आदमी और आदमी में बस यहीं पर अन्तर स्थापित हो जाता है। एक आदमी होता है जिसको जब मुश्किल आती है तो वो और कमर कस लेता है और दूसरे आदमी को जब मुश्किल आती है तो फूँक मार कर गायब हो जाता है। एक आदमी होता है, जो कोई काम कर रहा होगा जैसे ही उस काम में वो मुश्किल के तल पर पहुँचेगा, जहाँ बाधा आने लग गई है, शरीर को, मन को चुनौती मिलने लग गई; वो कहेगा, 'अब जाकर के जान आई खेल में, अभी तक तो बोर हो रहे थे।'
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प्रश्नकर्ता: मैं किसी भी क्षेत्र में, चाहे वो शिक्षा का हो या कोई नया वाद्ययन्त्र सीखना हो या कोई भी नई चीज़ सीखनी हो तभी तक आगे बढ़कर सीख पाता हूँ, जब तक वो चीज़ आसान लगती है और मज़ा देती है। जैसे ही वो चीज़ सीखने में मुश्किल हो जाती है, मैं उसे छोड़ देता हूँ। मदद करें।
आचार्य प्रशांत: देखो, एक-दो बातें समझना। अक्सर हम किसी नई चीज़ की ओर इसलिए नहीं जाते हैं क्योंकि हमें उस चीज़ से गहरा प्रेम होता है। हम इसलिए जाते हैं क्योंकि हमारी जीवन व्यवस्था के वर्तमान ढर्रों में हमें ऊब हो रही होती है। जैसी ज़िन्दगी चल रही है, उसमें ऊब हो रही है तो किसी और तरफ़ चल दिए, बिना ये समझे कि ऊब हो क्यों रही थी। तो वास्तव में तुम जिस तरफ़ को चल देते हो वो तुम्हारी वर्तमान व्यवस्था का ही एक संशोधित रूप होता है। तुम्हें ऐसा लगता ज़रूर है कि तुम किसी नई दिशा चले हो, कोई नई चीज़ सीख रहे हो, नई दोस्ती कर रहे हो, नई जगह जा रहे हो, कुछ भी नया कर रहे हो लेकिन वास्तव में तुम वही सबकुछ कर रहे होते हो जो तुम पहले कर रहे थे और जो कर-कर के तुम ऊबे ही हुए थे।
जो कर-कर के तुम ऊबे ही हुए थे उसी को तुम अगर और ज़्यादा करोगे, भले ही नाम बदल कर तो तुम्हारी ऊब कम तो नहीं हो जाएगी न। कर तो तुम मूलत: वही रहे हो जो तुम पहले भी कर रहे थे, बस तुमने नाम दूसरा दे दिया, जगह बदल दी, आकार-प्रकार कुछ बदल दिया। मूलत: करने वाला नहीं बदला, करने वाले की वृत्ति, करने वाले का इरादा नहीं बदला, वो वैसे का वैसा ही है।




