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इतना निर्भर क्यों है आपका बच्चा आप पर? || (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं यहाँ कैंप में आई हुई हूँ और मेरी बेटी की आज एक परीक्षा किसी कारणवश छूट गई, बड़ी ग्लानि अनुभव कर रही हूँ।

आचार्य प्रशांत: हम लोग ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ने में भी बड़े माहिर होते हैं। ग्लानि भाव ले लेने को बड़े आतुर होते हैं। अब ऐसे तो आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी छत्तीसगढ़ में जो आपके परिवार जन हैं उनकी होनी चाहिए। आप यहाँ आईं हैं, आप पत्थर से कूद जाएँ उनको ग्लानि होनी चाहिए, कि "मैं कुछ कर नहीं पाया।"

कोई बिलकुल ही बच्चा हो तो बात अलग है अन्यथा सब अपने-अपने लिए ज़िम्मेदार हैं। और भूलिए मत कि जब आप किसी के जीवन में इस हद तक प्रविष्ट हो जाते हैं, कि वो छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आप पर निर्भर हो जाता है, तो न सिर्फ़ वो आप पर निर्भर होता है बल्कि आप उसकी ज़िन्दगी पर हक़ भी जमा लेते हैं। जिसको आप ये कहते हैं कि, "तुम्हें सुबह सही समय पर उठाने की ज़िम्मेदारी मेरी है भले ही मैं तुमसे तीन-सौ किलोमीटर दूर किसी और जगह पर हूँ", उसको फिर आप उसके मुताबिक चलने भी नहीं देंगे। आप कहेंगे, "छोटी-छोटी बातें तो मैं तय करूँ तुम्हारी और जीवन के बड़े निर्णय तुम ख़ुद ही ले लोगे? सुबह उठाने के लिए माँ थीं, और जीवन की दिशा निर्धारित करने के लिए तुम ख़ुद हो?" आप छोड़ दोगे फिर उसे? आप जिसकी ज़िन्दगी में इतनी गहराई से घुस जाओ उसको फिर आप मुक्त नहीं छोड़ पाओगे। तो भला है कि वो अपने कर्मों के सुख-दुःख स्वयं भोगे।

प्र: चिंता होती है।

आचार्य: मैं फिर आपसे पूछ रहा हूँ। जिसकी ज़िन्दगी में आप इतने प्रविष्ट हो जाएँ कि सुबह उसको सही समय पर उठाने की ज़िम्मेदारी भी आप ले लें, उसको क्या आप कुछ भी एकांत में करने देंगे अब? उसकी ज़िन्दगी के तो हर लम्हें में आप मौज़ूद रहेंगे, घुसे हुए रहेंगे। आप कहेंगे, "मुझे पता है कि तू कब सोती है, कब उठती है, कब कहाँ जाती है।" एक जवान लड़की के साथ ये करना उसके प्रति अन्याय है। वो बढ़ ही नहीं पाएगी, उसका विकास रुक जाएगा, क्योंकि वो जहाँ भी जा रही है पा रही है कि साथ में माँ लगी हुई हैं। सुबह उठाने के लिए माँ है, खाना खिलाने के लिए माँ है, घर तय करने के लिए माँ है, जीवन तय करने के लिए माँ है।

ये बात वास्तव में बड़ी अजीब है, कि एक सुविकसित इंसान, एक परिपक्व वयस्क को इन छोटी-छोटी बातों में किसी और की आवश्यकता पड़े। ये छोटी-छोटी मजबूरियाँ कितने बड़े बंधन बन जाती हैं हमें पता नहीं, और बंधन जब भी होते हैं एक पर नहीं दोनों ओर से होते हैं। जो बंधा है वो तो बंधा ही है, जो बाँध रहा है वो भी बंध जाता है।

