जाति का दाग लगा है? तो ऐसे रगड़ कर साफ़ करें

Acharya Prashant

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जाति का दाग लगा है? तो ऐसे रगड़ कर साफ़ करें
ध्यान और प्रेम, इनके सामने ये जाति जैसा कचरा टिकेगा क्या? तो अगर जाति हटानी है तो इनको ही लाना पड़ेगा — एक ध्यान और एक प्रेम। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, मैं किरोड़ीमल का छात्र हूँ। मैं सेकंड ईयर में बीकॉम प्रोग्राम कर रहा हूँ। सर, मेरा कहना है कि धर्म साफ़ है या नहीं? क्या ये सिर्फ़ एक दृष्टिकोण का ज़रिया रह चुका है? क्योंकि एक एग्ज़ाम्पल जैसे क़ुरान, इसी को लेके किसी ने सूफ़िज़्म बना दिया और किसी ने इसी को लेके एक आई॰एस॰एस॰ बना दी। क्या धर्म साफ़ है या नहीं? ये सिर्फ़ एक इंटरप्रिटेशन का ज़रिया रह चुका है।

आचार्य प्रशांत: बढ़िया, बहुत अच्छा। इंटरप्रिटेशन मत कहो, उसको नियत बोलो। नियत।

प्रश्नकर्ता: यस सर।

आचार्य प्रशांत: नियत की बात है। मैं आपको ये दे दूँ (हाथ में एक कपड़ा उठाते हुए), है ना? इससे आप ऐसे माथा पोंछ सकते हो और इसी को आप जाकर किसी के ऐसे लगाकर (मुँह पर लगाकर) उसकी जान ले सकते हो।

प्रश्नकर्ता: यस सर।

आचार्य प्रशांत: तो नियत की बात है। और अपनी नियत का सिक्का चलाना आसान हो जाता है। कारण समझो, किसी भी ग्रंथ में हमेशा दो तरह की बातें होंगी, एक वो जो समय-सापेक्ष है डिपेंडेंट ऑन दैट टाइम, दैट प्लेस, दोज़ सरकमस्टैंसेज़ व्हेन दैट बुक केम अबाउट। कोई भी किताब किन्हीं परिस्थितियों के दायरे में लिखी जाती है। आप भले ही बोल दो, "आसमान से उतरी है" पर बात तो ये है ना कि एक दिन, एक समय, एक सेंचुरी में, एक साल में वो किताब जो है, वो भले ही बोल दो रिवील्ड है, आविर्भूत है, जो भी बोल लो पर उसका भी एक डेट है अपीयरेंस का।

तो उस समय और उस जगह पर जो स्थितियाँ होती हैं ना उनके अनुसार भी उस किताब में बहुत सारी बातें होती हैं, वो बातें लिखनी पड़ेंगी, नहीं लिखते हो तो उस किताब में और उस किताब को पढ़ने वालों में संबंध (कनेक्शन) नहीं बन पाता। समझ में आ रही है बात?

तो कुछ बातें हमेशा होंगी जो समाज की जो इमीडिएट कंसर्न्स होती हैं, उनको एड्रेस करती हैं। और कुछ बातें होती हैं जो सेंट्रल होती हैं, जो कोर बातें होती हैं, जो कालातीत (ट्रांसेंडेंटल) बातें होती हैं। अब ये दो तरह की बातें होती हैं, और दोनों बातें आप पाओगे कि किसी भी अच्छी किताब में मौजूद हैं। ठीक है ना? अब ये आपकी नियत पर है, कि इनमें से आप कौन-सी चीज़ उठा रहे हो।

हमारे भीतर एक पुराना जानवर बैठा हुआ है। उस पुराने जानवर को अपने पुराने ही काम करने हैं — ईट, स्लीप, रिप्रोड्यूस। जो असली बात है उससे वो जानवर डरता है, लेकिन वो जानवर साथ ही साथ अपने आप को सम्माननीय (रिस्पेक्टेबल) भी घोषित करना चाहता है। वो ये भी कहना चाहता है, "सी हाउ रिलीजियस एम आई!" तो वो रिलीजन की इन दोनों बातों में से कौन-सी बात उठा लेगा?

