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जातिवाद का मूल कारण क्या? समाधान क्या? || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
24 min
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कुछ कोहरा है जो पूरी दुनिया पर छाया हुआ है और ये किसी का व्यक्तिगत मसला नहीं है, ये पूरी दुनिया पर ही छाया हुआ है। और इसका एक ही समाधान है कि व्यक्ति के मन के भीतर जो अंधकार है उसका निवारण किया जाए और उसका एक ही उपाय है, उपनिषद्। लेकिन आचार्य जी जिस देश ने पूरी दुनिया को उपनिषद् दिए वो खुद ही इतने अंधकार में है।

एक समय पर वो विश्वगुरु हुआ करता था लेकिन आज दुनिया में सिर्फ़ ग़लत चीज़ों के लिए उसको जाना जाता है। बहुत ही कम लोग हैं जो भारत को एक आध्यात्मिक देश के रूप में देखते हैं और इसका कारण, मेरी जितनी समझ है, उसमें जो सबसे बड़ी वजह है — भारत में जाति प्रथा; हम इतने बँटे हुए हैं कि हम अपनी ही दुनिया में रहते हैं।

हमको मतलब नहीं है कि भारत में क्या हो रहा है। हमें बस अपने व्यक्तिगत मसलों से मतलब है, तो इसका क्या उपाय है कि कास्ट सिस्टम जो है वो खत्म हो? क्योंकि ये कास्ट सिस्टम हमेशा से हमारे यहाँ पर नहीं था, हमारे यहाँ पर वर्ण व्यवस्था रही है; वर्ण, गोत्र और कुल। तो मेरा सवाल आचार्य जी ये है कि ये जातिवाद क्या है, इसका अर्थ क्या है, ये क्यों बनाए गए थे और आज के समय में ये कितने प्रासंगिक हैं?

आचार्य प्रशांत: देखो, ऐसे शुरुआत करते हैं जैसे हमें कुछ पता ही नहीं, ठीक है? चलो मुझे नहीं पता जात क्या होती है, मुझे समझाओ। जब हम कहते हैं कि एक आदमी एक जात का है और दूसरा दूसरी जात का है तो इसका व्यवहारिक, ज़मीनी अर्थ क्या होता है, बताओ? (इशारा करते हुए) अगर आप एक जात के हैं और वो दूसरी जाति के हैं तो इसका क्या अर्थ हुआ? ये बात हमें ज़मीन पर किस तरह से देखने को मिलेगी?

प्र: दोनों एक दूसरे के दुश्मन होंगे।

आचार्य: ये सब तुम सिद्धांत, कॉन्सेप्ट की बात कर रहे हो, ज़मीन पर क्या होगा? मैं किसी और ग्रह से आया हूँ, मैं जात नहीं जानता, ठीक है? मैं दो लोगों से ऐसे मिल रहा हूँ जो अलग-अलग जात के हैं या दो ऐसे समूहों से मिल रहा हूँ जो अलग-अलग जाति के हैं, और मैं कुछ जानता नहीं। मैं तो साहब बाहर से आया हूँ तो मैं क्या देखूँगा, मुझे क्या दिखाई पड़ेगा?

(दाईं तरफ़ और बाईं तरफ़ उपस्थित श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए) ये एक जाति है ये दूसरी जाति है, ठीक है? ये इधर एक जाति है, इधर दूसरी जाति है और मैं कौन हूँ? मैं एलियन हूँ तो अब मुझे क्या दिखाई पड़ेगा?

प्र: आपस में बातचीत नहीं कर रहे होंगे।

आचार्य: अरे बाबा! आप दोनों आपस में बातचीत भी कर रहे हैं, पूरा ही एक समाज है। तो मैं अगर यहाँ खड़ा होकर के, बैठकर के देख रहा हूँ, ऑब्जर्व कर रहा हूँ तो मैं क्या देखूँगा? और मैं शार्प (तीक्ष्ण बुद्धि वाला) हूँ। मुझे चीज़ें समझ में आती हैं तो मुझे क्या दिखाई देगा? मैं नोट क्या करूँगा?

प्र: दोनों बाहर से तो एक जैसे प्रतीत होते हैं।

आचार्य: बाहर से क्या एक जैसे प्रतीत होते हैं, ऐसा है क्या वाकई? वाकई ऐसा है क्या?