और ये खूब होता है, पति पत्नी होते हैं, पति तय करेगा कि पत्नी दुपट्टा भी किस रंग का ख़रीद रही है। पतियों को भी बड़ा अच्छा लगता है जब पत्नी उनकी माँ बन जाती है। बिलकुल माँ-तुल्य सेवा कर रही है, सुबह उठते ही, "देखो आज तुम्हारे लिए ग्रीन टी बनाई है क्योंकि अब तुम मोटे होने लग गए हो।" तब तो बड़ा मधुर लगता है, वाह! फिर बाद में क्यों रोने आते हो? "गला पकड़ लिया है, साँस नहीं ले पाते। यहाँ बैठते हैं तो बोलती है वहाँ बैठो, वहाँ बैठते हैं तो उठा देती है 'चलो छत पर जाओ', छत पर होते हैं तो नीचे से चिल्लाती है 'बाज़ार नहीं गए अभी'। दफ़्तर से कभी मन कर जाए कि दोस्तों के यहाँ जाना है तो तुरंत फ़ोन आ जाता है कि 'कहाँ आवारागर्दी कर रहे हो'।" क्यों, तब तो तुम्हें बहुत अच्छा लगा था जब अपने हाथ से वो तुम्हें रसगुल्ला खिलाती थी। कहो अब?

खलील जिब्रान ने कहा था कि "साथ रहो, पर ज़रा दूर-दूर।" वो बात सिर्फ़ पति-पत्नी के लिए नहीं है, माँ-बेटी के लिए भी है। इतना भी क्या किसी के जीवन में घुस जाना कि उसकी अलार्म क्लॉक ही बन जाना। उसे जीने दीजिए, ग़लती करे तो दंड भी उसे ही भुगतने दीजिए। जो अपनी ग़लतियों के लिए दंड नहीं भुगत सकता वो फिर अपने सत्कर्मों का सुफल भी नहीं भोगेगा।

जब आईआईटी पहुँचे थे नए-नए तो वहाँ कुछ वैसे भी आते थे, कुछ बच्चे होते हैं न जिन्हें रुई के फाहे में रखा जाता है, लाडले। जिन्हें माँ-बाप बिलकुल एकदम दुलार से रखते हैं। जो होते हैं न बिलकुल जिन्हें कहा जाता है रुई के फाहे में रख कर पाला है, तो वैसे भी दो-चार पहुँचे हुए थे। तो रैगिंग वगैरह चल रही थी। उनके माँ-बाप आईआईटी के पास में ही होटल लेकर रहना शुरू कर दें, कि लाडले की रैगिंग हो रही है। और पता चल ही जाता है ऐसे लाडले कौन से हैं, वो गोलू-गोलू अलग ही दिखते हैं। उनमें से एक का नाम (अभी) रखा मैंने गोलू कस्टर्ड।

कहाँ है वो?

प्र: अभी गया है।

आचार्य: आप पता करिएगा इस कैंप में गोलू-कस्टर्ड किसका नाम है।

(श्रोतागण हँसते हैं)

तो ऐसे जब मिल जाते हैं न हॉस्टल वालों को, सीनियर्स को तो मतलब बिलकुल बाँछे खिल जाती हैं, कि ये (आचार्य जी बिलकुल मस्त होते हुए) "तू यहाँ आ, तू यहाँ आ, बैठ यहाँ बैठ।"

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: अच्छा शिकार मिल गया।

आचार्य: हाँ। तो ऐसे ही थे एक दम्पति। वो सुबह नाश्ता ले कर आ जाएँ, दोपहर खाना ले कर आ जाएँ, बच्चे को गाड़ी में बैठा लें, रैगिंग चल रही हो छुड़ा लें, दूर कहीं ले जाएँ। यहाँ तक करना शुरू कर दिया।

हॉस्टल से जो अकादमिक ब्लॉक है वो काफ़ी दूर है, यहाँ तक करना शुरू कर दिया कि गाड़ी में बैठा कर हॉस्टल से अकादमिक ब्लॉक छोड़ने लग जाएँ, सुरक्षा के लिए, क्योंकि रास्ते में तो धरे जाते हैं। सीधे पकड़ ही लेंगे कि "इधर आओ", ठीक है? कहा गया कि, "जाओ बाल मुंडा कर आओ।" अब बाल कटाने के लिए कैंपस के भीतर ही एक दुकान है उसको निर्देश रहते थे कि आएँगे तो कहेंगे कि छोटा करना, तुम छोटा नहीं करना तुम मूंड देना। तो उसको कहा गया बाल मुंडा कर आओ, तो उसको (उसके माता-पिता) बाहर ले गए जावेद हबीब के सैलून से स्टाइलिश बाल कटा कर ले आए। ये सब चल रहा था।