ये है बिल्कुल टाइम-डिपेंडेंट बात, प्लेस-डिपेंडेंट बात ( हाथ में पानी का ग्लास उठाते हुए)। और ये है ट्रांसेंडेंटल बात कालातीत ( दूसरे हाथ में पानी का ग्लास उठाते हुए)। अब वो हमारे भीतर जो जानवर बैठा है जो ये भी कहलवाना चाहता है कि "मैं तो अच्छा आदमी हूँ, मैं रिलीजियस आदमी हूँ," लेकिन साथ ही साथ उसको पता है कि जो बात सीधे-सीधे ट्रुथ की है, वो बात जानवर को मार देगी या टेम कर लेगी। तो रिलीजन के नाम पर एक ही किताब में दोनों बातें, इनमें से कौन-सी बात उठा लेगा? ये हुआ है धर्म के नाम पर आज तक, ये है एंटायर हिस्ट्री ऑफ रिलीजन।

धर्म के नाम पर जितनी भी बाहरी बातें थीं, छिलके जैसी बातें थीं, पेरिफ़ेरल बातें थीं, वो उठा ली गई हैं। जैसे कोई गन्ने का छिलका खा रहा हो, जैसे कोई केले का छिलका खा रहा हो, जैसे कोई अनार का छिलका खा रहा हो और छिलका तो होगा क्योंकि छिलके के बिना बाहरी दुनिया से रिलेशनशिप नहीं बन सकती। केले में अगर छिलका न हो तो क्या होगा? केला ही नहीं बचेगा ना। तो बाहरी दुनिया से रिलेशनशिप के लिए केले का छिलका चाहिए होता है।

हर स्क्रिप्चर में बहुत सारी बातें ऐसी होती हैं, जो यूँ ही होती हैं। वो बस ठीक है देख लो, बाहरी-बाहरी बात है सेंट्रल बात नहीं है। उन बातों को ऐसे म्यूज़ियम में डाल देना चाहिए कि ये बात हिस्टॉरिकल है, ट्रांसेंडेंटल नहीं है। और जो चीज़ हिस्ट्री की होती है उसकी जगह कहाँ होती है? म्यूज़ियम में। उन बातों को लो और ले जाकर के म्यूज़ियम में रख दो, कि "आपकी जगह यहाँ पर है। बहुत इज़्ज़त के साथ हमने आपको म्यूज़ियम दे दिया, आप यहाँ बैठिए हमारी ज़िंदगी में दख़ल मत दीजिए, ज़िंदगी तो हम ट्रांसेंडेंटल बात पर चलाएँगे।”

मैं आपसे बात कर रहा हूँ। हमने बातें करी हैं पर इसमें 2-4% बातें ऐसी भी होंगी, जो बिल्कुल कोर बातें नहीं थीं। उदाहरण के लिए, मैंने इनको (श्रोता को इंगित करते हुए) कहा कुर्सी उठाकर यहाँ आ जाओ। अब मान लो ये जो रिकॉर्डिंग है इसका ट्रांसक्रिप्शन हो जाए, इससे किताब बन जाए। ऐसी ही बनती हैं हमारी सारी किताबें। तो ये पूरी रिकॉर्डिंग हो रही है इन कैमरों में, तो जो कुछ भी कहा वो उसको ट्रांस्क्राइब कर दिया, किताब बना दी। उसमें ये भी आ गया कि "कुर्सी उठाकर आगे आ जाओ।" और मान लो, यही एक रिलीजियस बुक हो जाती है किसी तरीक़े से, दुनिया के संयोग से। क्योंकि बात तो जो हो रही है, वो असल में पूर्णतया विशुद्ध धार्मिक बात ही है, असल में यही धार्मिक बात है। बाक़ी जो बातें होती हैं धर्म के नाम पर वो तो अधार्मिक हैं।