प्र: कुछ नहीं पता लगेगा।

आचार्य: नहीं पता लगेगा? एक जात के यहाँ लोग बैठे हों जिनको मान लीजिए वो जो सोचते हों कि हम बहुत ऊँची जाति के हैं और दूसरे जाति के यहाँ बैठे हैं जो कहते हों कि हम बहुत नीची जाति के हैं। और मैं एलियन हूँ, मैं यहाँ बैठा हूँ। तो मैं क्या देखूँगा, इधर भी स्त्री-पुरुष हैं, बच्चे हैं, इधर भी स्त्री-पुरुष हैं बच्चे हैं; तो मैं क्या देखूँगा, मैं नोट क्या करूँगा?

मैं चलो एक चीज़ ये देख लूँगा कि शारीरिक बनावट करीब-करीब एक जैसी है और क्या दिखाई देगा मुझको? हाँ, इतना मैं देख पाऊँगा कि इधर वाले अपने-आपको ऊँचा समझते हैं तो उधर वालों को नीचा दिखा रहे हैं। ठीक! तो एक चीज़ ये दिखाई देगी कि इधर वाले अपने-आपको श्रेष्ठ समझते हैं, इनको नीचा समझते हैं। (दूसरी ओर इशारा करते हुए) इधर वालों में मैं क्या देखूँगा? इनको अब नीचा समझा रहा है तो इनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? इनमें रोष आएगा, ठीक है ना? और ये सिद्ध करेंगे कि हम नीचे नहीं हैं।

और मैं क्या देखूँगा?

एक-दूसरे का भय होगा; एक समूह का दूसरे समूह से भय होगा, अलगाव होगा, और मैं क्या देखूँगा?

प्र: विवाह नहीं होगा एक-दूसरे से, दूर-दूर रहेंगे।

आचार्य: यह, ये मैं कुछ ऐसी बात जानना चाहता हूँ न; मैं एलियन बैठा हूँ तो मैं देखूँगा कि अगर यहाँ बात हो रही है तो कैसी हो रही है? आपस में ज़्यादा हो रही है, इधर (दूसरी तरफ़) बात हो रही तो क्या हो रही है? आपस में ज़्यादा हो रही है। और इन दोनों समूहों के बीच बातचीत काफ़ी कम है। (ध्यान से देखने का अभिनय करते हुए) तो मैं ऐसे देख रहा हूँ, 'अच्छा ठीक है! तो ये दोनों आपस में नहीं बात कर रहे। इनका इधर चल रहा है, इनका इधर चल रहा है।' ठीक है! और मैं क्या देखूँगा?

मैं देखूँगा कि इधर के ये थे, इधर के आप थे, इन दोनों में लड़ाई हो गई तो उधर वाले जितने थे, आकर के किसका पक्ष लेने लग गए?

प्र: उधर वालों का।

आचार्य: और इधर वाले किसका पक्ष लेने लग गए?

प्र: इधर वालों का।

आचार्य: और पता इधर वालों को भी नहीं है कि लड़ाई किस बात की है और उधर वालों को भी नहीं पता है कि लड़ाई किस बात की है पर उन्होंने तुरंत कह दिया कि नहीं, अपने भाई का पक्ष लेना है और इन्होंने कह दिया कि अपने भाई का पक्ष लेना है।

ठीक है, अच्छा! और मैं क्या देखूँगा? और मैं देखूँगा कि इधर (एक जाति) की लड़के-लड़कियाँ आपस में रिश्ता बना रहे हैं, इधर (दूसरे जाति) के लड़के-लड़कियाँ आपस में रिश्ता बना रहे हैं और ऐसा भी हो रहा है कि खाना-पीना भी ज़्यादा साथ-साथ है नहीं। चार लोग उधर बैठकर एक थाली में खा रहे हैं, चार इधर बैठ कर खा रहे हैं, आपस में खाने में ज़रा संकोच है, परहेज है।

ये सब मैं देखूँगा, ठीक है? ये सब मैं देखूँगा।

ये सब दुनिया के किस देश में हो रहा है? मैं एलियन हूँ, मैं कुछ नहीं जानता। ये सब दुनिया के किस देश में हो रहा है? बस जो मैंने बात बोली वो समझिएगा। कि दो समूह हैं जिनमें से एक समूह अपने-आपको ऊँचा समझता है, एक नीचा समझता है। वो आपस में ज़्यादा शादी-ब्याह नहीं करते हैं, ये सब दुनिया के किस देश में हो रहा है?