एक शाम को ऐसे ही आए हुए थे उसके लिए कुछ रसगुल्ला, पानी, नाश्ता, कपड़े नए, ये सब ले करके। वार्डन ने देख लिया, वार्डन ने उन्हें डाँट करके भगाया। बोले, "जो हो रहा है होने दीजिए, ये जो आप दख़ल-अंदाज़ी कर रहे हैं, आप अच्छा नहीं कर रहे हैं उसके साथ।" मैं सीनियर्स की नहीं मैं वार्डन की बात कर रहा हूँ। वार्डन ने उन्हें भगाया, कि जो हो रहा है जैसा हो रहा है होने दीजिए। वो बोले, "रोता है।" वार्डन ने कहा, "रोने दीजिए, अभी नहीं रोएगा तो ज़िंदगी भर रोएगा।"

बहुत बहुत ज़रूरी है कि जो भी आपसे सम्बंधित हो, पति हो, पत्नी हो, चाहे बच्चा हो उसको ज़रा धूप में पकने दें, नदी में थपेड़े खाने दें, सड़क पर ठोकरें खाने दें, इसी से इंसान बनता है। मैं जिस गोलू की बात रहा हूँ वो जब एक सेमेस्टर बाद घर गया तो कम-से-कम दस किलो वज़न कम करके गया। और इंजीनियरिंग का दूसरा साल बीतते बीतते उसकी माँस पेशियाँ बन गई थीं, बलिष्ट दिखने लगा था। और आया था तो ऐसा था जैसे इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षा में प्रश्न होते थे न, "दो छोटे गोल गेंद एक बड़े गेंद के ऊपर रखी हुई हैं।"

(श्रोतागण हँसते हैं)

ऐसी उसकी हालत थी।

आपकी ममता मैं समझता हूँ, लेकिन इस ममता के चलते बच्चे का अनिष्ट मत कर दीजिएगा। ये बहुत अजीब बात है, बहुत अजीब बात है कि आपको यहाँ बैठ कर ग्लानि हो रही है कि दिल्ली में बैठी बेटी परीक्षा देने नहीं जा पाई।

प्र: उसके दुःख के कारण यह ग्लानि हो रही है।

आचार्य: अरे उसका दुःख उसका दुःख है। ये तो अकादमिक प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है, लोग सोते रह जाते हैं परीक्षा छूट जाता है। कई बार तो जगे रहते हैं और जान बूझ कर छोड़ देते हैं।

प्र: साल भर की मेहनत बेकार गई।

आचार्य: ठीक है, साल भर मेहनत करी थी तो। क्रिकेटर साल भर तैयारी करता है, मैच से एक रात पहले पता चलता है कि किसी माँसपेशी में खिचाव आ गया है, मैच मिस हो जाता है उसका, सीरीज़ पूरी मिस हो जाती है, तो? लोग ओलम्पिक के लिए चार-चार साल तैयारी करते हैं, आखिरी मौके पर कुछ हो जाता है नहीं जा पाते हैं, तो?

