मनुष्य चाहे किसी भी देश में हो, किसी भी परिस्थिति में हो, दुर्भाग्यवश विभाजन उसे सहज लगता है। जहाँ जाति के आधार पर विभाजन नहीं होता, वहाँ कोई और नाम लेकर यह प्रवृत्ति सामने आ जाती है। इन सभी बँटवारों का मूल स्रोत केवल मन की अज्ञानता और भ्रम है। जातिवाद मात्र एक लक्षण है, और मनुष्य को इससे नहीं, बल्कि समूची समस्या से मुक्ति चाहिए। इसका एकमात्र उपाय है—जीवन को गहराई से देखना, मन को समझना, जो वेदांत, गीता और उपनिषदों के अध्ययन से संभव है।
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प्रश्नकर्ता:
प्रणाम आचार्य जी, कुछ कोहरा है जो पूरी दुनिया पर छाया हुआ है। यह किसी एक व्यक्ति का मसला नहीं है, बल्कि समस्त मानवता पर एक आवरण बनकर बैठा हुआ है। इसका एकमात्र समाधान है कि व्यक्ति के भीतर के अंधकार का निवारण किया जाए — और उसका उपाय है: उपनिषद्।
लेकिन जिस देश ने पूरी दुनिया को उपनिषद् दिए, वही आज सबसे अधिक अंधकार में डूबा हुआ प्रतीत होता है। एक समय था जब भारत विश्वगुरु कहलाता था, लेकिन आज वह अधिकतर ग़लत कारणों से जाना जाता है। बहुत ही कम लोग हैं जो भारत को एक आध्यात्मिक देश के रूप में देखते हैं।
मेरी समझ में इसकी एक प्रमुख वजह है — जाति प्रथा। हम इतने विभाजित हैं कि अपनी ही संकीर्ण दुनिया में सिमटकर रह गए हैं। हमें देश के व्यापक हितों से कोई सरोकार नहीं रह गया, हम केवल अपने व्यक्तिगत जीवन तक सीमित हो गए हैं।