ये साहब हर जगह है। बात समझ में आ रही है?

हाँ, किसी जगह पर ये किसी रास्ते से घुसा है और किसी अन्य जगह पर किसी (अन्य) रास्ते से घुसा है। लेकिन मूल कारण एक ही है। किसी जगह तुम उसको नाम कास्ट (जाति) का दे सकते हो, कहीं पर नाम क्लास (वर्ग) का दे सकते हो, कहीं कुछ और बोल सकते हो। पर मूल वजह तो एक ही है, जानते हो क्या?

ये जो खोपड़ा है न हमारा, इसे सीमाएँ चाहिए, इसे बँटवारे पसंद हैं, इसे बाँटना बहुत ज़रूरी है। समझ में आ रही है बात? जहाँ पर बँटवारा जाति के नाम से नहीं होता वहाँ किसी और नाम से हो जाता है। जिनको तुम कहते भी हो कि बहुत विकसित, परिपक्व, उदार, लिबरल देश है वहाँ भी ऐसा हो पाएगा क्या कि एक बहुत गरीब आदमी है और एक बहुत अमीर आदमी एक ही थाली में खाना खा रहे हैं? बोलो!

चलो अगली बात — क्या ऐसा भी हो पाएगा कि कोई बहुत अव्वल दर्जे का रेस्ट्रॉ है और उसमें गरीब लोग पाए जा रहे हैं? और पाए भी जाएँगे तो वेटर होंगे। विभाजन तो हो गया ना! कहीं लिखा नहीं है उसके दरवाज़े पर कि यहाँ सिर्फ़ अमीर लोग प्रवेश कर सकते हैं पर वैसे किसी नोटिस की ज़रूरत नहीं है, मेन्यु कार्ड, रेट कार्ड काफ़ी है। जो होटल का टैरिफ कार्ड होता है, वो काफ़ी है।

अंग्रेज दरवाज़े पर चस्पा कर देते थे, ‘डॉग्स एण्ड इंडियन्स नॉट अलाउड’ (कुत्तों और भारतीयों का आना मना है), अब उसकी ज़रूरत नहीं है। उसकी जगह सिर्फ़ क्या चाहिए? मेन्यु कार्ड, वो मेन्यु कार्ड ही काफ़ी है निन्यानवे प्रतिशत लोगों को बताने के लिए कि बाहर रहो, अंदर मत आ जाना; क्योंकि मेन्यु कार्ड पर सिर्फ़ ये नहीं लिखा होता कि खाने में क्या है, ये भी लिखा होता है कि कितने का है। और बड़ी उलझन की, ऑकवर्ड स्थिति हो जाती है कई लोगों की: बेचारे जाकर बैठते हैं, फिर देखते हैं फिर धीरे से उठ कर निकल जाते हैं। ये समझ में आ रही बात?

इंसान जहाँ भी है जैसा भी है, दुर्भाग्यवश बँटवारा उसे पसंद है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि बँटवारे का मारा हुआ है। तो एक बात तो ये समझो। इसका ताल्लुक भारत भर से नहीं है, इसका ताल्लुक दुनिया की हर जगह से है। हाँ, ये समस्या भारत में बहुत गंभीर रूप में निश्चित रूप से देखी गई पर भूलना नहीं कि जो समय भारत में बहुत गहरे जातिवाद का था वही समय भारत में आर्थिक ह्रास का भी था, इकोनामिक डिक्लाइन , वही समय भारत में सामरिक ह्रास का भी था, मिलिटरी डेक्लाइन , और वही समय भारत में तमाम तरह की गुलामियों का भी था।

वही समय था जब भारत में कई सौ सालों तक कोई वैज्ञानिक प्रगति भी नहीं हुई। ये सारी बातें मिलाकर किधर को इशारा कर रही हैं? समझो, समाज ऐसा है कि जातिप्रथा उसमें भयानक रूप ले चुकी है, सतीप्रथा भयानक रूप ले चुकी है, वैज्ञानिक तरक्की कोई हो नहीं रही, आर्थिक प्रगति हो नहीं रही और युद्ध के मोर्चे पर एक के बाद एक हार मिल रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये जो पाँचों-छहों बीमारियाँ हैं इनका कोई मूल साझा स्रोत हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि जब हटेंगी तो सारी बीमारियाँ एक साथ हटेंगी?