प्र२: सर, पर मैंने इसका उल्टा भी देखा है। कुछ कॉलेज के लड़कियों के ग्रुप को मैं ले कर गई थी कैम्प में। एक लड़की के अभिभावक ट्रैन में भी हमारे साथ थे, जहाँ पर हम रुके थे वहाँ से थोड़ी दूर एक होटल बुक कर के वहाँ रुके थे। एक ग्रुप में तो ऐसा हुआ था कि दो सिक्योरिटी गार्ड्स मेरे साथ चले थे, वो भी एक लड़की के लिए।

आचार्य: हाँ होता है ऐसा, और ऐसों की बहुत फ़ज़ीहत होती है।

प्र२: जिस लड़की के माता-पिता साथ आए थे, उस लड़की ने स्वयं उन्हें मजबूर किया था साथ आने के लिए।

आचार्य: आप कर दीजिए यही धीरे-धीरे, आप पाएँगे कि जिसको आप सुरक्षा देते आ रहे थे उसको अब सुरक्षा की आदत लग गई है। अब आप नहीं देंगे तो वो आपसे नाराज़ हो जाएगा, कि "आज तक जो देते आए अब क्यों नहीं दे रहे हो?" आदमी का मन आदतें पालने के लिए तत्पर रहता है, जल्दी से उसे आदतें मत दे दीजिए। दूसरे द्वारा प्रायोजित सुरक्षा बहुत जल्दी आदत बन जाती है, बहुत जल्दी। और मुफ़्त की सहूलियतें मिल रही हों तो कौन छोड़ना चाहेगा।

कोई छोड़ना भी नहीं चाहेगा लेकिन जब वो हटेंगी तो ऐसा लगेगा कि आपके साथ अन्याय हो गया है। वो व्यक्ति कहेगा "आज तक दिया था अब क्यों नहीं? ज़रूर तुम्हारे प्यार में कमी आ गई है।" तब आप ये समझते फिरेंगे कि "भाई पहले भी देता था तो ज़रुरत से ज़्यादा देता था, कोई प्यार में कमी नहीं आ गई है, वक़्त का तकाज़ा है।" पर आप समझा नहीं पाएँगे। वो बार-बार यही आरोप लगाएगा कि "तुम पहले प्यार करते थे अब नहीं करते हो, देखो इसीलिए वो सब सहूलियतें नहीं देते हो मुझे।" तो फिर देते रहो ज़िन्दगी भर, और अपंग बना दो उसको।

किसी भी बाग़ के फूलों से ज़्यादा सुन्दर होते हैं पहाड़ों के फूल, क्योंकि उन्हें कोई सुरक्षा नहीं देता। आप अपने घर में गुलाब लगाओ और जंगली गुलाबों से उसकी तुलना करके देख लो। आप अपने घर में किसी जानवर को रखो और किसी भी जंगली जानवर से उसकी तुलना करके देख लो। और नहीं कर पा रहे तुलना तो मुकाबला करवा दो। शहरी कुत्ते का जंगली कुत्ते से करवा दो मुकाबला, फिर देख लेना। घर की बिल्ली का जंगली बिल्ली से करवा दो मुकाबला फिर देख लेना। जंगली बिल्ली को कोई नहीं जाता कटोरी में दूध और रोटी देने इसीलिए वो ऐसी होती है कि, "आओ अब (बाजुओं को थपथपाते हुए) शेर की मौसी हूँ।"

दोनों पक्षों से कह रहा हूँ, जिनका बहुत कुछ देने का मन करता है स्वजनों को वो ज़रा देने से बाज़ आएँ। और जिनका बहुत कुछ लेने का मन करता हो वो ज़रा अपनी चाहत को ध्यान से देखें। तुम ये कर क्या रहे हो?

प्रेम में एक दूसरे को और ज़्यादा पराश्रित नहीं बनाते। आप किसी से वास्तव में प्रेम करते हो तो उसको स्वनिर्भर बनाओगे, आत्मनिर्भर। आपको अच्छा लगेगा कि अब ये किसी से कुछ नहीं माँगता, ये अपने पाँव चलने के काबिल हुआ। ये प्रेम थोड़े ही है कि, "मैं तुझे रोज़ दिए जाऊँगा, दिए जाऊँगा", पर हमारी आम परिभाषा यही रहती है। रहती है कि नहीं रहती है? कि प्यार में तो दूसरे को गोदी में उठा कर चुम्मी चुम्मी करते हैं। गोदी में उठाना ठीक है पर जिसको गोदी में उठा रहे हो वो अब घोड़ा हो चुका है।

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