इंसान की सब समस्याओं का मूल समाधान || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपको तीन-चार साल से सुन रहा हूँ लेकिन सत्र में पहली बार आया हूँ। मेरा सवाल है जो है कि जब मैं आसपास देखता हूँ तो वहाँ पर समस्याएँ हैं, उनको मैं अपनी समझ से दो वर्गों में बाँटता हूँ। एक वर्ग है जैसे धार्मिक अन्धविश्वास, रीति-रिवाज़, कुरीतियाँ इत्यादि। वो ऐसी समस्याएँ हैं जिसे कोई ऊपर ऊपर से देखकर कह देगा कि ये धर्म से सम्बन्धित हैं। फिर एक दूसरा वर्ग आता है जिसमें निरपेक्ष समस्याएँ आती हैं जैसे कि सामाजिक अपराध, मानसिक बीमारियाँ, आत्महत्या की समस्या आदि। वो ऐसी हैं कि उनको कोई ऊपर ऊपर से नहीं कहेगा कि धर्म या अध्यात्म से सम्बन्धित हैं।
अध्यात्म का सम्बन्ध मानव मन से जुड़ी समस्याओं से है ये समझ आता है। अशिक्षा, गरीबी, स्वास्थ्य सम्बन्धित समस्याएँ, यातायात की समस्याएँ, इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याएँ आदि का धर्म से क्या लेना-देना है? गरीबी और अशिक्षा दूर करने के लिए अध्यात्म किस तरह से सहायक है? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: दुनिया का कोई प्रपंच नहीं है, जिसका समाधान अध्यात्म नहीं है। दुनिया की हर समस्या तुम किसी वर्ग, उपवर्ग में रखो, अध्यात्म के ह्रास की वजह से ही होती है। कोई भी समस्या हो, तुम बोल दो कि सामाजिक समस्या है, तुमने कहा, ’सेक्युलर समस्या है, सब समस्याएँ सिर्फ़ इसलिए होती हैं, क्योंकि वास्तविक धर्म अनुपस्थित होता है।’
धर्म सब चीज़ों में हैं, धर्म तो वास्तव में सेकुलरिज़्म में भी है। अगर सेकुलरिज़्म का अर्थ है पन्थनिरपेक्षता, तो वो कहता है कि सत्य आवश्यक है, उस तक पहुँचना है, चाहे जो रास्ता मिले। मैं किसी एक रास्ते के प्रति विशेष पूर्वाग्रह नहीं रखूँगा।
तो अगर वास्तव में समझा जाए, तो विशुद्ध सेकुलरिज़्म का भी असली अर्थ धार्मिकता ही है। अगर कोई सच्चा सेक्युलर