तो अब उस किताब में ये भी लिख दिया जाएगा कि मैंने इनको बोला था, "कुर्सी उठाकर यहाँ आ जाओ।" और आपने पाया कि सौ साल बाद एक रस्म चल रही है, एक जलसा, एक जुलूस निकल रहा है, जिसमें 10 हज़ार लोग कुर्सियाँ उठाकर चल रहे हैं। और तुमने उनकी कुर्सी पर उंगली उठाई तो "सर तन से जुदा! मार देंगे, फोड़ देंगे, कुछ भी कर देंगे। साहब वो आए थे आचार्य, वो बोल के गए थे। देखो लिखा हुआ है! लिखा है कि नहीं लिखा है? कुर्सी उठाओ, आगे आओ।” तो सिर्फ़ कुर्सी उठानी नहीं है, कुर्सी उठाकर आगे भी आना है। उतनी नहीं है, मैंने कोट भी उतारा है: “(शिवा मैं ये उतारना चाहता हूँ)।”

तो पता चला कि उससे कोई प्रथा ही निकल पड़ी, न्यूडिज़्म वग़ैरह कुछ कि इनके जो अनुयायी हैं, 200 साल बाद देखा कि ये जाते हैं और पब्लिकली, क्योंकि पब्लिकली उतारा है, सबके सामने वस्त्र…। “तो उनका काम ही यही है कि वो चौराहों पर जा रहे हैं, सभागारों में जा रहे हैं, जहाँ कहीं भीड़ देख रहे हैं वहीं जा रहे हैं और खट से कपड़े उतार रहे हैं। और कह रहे हैं, ‘ये तो हमारी रिलीजियस राइट है!’ और अगर कोई हमें रोकेगा तो दैट इज़ हर्टिंग आवर रिलीजियस सेंटिमेंट्स!” और जब उनको रोका गया तो वो कह रहे हैं: "नहीं, ऐसे अगर रोकोगे तो हमें अपना अलग देश चाहिए — न्यूडिस्तान!" आ रही बात समझ में?

अब इतनी मोटी किताब होगी 200 पन्ने की, उस 200 पन्नों में वो कौन-सा आदमी होगा, जिसको यही बात दिखाई देती है: "कुर्सी आगे उठाओ, कैमरा लगाओ, माइक दो, पानी दो, कोट पकड़ लो," वो कौन-सा आदमी है जो खोज-खोजकर यही बातें पकड़ रहा है? ये बहुत बेईमान और बहुत डरा हुआ आदमी है, और वो ये सब बातें पकड़ेगा और इन्हीं सब बातों को फुला करके एक नई किताब लिख देगा। वो कहेगा, "ये व्याख्या है, भाष्य है, टीका है, कमेंट्री है।" और उसके आधार पर पूरी परंपरा चला देगा और कहा क्या जाएगा कि ये परंपरा शुरू कहाँ से हुई थी? (अपनी ओर इंगित करते हुए)।

श्रोता: आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: और मैं कहीं से ऐसे कहूँ, "मैंने कब किया?" तो दुनिया में जितने भी ऊँचे लोग हुए हैं — बुद्ध हों, श्रीकृष्ण हों, कबीर साहब हों, वो सब यही पूछ रहे हैं आज सवाल, कि "ये सब कुछ तुम मेरे नाम पर कर रहे हो, ये मैंने कब कहा था? ये मेरी बात तो है ही नहीं! और तुम मेरे नाम पर ये सब कर क्या रहे हो।" आ रही है बात समझ में?

“सार-सार को गहि रहै, और थोथा देई उड़ाय।।” हम उल्टा चलाते हैं, हम ढूँढ-ढूँढकर छिलका खाते हैं। और ये काम किसका होता है? सड़कों पर छिलका खाते किसको देखते हो?

श्रोता: जानवर को।

आचार्य प्रशांत: हम वही पुराने जानवर हैं, जिसके लिए कहा गया था ना, कि बंदर क्या जाने?

श्रोता: अदरक का स्वाद।

आचार्य प्रशांत: असली चीज़ से हमें डर लगता है और नक़ली चीज़ को हम अपना धर्म बना लेते हैं। जहाँ कहीं देखो कि धर्म के नाम पर नालायकियाँ चल रही हैं, वहाँ ये मत कह देना कि "अरे, ये धर्म ग़लत है!" वहाँ ये कहना, "ये धर्म है ही नहीं!"

