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जानिये कि आप 'ना' क्यों नहीं बोल पाते || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: कुछ दिनों के अवलोकन के पश्चात मुझे स्वयं में एक कमज़ोरी दिखाई दी, 'ना' न कह पाने की। कई जगह पर मुझे 'ना' बोल देना चाहिए था, बहुत पहले बोल देना चाहिए था, आराम से बोल देना चाहिए था।

लेकिन कुछ ऐसा डर अंदर इकट्ठा हो जाता है और 'ना' नहीं कहा जाता, सही समय पर, सही मौके पर। 'ना' नहीं बोला जाता और फिर बाद में उसका भुगतान बहुत ज़्यादा चुकाना पड़ता है। यह कमज़ोरी शुरू में रही, जैसे बचपन में भी दोस्तों को 'ना' नहीं कर पाता था।

मैं होस्टल गया तो कोई भी आ जाए, स्कूटर लगा होता था, कोई भी ले जाए। ऐसी एक शुरू से खुली सी आदत रही है। परंतु अब आकर दिखता है कि 'ना' कहना चाहिए और स्पष्ट रूप से कहना चाहिए। वहाँ मैं मात खा जाता हूँ। उसका नुक़सान होता है।

आचार्य प्रशांत: 'ना' क्यों नहीं बोल पाते?

प्र: अगला क्या सोचेगा? अगला मेरे बारे में क्या सोचेगा?

आचार्य: और वो जो सोचेगा, उससे आप पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

प्र: वो जो पुरानी छवि उसके साथ मेरी बनी हुई है या जो मैंने एक कह लो कमिटमेंट टाइप (प्रतिबद्धता जैसा) कर रखा है, तो क्या कहेगा कि "यार ये तो बदल गया है, यार ये तो और हो गया है।"

जैसे एक इम्प्रेशन (प्रभाव) होता है, वह ख़त्म हो जाता है।

आचार्य: तो उसके मन में आपकी छवि ख़राब हो गई तो क्या होगा?

प्र: ही माइट नॉट लाइक मी (शायद वह मुझे पसंद न करे)।

आचार्य: तो क्या होगा?

प्र: देन आई विल बी लेफ्ट विद फ्यूवर पीपल (तब मैं कुछ ही लोगों के साथ रह जाऊँगा)।

आचार्य: तो क्या होगा?

प्र: मतलब फिर जिनसे मैं एक संबंध बना पाऊँगा, मुझे महसूस होता है कि वो फिर कम होते जा रहे हैं लोग।

आचार्य: तो कम हो जाएँगे तो क्या होगा?

प्र: फिर बाटूँगा किसके साथ?

आचार्य: तो आप अनजानों के साथ भी बाँट सकते हैं (हँसते हुए)।

प्र: अनजानों के साथ भी वही समस्या है कि वो जो पहल करनी चाहिए उनसे सम्बन्ध बनाने की वहाँ भी एक…

आचार्य: बाँटने के लिए सम्बन्ध क्यों बनाना है? भिखारी को आप बाँटते हो, उससे सम्बंध बनाते हो पहले? किसी को प्रेम में यूँ ही दे देते हो, सम्बंध बनाते हो क्या पहले? किसी को देने के लिए उससे संबंधित होना कहाँ ज़रूरी है? बात कहीं लेने की तो नहीं है (हँसते हुए)?

प्र: बड़ी छिपी हुई चीज़ है।

आचार्य: आपको भी पता है, छिपी नहीं रह सकती। मैं भी जानता हूँ, क्या छुपेगा? तो छुपा क्यों रहे हैं? बात लेने की है न?

प्र: यही कि लोग मेरे बारे में अच्छा सोचें।

आचार्य: तो उससे मुझे क्या होगा?

प्र: मेरे काम आए।

आचार्य: तो उससे क्या होगा? आपके बारे में अच्छी छवि रखें, आपके बारे में अच्छा सोचें, उससे क्या होगा?

प्र: और लोगों में भी मेरे बारे में…

आचार्य: उससे क्या होगा?

प्र: एक्चुअली (वास्तव में) तो कुछ नही होगा।

आचार्य: अरे! कैसे नहीं होगा?

प्र: काम आते हैं लोग।

आचार्य: काम किस तौर पर आएँगे?

प्र: कुछ मुश्किल बँट जाए।

आचार्य: किस तरह की मुश्किल और उसमें क्या काम आएँगे?

प्र: वैसे तो सारी मुश्किलें…

आचार्य: हमारी सारी मुश्किलें कैसी होती हैं? हमारी मुश्किलें यह होती हैं कि सच्चाई नहीं पता, मुक्ति नहीं मिल रही, मोक्ष चाहिए, सत्य चाहिए, ऐसी मुश्किलें होती हैं क्या हमारे सामने? तो आप जिन लोगों के मन में अपनी उज्ज्वल छवि रखने की कोशिश कर रहे हैं, इस आशा में कि वो एक दिन आपके काम आएँगे, आपकी मुश्किलों में आपका सहारा बनेंगे। आप किन मुश्किलों की बात कर रहे हैं?