वो साझा स्रोत क्या है, उसको समझो तो। वो साझा स्रोत वही होता है— दिमाग़ के भीतर का अज्ञान, कोहरा। जब वो कोहरा छाता है तो आदमी न जाने कितनी पागलपन की करतूतें करता है। इंसान इंसान को मार के खाना शुरू कर देता है। हर तरीके से आदमी दूसरों का भी शोषण करता है और अपना भी नाश; समझ रहे हो?

तो तुम कानूनन प्रतिबंधित भी कर सकते हो जाति व्यवस्था को, कर दो। वो दूसरे तरीकों से सामने आ जाएगी। वो एक ऐसा नासूर है, उसको शरीर में एक जगह से साफ़ करोगे दूसरी जगह से फूट पड़ेगा, नाम कुछ और ले लेगा। ब्रिटेन में तो नहीं थी ना जाति व्यवस्था फिर कैसे हो गया ‘डॉग्स एण्ड इंडियन्स नॉट अलाउड’ ? कोई और नाम ले लेगा वह।

एक मज़ेदार बात थी। गोवा गए हुए थे तो मेरे साथ ये सब लोग थे। तो एक जगह उन्होंने कहा कि आज जाते हैं डांस पार्टी है यहाँ पर। इनको बिचारों को घुसने नहीं दिया। वो बोले, ' स्टेग एंट्री नॉट अलाउड (बिना महिला साथी प्रवेश वर्जित है)।' ये तो वही हो गया ‘डॉग्स एण्ड इंडियन्स नॉट अलाउड’। ये भी तो एक तरह की आपके ऊपर बाध्यता ही लगाई जा रही है ना कि जब तक तुम्हारे बगल में एक देवी जी नहीं हैं तब तक अंदर घुसने नहीं देंगे तुम्हें, नाचने नहीं देंगे; नाचने छोड़ दो, बैठने नहीं देंगे। बाहर खड़े होकर बोल रहे कि देखो भूखे-प्यासे हैं। कुछ नहीं! 'वो (साथ में लड़की) कहाँ हैं?' वो बोले, 'हम सातों में किसी के पास नहीं।' (हँसी) (गार्ड) बोले, 'बाहर खड़े रहो, अंदर नहीं आ सकते'; ‘डॉग्स एण्ड इंडियन्स नॉट अलाउड’। अपार्टमेंट्स में लिखा रहता है, ‘बैचलर नॉट अलाउड’।

हमें किसी-न-किसी को दुश्मन बनाना है, हमें किसी-न-किसी को पराया घोषित करना है। हमें किसी-न-किसी को घोषित कर देना है कि ये अवांछित है, ये हमें अपनी ज़िंदगी में नहीं चाहिए। ये बहुत दूर की कौड़ी लगेगी आपको लेकिन देखो न कभी वो मंदिरों में कहते थे कि शूद्रों को आना वर्जित है, अब वो और जगहों पर और लोगों को वर्जित कर रहे हैं। और जिनको वर्जित किया जा रहा है उनको एज़ अ कैटेगरी , एज़ अ क्लास (एक वर्ग विषेश के रूप में) वर्जित किया जा रहा है। उनकी कोई व्यक्तिगत ग़लती नहीं है कि उनको वर्जित किया गया। तुम शूद्र हो तुम वर्जित हो, तुम बैचलर (अविवाहित) हो तुम वर्जित हो। वो बैचलर कोई भी हो सकता है। हमारे देश में तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, कौई भी हो सकता है (हँसी)। तो एज़ ए क्लास, यू आर बार्ड (एक वर्ग के रूप में तुम्हें मनाही है)। समझ रहे हो बात को?