अभी हमने संत कबीर का नाम लिया। जिस वजह से बौद्ध और जैन धाराएँ दोनों उठीं, उनमें एक बड़ी वजह थी — हिंसा। इसीलिए आप बुद्धिज़्म, जैनिज़्म, दोनों में ये शब्द बड़ा केंद्रीय पाते हो — अहिंसा। अहिंसा की बात ही इसलिए करनी पड़ी क्योंकि समाज में हिंसा बहुत दिखाई दे रही थी। और हिंसा क्यों दिखाई दे रही थी? कर्मकाण्ड में पशुबलि होती थी और पशुबलि क्यों होती थी, वही पशु मारे जाते थे जो खाने में स्वादिष्ट होते थे।

कहा ये जाता था कि "साहब, ये तो वेदों में लिखा हुआ है। ये तो वेदों में लिखा हुआ है कि सैक्रिफ़ाइस करनी चाहिए इससे देवता खुश होते हैं। बलि, क़ुर्बानी, ये करो तो इससे देवता खुश होते हैं।" और सारी जितनी बलि दी जाती थी, वो स्वादिष्ट मांस ही होता था। और वो ये नहीं कि देवता खा रहे हैं, वो खाने वाला कौन होता था? जिन्होंने बलि दी है वही फिर खाते भी थे, तो ले-देकर ये बस पेट भरने और स्वाद का बड़ा हिंसात्मक और बहुत-बहुत बेईमानी भरा तरीक़ा था।

तो "अहिंसा" की बात करी।

पर वेदों में मंत्र मौजूद हैं जहाँ पर बात हुई है, बलि की। उनके कई अलग-अलग तरीक़े के अर्थ निकाले जाते हैं। जो लोग ऊँचा अर्थ लेना चाहते हैं वो कहते हैं की "साहब, ये जिस बलि की बात हो रही है ना, वो अपने अहंकार की बलि देने की बात हो रही है। पशु को मारने की नहीं, पशुता को मारने की बात हो रही है।" ठीक है?

तो ऐसे ही एक बार एक पंडित, संत कबीर के सामने आ गया। और वो मना कर रहे थे बोल रहे थे, “नहीं।” असल में जानवरों के प्रति प्रेम हमारी संत परंपरा में अगर किसी ने सबसे ज़्यादा दिखाया है, तो संत कबीर हैं। जानवरों के प्रति प्रेम और किसी तरीक़े से मांसाहार नहीं होना चाहिए, और ये जो तुम कर रहे हो ना कि "अगर एक भी जानवर को जो तुम करके दे रहे हो, इसके बाद तुम चैन से जी नहीं पाओगे।" ये बात संत कबीर साहब से ज़्यादा किसी ने नहीं बोली है।

तो कोई पंडित वहाँ पर आया उनके पास और बोलता है कि "आप मना कर रहे हो, ये सब बातें तो हमारे वेद में लिखी हुई हैं।" वो दिखाने लग गया, कि देखो यहाँ ये अश्वमेध लिखा है, अजमेध, अश्व माने घोड़ा, अज माने बकरा, गौमेध भी लिखा हुआ है, नरमेध। वो अपना पंडित का अपना ज्ञान, उसकी अपनी बातें। तो संत कबीर बोलते हैं, जितने उसने तरह के मेध बताए थे, तो बोलते हैं:

“अजामेध गोमेध जग, अश्वमेध नरमेध। कहै कबीर अधर्म को, धर्म बतावै वेद।।"

बात समझ में आ रही है?

बोले, "अगर ये सब है, तो ये धर्म ही नहीं है! हम धर्म ही इसको मानने से इनकार करते हैं। अगर ये सब जो तुम कर रहे हो इसका नाम धर्म है, तो कहे कबीर — अधर्म। ये अधर्म है, इसको तुम धर्म का नाम दे रहे हो ये धर्म है ही नहीं!" हम क्यों इजाज़त दें, मूर्खों को इतना ऊँचा नाम यूसर्प करने की, मोनोपोलाइज़ करने की? जो ऊँचे से ऊँचा शब्द हो सकता है — धर्म — हम क्यों उस पर क़ब्ज़ा कर लेने दें ऐसे लोगों को, जो किसी काबिलियत के नहीं हैं? बताओ।

