हैं, गधा और गधा भी साथ देखते हैं, हमें तो कभी कुछ समझ नहीं आया।

वो तब होता है जब तुम्हारी नीयत हो जग जाने की। फिर एक छोटा-सा झटका भी काफ़ी होता है। जैसे कोई इरादा करके सोया हो कि सुबह पाँच बजे उठ ही जाना है फिर एक हल्की सी आवाज़ भी काफ़ी होती है। फिर अलार्म कितनी देर तक बजता है? अगर इरादा पक्का था, ईमानदारी का था कि उठना-ही-उठना है, तो अलार्म को कितनी देर तक बजना होता है? वो बजा नहीं कि तुम उठ बैठे।

मैं अपनी बताता हूँ, बहुत बार मेरे साथ हुआ है कि मैं अलार्म बजने से ठीक दो मिनट पहले उठ जाता था। अलार्म को बजने का भी मौक़ा नहीं। जब चाहा उठना, जब पता था कि उठना आवश्यक है। हमेशा नहीं, मैं कोई दिव्यकथा नहीं सुना रहा हूँ कि 'अहाहा, ये मिल गयी, मिल गयी, छुपा रहे थे निकल आयी।' ऐसे ही एक साधारण अनुभव है। समझ में आ रही है बात?

वो तैयारी होनी चाहिए। ध्येय होना चाहिए मुक्ति। जिसका मुक्ति ध्येय हो गया, ऋषि कह रहे हैं, ‘वही महर्षि है, वही देवता है।’ तो देवता तुम ऐसे ही नहीं बन जाओगे कि देवताओं जैसे कपड़े धारण कर लिये और मुकुट वगैरह लगाकर घूमने लग गये बाहर सड़क पर कि हम देवता हैं। माथे पर मुकुट है, कंधे पर गदा है, दूसरे कंधे पर धनुष है, पीछे तरकश है। तीर वगैरह निकाल कर इधर-उधर मार रहे हैं। म्यूज़ियम में रख दिये जाओगे, जेल में भी नहीं।

देवता कौन? जिसका ध्येय मात्र सत्य है। जिसका ध्येय सत्य हो गया, वह देवता हो गया। समझ में आ रही है बात? और इसका उल्टा भी समझ लो। जिसने नीयत ही बना रखी है झूठ के कीचड़ में बिलबिलाते रहने की, वही फिर राक्षस, वही असुर है। उसका इरादा ही ग़लत है।

बात स्थिति की नहीं है कि हालत क्या है, बात इरादे की है। हो सकता है स्थितियों ने किसी को आसमान पर पहुँचा दिया हो, पर वो आसमान पर पहुँच करके भी नीचे देख कीचड़ की ओर ही रहा है। उसको यही लग रहा है जल्दी से जाकर के गोता मार दूँ नीचे कीचड़ में। तो ये कौन है? राक्षस, असुर है ये।

और कोई नीचे कीचड़ में भी धँसा हुआ है परिस्थितियों के संयोग के कारण, लेकिन वो देख लगातार आकाश को रहा है, तो वो कौन है? वो देवता है। स्थितियों पर नहीं, इरादे पर जाना। स्थितियाँ तो बहुत हद तक आकस्मिक होती हैं, संयोग का खेल। ये देखो कि नीयत क्या है, ध्येय क्या है, चाहते क्या हो।

"उस परमदेव परमेश्वर को जानकर के — ज्ञात्वा, मानकर नहीं, जानकर — जानने के बाद मनुष्य मृत्यु के पाश को, बंधनों को काट डालता है।"

समझ में आ रही है बात? मृत्यु का पाश क्या है? एक शब्द में बताना। मृत्यु का बंधन क्या है, मृत्यु का पाश क्या है? मृत्यु के पाश को जीवन कहते हैं। ये हमारा पूरा जीवन क्या है? ये मृत्यु का जाल है, जिसमें हम इधर से उधर छटपटा रहे हैं, छटपटा रहे हैं, छटपटा रहे हैं, जैसे जाल में कोई पक्षी फँस गया हो। वो बहुत देर तक छटपटाएगा और फिर काटा जाएगा। हमारी हालत ऐसी ही नहीं है? बहुत देर तक छटपटाते हैं और फिर काट दिये जाते हैं। ये जीवन मृत्यु का जाल है।

तो मृत्यु का जाल कोई जीवन से अलग नहीं होता है, कि जीवन के बाद मृत्यु आती है। ‘ईश्वर हमें ज़िंदा रखना, मृत्यु न आये, मृत्यु न आये।’ तुम्हें ज़िंदा क्या रखें, तुम तो हो ही मौत के जाल में। अभी छटपटाओगे फिर काट दिये जाओगे। समझ में आ रही है बात?