प्र: वही सांसारिक।

आचार्य: सांसारिक मुश्किलें और उसमें वो आपको किस तरह का सहारा देंगे?

प्र: भौतिक।

आचार्य: भौतिक। माल (दोनों हाथों से धन का संकेत करते हुए)। तो जो ये सारा छवि बचाने का खेल है, ये माल के लालच का खेल है।

ये जो पूरी बात ही है कि समाज में अपनी छवि अच्छी रहे, इज्ज़त ऊँची रहे, समझिए अच्छे से, कि वो बात पूरे तरीक़े से भौतिक है, मटेरियल है। भौतिक है, मटेरियल है।

अध्यात्म की भाषा में कहेंगे तो देहभाव से आती है। जिसमें देह से तादात्म्य जितना ज़्यादा रहेगा, उसे भौतिक चीज़ें पाने की लालसा उतनी ज़्यादा रहेगी क्योंकि वो पहला मटेरियल जो आपको बहुत पसंद आता है वो होती है आपकी देह।

एक बार ये पदार्थ, ये मटेरियल (शरीर को इंगित करते हुए) पसंद आ गया, उसके बाद दुनियाभर के पचासों अन्य पदार्थों पर आपकी निर्भरता बन जाती है। जिसको इससे मोह हो गया, इस पदार्थ से, उसे पचासों अन्य पदार्थ अब चाहिए, कि नहीं चाहिए? बोलो कौन-कौन से पदार्थ चाहिए?

एक बार ये बहुत क़ीमती लगने लग गया, एक बार यह धारणा बना ली कि यह बड़ी क़ीमती चीज़ है, यह मटेरियल — यह शरीर मटेरियल ही है न—एक बार यह बहुत कीमती है तो अब और कौन-कौन से मटेरियल चाहिए? खाना चाहिए, घर चाहिए, गाड़ी चाहिए। वो सब शरीर के लिए ही तो चाहिए होते हैं न। एक से बढ़कर एक फिर कपड़े चाहिए, दुनिया की तमाम तरह की सुख सामग्री चाहिए। और वो जो कुछ भी आपको चाहिए इसके वास्ते, वो आसमान से तो नहीं टपकेगा, वो कहाँ से मिलेगा? दूसरे लोगों से मिलेगा और फिर आपकी मजबूरी हो जाएगी कि दूसरे लोगों के मन में आपकी छवि अच्छी रहे ताकि आपको जो पाना है, वो आपको मिलता रहे।

बहुत लोग कहते हैं, "अरे! ये तो नैचुरल (प्राकृतिक) बात है न कि हम दूसरों के मन में अपनी अच्छी छवि, अच्छा इम्प्रेशन (प्रभाव) रखना चाहते हैं।" इसमें कुछ भी स्वाभाविक नहीं है। ये बात सीधे-सीधे देहाभिमान की है, बॉडी आइडेंटिफिकेशन की है।

ये जो हम रो पड़ते हैं, सार्वजनिक रूप से बेइज़्ज़त हो जाने पर। बहुत लोग देखे हैं न ऐसे, वो कहते हैं कि हम बड़े संवेदनशील हैं। उनकी भाषा में कहते हैं हम बड़े टची हैं। हमें कुछ कह दिया तो हम रो पड़ेंगे। यह बात भावनाओं की नहीं है, यह बात संवेदनशीलता की नहीं है, ये बात सीधे-सीधे मटेरियल गेन की है, भौतिक लाभ की है।

आप लालची हैं इसलिए बेइज़्ज़त होने पर रो पड़ते हैं। "ये क्या हो गया? ऐसा तो शायद कभी सुना नहीं।"

आप लालची हैं, इसलिए आपको इज़्ज़त का इतना ख़्याल है। आपको दूसरों से जो इज़्ज़त मिलती है, उस इज्ज़त के माध्यम से बहुत कुछ मिलता है। इसलिए आपको इज़्ज़त प्यारी है। इज़्ज़त से आपको कुछ नहीं मिल रहा होता तो आप इज़्ज़त के पीछे नहीं भागते। ये बात लेकिन थोड़ा सूक्ष्म हो जाती है तो हमारी पकड़ में नहीं आती।

हम सोचते हैं जैसे इज़्ज़त का अपना कोई मूल्य है, हम सोचते हैं दूसरों की नज़र में हमारा जो सम्मान है, उसका अपना कोई मूल्य है। उसका अपना कोई मूल्य नहीं है। उसका सिर्फ़ एक आश्रित मूल्य है, डेराईव्ड वैल्यू है। इज़्ज़त की क़ीमत इसलिए है क्योंकि इज़्ज़त के माध्यम से आपको कुछ और मिलता है। क्या मिलता है? माल (हाथ से संकेत करते हुए), तमाम तरह का माल मिलता है।

