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जब जीवन की धूल पर अपने खून की बूँद पड़ती है, तब कुछ खास पता चलता है || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। जब से आपके सानिध्य में आयी हूँ, तब से मैंने ये अब थोड़ा-थोड़ा जानना शुरू किया है कि मुझे जब तक किसी चीज़ का अनुभव नहीं होता, मुझे ऐसा लगता है वो ज्ञान मुझे समझ में नहीं आता। तो शुरू-शुरू में ऐसा लगता था कि बहुत चीज़ें एकदम से क्लियर (स्पष्ट) हो गयी हैं, तो काफ़ी अहंकार इस वजह से बढ़ने लगा था।

कोई भी चीज़ मेरे सामने जब होती है, लॉजिकली (तार्किक रुप से) मुझे समझायी जाती है, तब मैं आसानी से समझती हूँ लेकिन अगर आप मेरे सामने मैग्नेटिक फ़ील्ड (चुम्बकीय क्षेत्र) या इलेक्ट्रिसिटी (विद्युत) की बात करेंगें, फिज़िक्स के कॉन्सेप्ट (भौतिकी की अवधारणाएँ), तो मुझे थोड़ा मुश्किल होती है समझने करने में। मैं नहीं समझ पाती।

तो इन्टलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक तल) पर हम सबका जो नेचर है, वो अलग-अलग है। शायद हम पैदा ही कुछ अपने नेचर के साथ हुए हैं। तो स्पिरिचुअल नॉलेज (आध्यात्मिक ज्ञान) में भी हमारे साथ यही होता है कि कुछ लोगों को यह बात जल्दी समझ में आ जाती है, कुछ लोगों को देर से और मुझे तो अनुभव के साथ ही समझ में आती है।

आचार्य प्रशांत: ये चीज़ ऐसी है जिसको जब तक आप जीवन में नहीं लाएँगे, आपको नहीं समझ में आएगी, एकदम नहीं समझ में आएगी। ये मैग्नेटिक फ़ील्ड जैसी चीज़ नहीं है। मैग्नेटिक फ़ील्ड तो फिर भी आपको कोई दिखा सकता है डेमॉन्सट्रेट (प्रदर्शित) करके।

जो उसकी लाइन्स (रेखाएँ) होती हैं, जो एक पोल (ध्रुव) से दूसरे पोल चलती हैं, वो लाइन्स सचमुच ज़मीन पर बन जाएँगी। आप एक बड़ा मैग्नेट (चुम्बक) रख दो और छोटी-छोटी आप उसमें आइरन जो फ़ाइलिंग्स (लोहे के बुरादे) होती हैं, वो रख दो, तो आपको दिखाई देंगी वो अपनेआपको अरेंज (व्यवस्थित) कर लेंगी फ़ील्ड (क्षेत्र) की तरह। वो तो फ़िर भी दिख जाएगा।

साइंस में और कई तरीक़े के ऐब्स्ट्रैक्शंस होते हैं। फिज़िक्स (भौतिकी) में कर्ल और डाइवर्जेंस (कर्ल और मोड़) होते हैं, उसको आप कैसे दिखा दोगे। फिज़िकल वर्ल्ड (भौतिक जगत) में आप कर्ल कैसे दिखाओगे, दिखा सकते हो, पर वो एक तरह का डेरिवेशन (व्युत्पत्ति) होगा, मुश्किल होगा।

तो वो सब बात नहीं है यहाँ पर, कि वो आपने ईक्वेशन (समीकरण) से समझ लिया है या आपने कोई उससे मैथमैटिकल प्रॉब्लम (गणितीय समस्या) हल कर ली। ये तो चीज़ ऐसी है, जिसको जियोगे तो ही पता चलेगा कि कौन कितने पानी में है। नहीं तो भई, बात सारी आपकी मूल अंदरूनी वृत्ति की है न? वो कह रही है और चाहिए, और चाहिए, और चाहिए..। आपको, आपको किसी ने बोल दिया और चाहना ही दुख है, तो हमने कहा, ‘ठीक है और चाहना ही दुख है।‘ पाँच शब्द। आप बाज़ार गये, फ़िर और चाहने लग गये।