बहुत लोग कहेंगे, दिस इज़ द ट्रिविलाइजेशन ऑफ द इसू (ये मामले का तुच्छीकरण है)। नहीं, ट्रिविलाइजेशन (तुच्छीकरण) नहीं है।

आप जब खुद को नहीं जानते न तो आप दूसरे को नहीं जानते। जब आप दूसरे को नहीं जानते तो दूसरे से लगता है डर। जब दूसरे से लगता है डर तो दूसरे को कर देते हो प्रतिबंधित। हिंदुस्तान में आप बात कर लेते हो जातिप्रथा की और वहाँ जो कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक-दूसरे का गला काटते रहे हैं उसकी बात नहीं करोगे? वहाँ बोल दोगे कि ये तो लिबरल लोग हैं। तो ये आयरिश रिपब्लिकन आर्मी क्या थी? पता ही है उसके पीछे मामला क्या था सारा? वहाँ भी एक बड़ा धार्मिक पहलू था।

जातिप्रथा नि:संदेह बहुत गंधाती हुई चीज़ है लेकिन मैं बार-बार कहा करता हूँ कि तुम बाकी सब मन की बीमारियों को छोड़कर सिर्फ़ एक बीमारी पर ध्यान केंद्रित करोगे तो सफलता नहीं मिलेगी। जो आदमी जातिप्रथा में बहुत यकीन रखता है, वो आदमी पचास और बेवकूफ़ी की चीज़ों में भी यकीन रखता होगा। तुम सर्वेक्षण करके देख लो। उसकी ज़िंदगी में और भी पचास बीमारियाँ होंगी और उन सब बीमारियों का एक साझा स्रोत है।

ये ऐसी सी ही बात है कि आपको कोई वायरस लगा है और उसकी वजह से आपके शरीर में चौदह तरह के लक्षण दिखाई दे रहे हों। उसमें से एक लक्षण ये भी हो कि आपकी हथेली पर खुजली होगी और आप हथेली की खुजली का ही इलाज करे पड़े हैं, करे पड़े हैं। अरे भाई, हो सकता है कि आप के इलाज से हथेली की खुजली मिट भी जाए, तो भी जो भीतर घुन लगा हुआ है, वो तो लगा ही रहेगा न!

और मैं उसका प्रमाण दिए देता हूँ। जिनकी हथेली की खुजली मिट भी गई है, वो कौन से खुदा के बंदे हो गए हैं! बहुत सारी जनता घूम रही है अभी जो कहती है, साहब हम तो जात-पात में यकीन नहीं रखते। वो जात-पात में यकीन नहीं रखते लेकिन उनका जीवन फिर भी उतना ही गंधा रहा है जितना जात-पात वालों का। वो जात में नहीं यकीन रखते पर पचास और गंदगियाँ कर रहे हैं। तो फर्क़ कहाँ पड़ा, तरक्की कहाँ हो गई? हम जात-पात में यकीन नहीं रखते लेकिन हम चाहते हैं कि वेश्यावृत्ति को कानूनी घोषित कर दिया जाए। ये तो बहुत उदारमना हैं! कितनी इन्होंने आंतरिक तरक्की की! 'अरे देखिए साहब, हम प्रोग्रेसिव आदमी हैं तो कास्ट वगैरह में यकीन नहीं रखते।'

एक लक्षण से मुक्ति चाहिए या पूरी बीमारी से ही? पूरी बीमारी से अगर मुक्ति चाहिए तो तरीका सिर्फ़ एक है — ज़िंदगी को देखना पड़ेगा, मन को समझना पड़ेगा। नहीं तो कुएँ से निकलकर खाई की तरफ़ भागने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। समझ में आ रही है बात? और ये तो कर ही मत देना ग़लती कि सनातन धर्म पर जातिवादी होने का इल्ज़ाम लगा कर के कहीं उपनिषदों को ही नकार दो। ये भी चल रहा है कि 'हम क्यों पढ़ें इनके शास्त्र, ये ब्राह्मणों ने लिखे हैं और इन्हीं शास्त्रों से तो जाति व्यवस्था आयी है।'

कौन से उपनिषद् से जाति व्यवस्था आयी है, बता दो। बेवकूफ़ी की बात! और उपनिषदों से आयी है तो पाकिस्तान में क्यों अहमदियों की पिटाई है? और शिया और सुन्नी क्यों लड़ रहे हैं? बोलो! और क्यों सिक्खों में जाट सिख अलग हैं और दूसरे अलग हैं, और जो पाकिस्तान से आए हैं उनको भापा बोलते हैं? क्योंकि बात हिंदू की, मुस्लिम की या सिक्ख की है ही नहीं, जब भीतर सब कुछ खंडित है, बँटा-बँटा, तो हम बाहर भी बँटवारा कर ही डालते हैं। हम अपने प्रति इतनी ज़्यादा हीनता से भर गए हैं कि हमें ऐसा लगता है कि सारी बुराइयाँ तो सनातन धर्म में ही है।

