प्रश्नकर्ता: कुछ दिनों के अवलोकन के पश्चात मुझे स्वयं में एक कमज़ोरी दिखाई दी, 'ना' न कह पाने की। कई जगह पर मुझे 'ना' बोल देना चाहिए था, बहुत पहले बोल देना चाहिए था, आराम से बोल देना चाहिए था।
लेकिन कुछ ऐसा डर अंदर इकट्ठा हो जाता है और 'ना' नहीं कहा जाता, सही समय पर, सही मौके पर। 'ना' नहीं बोला जाता और फिर बाद में उसका भुगतान बहुत ज़्यादा चुकाना पड़ता है। यह कमज़ोरी शुरू में रही, जैसे बचपन में भी दोस्तों को 'ना' नहीं कर पाता था।
मैं होस्टल गया तो कोई भी आ जाए, स्कूटर लगा होता था, कोई भी ले जाए। ऐसी एक शुरू से खुली सी आदत रही है। परंतु अब आकर दिखता है कि 'ना' कहना चाहिए और स्पष्ट रूप से कहना चाहिए। वहाँ मैं मात खा जाता हूँ। उसका नुक़सान होता है।
आचार्य प्रशांत: 'ना' क्यों नहीं बोल पाते?
प्र: अगला क्या सोचेगा? अगला मेरे बारे में क्या सोचेगा?
आचार्य: और वो जो सोचेगा, उससे आप पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
प्र: वो जो पुरानी छवि उसके साथ मेरी बनी हुई है या जो मैंने एक कह लो कमिटमेंट टाइप (प्रतिबद्धता जैसा) कर रखा है, तो क्या कहेगा कि "यार ये तो बदल गया है, यार ये तो और हो गया है।"