जब आप इस बात को साफ़-साफ़ देख लेंगे तो फिर आपके लिए इज़्ज़त को अधिक क़ीमत देना मुश्किल हो जाएगा। और ग़ौर करिएगा कि जिससे आपको माल की जितनी ज़्यादा अपेक्षा होती है, उम्मीद होती है, उसकी नज़रों में आप अपनी इज़्ज़त उतनी ऊँची रखना चाहते हैं।

हिंदुस्तान में स्त्रियों को ख़ासतौर पर हया का, लज्जा का, इज़्ज़त का, शर्म का, पाठ पढ़ाया गया। कहा गया कि स्त्री को तो सम्मानीय होना ही चाहिए। पुरुष कलंकी निकल जाए, बुरे चरित्र का निकल जाए, कोई बात नहीं। स्त्री के दामन पर कोई दाग़ नहीं होना चाहिए। स्त्री के लिए इज़्ज़त का मूल्य बहुत-बहुत ऊँचा बताया गया।

किसकी नज़रों में इज़्ज़त? अधिकांशतः पुरुषों की नज़रों में। स्त्री के लिए इज़्ज़त क्यों इतनी महत्वपूर्ण बना दी गई? क्योंकि स्त्री पुरुष पर आर्थिक रूप से निर्भर है, आश्रित है। बात समझ रहे हो?

चूँकि उसको तमाम तरह के बंधनों में रखा गया, ख़ुद कमाती नहीं, दुनिया का कुछ हालचाल जानती नहीं। उसको जो भी मिलना है भौतिक रूप से, माल-असबाब, पदार्थ, वो पुरुष से ही मिलना है।

तो स्त्री से कहा गया, "तू इज़्ज़तदार रह और तेरी इज़्ज़त इतनी बड़ी चीज़ है कि अगर तू बेइज़्ज़त हो जाए तो प्राण त्याग दे।" बात समझ रहे हो?

इज़्ज़त के माध्यम से जितना तुम्हें दूसरों से मिलता है उतने ही तुम दूसरों के गुलाम भी तो हो जाते हो क्योंकि अब लगातार तुम्हें कोशिश करनी है कि दूसरे के सामने तुम वही छवि रखो जो वो तुमसे चाहता है।

स्त्री को पुरुष के सामने बिलकुल वही छवि रखनी होगी जो पुरुष चाहता है। घर की औरत को बिलकुल पाक-दामन रहना होगा, सच्चरित्र, सती-सावित्री। वो जितनी सती-सावित्री है, जितनी सच्चरित्र है, पुरुष से उसे उतना माल मिलता जाएगा। वो पूरी तनख्वाह लाकर उसके हाथ में रख देगा। "बोलो और क्या चाहिए? गहने चाहिए? देंगे।"

और यही अगर पता चल जाए कि घर की स्त्री इधर-उधर आती जाती है, दो-चार और सम्बन्ध हैं, इज़्ज़तदार नहीं है तो सबसे पहले उसे चोट कहाँ पड़ेगी? आर्थिक रूप से पड़ेगी। इज़्ज़त गँवाई नहीं कि रोटी गँवा देगी।

इज़्ज़त का सीधा संबंध रोटी से है। इस बात को समझो। जो रोटी का जितना तलबगार होगा, वो इज़्ज़त पर उतना मरेगा। और रोटी के तुम कितने तलबगार हो वो निर्भर इस पर करता है कि तुममें देहभाव कितना सघन है।

जितना तुम अपने आपको पेट मानते हो, उतना ही ज़्यादा तुम रोटी के लिए मरोगे और जितना तुम रोटी के लिए मर रहे हो, उतना ज़्यादा तुम इज़्ज़तदार रहना चाहोगे रोटी देने वाले की निगाहों में।

हम इज़्ज़त को बहुत बड़ी बात समझ बैठते हैं। हमारे जीवन का, समय का, ऊर्जा का, ध्यान का, न जाने कितना बड़ा भाग, सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में अपनी छवि चमकाने में लग जाता है; है न? समझो तो सही कि यह छवि चमकाने के पीछे पूरी बात क्या है? वो जो बात है, वो जैविक है। वो जो बात है, उसका मनुष्य की विकास यात्रा से, इवोल्यूशन से संबंध है।

हमारी एक-एक भावना, अंतत: सिर्फ़ एक उद्देश्य के लिए है — इस शरीर को आगे बढ़ाते रहने के लिए। इसमें जो भावनाएँ बैठी हैं, उनमे जो डीएनए बैठा है, उसका प्रसार करते रहने के लिए।