तो जिसे मृत्यु से बचना है उसे किस जाल को काटना है? जीवन जाल को काटना है। ये जीवन जंजाल ही काटना है, अगर मृत्यु से बचना है। समझ में आ रही है बात? तो इसीलिए मृत्यु को हराने को ये नहीं नाम दिया गया कि मृत्युमुक्त, मृत्यु को हराने को नाम दिया गया जीवनमुक्त। जिन्हें मृत्यु से बचना था वो जीवनमुक्त हो गये। उन्होंने कहा, 'ये जीवन है ही नहीं, ये तो मौत है, इसी से तो बचना है।'

सूझ देख रहे हो बताने वालों की? उन्होंने ये नहीं कहा कि अमर हो जाओगे। उन्होंने ये नहीं कहा कि मौत को हरा दोगे, अमर हो जाओगे। उन्होंने क्या कहा? 'जीवन्मुक्त हो जाओ।' जीवन से मुक्त हो गये, मरोगे ही नहीं फिर। जो जीवन के जाल में फँसा है वो तो मरा-सा ही है।

मौत आनी नहीं है, हम मौत को जी रहे हैं। मौत एक क्षण नहीं है, मौत एक लंबा अंतराल है साठ वर्षों का जिसको हम जीवन बोलते हैं। मौत जीवन के अंत में नहीं आती, मौत जीवन के पल-पल में है। हम जिये ही नहीं हैं। और ये बड़ी अजीब बात है कि जो पल-पल मर रहा है तिल-तिल करके, वो डर रहा है किसी आख़िरी, अंतिम भविष्य की मृत्यु से! मर वो कब रहा है? अभी, और अगले पल, और उससे पिछले पल। और उसे ख़ौफ़ किसका है? चालीस साल बाद कहीं मौत न आ जाए। चालीस साल बाद मौत न आ जाए? (हँसते हुए)

जैसे कोई यहाँ जूते खा रहा हो, वहाँ लतियाया जा रहा हो, जहाँ जा रहा हो वहीं उसे थप्पड़ पड़ रहे हैं, कपड़े फाड़े जा रहे हैं, नंगा करके मारा जा रहा है। और कोई उससे पूछे, 'तू इतनी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त क्यों करता है?' बोलता है, 'वो इसलिए क्योंकि मुझे अपमान पसंद नहीं है। मैं अपमान से बचने के लिए इतना अपमान सहता हूँ। ये सब मैं इसलिए कर रहा हूँ ताकि मेरा अपमान न हो।' ठीक वैसे ही हम मौत इसलिए जी रहे हैं ताकि एक दिन मौत न हो।

जैसे कोई आदमी ऐसा हो जिसे खाना भी जूते में रख कर परोसा जाता हो। और उससे पूछो कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किस बात का है, तो बोलता है बेइज़्ज़ती का। और अभी-अभी उसने जूते में हाथ डालकर निवाला तोड़ा है, और बोलता है, ‘देखो, मुझे बेइज़्ज़ती से बहुत डर लगता है।’ वैसे ही हम जीने वालों को मौत से बहुत डर लगता है। मौत ही जी रहे हो, तुम्हें डर क्या लगता है मौत से? रोज़ बेइज़्ज़ती करा रहे हो, तुम्हें डर क्या लगता है बेइज़्ज़ती से?

आ रही है बात समझ में?

और इतना ही नहीं है कि अभी आने वाले समय में किसी तरीक़े से मौत से बचना है या आने वाले समय में बेइज़्ज़ती नहीं करानी। धुरंधर ऐसे हैं, वो अगले जन्म की बात कर रहे हैं। ‘देखो, इस जन्म में तो ये देशी जूते में भरकर खाना मिला है। तैयारी हम पूरी कर रहे हैं अगले जन्म में विदेशी ब्रांड के जूते में भरकर खाएँगे। ये कोई जूता है देशी! छेद है इसमें। सारा सांभर चू गया। और डोसा गमबूट में डालकर दिया था, ऐसे (हाथ से इशारा करते है), लंबा-लंबा। ये कोई बात ठीक नहीं है। हम पुण्य कर रहे हैं, अगला जन्म होना चाहिए हमारा, और तब ब्रांडेड जूते में खाएँगे।’ तुम अपनी अभी की हालत देखो न, तुम कहाँ अगले जन्म की बातें करने लगे मूर्ख!