तो उन पाँच शब्दों से जो पूरा भोगवाद था वो थोड़ी ही मिट गया। हाँ, उन पाँच शब्दों से अब प्रयोग और प्रयास की शुरुआत हो सकती है। आपको एक बात बतायी गयी है, अब इसके बाद आप उसको ज़िन्दगी में लाने की शुरुआत करिए। तो जो यहाँ पर ज्ञान आपको मिल रहा है, ये अन्त नहीं है, ये आरम्भ है। यहाँ से आपकी लर्निंग (सीखना) शुरू होती है। ये लर्निंग नहीं है अपनेआप में, या आप कहें कि मैं गीता पढ़ती हूँ और उससे मुझे बहुत ज्ञान मिल गया। न-न-न, न।

गीता से ज्ञान का श्रीगणेश हुआ है। ज्ञान तो तभी मिलेगा जब संसार में आप उस पर प्रयोग करेंगी, ज्ञान तब मिलता है। ग्रन्थ, गुरु कुछ भी कोई भी ज्ञान नहीं दे सकते। ज्ञान तो, हमने क्या कहा, कैसे आता है? चयन से और मूल्य चुकाने से। जब जीवन में उसको जिया जाता है, उससे जो चुनौती आती है, जो कष्ट आता है, उसको झेला जाता है, तब वास्तव में ज्ञान होता है। नहीं तो फिर वो सूचना है। सूचना, डेटा , इन्फॉर्मेशन।

साहब सूचित हो गये, अब सूचित होना और ज्ञानी होना एक बात तो नहीं होती न। और आपको बहुत मिलेंगे जिनके पास सूचनाओं का भंडार होता है। वो बंदा नहीं है, वो डेटाबेस है। उससे क्या फायदा? तुम्हारे पास कुछ भी होगा, तुम गूगल के तो एक प्रतिशत भी नहीं हो सकते, आधा प्रतिशत, शून्य दशमलव शून्य-शून्य-शून्य- शून्य-शून्य-शून्य, शून्य एक प्रतिशत भी नहीं हो सकते। ऐसों से कुछ नहीं होता।

सूचना भर लेना बस अहंकार को थोड़ी तृप्ति दे सकता है, उससे जीवन में कुछ नहीं मिलता। फ़िर बोल रहा हूँ, यहाँ जो आपको मिल रहा है, वो ज्ञान की शुरुआत भर है, बाक़ी तो ज्ञान तभी होगा, जब आप इसके जोख़िम उठाएँगे ज़िन्दगी में। समाज धर्म का पालन नहीं करना, ये ज्ञान ऐसे थोड़े ही मिल जाता है। वो ज्ञान तब मिलेगा जब ज़रा समाज के दो-चार न्योतों को ठुकराएँगे आप, या दो-चार महफ़िलों में हुड़दंग मचाएँगे आप।

कहेंगे ये नालायकी चल रही है, मुझे बुलाकर के चिकन-टिक्का परोस रहे हो। डंडा उठाकर के चार लगाया, तब ज्ञान आएगा कि बात क्या होती है। आपने चार डंडे लगाए, वो चालीस लगाएँगे। तब पता चलेगा न कि जगत निस्सार है (श्रोता हँसते हुए)। नहीं तो ऐसे कोई बता दे कि क्या, समाज धर्म का पालन नहीं करना। कितनी रुखी बात है, इसमें क्या समझ में आना है। ज्ञान तो उतरता है जब डंडे चलते हैं, उसके बिना थोड़े ही होता है। वो ग़ालिब का है कि अब ठीक-ठीक याद है कि पता नहीं कि — “इश्क में और टूटकर हम बेबाक हो गये, धोए गये कुछ ऐसे कि बस पाक हो गये।“

तो धुलाई ज़रूरी है। पाक माने पवित्रता, सफ़ाई। वो तभी होता है। ज्ञान का मूल्य यही है कि अपना ज्ञान ले जाओ, अब उसको जीवन में आज़माओ, तो बहुत धोए जाओगे, तभी पाक हो जाओगे। नहीं तो यहाँ मूँडी में रख लेने से सूचना को ज्ञानी थोड़े ही हो जाओगे कि आचार्य जी ने कुछ बताया और उसको हमनें कर लिया।