आपको क्रोध क्यों आता है प्राकृतिक रूप से? देखा है प्रकृति में सभी जानवरों को क्रोध आता है। आपमें और पशुओं में व्यवहार के तल पर जो कुछ भी साझा हो, समझ लीजिए कि उसका उद्देश्य एक ही है — आपके डीएनए को आगे बढ़ाना। प्रकृति और कुछ चाहती ही नहीं।

क्रोध आपको भी आता है, क्रोध पशु को भी आता है, उद्देश्य एक ही होगा और वो एक ही उद्देश्य, एक ही हो सकता है। क्या? डीएनए आगे बढ़ाना है। क्रोध का और कोई उद्देश्य नहीं है। आप रो क्यों पड़ते हैं? आप हँस क्यों पड़ते हैं? इन सबका सम्बन्ध—आपमें ईर्ष्या क्यों उठती है? आपमें मोह क्यों उठता है? आपमें ममत्व क्यों उठता है? वजह बस एक है, कुछ और मत समझिएगा।

आप जिसको प्यार कहते हैं आपको वो क्यों हो जाता है? वजह बस एक है। आप जिसको तकरार कहते है वो क्यों हो जाती है? वजह बस एक है। प्राकृतिक तौर से आपमें जो कुछ भी उठता है, उसका उद्देश्य बस एक है।

बात समझ में आ रही है?

साँप को देखा है? रस्सीनुमा होता है जब वो ज़मीन पर रेंग रहा होता है। देखा है? आपके सामने आता है तो उसका आकार कुछ बदल जाता है। कैसे बदल जाता है? जब तक वो ज़मीन पर रेंग रहा है आपसे उसका कोई मतलब नहीं तब तक वो कैसा है? ट्यूब जैसा है, एक नली जैसा है, एक रस्सी जैसा है न, एक सिलिंडर जैसा उसका आकार है।

लेकिन आपके सामने आता है तो ऐसा हो जाता है (एक हाथ से सॉंप के फँन का संकेत करते हुए)। अब ये आकार ट्यूब या सिलिंड्रिकल तो नहीं है न? यह आकार बदल क्यों लिया उसने? इससे क्या होगा?

श्रोतागण: दिखा रहा है।

आचार्य: दिखा रहा है, आपके मन में अपनी?

श्रोतागण: छवि बना रहा है।

आचार्य: छवि बना रहा है और ये छवि बनाने का उद्देश्य क्या है? अपनेआप को अब वो बड़ा करके दिखा रहा है। जितना बड़ा वो है नहीं, उससे ज़्यादा वो अपनेआप को बड़ा करके दिखा रहा है।

क्यों दिखा रहा है अपनेआप को इतना बड़ा करके? ताकि आप डर जाएँ। डर जाएँ तो उसकी जान बचे।

प्रकृति भी यह खेल खेलती है, प्रकृति में भी जानवरों को पता है दूसरे के मन में अपनी छवि बनाओ क्योंकि छवि बनाने से इसका (शरीर का) व्यापार आगे बढ़ेगा।

छवि बनाने का और कोई प्रयोजन ही नहीं होता। मोर नाचता है मोरनी के सामने, यूँ पंख फैला करके, ये क्या करा जा रहा है? छवि ही तो बनाई जा रही है।

बब्बर शेर को देखिएगा, उसका धड़ बहुत विशाल नहीं होता। लेकिन आप उसे सामने से देखेंगे, बहुत बड़ा नज़र आएगा, कैसे बहुत बड़ा नज़र आता है? उसके मुँह के इर्दगिर्द बाल ही बाल होते हैं। आप सामने से देखेंगे, आपको लगेगा पता नहीं कितना विशालकाय है। वो उतना बड़ा है नहीं, उसने अपनी छवि बनाई है ताकि उसकी देह का धंधा चलता रहे शिकार करने में आसानी हो। सामने वाला आधी लड़ाई तो डर के ही हार जाए। "अरे! इतना बड़ा शेर! सामने आ गया।"

गली के दो कुत्तों को लड़ते हुए देख लेना कभी, एक दूसरे के सामने अपने जबड़े के दाँत ऐसे खोलते हैं कि पूछो मत, देखा है? ये क्या किया जा रहा है? छवि बनाई जा रही है।

अब मुझे बताओ तुम सज-धज के क्यों निकलते हो? एक ही उद्देश्य होगा — शरीर को आगे बढ़ाना और कोई उद्देश्य नहीं होता। और जो जितना ज़्यादा उत्सुक हो दूसरे के मन में अपने लिए एक अनुकूल छवि बनाने का, जान लो उसको उतना ज़्यादा, न आत्मा से मतलब है, न सच्चाई से मतलब है, न मुक्ति से मतलब है। उसको तो बस पेट से मतलब है।