और सवाल आ रहे हैं, लोगों की बड़ी उत्सुकता है। कह रहे हैं, 'आचार्य जी, आप पुनर्जन्म से इनकार कर रहे हैं। फिर कोई मुक्ति के लिए प्रयत्न ही क्यों करे? फिर हम कोई भी अच्छा काम क्यों करें?' भाई, तुम मुक्ति के लिए प्रयत्न इसलिए करो क्योंकि अभी तुम्हारी हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है। तुम्हें बीस साल बाद सोचने की ज़रूरत या फ़ुर्सत कहाँ से है? तुम्हें मुक्ति अगले जन्म के लिए नहीं चाहिए; तुम्हें मुक्ति वर्तमान के लिए चाहिए, तुम अभी मरे हुए हो। मुक्ति इसको कहते हैं। अपनी हालत पर ध्यान दो!

और ये कह रहे हैं कि अगर अगला जन्म होता ही नहीं है तो हम अध्यात्म में क्यों आयें। अध्यात्म में अगले जन्म के लिए नहीं आओ, आज के लिए आओ। हालत देखो अपनी, इसको ठीक करना है, इस हालत को, इसलिए अध्यात्म में आओ। कह रहे हैं, 'नारियल की चटनी और लाना।' वो बच्चे के जूते में लेकर आया, छोटी, थोड़ी दी जाती है न। और इस तरीक़े से खाते हुए कह रहे हैं, 'अध्यात्म देखिए अगले जन्म को बेहतर बनाने के लिए होता है।'

अध्यात्म अगले जन्म को बेहतर बनाने के लिए नहीं होता। हम दुर्गति में कब हैं? अभी। अध्यात्म अभी की हालत को ठीक करने के लिए होता है। अध्यात्म इसलिए नहीं होता कि जल्दी से कुछ ठीक-ठाक काम कर लो ताकि मरने के बाद जहाँ जाना है, वहाँ के बढ़िया कमरे का आरक्षण हो जाए। क्या कर रहे हैं? तो कह रहे हैं, 'वो परलोक में है एक बढ़िया वाला रिसॉर्ट, उसमें जो लग्ज़री सुइट है उसकी बुकिंग कर रहे हैं। पुण्य इसीलिए तो किये जाते हैं, कि परलोक वाले लग्ज़री रिसॉर्ट में जो सबसे हाई एंड रूम होगा वो हमारे लिए रिज़र्व्ड (आरक्षित) रहे।' ग़ज़ब हो गया!

और वहाँ क्या होता है? 'स्पा है, उर्वशी मसाज करती है।' और क्या है? 'रम्भा रूम सर्विस पर लगी हुई है।' और? 'और एक-से-एक अप्सराएँ हैं, वो बार में होती हैं।' ये पुण्य इसलिए किये जा रहे हैं सारे। और ये सारी बातें करते समय क्या हो रहा है? जूते में छेद था, सांभर ससुरा बह गया और ये बात बता रहे हैं वहाँ पर रम्भा, मेनका और जो जितनी होती हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने आख़िरी में नीयत की बात की थी। तो आपने कहा कि जिसकी नीयत होगी वो अपनेआप रास्ते ढूँढेगा; जिसकी नीयत ही नहीं है, तो कुछ होगा नहीं। तो फिर जैसे हम शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, हम सुनते हैं, हम भजन वगैरह करते हैं, क्या इसी चीज़ के लिए कि हमारी नीयत बदल जाए इसमें?

आचार्य: दोनों बातें हैं। ये नीयत को बदलते भी हैं और इन तक तुम आओगे नहीं अगर नीयत साफ़ नहीं है। तो मुर्गी पहले आयी या अण्डा इसमें मत फँसो। बस ये समझ लो तुम भूल-भुलैया में हो, और वहाँ चंद जो सही दरवाज़ें हैं उनमें से कुछ का नाम है उपनिषद्।

प्र: नीयत तो कर्म से ही झलकती है। आपका एक वीडियो भी है अंग्रेज़ी में, 'टू नो योर इण्टेंशंस वॉच योर एक्शंस।' और यदि कर्म से झलकती है तो फिर नीयत तो ऊपर-नीचे हो ही सकती है। तो हम ये कैसे किसी और को देखकर या स्वयं को भी देखकर कह सकते हैं कि नीयत सही है? जैसे अब मैंने आलस किया तो फिर मेरी नीयत ख़राब हो गयी। फिर मैं आलस से उठ गया तो फिर नीयत ठीक हो गयी।