अभी मैं देख रहा था ट्विटर पर, किसी ने जो यहाँ पर सीख थी, वो ले जाकर लिख दी और उसमें मुझे टैग कर दिया कि अद्वैत अन्डर स्कोर प्रशांत (अद्वैत_प्रशांत) वहाँ पर लिखकर के कि इन्होंने ये सब बताया है। अब नीचे उसको गालियाँ-ही-गालियाँ पड़ रहीं हैं, कह रहें हैं धर्म ख़राब कर दिया, ये कर दिया, वो कर दिया। ये है। अब इसको ज्ञान होगा (सभी हँसते हुए)। हाँ, अब तुम्हें पता चलेगा न कि ये जो गाली देने आये, ये कौन हैं, तुम्हारी फ़ीड कौन देख रहा है। तुम्हारे दोस्त-यार, तुम्हारे नाते-रिश्तेदार, तुम्हारे पड़ोसी वही तो देख रहे हैं, जो तुम्हारे उसमें हैं कॉन्टैक्ट लिस्ट (सम्पर्क सूची) में, और वही उसको कम-से-कम छः जनों ने उसको नीचे सुना रखा था लाइन से।

अब ज्ञान होगा। ये थोड़ी कि यहाँ पर आकर के ऐप पर लिख गये, और वहाँ ऐप पर हैं ही सब अपने ही जैसे भले मानुष, देसी गाय। सींग नहीं मारती है एकदम। कोई कुछ नहीं बोलता किसी को, यहाँ तो सब एक-दूसरे को प्रोत्साहित ही करते रहते हैं। मैं तो इंतज़ार में हूँ किसी दिन कुछ, मैं सोच रहा हूँ अपनी ही फ़ेक आईडी (फ़र्जी पहचान) बनाकर कुछ...मार पिटाई न हो, तो मज़ा ही नहीं आता कुछ।

जाओ जाकर के बाहर ये सब बातें करो, जियो, त्योहारों का मौसम है। महफ़िलों में यही जो ज्ञान हुआ है, जाकर ज़रा बाँचो, तब असली ज्ञान होगा, तब विरक्ति उठेगी। तब वैराग्य के कारण मिलेंगे। याद रखिए, ज्ञान तो परिभाषा से ही नकारात्मक होता है। नकारात्मक माने वो टूट-फूट के साथ चलता है। ज्ञान कुछ बनाता थोड़े ही है, ज्ञान तो जो बना हुआ है उसको बस तोड़ता है। तो जहाँ टूट-फूट नहीं हो रही है, वहाँ कौनसा ज्ञान? ज़िन्दगी में जब तक भूकम्प नहीं आ रहा और इमारतें नहीं चरमरा रहीं, तब तक काहे का ज्ञान? ज्ञान लेकर अंटी में खोंस लेने के लिए थोड़ी होता है, जेब में छुपा लिया है, खोपड़े में दबा लिया है, ज्ञान है।

अरे! ज़रा डंडे चलें, गोलियाँ चल जाएँ और अच्छा! दीवारें नहीं गिर सकती हैं तो कम-से-कम दरवाज़े ही गिरें। गोली भी नहीं खा सकते तो कम-से-कम गाली खाओ। तब ज्ञान होता है। मज़ाक की बात नहीं, सचमुच बोल रहा हूँ। ज्ञान बिना टूट-फूट के आ ही नहीं सकता बाबा। “हाँसे खेले पिया मिले तो कौन दुहागन होए।“

हँसते-हँसते, खेलते-खेलते, रिफ़्लेक्शन (प्रतिबिम्ब) लिख-लिखकर, उस पर स्माइली (हँसते चेहरे का चित्र) बना-बनाकर और एक-दूसरे की तारीफ़ें कर-करके ज्ञान मिल जाता, तो सब ज्ञानी हो गये होते। फिर वियोगन कौन बचती? कोई नहीं। दुहागन माने जो विरहिणी है, माने अहंकार, जो अभी पिया से बहुत दूर है। बोले, ‘हँसते-हँसते अगर मिलता होता, तो फिर विरहिणी तो कोई बचती ही नहीं।‘ ये तो चीज़ ऐसी है जो लठ खाकर ही मिलती है।