यह छवि का पूरा चक्कर ही, पूरा व्यापार ही, बस देह चलाने का है। इसीलिए देह चलाने के जितने धंधे हैं, वो आश्रित ही हैं छवि के रंग-रोगन पर।

एकमात्र निर्भयता होती है — देहभाव का त्याग। मैं देह हूँ ही नहीं, मुझे डरना क्या! जब तक देह है तब तक डरोगे और जब तक देह है अंतिम डर एक ही रहेगा — मौत का। वो डर तुमसे न जाने क्या-क्या काम करवा देगा।

जिसने वो डर त्याग दिया अब उसमें यह भावना रह ही नहीं जाती कि किसी की नज़रों में अच्छा रहना है कि बुरा रहना है। अब वो आज़ाद ज़िंदगी जी सकता है, अब वो दूसरों पर आश्रित नहीं है। आश्रित अगर वो है भी तो अब आत्मा पर आश्रित है, सच्चाई पर आश्रित है। दूसरों का मुँह उसे नहीं देखना।

जो जितनी नक़ली ज़िंदगी जी रहा है उसको आप उतना ज़्यादा सचेत पाएँगे छवि के प्रति, इज़्ज़त और सम्मान के प्रति। वो उतना ज़्यादा कहता नज़र आएगा, "अरे! धीरे से बोलो, कहीं कोई सुन न ले, लोग क्या कहेंगे? देखो अंदर की बात, अंदर ही रहनी चाहिए, किसी को कानो-कान ख़बर न हो।"

"देखिए साहब, मामले को यहीं दबा दीजिए। समाज में नहीं बात फैलनी चाहिए। लड़की से नादानी में हो गया।"

"नहीं-नहीं वो लड़का जवान है, इसलिए ग़लती कर बैठा, नहीं तो हमारे यहाँ ड्रग्स क्या, बीड़ी-तंबाकू भी कोई नहीं लेता।" ये सब सुनी-सुनाई लग रही है न बातें? ये सब वो लोग हैं जिन्होंने ज़िंदगी में पेट से ज़्यादा कुछ जाना ही नहीं। ये बात इज़्ज़त की कर रहे हैं लेकिन मक़सद इनका बस पेट है, देह है।

सब इज़्ज़तदारों को पेटदार जानना। जब कोई बोले हम बड़े इज़्ज़तदार आदमी हैं, तो समझ जाना कि इज़्ज़तदार नहीं है, पेटदार है। इसका पेट बहुत बड़ा है। तो पेट में कितनी भी इज़्ज़त डालो, पेट तो भरेगा नहीं और जो जितना डरा हुआ होगा, उसे अपनी इज़्ज़त की उतनी परवाह होगी और जो दूसरों पर जितना आश्रित होगा उसे अपनी इज़्ज़त की उतनी परवाह होगी। जाँच के देख लेना। नेताओं को बड़ी अपनी छवि की चिंता रहती है। क्यों? क्योंकि वोट ही किसी और से मिलना है, छवि के ही दम पर वोट मिलना है; छवि गई, वोट गया।

ये सब अभिनेता, अभिनेत्री लगे रहते हैं इसी चक्कर में, जनता के बीच में छवि चमकदार रहे। पंद्रह-बीस, चालीस, पचास फोटो खिंचती होंगी, तब उनमें से एक आती होगी जनता के बीच। और वो भी ख़ूब चमका के रंग-रोगन करके, घिस-घिस के।

वजह सीधी है, तुम अपने चेहरे की खा रहे हो, तुम अपने देह की खा रहे हो। तुममें कोई आंतरिक दम नहीं है। न तुम्हारी कला में दम है, न तुम्हारे कौशल में दम है, न तुम्हारे मन में दम है, न तुम्हारे ज़मीर में दम है। तुम खा ही जिस्म की रहे हो। जब जिस्म की खा रहे हो तो बड़े डरे रहते हो, बड़े काँपते से रहते हो, हर समय सोचते रहते हो, "अरे! और जनता के बीच क्या जा रहा है? ज़रा पता चलता रहे।"

कितनी अजीब बात है न? लोग मरते रहते हैं इज़्ज़त के पीछे और उनको जो इज़्ज़त मिलती है वो दो कौड़ी की नहीं होती, रातों-रात छिन जाती है।

और जिन्होंने इज़्ज़त की परवाह नहीं करी, उन्हें ऐसी इज़्ज़त मिली है कि वक्त भी नहीं छीन सकता। कबीर साहब को क्या फ़िक्र पड़ी थी कि कौन उन्हें पूजनीय मान रहा है और कौन निंदनीय। पर छः सौ साल हो गए उन्हें गए हुए, इज़्ज़त उनकी बढ़ती ही जा रही है। परवाह नहीं करी न उन्होंने इज़्ज़त की।

