जब मृत्यु निकट हो || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे पापाजी को फोर्थ स्टेज (चौथे स्तर का) कैंसर है। मैं आपको पिछले साढ़े चार साल से सुनता हूँ। उनको तीन साल हो चुके हैं और सरवाइव (बना रहना) कर रहे हैं। उन्हें रिनल सेल कैंसर है।
आचार्य जी, मैं आपसे यह चाहता हूँ कि आप कुछ ऐसा बोलें कि जितने भी फोर्थ स्टेज कैंसर रोगी होते हैं, जो सरवाइव कर रहे हैं, वो मुक्ति की तरफ़ बढ़ें। मुझे तो पता है कि यह अज्ञान ही है कि मैं अपने पापा से मोह करता हूँ, लेकिन मैं उनका इतना तनाव नहीं लेता। मुझे होने वाली कोई भी समस्या का तनाव मैं नहीं लेता, पर उन पर क्या बीतती होगी। वो सोचते होंगे कि मैं हर पल यहाँ से जा रहा हूँ।
वो बोलते हैं कि मौत तो एक बार आती है, मुझे कोई दिक्क़त नहीं उससे। वो आपको नहीं सुनते, न आपको जानते हैं; मैं जानता हूँ आपको। आपके साथ रह के मैं थोड़ा-बहुत समझा हूँ, लेकिन उनको नहीं पता, वो परेशान रहते हैं काफ़ी। तीन साल हो चुके हैं।
मैं तिब्बत तक जा चुका हूँ इलाज के लिए। मैंने उन्हें काफ़ी बार भर्ती भी कराया है। उनका आयुर्वेदिक, एलोपैथिक इलाज भी करवाया। टाटा हॉस्पिटल मुंबई तक मैं गया। जितनी भी टारगेटेड थेरेपी, कीमोथेरेपी और भी जो नयी-नयी थेरपी आयी हैं कैंसर की वो करवायी हैं। परिणाम यह रहा है कि थोड़ी देर तक रुक जाता है कैंसर और फिर वृद्धि करने लगता है।
जो लोग कैंसर में सरवाइव कर रहे हैं, उनके लिए आप मुक्ति की तरफ़ से क्या कहना चाहेंगे? धन्यवाद, आचार्य जी।