मीरा का श्रीकृष्ण को चुन लेना और राणा का कहना कि पी ज़हर, ये दोनों सदा साथ-साथ चलते हैं। अगर अभी जीवन में राणा का ज़हर नहीं आ रहा है तो श्रीकृष्ण भी नहीं आये हैं। ऐसे थोड़ी है कि राणा भी रूह-अफ़्ज़ा पिला रहे हैं और श्रीकृष्ण का भी चरणामृत पी रहे हो, ये दोनों तो एक साथ नहीं चल सकते। फिर मामला फ़रेब का है। अगर श्रीकृष्ण सचमुच जीवन में आये होते, तो प्रमाण ये होता कि राणा ज़हर लेकर खड़ा हो गया होता।

सन्त सचमुच जीवन में आये होते...मीरा जाती तो थीं रैदास के पास। पूरा समुदाय, पूरा कुनबा डंडा लेकर खड़ा हो गया था कि एक तो तुम समृद्ध घर से, वहाँ तुम महल से निकलती हो। जा किसके पास रही हो, ये चर्मकार, ये चमड़े और जूते का काम करते हैं, पहली बात। दूसरी बात तुम स्त्री, वो भी युवा और खुलेआम सड़क पर घूमती, जा कहाँ रही हो पुरुष के पास? और तीसरी बात, तुम हो उच्च जाति से और जा किसके पास रही हो, जो तथाकथित एक निचली जाति का है।

तो चाहे श्रीकृष्ण के पास जाना हो, चाहे रैदास के पास, ज्ञान आ रहा है कि नहीं, कोई सच्ची घटना जीवन में घट रही है कि नहीं, इसका प्रमाण तो मारपीट ही होती है। मीरा ऐसे थोड़ी कि अपना महल में बैठी हुई हैं और सारे मज़े भी ले रही हैं और...। वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी।

निकलो न गली-गली, गाओ फिर हरी गुण। गली-गली तो काहे को निकले, गली गली है, चुपचाप रात के अन्धेरे में ख़ुफ़िया तरीक़े से गीता बस सुन लो, किसी को पता नहीं लगना चाहिए। असरानी, शोले (फ़िल्म का नाम) में, ‘जेल में रिवॉल्वर (पिस्तौल) आ चुका है।‘ वैसे ही है, ऐप पर, ‘गीता-सत्र आ चुका है, किसी को कानों-कान ख़बर नहीं होनी चाहिए।‘ ऐसे नहीं होता कि किसी को कानों-कान ख़बर नहीं होनी चाहिए।

वहाँ तो फिर होता है कि वो तो गली-गली हरि गुण गाने लगी। जब गली-गली हरि गुण गाओगे तो डंडा ज़रूर पाओगे। समाज इतनी आसानी से अपने शिकार नहीं छोड़ देता। बहुत बुरा लगता है समाज को, मेरा एक शिकार किसी ने छीन लिया।

किसी भी जानवर को देखिएगा, वो सबसे उग्र तब हो जाएगा जब आप उसका शिकार छीन लें। कहते हैं किसी भी जानवर के आस-पास भी मत जाओ जब वो खा रहा हो। आप उसके आस-पास जाओगे, उसको लगता है आप उसका खाना छीनने आ रहे हो, वो आपको काट लेगा। उसे खा पी लेने दो, फिर ठीक है। वैसे ही आप सब समाज के शिकार हो, वो आपको खाना चाहता है, आप बचकर भागोगे, आपको माफ़ नहीं करता। और मुझ जैसे को तो बिलकुल नहीं माफ़ करता जो कितने ही शिकारों को बचा रहा है।

ज्ञान तब आता है जब जीवन के धूल भरे मैदान पर अपने खून की बूँद पड़ती है। वो जब बूँद धूल से मिलती है न, वो क्षण होता है ज्ञान का। उसके बिना नहीं ज्ञान आता।

वो, वो पल देख पा रहे हो, गाढ़े लाल खून की बूँद जाकर के मिल रही है धूल से, वो क्षण ज्ञान का है। सांकेतिक रूप से भी समझ लो कि जिसको तुम अपना जीवित खून समझते हो, वो धूल मात्र है, जब ये दोनों एक हो जाते हैं, उस समय ज्ञान उठता है। ये एक नहीं हो रहे, तो नहीं।