अपने आचरण को देखिएगा, अपने मन को देखिएगा, अगर आप पाते हैं कि आप ऐसे हैं कि किसी ने आपको दो-चार चुभती बातें बोल दीं और आपको बड़ी ठेस लग जाती है तो समझ लीजिएगा कि बड़े देहभाव में जी रहे हैं आप। आपके जीवन में डीएनए से बड़ा कुछ है ही नहीं। कि आपकी ज़िंदगी का एक ही मक़सद है, डीएनए का प्रचार-प्रसार।

आपमें से बहुत यहाँ ऐसे बैठे हैं, जिनको, मुझे पता है कि किसी ने ज़रा-सा कुछ बोल दिया और काँटा लगा। वो दो-चार दिन बिल्कुल ऐसे घूमेंगे कि "उफ़, हाय-हाय!" उससे यही पता चलता है कि सच्चाई से, आत्मा से कोई ताल्लुक नहीं है तुम्हारा, जिस्म के लिए जी रहे हो।

बचना ऐसों से जो अपने परिचय में ही बता दें, मैं न बड़ा सेंसिटिव हूँ, जल्दी हर्ट हो जाता हूँ। तो समझ लेना कि ये माँस का पुतला सामने खड़ा है। और ये जी ही इसीलिए रहा है कि दुनिया को माँस से और परिपूर्ण कर दे।

बुरा लगा है (मुस्कराते हुए)? कोई बात नहीं, लगना चाहिए। हालत जब अपनी ऐसी कर रखी है कि हवा भी बहकती है तो चोट लग जाती है, तो मेरी बात का तो बुरा लगेगा ही। मैं कैसे बचा लूँगा? हालत तो ये है कि राह चलते भी उलझते रहते हो किसी-न-किसी से। चोट के पुतले जैसे हो।

प्र: नज़र आना आचार्य जी शुरू हो रहा है कि कैसे जहाँ इज़्ज़त का सबसे ज़्यादा खतरा लगता है, वो सारे उदाहरण दिख रहे हैं। माँ के सामने बात न आए, बॉस के सामने बात न आए, पत्नी को न पता चल जाए। जो सबसे क्लोज (करीबी) सम्बंधी हैं…

आचार्य: वो जो सबसे क्लोज नहीं हैं।

प्र: उनके सामने इज़्ज़त जाने का ख़तरा रहता है।

आचार्य: न-न-न, जो क्लोज होते हैं उनके सामने इज़्ज़त जाने का कोई ख़तरा नहीं होता। जिनसे वाक़ई निकटता होती है, उनके सामने आप धड़ल्ले से नंगे हो सकते हैं, बेइज़्ज़त हो सकते हैं।

माँ के सामने, पत्नी के सामने अगर इज़्ज़त बचानी पड़ रही है तो जान लीजिए कि इस सम्बन्ध में किसी तरह की सच्चाई नहीं है, असलियत नहीं है। औपचारिकता है, बनावटीपन है।

ऐसा थोड़ी है कि हर जगह आप अपनी इज़्ज़त बचाते फिरते थे। हॉस्टल में रहते थे, वहाँ पर दोस्त-यारों के सामने इज़्ज़त बचाते थे क्या? वहाँ तो धड़ल्ले से नंगे हो जाते थे।

हाँ, वही बात घर पर माँ-बाप को बताते हुए थर्राते थे। क्यों? वजह समझिएगा। दोस्त को बता भी देंगे तो कोई नुक़सान नहीं करेगा वो। दोस्त को आप कुछ भी बता दीजिए, कोई नुक़सान नहीं करेगा।

वो कल भी आपको अपनी टीशर्ट दे देता था उधार, आज भी दे देगा। तो आपका कोई मटेरियल नुक़सान नहीं हुआ न, कल भी आपको वो मटेरियल उससे मिल रहा था। कौन-सा मटेरियल ? टीशर्ट। और आपने उसको बता दिया कि आज रात गाँजा मार के आया हूँ तो अगले दिन क्या वो टी शर्ट देने से मना कर देगा? नहीं मना करेगा। इसीलिए उसकी नज़रों में आपको इज़्ज़त की परवाह ही नहीं है।

इज़्ज़त का सीधा ताल्लुक लालच से है, पदार्थ के भोग से है। हाँ, घर पर जाकर बता दिया कि गांजा मारकर आया हूँ तो जो टीशर्ट आपने पहन रखी है वो भी फट जाएगी, तो घर पर नहीं बताएँगे। तो घर पर न बताने का सीधा ताल्लुक भी लालच और पदार्थ के भोग से है। टीशर्ट की बात है ये, इज़्ज़त की बात नहीं है।