हमने कहा, "मनुष्य एक धार्मिक जीव है, धर्म हमें चाहिए।" ऊँचा शब्द है, धर्म। हमने धर्म पर क्यों क़ाबिज़ हो जाने दिया है ऐसे लोगों को जो धर्म जानते ही नहीं, ये है गलती और इस गलती का सुधार करना पड़ेगा। समझ में आ रही है बात ये?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मेरा नाम सोनू द्विवेदी है। अगर बात करें डिस्क्रिमिनेशन की, तो मुझे लगता है कि उसके दो पिलर्स हैं, पहला इग्नोरेंस और दूसरा है एटीट्यूड। तो अगर हमें इसको फंडामेंटली समझना है, तो इग्नोरेंस और एटीट्यूड को समझने की बहुत ज़रूरत है। तो आख़िर इग्नोरेंस और एटीट्यूड का परस्पर में क्या संबंध है, इन टर्म्स ऑफ़ डिस्क्रिमिनेशन?

आचार्य प्रशांत: नहीं। इग्नोरेंस का मतलब होता है — अज्ञान, आम भाषा में। और एटीट्यूड का मतलब होता है — दृष्टि या नज़रिया। ठीक है?

अज्ञान कुछ होता नहीं, झूठा ज्ञान होता है। कोई इग्नोरेंट नहीं होता, कोई भी इग्नोरेंट नहीं होता, सबको लगता है वही ज्ञानी है। जहाँ से हमारा ब्रेन है ना, ये वैक्यूम (रिक्तता) बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसे कुछ अगर पता नहीं होता है तो उस खाली जगह को ही कल्पना से भर लेता है, इसे पता नहीं है तो उस खाली जगह को कल्पना से भर लेता है। कोई इग्नोरेंट नहीं होता। आपके सामने कोई बात ला दी जाए, आप तुरंत उस पर कुछ-न-कुछ तो सोच ही लेते हो ना। आप ये थोड़ी कहते हो, कि मुझे इस बारे में बिल्कुल भी कुछ नहीं पता है। कभी ऐसा होता है?

मिले हो, ट्रेन में लोग जा रहे होते हैं देखा कैसे आपस में बहस कर रहे होते हैं। पता दोनों में किसी को कुछ नहीं है लेकिन दोनों को पूरा भरोसा है कि "ज्ञान" है — ये इग्नोरेंस है। इग्नोरेंस इज़ द इल्यूज़न ऑफ़ नॉलेज, नॉट द एब्सेन्स ऑफ़ नॉलेज।

इग्नोरेंस है कि "मुझे भ्रम है कि मुझे ज्ञान है।"

ज्ञान का अभाव नहीं है, अज्ञान। ज्ञान का भ्रम है, अज्ञान।

और एटीट्यूड माने क्या होता है? एटीट्यूड माने होता है, किसी चीज़ को जाना नहीं, समझा नहीं, पर उसके बारे में मेरे पास एक मत है, रुख है, ओपिनियन है इसे बोलते हैं एटीट्यूड। तो जहाँ इग्नोरेंस है माने झूठा ज्ञान है, वहाँ एटीट्यूड तो होगा ही होगा ना। झूठा ज्ञान है, मेरी नज़र में तो ज्ञान ही है, अपनी नज़र में तो मैं होशियार ही हूँ, "मुझे सब पता है।" अपनी नज़र में तो मैं होशियार ही हूँ ना, भले ही मैं एकदम कुछ नहीं जानता पर मुझे सब पता है।

एक छोटा-सा प्रयोग है, अभी करते हैं आपको बड़ा मज़ा आएगा। गुडकुल कुलकुल, बताओ ये क्या है? अच्छा आँख बंद करो, गुडकुल कुलकुल बोलो, देखो क्या होता है। ये जो ब्रेन है इतनी गड़बड़ चीज़ है ये कोई न कोई इमेज खड़ी कर देगा, ये कोई न कोई मीनिंग भी दे देगा। ये अंधेरे में ऐसे हाथ-पाँव चलाने लगेगा कि इसका कुछ तो अर्थ होगा, कुछ तो सोचूँ। "अच्छा “गुडकुल कुलकुल,” अच्छा गुड़ के ख़ानदान की बात हो रही है क्या?" अच्छा कोई आदमी हो, गुरुकुल में गया था? गुड़गाँव से कुछ है क्या संबंध इसका?"