और उसमें जैसा आपने कहा ऐब्स्ट्रैक्शंस वगैरह काम नहीं आते, कोई ऐब्स्ट्रैक्शन नहीं चलेगा। जब आप गोली खाते हो, तो उसमें इस बात का क्या महत्व है कि आप प्रिन्सिपल ऑफ लीनिअर मोमेंटम (रैखिक गति के सिद्धान्त) समझते हो कि नहीं। कोई फ़र्क पड़ता है इस बात से।

आप पूरा समझते हो कि गोली चलती है तो बन्दूक पीछे को जाती है और रिकॉइल (पीछे हटती) करती है और कंजर्वेशन ऑफ मोमेंटम (संवेग का संरक्षण), क्या फ़र्क पड़ता है समझते हो कि नहीं समझते हो? बात तो इसकी है कि गोली खाने का जिगर है या नहीं है। ये बात, ये सिद्धान्त, मोमेंटम (संवेग) वगैरह समझे बिना भी कोई गोली खा सकता है, और कोई ऐसा हो सकता है जो बड़ा पंडित हो भौतिकी का, सब समझता है, लेकिन जब गोली खाने की बारी आती है तो नदारद। सौ श्लोक कंठस्थ हैं, पर जब कहा ‘युद्धस्व’ तो चक्कर खाकर गिर पड़ा, बेहोश।

बहुत देखे हैं ऐसे, ज़्यादातर ज्ञानी ऐसे ही होते हैं और उनसे पूछो, ‘क्या हो गया युद्धस्व, सौ श्लोक तूने सुनाये थे अभी।‘ तो बोलेगा ‘ज्ञानी हैं, योद्धा थोड़े ही हैं।‘ भक्क! लड़ नहीं सकता तो सड़। या तो लड़, नहीं तो सड़।‘

कितने, चाहे जिसका भी कृतित्व हो, वेदव्यास भी एक नहीं थे, न जानें कितने वेदव्यास रहें हैं। चाहे वेदव्यास का हो, चाहे श्रीकृष्ण का हो, चाहे किसी और ज्ञानी का, किसी ऋषि का हो, पर भगवद्गीता कितनी सुन्दर है! युद्धभूमि में रचा गया है मामला। सारी बात कही गयी है युद्धभूमि में। कोई ज्ञान भूमि नहीं, कोई गुरुकुल नहीं, कोई आश्रम नहीं — युद्धभूमि। संदेश साफ़ है। सारी बात अंततः आनी तो युद्ध पर ही है और जो युद्ध नहीं कर सकता, गीता उसके लिए काहे को?

प्र: तो आचार्य जी, हम कह सकते हैं कि जब ज्ञान के साथ अनुभव जुड़ता है, तो ज्ञान की असली परख होती है?

आचार्य: नहीं, ज्ञान के साथ अनुभव नहीं जुड़ता है। मैं क्या समझा रहा हूँ इतनी देर से आपको? जो बात समझी है, जाइए उसको जीइये, करिये उसको, प्रयोग में लाइए, उसमें साथ में नहीं जुड़ेगा अनुभव। उसको आप जीना शुरू करेंगे तो जीवन अपनेआप मूल्य माँग लेगा। मूल्य आप दे दें, तो है ज्ञान। मूल्य ना दें, तो कोई ज्ञान नहीं। ज्ञान का काम है कि वो जीवन में आएगा तो तोड़-फोड़ मचाएगा। आप तोड़फोड़ कर लें बर्दाश्त, तो है ज्ञान; नहीं करें बर्दाश्त, तो कोई ज्ञान नहीं।

प्र: आचार्य जी, बस एक चीज़ और जो मुझे थोड़ी सी परेशान करती है बार-बार। वो ये कि जब मैंने आपको सुनना शुरू किया, तब मेरी उम्र चालीस हो चुकी थी, तो जब मैंने सत्रों में आना शुरू करा फिज़िकली (शारीरिक रूप से) तो मैंने देखा वहाँ पर हर उम्र के लोग आते हैं और जिसमें काफी यंग (युवा) लोग भी मुझे दिखते थे, बीस साल के भी हैं, पच्चीस के भी। तो मुझे लगता है कि कुछ मेरे बहुत सारे साल ऐसे बर्बाद हो गये पिछले कुछ इस वजह से। तो मतलब जैसे मैंने पहले कहा था कि मोटी बुद्धि वाला एक कंसर्न (चिंता) मुझे बार-बार लगता है, तो क्या वो सच में उम्र का कुछ रहता है कि कुछ लोगों को सच में एक शार्प स्किल (तीक्ष्ण कौशल) होता है, समझने का जल्दी और कुछ लोगों को सच में देर में ही बात समझ में आती है।