घर पर भी आपको पता हो कि कुछ भी बताता चलूँ, कोई भौतिक नुक़सान, कोई मटेरियल लॉस नहीं होना है, तो आप सब बता देंगे। माँ-बाप को बताओ तो उनसे जो रुपया-पैसा मिलना है, वो बंद हो जाएगा। पत्नी को बता दिया तो हो सकता है वो रोटी न बनाकर दे या देह का सुख न दे। मना कर दे कि भाग दूर को, कमरे से बाहर निकलो। तो वहाँ नुक़सान होने की संभावना है। कैसा नुक़सान? भौतिक नुक़सान।

सीधा-सीधा मटेरियल लॉस। तो इसलिए आप अपनी इज़्ज़त की इतनी परवाह करते हैं। जो आपके चुनिंदा यार होते हैं इसीलिए आपको उनके सामने इज़्ज़त इत्यादि की कोई फ़िक्र नहीं करनी पड़ती।

श्रोता: रिश्तों में औपचारिकता है, फॉर्मेलिटी है।

आचार्य: रिश्तों में माल है। रिश्तों में माल है, माल का आदान-प्रदान है और माल का लालच है। वो माल रुपया-पैसा भी हो सकता है, वो माल कामवासना का सुख भी हो सकता है। पर जो कुछ भी है, है फिजिकल ही, भौतिक ही है। देह भी भौतिक है, देह के ऊपर का कपड़ा भी भौतिक है, दोनों फिजिकल हैं न। तो बात या तो इस माल की (कपड़े की) होगी या इस माल की (शरीर की) होगी। पर बात है माल की ही। हम मालाभिमानी हैं। हम मालभाव में जीते हैं।

श्रोता: ग्राहक और दुकानदार का रिश्ता।

आचार्य: ज़िंदगी के बड़े-से-बड़े आनंदों में है, उन्मुक्त जी पाने का, चल पाने का, आ पाने का, जा पाने का, बोल पाने का आनंद। और जिसको अपनी छवि की ही चिंता लगी हुई है, वो उन्मुक्त जी ही नहीं सकता।

जीवन का इतना बड़ा आनंद आपने गँवा दिया। अब एक-एक कदम सिहर-सिहर कर रख रहे हो। पाँच दफे आईने में अपनी सूरत देख रहे हो मैं लग कैसा रहा हूँ। कहीं गिर पड़े तो ये बाद में देख रहे कि चोट कितनी लगी, ये पहले देख रहे हो किसी ने देखा तो नहीं।

श्रोता: बचपन से मैंने देखा है कि जैसे शिक्षकों को प्रभावित करने की आदत ताकि वहाँ से नंबर मिले।

आचार्य: दूसरी क्लास के टीचर को इम्प्रेस (प्रभावित) करने की कोशिश करते हो क्या कभी? क्यों, अपनी ही क्लास के टीचर को क्यों इम्प्रेस करना है?

क्यों, अपनी ही टीचर को क्यों इम्प्रेस करना है, बगल वाली क्लास की टीचर को क्यों नहीं? या बगल के स्कूल की टीचर को क्यों नहीं?

क्योंकि वो माल देती है। और जिस दिन वो माल देना बंद कर देती है, उस दिन फिर वो धीरे-धीरे ध्यान से हटती जाती है। हटती जाती है कि नहीं?

श्रोता: और उन दिनों जब क्लास में बैठते थे तो प्रभावित करने की इतनी अंदर से आ जाती थी।

आचार्य: थोड़ी प्राकृतिक है, थोड़ी सामाजिक है। छोटे बच्चों में भी होती है। इसीलिए छोटे-से-छोटे बच्चे को भी झूठ बोलना सिखाना नहीं पड़ता। प्रकृति झूठ से भरी हुई है।

और जो गिरगिट आपके सामने रंग बदल रहा है, वो क्या कर रहा है? वो क्या कर रहा है? झूठ ही तो बोल रहा है। जिस रंग का नहीं है, वो रंग आपको दिखा रहा है।

ये बातें प्रकृति में ही निहित हैं। छोटा बच्चा गर्भ से ही झूठ साथ लेकर पैदा होता है। हम सोचते हैं कि अरे कुसंगति के कारण झूठ बोलने लगा। न। देह में झूठ बैठा हुआ है, डीएनए में बैठा हुआ है।

ये छिपकली जो आपके पीछे पूछ छोड़कर भागती है, ये क्या है? आप छिपकली के पीछे भागते हो, पूछ छोड़कर भाग जाती है। ये क्या है?

श्रोता: धोखा।

श्रोता२: मेरे पूँछ से खेलो।

आचार्य: जो देहभाव में जिएगा, वह पशु समान जिएगा। वो ये सब फरेब, चालाकियाँ करते ही रहेगा।

उनसे हासिल क्या होगा उसको? छिपकली की पूँछ और छिपकली की मौत (हँसते हुए)।

छिपकली बड़ी प्रवीण भी होती है, बड़ी होशियार भी होती है, तो भी रह तो छिपकली ही गई।

पूँछकटी छिपकली देखी है कभी? कितनी सम्माननीय हैं (पुनः हँसते हुए)? मरेगी वो भी छिपकली की मौत। और अपनी तरफ़ से उसने बड़े जुगाड़ लगा दिए।

श्रोता: और अधिकांशतः यह सब कुछ हो बेहोशी में ही रहा होता है। एक आदत सी बन गई होती है और फिर मैंने देखा है उससे शोषण जब तक न हुई हो अच्छे से तब तक होश नहीं आता, तब जाकर होश आता है कि भई कर क्या रहे हैं?