कुछ-न-कुछ चल रहा होगा दिमाग़ में, ठीक है? ये ब्रेन है इसमें कभी अज्ञान नहीं होता, इसमें सदा फर्ज़ी ज्ञान होता है — फर्ज़ी ज्ञान। हर आदमी अपनी नज़र में ज्ञानी है, ये इग्नोरेंस है। और अगर मैं ज्ञानी हूँ तो ये मेरे सामने आता है, तो इसको देखते ही मेरे मन में क्या आ जाएगा इसके प्रति? एटीट्यूड। क्योंकि मुझे तो लगता है कि मैं पहले से ही जानता हूँ, "देखो, इसका शर्ट का ऊपर वाला बटन खुला है, मुझे पहले से ही पता है ऐसे लोग ठीक होते नहीं। बेटा, तुम बच के रहना," ये एटीट्यूड है। कुछ पता नहीं पर तुक्केबाज़ी, ये एटीट्यूड है।

एटीट्यूड जहाँ होता है वहाँ गड़बड़ होगी ही होगी, क्योंकि आपको एटीट्यूड नहीं चाहिए। एटीट्यूड पुरानी, बासी रेडीमेड चीज़ होती है, आपको एक इंडिपेंडेंट लाइव रिस्पॉन्स चाहिए। आप मुझसे कोई बात करो तो मैं जवाब अपने पुराने एटीट्यूड से थोड़ी दे सकता हूँ, मुझे आज आपकी बात अभी-अभी समझनी पड़ेगी, आपकी आँख में आँख डाल के और कानों से सुन के और ध्यान देकर के, वहाँ से मेरा-आपका रिश्ता बनेगा।

और एक रिश्ता होता है जो एटीट्यूड से बनता है। एटीट्यूड क्या होता है? "अच्छा, ओ! बाल लंबे करके बैठे हो ऐसे लोग मुझे पसंद ही नहीं हैं," ये एटीट्यूड है। "इन्होंने तिलक लगा रखा है, ज़बरदस्त कंज़र्वेटिव हैं ये, मुझे पसंद ही नहीं है।" मैंने ज़रा-सा कुछ देखा और उससे पूरी कहानी बना ली, ये एटीट्यूड है। एटीट्यूड का मतलब होता है बिना जाने ओपिनियन बनाना, पहले से ही बना के रखना।

असली आदमी में, धार्मिक आदमी में एटीट्यूड होता ही नहीं, क्योंकि उसके पास हिम्मत होती है जो भी स्थिति है उसको उपलब्ध होने की। वो कह रहा है, "एटीट्यूड का क्या करना है, जब चीज़ सामने आएगी तो देख लेंगे। एटीट्यूड क्या बनाना है, जब सामने आएगा तो देख लेंगे।"

एटीट्यूड एक तरह का डिफ़ेन्स मेकैनिज़्म है। जो डरे होते हैं, उन्हें ही डिफ़ेन्स चाहिए होती है, और जहाँ इग्नोरेंस है माने फर्ज़ी ज्ञान है वहाँ एटीट्यूड होगा ही होगा। तो इसलिए जानने वालों ने कहा है, "कुछ भी मानकर मत रखो, जब सामने आए तो परख लो, जान लो, सवाल पूछ लो, देख लो।” पे अटेंशन एंड नो। आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। मेरा सवाल ये है, कि रिसेंट फ्यू डिकेड्स में कास्ट का पॉलिटिसाइज़ेशन बहुत हो रहा है। कास्ट इन पॉलिटिक्स और *पॉलिटिक्स इन कास्ट *हो रहा है, जो कि अच्छी बात तो है नहीं। लेकिन इसको काउंटर मेज़र कैसे किया जाए? और करंट सिचुएशन के हिसाब से प्रैक्टिकल मेज़र्स क्या-क्या लिया जाए, जिसके वजह से कास्ट डिस्क्रिमिनेशन घटाया जा सके?