आपको क्या लगता है कि इस्लाम में कोई भी मुसलमान किसी भी दूसरे मुसलमान से कर ले जाता है शादी? आप हैं किस दुनिया में! जाकर के कुछ मुसलमान भाइयों से बात तो करिए, वो बताएँगे आपको हक़ीक़त क्या है। बँटवारा कहाँ नहीं है? उस बँटवारे को हटाने का जो तरीका है आप उसे ही हटाए दे रहे हैं। (श्वेताश्वतर उपनिषद् की ओर इशारा करते हुए) ये है उसको हटाने का तरीका, ये सामने श्वेताश्वतर उपनिषद्। कानून एकता और समानता नहीं ला पाएगा, लाएगा भी तो बहुत सतही होगी। कानून आपको विवश कर सकता है क्या किसी से प्यार करने को?

कानून तो अधिक से अधिक यही कह सकता है कि सरकारी नौकरियों में भेदभाव नहीं किया जाएगा, सार्वजनिक जगहों पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। इतना ही तो कर सकता है न कानून? कानून एकता समरसता नहीं ला सकता। वो तो उपनिषद् ही लाएँगे; वो जब आपको बताएँगे कि तुम किसकी जात की बात कर रहे हो; 'देह की जाति की? तुम्हें देह इतनी प्यारी हो गई?' क्योंकि जाति अगर पैदाइशी होती है, पैतृक होती है तो देह की ही होगी, देह ही तो पैदा होती है न। इन्होंने तो आपको बता दिया कि देह ही दो कौड़ी की है, तुम कहाँ फँसे हुए हो इस चक्कर में? जानवर के भी देह होती है, तुम्हारी भी देह है; तुम किस बात पर नाज़ कर रहे हो! चेतना की बात करो। अब चेतना की तो कोई जाति होती नहीं—ऐसे हटेगी जात।

जब आप देह से अपना सरोकार थोड़ा कम करेंगे, तो फिर आपने जाति से भी अपना सरोकार कम कर लिया। क्योंकि जात होती ही सिर्फ़ देह की है और जो जितना देह से लिप्त है वो उतना ज़्यादा बेवकूफियाँ करेगा, जात की नहीं करेगा तो कोई और करेगा। हो सकता है कोई जात को न मानता हो पर जेंडर (लिंग) को मानता हो। उसका यही चल रहा है कि हाय मैं कितनी सुंदर हूँ, मैं क्या करूँ (हँसी)। मूल तो एक ही हुआ ना! थोड़ी देर पहले ये बोल रही थी कि हाय मैं तो ऊँची जाति की हूँ मैं क्या करूँ, अब बोल रही है सुंदर हूँ क्या करूँ। ये दोनों ही चीज़ें कहाँ से आ रही हैं? देह से आ रही हैं। दोनों में से एक नहीं हटेगी, हटेंगी तो दोनों हटेंगी।

निवेदन है सबसे मेरा वही कि कचरा साफ़ करने के चक्कर में घर में जो एकमात्र हीरा है उसको बाहर मत फेंक देना। पहली ग़लती ये कि घर में कचरा भरने दिया, दूसरी ग़लती ये कि कचरा साफ़ करने के चक्कर में हीरा भी उठा कर बाहर फेंक आए। थोड़ा-सा भी अगर जागृत आदमी होगा तो उसको हँसी आएगी। थोड़ा पीछे जाएगा, देखेगा कि ये चीज़ें आयीं कहाँ से, इनका अर्थ क्या है; ब्राह्मण का अर्थ क्या होता है, शूद्र का अर्थ क्या होता है। कितनी बार तो मैं ही बता चुका हूँ। उपनिषदों ने खुद साफ़ किया कि ब्राह्मण माने क्या, शूद्र माने क्या, जाति माने क्या।