आचार्य: उसको बेहोशी मत कहिए। दो तरह के होश हैं। ये लोग जो अपनी छवि चमकाने को आतुर हैं, इनको भी ज़बरदस्त होश है। अब लट (सिर के आगे के बाल) ऐसे (किसी एक तरीक़े से) आनी है और ऐसे आने की जगह ऐसे (किसी दूसरे तरीक़े से) आ गई, तो ये इतने सजग हैं कि इन्हें तत्काल पता चल जाएगा। तो ये तो मत कहिए की इन्हें होश नहीं है, होश तो पूरा-पूरा है। छवि वालों के होश के क्या कहने? किस सूट के साथ, किस रंग का दुपट्टा चलेगा? नहीं दुपट्टा अब चलता नहीं। क्या चलता है? कुछ भी और? मुँह रंगने का सामान, होठ रंगने का सामान। वो उनको बिलकुल बारीकी से पता होता है न।

रंग एंगसट्रान के तीसरे डेसिमल तक उन्होंने मँगाकर, बिलकुल मिलाकर पहना होता है। कि जो अभी सैंडल डाली है वो चार हज़ार तीन सौ छब्बीस एंगसट्रान की है अगर तो आँखों पर जो लगा रहे हैं वो पाँच हज़ार एक सौ तीन दशमलव छः छः एंगसट्रान का होना चाहिए। इतनी गणना कोई बेहोशी में कर लेगा क्या? कर लेगा? तो होश तो है। यह मत कहिए कि बेहोशी में हो रहे हैं वो काम। बस वो जानवर वाला होश है। जानवर वाला होश है।

कभी देखिएगा कि छिपकली को किसी कीड़े पर घात लगाते हुए, कैसे ध्यान में रहती है, देखा है? पाँच मिनट, दस मिनट, बिल्कुल किसी साधक समान (प्रतिभागी हँसते हुए), स्थिर आसन में रहती है, होश तो पूरा है उसको, या होश नहीं है? वो जानवर वाला होश है।

तो ये जो देह और छवि वाले लोग होते हैं, होश इन्हें पूरा होता है। पर इनका होश होता है छिपकली वाला होश। इनका पशु होश है। वो दूसरा होश है।

प्र: जैसे कई बार नहीं भी करना चाहते पर करना पड़ता है। ऐसा क्यों हो रहा है?

आचार्य: अभी लालच बाक़ी है। अभी उम्मीद बची है कि उस व्यक्ति से कुछ मिल जाएगा।

श्रोता: और यह उम्मीद टूटेगी कैसे?

आचार्य: टूट रही है बात करते रहिए। बात टूटेगी, तो फिर उम्मीद नहीं टूटेगी। इसीलिए बहुत लोग बात शुरू ही नहीं करते। क्योंकि बात शुरू हो गई तो ज़माने से उम्मीदें टूटेंगी।

श्रोता: मैंने कई बार अपने अंदर देखा कि यह बची हुई उम्मीद है। आफ़त है। कुछ मिल सकता है। अभी भी कुछ पड़ा है जो…

आचार्य: कितनी ही दफ़ा होता है शिविर ख़त्म हो जाता है। लोग वापस चले जाते हैं। वापस जाकर संदेश भेजते हैं, बोलते हैं, जो असली सवाल था, वो चार दिन तक आपसे पूछा ही नहीं क्योंकि पता था कि अगर वो मुद्दा आपके सामने खोल दिया तो उम्मीद टूटेगी, दिल टूटेगा।

तो हिम्मत नहीं पड़ी आपके सामने वो बात उठाने की। पर उसी बात के लिए आए थे शिविर में और वही बात कर नहीं पाए। जो झूठ में जी रहा होता है, उसकी एक पक्की निशानी यह होती है कि वो सच से कतराना शुरू कर देता है।

उसकी हालत बड़ी बेबसी की होती है। उसको पता है कि वो झूठ में जी रहा है और जिए जा रहा है।

प्र: जैसे इज़्ज़त वाली बात मैं बहुत समय से करना चाहता था, पर तब नहीं इतनी स्पष्टता आती थी। पर मैंने देखा कि जीवन की ऐसी परिस्थिति होती है जो बड़ा नुक़सान कर देती है। जैसे आज खुलकर कर पा रहा हूँ, यह चीज़ समझ आ रही है। धन्यवाद।

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