क्योंकि आपने जो बात कही है, वो रैपिडली हो नहीं सकती है कि जितने भी अपने शास्त्र हैं, उनको रिडिक्यूल कर दिया जाए, उनको हटा दिया जाए। लेकिन अभी रैपिड मेज़र्स क्या-क्या लिए?

आचार्य प्रशांत: नहीं नहीं, मैंने सारे शास्त्रों को रिडिक्यूल करके हटाने की तो बात कही भी नहीं है। मैंने क्या कहा है? मैंने कहा, कचरा हटाओ ताकि हीरा सामने आ सके, सब कुछ हटाने की बात नहीं कही है। और आप क्यों कह रहे हो कि तुरंत नहीं हो सकता, तुरंत हो नहीं सकता तो दूर की बात है तुरंत अभी हो रहा है, कैसे नहीं हो रहा है। कह रहे हो, “कास्ट डिस्क्रिमिनेशन होता है और तुरंत हट नहीं सकता," एस.सी.-एस.टी. क्लब है और जन्म से मैं ब्राह्मण हूँ। क्यों बुलाया मुझे? ठीक आपके सामने प्रमाण है, कि

जहाँ-जहाँ सच्चाई की, असलियत की कद्र होती है वहाँ जात नहीं देखी जाती।

मेरी जात देख के बुलाया था क्या?

बल्कि होना तो ये चाहिए था कि मुझे तो क्लास एनिमी मानते, एक तो ब्राह्मण वो भी पुरुष और वो भी शास्त्र पढ़ाने वाला! मैं तो बिल्कुल होना चाहिए, बहुत सारे मित्र हैं जिन्हें मुझसे समस्या ही यही है। वो कहते हैं, यही है! यही है मनुवादी! इसी के पुरखों ने हमारा आज तक शोषण कराया है। अब मैं आपसे बात कर रहा हूँ, तो ऐसा कोई ख़्याल दिमाग़ में आ रहा है आपके? (श्रोता ना में सिर हिलाते हुए)। तो हट गई ना कास्ट। पर जैसे इस पल में हटी है, वैसे इस पल में आप हो आपको हमेशा ऐसे ही रहना होगा तो हट गई तुरंत हट गई, अभी हट गई। पर अगर ऐसे नहीं रहोगे तो वापस आ जाएगी, ये तो हमारे ऊपर है।

इस पल में, मेरे लिए आप यहाँ बैठे हुए मेरी ज़िम्मेदारी हो, आप युवा चेतना हो। और मैं कह रहा हूँ कि मेरे पास अगर दो घंटे हैं तो मुझे इन दो घंटों में अधिकतम आपको देकर जाना है, और आपके सामने मैं बैठा हुआ हूँ, तो आप भी उतने ही ध्यान से सुन रहे हो मुझको। ये हमारा रिश्ता है इस रिश्ते में कास्ट नहीं है न, तो हट तो गई कास्ट! अभी हट गई!

ध्यान और प्रेम, इनके सामने ये जाति जैसा कचरा टिकेगा क्या? तो अगर जाति हटानी है तो इनको ही लाना पड़ेगा — एक ध्यान और एक प्रेम।

जहाँ ये आ जाता है ना वहाँ पर ऐसे (चुटकी बजाते हुए) हट जाता है सारा कचरा, और अगर उनको नहीं लेकर आओगे तो कचरा बना रहेगा, शताब्दियों से बचा हुआ है, शताब्दियों तक बचा रहेगा, हो सकता है नाम बदल जाए। मूल में बात कास्ट की नहीं है मूल में बात सेल्फ़िश डिस्क्रिमिनेशन की है वो सेल्फ़िश डिस्क्रिमिनेशन बचा रहेगा, हो सकता है वर्ण और जाति ये शब्द मिट जाएँ, पर सेल्फ़िश डिस्क्रिमिनेशन किसी और नाम किसी और तरीक़े से चलेगा। वो तो सिर्फ़ वैसे ही हट सकता है जैसे ठीक अभी हटा हुआ है — ध्यान और प्रेम — ले आओ सब अभी हो जाएगा, नहीं लाओगे 10 हज़ार साल में भी नहीं होगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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