आचार्य: तो फिर ऐसे में तो जो चीज़ व्यावहारिक है वो बहुत ज़्यादा सांख्यिक होगी। तुम यही देखना ही चाहते हो कि मेरा दिन कैसा है, तो फिर तुम्हें ये गणना करनी पड़ेगी कि पूरे दिन में कितनी बार या कितनी देर तक मेरी नीयत कैसी थी, और कोई तरीक़ा नहीं है। हिसाबी-किताबी होना पड़ेगा। ऐसे कर लिया करो — सुबह उठो, लिख लो कि अगर नीयत अच्छी है मेरी तो आज दिन में मुझे ये छः काम कर लेने चाहिए। और रोज़ रात तक देख लिया करो कितने करे, उससे नीयत का पता चल जाएगा।

और सुबह कोई अति उत्साह में लिखने की ज़रूरत नहीं है। व्यावहारिक रूप से देख करके, कि अगर मेरी नीयत साफ़ है, अगर बेईमानी नहीं कर रहा हूँ, तो आज ये छः काम तो कर ही लेने चाहिए। रात तक देख लो कितने करे, उससे पता लग जाएगा कि दिन मे नीयत कितनी साफ़ थी। ये मिल गया तुमको ईमानोमीटर। इस पर अगर साठ प्रतिशत भी ले आये, तो आदमी अच्छे हो। पर बहुत आगे का मत जाना। मैं ये मानकर बोल रहा हूँ कि दिन में कोई आकस्मिक घटना नहीं होगी, क्योंकि ऐसे संयोग हो सकते हैं जो तुम्हारी सारी योजना को ऊपर-नीचे कर दें। पर वैसे संयोग रोज़ नहीं होते। और वैसे संयोग ऐसा नहीं है कि चौबीस घंटे के अंदर ही हो जाएँगे। तो व्यावहारिक रूप से चौबीस घंटे का अंतराल ले सकते हो तुम अपनेआप को जाँचने के लिए।

प्र: किसी की संगत पर भी आपने ये बात कही कि किसी का अहंकार यदि उर्ध्वगामी है तो संगत करो, और अगर नहीं है तो न करो। तो उसमें भी फिर ये एक तरह से फिर गणना ही हो गयी।

आचार्य: हाँ, गणना ही करनी पड़ेगी, और कोई तरीक़ा नहीं है। देखो, यहाँ तो जो कुछ है, वो सब अपूर्ण ही है। तुम्हें अपूर्ण से अपूर्ण की तुलना करके देखना है कि कौन कम अपूर्ण है। पूर्ण सत्य तुम्हें जगत में डोलता हुआ कैसे मिल जाएगा!

यहाँ तो अवतार भी वह है जो कम अपूर्ण है। और जो कम अपूर्ण है उसमें भी कुछ अपूर्णता तो है ही न। तो उसकी अपूर्णता की ओर बार-बार इशारा मत करो। ये ऐसी सी बात है कि एक फेल (अनुत्तीर्ण) हो गया है, अट्ठाईस प्रतिशत उसके नम्बर आये हैं। और वो प्रथम आने वाले को, जिसके छियानवे प्रतिशत आये हैं, उसको चिढ़ा रहा है। बोल रहा है, 'चार प्रतिशत कहाँ गये तेरे? बता, बता! तूने भी तो ग़लतियाँ करी हैं न, राम। देख चार ग़लतियाँ तेरी मैंने निकाल दीं।'

अरे भई, वो छियानवे प्रतिशत वाले हैं, तुम अट्ठाईस प्रतिशत वाले हो, तुम उनकी ग़लती क्या निकाल रहे हो? और सौ प्रतिशत तो परिभाषा है कि किसी के आ नहीं सकते। ये परिभाषित कर दिया गया है कि जीव के अधिक-से-अधिक निन्यानवे दशमलव नौ नौ प्रतिशत हो सकते हैं। सौ प्रतिशत हो गये तो वो जीव ही नहीं रहेगा।

जो अवतार है वो जीव बन कर आया है न। तो जीव बनते ही उसने स्वयं ही ये तय कर लिया था कि अब मुझमें भी कुछ-न-कुछ अपूर्णता रहेगी। उसने अपना ये अधिकार त्याग दिया था कि मैं सौ प्रतिशत अब हूँ। उसने सौ प्रतिशत से अपना दावा ख़ुद ही खींच लिया था। 'अब इतना नहीं हूँ मैं। कुछ अब अपूर्णता आ गयी मुझमें क्योंकि अब मैं व्यक्ति हूँ।'