चेतना अगर आपकी ब्रह्ममुखी है सिर्फ़ तब आप ब्राह्मण हैं और जिसकी ही चेतना ब्रह्ममुखी है वो ब्राह्मण है। इतनी सीधी सपाट सरल बात है यह। फँस कहाँ रहे हो, दिक्कत क्या है? किसने कह दिया कि तुम्हारे पिता की जो जाति थी वही तुम्हारी जाति हो जाएगी, कैसे हो गया? और किसने कह दिया कि जन्म भर एक ही जाति रहती है? जब चेतना की स्थिति प्रतिपल बदलती रहती है तो तुम्हारी जाति भी तो फिर प्रतिफल बदल रही है ना? जब तुम्हारी चेतना ब्रह्ममुखी है—ब्रह्ममुखी से क्या मतलब है, सीधी बात करो? साफ़ है, निर्मल है। जब तुम्हारी चेतना साफ़ है तो ब्राह्मण हो तुम, ऊँचा स्थान मिलना चाहिए तुमको, सम्मान के अधिकारी हो।

और जब तुम्हारी चेतना शरीरबद्ध है, गिरी हुई है, गंदी है तो शूद्र हो तुम; उठो, आगे बढ़ो, बेहतर बनो। ये क्या खेल चला रखा है कि पैदा होते हो, कोई बोल देता है मैं ऊँचा हूँ, कोई बोल देता है मैं नीचा हूँ। इस तरीके से समाज ने वर्ण व्यवस्था का पालन करा है, उपनिषदों ने नहीं कहा है ऐसे करने को। समाज की करतूत को उपनिषदों के ऊपर काहे डाल रहे हो? बल्कि ये तो दो तरफ़ा बेवकूफ़ी हो गई न। पहली बात तो तुमने उपनिषद पढ़े नहीं और उपनिषदों को न पढ़ने के कारण तुम जो करतूतें कर रहे हो उसका ठीकरा तुम उपनिषदों के सिर फोड़ रहे हो; ये तो अजीब बात है!

जैसे सिलेबस हो साल भर का, पढ़ाई करी नहीं। पढ़ाई करी नहीं, कौन मेहनत करे, पढ़े, और जब परीक्षा हुई तो उसमें क्या हो गए? फेल, सब उल्टा-पुल्टा लिख आए हैं। वहाँ अपनी मनगढ़ंत कहानियाँ, जो साल भर पिक्चरें देखते रहे, घटिया थर्ड क्लास , उन पिक्चरों की कहानियाँ लिख रहे हैं। और बहुत बेहूदी, अश्लील कहानियाँ! गणित की परीक्षा में भद्दे, अश्लील चित्र बनाकर के आ गए। एक तो ये करतूत, और फिर पकड़े गए पूछा गया कि ये बदतमीज़ी कर क्यों रहे हो, तो बोल रहे कि वो टेक्स्टबुक (किताब) में ऐसा ही लिखा है। सारी ग़लती उस टेक्स्टबुक की है, उसको जला दो।

तुमने टेक्स्टबुक पढ़ी भी है? ये जो तुम बदतमीज़ी लिखकर आए हो एग्जाम में वो इसीलिए लिखकर आए क्योंकि तुमने कभी पढ़ा ही नहीं। तुमने पढ़ा होता तो तुम ये कर ही नहीं सकते थे। ये जात-पात, गंद-फंद, हर तरह की कमज़ोरी, चाहे वो ये हो कि आप विज्ञान में आगे नहीं बढ़ रहे, चाहे वो ये हो कि आप युद्ध के मोर्चे पर लगातार हार खाते रहे, वो सारी कमज़ोरियाँ आ ही इसीलिए रही हैं क्योंकि आप इन ग्रंथों के पास कभी गए नहीं ठीक से। आपने कभी समझना ही नहीं चाहा।

नहीं तो तुम मुझे ये बता दो कि कृष्ण की बात का अर्जुन पर तो ये असर हुआ था कि उसने अपने से दूनी शक्तिशाली सेना हरा डाली—कृष्ण की बात का अर्जुन पर ये असर हुआ था कि सामने दूनी सेना खड़ी हुई थी और हरा दी अर्जुन ने। अगर कृष्ण की गीता हमने समझी होती तो हम इतनी लड़ाईयाँ एक के बाद एक हारते कैसे गए, बताओ? ज़ाहिर सी बात है कि कृष्ण की गीता हमने समझी ही नहीं कभी। और जब लड़ाई हार गए, हम बोल रहे हैं कि कृष्ण ही बेकार हैं, गीता ही बेकार है, फू-फू-फू।

