इन मूर्खताओं से ऋषियों का नाम मत जोड़ो || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)

प्रश्नकर्ता: मुझे आपका अध्यात्म के प्रति वैज्ञानिक और व्यवहारिक रुख अच्छा लगता है। पर मुझे एक समस्या है। मैंंने कुछ महीने पहले एक किताब पढ़ी है जिसमें गुरुजी ने मौत और मरने के बाद जो दूसरी दुनिया होती है, उसके बारे में कुछ बातें बतायी हैं। बताया है कि कैसे हम एक बार में नहीं मरते। रूह धीरे-धीरे करके शरीर को छोड़ती है। और मौत के बाद भी शरीर में कुछ दिनों तक जीवन रहता है, ऊर्जा रहती है, नाखुन और बाल बढ़ते हैं। और अगर शरीर से प्राण को पूरी तरह निकालना है, तो उसके लिए कुछ तकनीकें होती हैं जो ऋषियों ने विकसित करी हैं।
ये सब देखकर के मुझमें डर बैठ गया है। क्योंकि हमारे घर में, हमारे परिवार में ऐसा नहीं किया जाता। तो चूँकि हमारे घर और परिवार में ऐसा नहीं किया जाता, तो मुझमें ये डर बैठ गया है कि हमारे घर, परिवार के लोगों के प्राण तो पूरे निकले ही नहीं। हमने उनको यूँ ही जला दिया। तो क्या हमारे ऋषियों ने ऐसी कुछ तकनीकें बनायी हैं जिससे मरने के बाद शरीर से प्राण निकाले जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, ऋषियों का ये सब धन्धा नहीं होता कि शरीर से प्राण कैसे निकालने हैं? उसके लिए तकनीकें बनायें कि मरे आदमी के पाँव पकड़ के खींचो तो वो और मरेगा। ये ऋषि का काम नहीं होता है। ऋषि को शरीर से प्राणों को मुक्ति नहीं देनी होती है। ऋषि उसकी बात करता है जो वास्तव में बन्धन में है। कौन बन्धन में है? अहम्। और अहम् बन्धन में कब है? वो जीवन में बन्धन में है। वो मरकर थोड़े ही बन्धन में है।
तो ऋषि का काम होता है तुम्हारे जीवन काल में तुम जिन बन्धनों में हो, उनकी बात करना। पिछले जन्म की बात करना, अगले जन्म की बात करना, मौत में कितने दिनों तक तुम्हारे प्राणों को रोककर रखना है, फिर किस विधि से निकाल देना है ये सब बात करना, ये टोने-टोटके वाले बाबाओं का काम है। ऋषि का काम नहीं है।
बाबा और ऋषि में अन्तर करना सीखो। भारत में ये बड़ी गड़बड़ हो गयी है। हमें ऋषि और बाबा का मतलब, अन्तर ही नहीं पता है। ऋषि अन्तर्जगत का वैज्ञानिक है। वो तुमको डर से मुक्त करना चाहता है। और जिनको तुम ये झाड़-फूँक, टोने-टोटके वाला बाबा कहते हो, वो अन्धविश्वास का पैरोकार है। वो तुममें और डर बैठाना चाहता है।



