आचार्य प्रशांत: जब हम कहते हैं कि एक आदमी एक जात का है और दूसरा दूसरी जात का है तो इसका व्यवहारिक, ज़मीनी अर्थ क्या होता है, बताओ? (इशारा करते हुए) अगर आप एक जात के हैं और वह दूसरी जाति के हैं तो इसका क्या अर्थ हुआ? यह बात हमें ज़मीन पर किस तरह से देखने को मिलेगी?
श्रोता: दोनों एक दूसरे के दुश्मन होंगे।
आचार्य: यह सब तुम सिद्धांत, कॉन्सेप्ट की बात कर रहे हो, ज़मीन पर क्या होगा? मैं किसी और ग्रह से आया हूँ, मैं जात नहीं जानता, ठीक है? मैं दो लोगों से ऐसे मिल रहा हूँ जो अलग-अलग जात के हैं या दो ऐसे समूहों से मिल रहा हूँ जो अलग-अलग जाति के हैं, और मैं कुछ जानता नहीं। मैं तो साहब बाहर से आया हूँ तो मैं क्या देखूँगा, मुझे क्या दिखाई पड़ेगा?
(दाईं तरफ़ और बाईं तरफ़ उपस्थित श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए) यह एक जाति है यह दूसरी जाति है, ठीक है? यह इधर एक जाति है, इधर दूसरी जाति है और मैं कौन हूँ? मैं एलियन हूँ तो अब मुझे क्या दिखाई पड़ेगा?
श्रोता: आपस में बातचीत नहीं कर रहे होंगे।
आचार्य: अरे बाबा! आप दोनों आपस में बातचीत भी कर रहे हैं, पूरा ही एक समाज है। तो मैं अगर यहाँ खड़ा होकर के, बैठकर के देख रहा हूँ, ऑब्जर्व कर रहा हूँ तो मैं क्या देखूँगा? और मैं शार्प (तीक्ष्ण बुद्धि वाला) हूँ। मुझे चीज़ें समझ में आती हैं तो मुझे क्या दिखाई देगा? मैं नोट क्या करूँगा?