आचार्य: अरे! स्किल नहीं है भई, क्या बोल रहा हूँ मैं इतनी देर से? इट्स द विलिंगनेस टु पे अप (यह मूल्य चुकाने कि इच्छा है)। कोई कला, कौशल नहीं है, आईक्यू (इंटेलीजेंस क्वोशयंट) नहीं है, कुछ और नहीं है वो। तैयारी है एक, क्या? हाँ, क़ीमत चुकाऊँगा, डंडा खाऊँगा। वो बीस साल वाले में हो, तो बीस साल वाले में, अस्सी साल वाले में, तो अस्सी साल वाले में, जिसमें हो।

और यहाँ किसको जल्दी समझ में आ जा रहा है, क्या बता रही हैं कि बीस साल वालों को समझ में आ गया, बीस साल वालों को छोड़िए जो, बीस-बीस साल से हैं उनको नहीं समझ में आया। कुछ नहीं समझ में आता किसी को। समझ में आने का मतलब होता है अपने ही आप को मिटाना। जो स्वयं को मिटाने के लिए हाँ बोल दे, उसको आ गया समझ में। बाक़ी तो ऐसे ही हैं, बस अपना पंडिताई है और सूचना है। और एक-से-एक ज्ञानी घूम रहे हैं। तो उसमें कुछ नहीं हो गया।

हम बात करते है न कि एक पल की गहराई कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है, सौ वर्षों की लम्बाई से। तो आप चालीस की हो गयी हों, पचास की हो गयी हों, वो एक पल अभी आपको उपलब्ध है कि नहीं? एक पल है, जीवन में बचा है कि नहीं, कि उतना भी नहीं बचा है?

(प्रश्नकर्ता गर्दन हिलाकर हामी भरते हुए)

आचार्य: तो बस हो गया, वो एक पल आपके पास है तो कोई आपसे बीस साल छोटा है, चालीस साल छोटा है, क्या फ़र्क पड़ता है? इसमें मोटी बुद्धि वाली कोई चीज़ नहीं है। ज्ञानमार्ग, बुद्धि का मार्ग नहीं है, बहुत लोगों को लगता है बुद्धि का मार्ग। ज्ञानमार्ग हौसले का मार्ग है, साहस का मार्ग है, निष्ठा का मार्ग है।

ये बेईमानी की बात होती है लोग कह देते हैं कि अरे! वो जो ज्ञानमार्गी तो सब वो बुद्धिजीवी, इंटलेक्चुअल्स होते हैं। भक्क! ज्ञानमार्ग का मतलब होता है ये दम होना चाहिए कि जो जाना है उसको जीऊँगा। तो ज्ञानमार्ग किसके लिए नहीं है, कायरों के लिए नहीं है। और कायरों को ज्ञान से बड़ी समस्या रहती है, वो बाक़ी कुछ भी कर लेंगे उनसे कुछ करवा लो, मुँह बजवा लो बजायेंगे खूब, और कुछ भी करवा लो, खम्भा बजवा लो।

ज्ञान का क्या मतलब होता है, ज्ञान का मतलब होता है पता चल गया इसमें क्या है (कप की ओर इशारा करते हुए) नहीं पीऊँगा, यह है ज्ञानमार्ग। पता चलना एक प्रतिशत बात थी, जिगर के साथ कहना नहीं पीऊँगा, ये निन्यानवे प्रतिशत बात है। ये है निन्यानवे प्रतिशत ज्ञानमार्ग, अपना हौसला, अपना जिगर। जाना है तो जीऊँगा, ये होता है ज्ञान। इसमें स्किल या आईक्यू या और चीज़ें उससे नहीं होता या उम्र, इससे नहीं होता।

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