तो ये मत देखो कि मुझे पूर्ण चाहिए, 'यहाँ पूर्ण कौन है? पूर्ण कौन है?' पूर्ण मिलेगा ही नहीं। यहाँ तुम्हें जो सबसे कम अपूर्ण है उसको खोजना है, उसकी संगत करनी है। और यही तरीक़ा है। चालीस प्रतिशत और साठ प्रतिशत वाले हों, तो तुम ये थोड़ी कह सकते हो कि ये तो दोनों ही अपूर्ण हैं, दोनों ही एक जैसे हैं। नहीं, यहाँ पर भी विवेक लगाओ। यहाँ पर विवेक यह होगा कि साठ प्रतिशत वाले के पास जाऊँगा।

अगर विवेक की तुम्हारी परिभाषा यही है कि सत्य और असत्य में भेद करने को विवेक कहते हैं, तो तुम्हारी ये परिभाषा जगत में अनुपयोगी रहेगी, क्योंकि जगत में सत्य और असत्य का भेद तुम कर ही नहीं सकते। क्यों? क्योंकि जगत में सत्य है ही नहीं, यहाँ तो सबकुछ असत्य है। तो जगत में विवेक की उपयोगी और व्यावहारिक परिभाषा क्या है? ज़्यादा असत्य और कम असत्य का भेद करने को विवेक कहते हैं।

और एक बात समझना — जगत में जो सबसे कम असत्य है, वही तुम्हारा द्वार होता है पूर्ण सत्य तक पहुँचने का। तो इसीलिए जगत में जो सबसे कम असत्य है, उसे उतनी ही मान्यता, उतना ही सम्मान दो जितना सत्य को दिया जाता है। नहीं समझ में आ रही बात? तो ये जो तुम्हारा सम्मान का कर्व (वक्र) होगा न, ये एक बिन्दु पर जाकर के एक डिस्कंटिन्यूटी एक्सपीरियंस (अनिरंतरता महसूस) करेगा, स्टेप फ़ंक्शन बनना चाहिए।

समझो बात को। कोई चालीस प्रतिशत पूर्ण है, तो तुम उसे चालीस यूनिट (इकाई) सम्मान दे दो। अब ये बात बहुत हिसाबी-किताबी हो रही है, लेकिन ऐसी होनी ज़रूरी है, इसलिए समझो। कोई चालीस प्रतिशत पूर्ण है, तो उसे तुम चालीस यूनिट का सम्मान दे दो। कोई साठ प्रतिशत पूर्ण है तो उसे साठ का दे दो। लेकिन जब आगे जाने लगोगे न, तो तुम ये नहीं कह सकते कि कोई अस्सी प्रतिशत पूर्ण है तो उसे अस्सी यूनिट का ही सम्मान दूँगा। अब अस्सी वाले को तुम्हें सम्मान देना चाहिए पाँच सौ यूनिट का। नब्बे वाले को तुम्हें सम्मान देना चाहिए पाँच हज़ार यूनिट का।

और जो छियानवे प्रतिशत वाला है, वहाँ पर तो कम्पलीट डिस्कंटिन्यूटी हो जाएगी। उस छियानवे प्रतिशत वाले को तुम्हें सम्मान देना होगा अनंत। तुम ये नहीं कह सकते कि चालीस वाले को चालीस यूनिट दिया था, तो ये छियानवे वाले को छियानवे यूनिट दूँगा। नहीं, ये नहीं कर सकते, क्योंकि जो छियानवे प्रतिशत है वो सर्वाधिक है जो जगत में पाया जाता है। तो उसको तुमको पूर्ण जितना ही सम्मान या मूल्य देना पड़ेगा।

यही वजह है कि परमात्मा को जितना पूजा गया उतना ही अवतारों को पूजा गया। जबकि अवतारों में तो तुम्हें तमाम तरीक़े के विकार और खोट भी दिखायी दे जाते हैं। दिखते हैं न? फिर भी उनकी इतनी पूजा क्यों होती है? क्योंकि वो अंतिम है जो जगत में मिल सकता है, वही द्वार है। उनसे गुज़र कर तुम उस तक पहुँच जाओगे। तो उनकी खोट नहीं देख सकते तुम। उनको ठीक उतना ही मूल्य दो जितना तुम मुक्ति को देते हो।

समझ में आ रही है बात?

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