तुमने समझी है, जिस चीज़ को छू-छू कर रहे हो? पढ़ी है? पर नहीं, असली चीज़ को कोई महत्व देना नहीं है, उसके साथ मज़ाक, खिलवाड़ करना है। अभी यूट्यूब पर अब वीडियो चलने शुरू हो गए हैं छोटे-छोटे जिसमें एक मसखरा आता है कृष्ण बनके। वो बहुत सारा चीज़ अपने ऊपर डाल लेता है। वो कृष्ण जैसी वेशभूषा कर लेता है, पोशाक, और फिर आकर के वो अजब ज्ञान पेलता है गीता के नाम पर कि जैसे ये सब गीता में लिखा हो।

ये बदतमीज़ी है ना? ये काम तो तुम किसी सामान्य लेखक के साथ भी नहीं कर सकते या कर सकते हो? कि जो बात उसने कही नहीं, लिखी नहीं, उसको उसके नाम पर चिपका दो, कर सकते हो क्या? आप लोग कोई पोस्टर देखें जिसमें कोई बहुत ही भद्दी बात लिखी हो और नीचे लिखा हो ‘अचार्य प्रशांत’, तो आपको कैसा लगेगा? पर सनातन धर्मियों ने लगातार यही करा है कि भद्दी-भद्दी बातें लिखकर उसके नीचे लिख दिया है भगवद्गीता, तब बुरा नहीं लगा? और वही भद्दी बातें हमारी ज़िंदगी बन गई हैं; हमें खा गई व्यक्ति के तौर पर, समाज के तौर पर, राष्ट्र के तौर पर। वही भद्दी बातें हमको खा गई तो हम दोष किस पर लगा रहे हैं? गीता पर, उपनिषदों पर।

उस आदमी को लेकिन तुम नहीं पकड़ते जो कृष्ण का नाम लेकर के कोई भी बेहूदी बात बोल जाता है। उससे पूछो कि किस श्लोक में लिखी है बात बता। यहाँ तक कि जो संगठन बोलते हैं कि वो कृष्ण को समर्पित हैं, उनके प्रवक्ताओं की बातें सुनो! बहुत उनके वीडियो चलते हैं, मिलियन्स (लाखों) में उनके फॉलोअर्स हैं। उनसे पूछो कि आप जो बात बोल रहे हो वो तो कृष्ण की बात के बिल्कुल खिलाफ़ है लेकिन आप बोले ही जा रहे हो, बोले ही जा रहे हो।

सिर घुटा लिया है, टीका लगा लिया है और बोले ही जा रहे हो। मुझे बताओ ये बात गीता में कहाँ है जो तुम बोल रहे हो? कृष्ण तो कहते हैं बल्कि कि जो ऐसी बात बोले वो असुर है। जो बात तुम कृष्ण भक्त होने का दावा करने के साथ बोल रहे हो, कृष्ण कहते हैं जो इस तरह की बातें करते हों वो असुर हैं। लेकिन नहीं, हम ऐसी बातें झेले जाते हैं, झेले जाते हैं। और फिर उन बातों से हमें नुकसान होता है तो दोष किस पर लगता है? गीता पर, कि 'अरे! गीता! कुछ ठीक नहीं है गीता। गीता की वजह से जात-पात है, गीता की वजह से अंधविश्वास है। चलो वेदों को जला दो, उपनिषदों को जला दो, गीता को जला दो।' और जो जितना शास्त्रों को जलाए वो उतना ज़्यादा प्रगतिशील माना जाएगा। (व्यंग्यात्मक शैली में) यू नो, रिलिजन इज़ फॉर द मासेस, नॉट फॉर द क्लासेस (धर्म भीड़ के लिए है, श्रेष्ठ लोगों के लिए नहीं)।

दुनिया का ये बड़े से बड़ा अजूबा है कि जिस देश ने—वास्तव में देश ने नहीं दिए हैं, कुछ ऋषियों ने दिये हैं; कौन सा पूरा देश उठ करके आया था उपनिषदों का निर्माण करने। कुछ मुट्ठी भर ऋषि थे जिनकी साधना थी उससे ये आए। बड़े जादू की बात है कि उसी देश में इतनी पिछड़ी हुई सोच भी है साथ में। लेकिन पिछड़ी हुई सोच इनसे नहीं आयी है भाई! पिछड़ी हुई सोच इसलिए आयी है क्योंकि तुमने इनका कभी सम्मान नहीं करा और सम्मान करा भी तो कैसे करा? (सामने रखे उपनिषद को हाथ जोड़कर प्रणाम करने का अभिनय करते हुए)।

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