हवस और हिंसा रोकने के लिए ये सज़ा दो

Acharya Prashant

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हवस और हिंसा रोकने के लिए ये सज़ा दो
तुम ये माने बैठे हो कि समाज बहुत अच्छा है, क़ानून में बस कमी है। क्यों अपने आपको कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट दे रहे हो? क्यों कह रहे हो कि इस समाज का चरित्र बहुत अच्छा है? क्यों समाज को एक चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हो? मत दो भाई। इस समाज को अच्छा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट देने की कोई ज़रूरत नहीं है। जो मामले होते हैं न, वो प्रतिनिधि मामले हैं — वे रेप्रेजेंटेटिव मामले हैं। वो ऐसा नहीं कि यूँही कोई आसमान से गिरा एलियन है जो आकर रेप कर गया। वो इसी समाज, इसी मिट्टी से उठा हुआ अपराधी है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, अभी जो कोलकाता केस हुआ है, उसके बाद देश के और राज्यों से भी ऐसी बहुत सारी ख़बरें, ऐसी बहुत सारी घटनाएँ सामने आ रही हैं और और भी आगे भी आती चलेंगी। अब ये जो अपराध है, ये जो जघन्य अपराध है, इसका हम ये तो जानते हैं कि जो वास्तविक परिवर्तन आएगा वो भीतरी होगा। जो बदलाव आ सकता है, वो भीतरी होगा।

पर बाय लॉ इस क्राइम का क्या पनिशमेंट होनी चाहिए? व्हाट इज़ द राइट पनिशमेंट इस क्राइम के लिए? बाय लॉ क्या सही पनिशमेंट होनी चाहिए?

आचार्य प्रशांत: बेटा, बाय लॉ जो पनिशमेंट होना चाहिए वो तो लॉ में पहले से ही है। प्रॉब्लम ये थोड़ी है कि लॉ में लैक्सिटी है। लॉ को कहाँ तक ले जाओगे? कुछ जगहों पर तो ये तक है कि बलात्कारी को फांसी की सज़ा दे देंगे। लॉ अब इससे ज़्यादा क्या करेगा? लेकिन जहाँ पर बलात्कार पर फांसी का भी प्रावधान है, वहाँ बलात्कार रुक थोड़ी रहे हैं। तो बात शायद लीगल प्रोविज़न की उतनी ज़्यादा है नहीं।

जो भारतीय कानून भी है, वो बलात्कार को लेकर के काफ़ी सख़्त है, और भी सख़्त बना सकते हो। एक ही चीज़ है उसमें बची है कि फांसी दे दी जाएगी। वो भी कर सकते हो। लेकिन और जगह हैं दुनिया में, जहाँ फांसी का भी है — वो तो आख़िरी बात होती है न — वहाँ भी रुके नहीं। तो शायद जो इस समस्या का मूल कारण है, वो लॉ में नहीं है, कहीं और है। और अगर आप जो असली वजह है, उसको नहीं पकड़ोगे, और जो इधर-उधर की वजह हैं, उनकी बात करोगे तो समस्या की असली वजह बची रह जाएगी। जब भी ऐसा कुछ होता है, और हर साल एक बार, दो बार, चार बार ऐसा कोई बहुत दुखद मामला सामने आता ही है, तो आक्रोशित लोगों के एक वर्ग से कानून को लेकर माँग उठती है कि कानून बदलो, कानून बदलो।

मैं नहीं समझता कि कानून बदलने से बहुत फ़र्क़ पड़ने वाला है। फ़र्क़ जिस बात से पड़ने वाला है, समस्या का जो असली समाधान है, उसकी बात हम करना नहीं चाहते। क्योंकि वो बात करो तो हमें असुविधा होती है। तो हम कहते हैं कि बलात्कारी को फांसी दे दो। फांसी दी जा सकती है बिल्कुल। अभी जैसा मामला हुआ है, इसमें तो फांसी की सज़ा भी कम है। बिल्कुल, फांसी भी दी जा सकती है। लेकिन मुझे अफ़सोस है और मुझे डर है कि फांसी देने से भी शायद ये अपराध बहुत कम होंगे नहीं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे पहले के ज़माने में ऐसा होता था कि जब कोई किसी का रेप कर देता था, तो जेनरली शादी कर देते थे उस लड़की से। पर आज तो फांसी की सज़ा रहती है। तो कई बार जब रेप करने के बाद ऐसा देखा जाता है कि वो व्यक्ति उसका मर्डर करने की भी कोशिश करता है, क्योंकि उसको पता है कि किसी तरीक़े से शायद सबूत मिट जाए, इसलिए मर्डर ही कर दो। तो अगर फांसी की सज़ा नहीं होगी शायद, तो क्या मर्डर रुक सकता है, रेप के बाद?

आचार्य प्रशांत: बेटा, फांसी की सज़ा भी तो तभी दी जाती है न जब सबूत मौजूद हो। जानते हो जानकारों के, जो कानून के लीगल मैटर्स, विधि के जो जानकार हैं, उनका एक वर्ग ये भी कहता है — कि तुम बलात्कार की सज़ा जितनी कड़ी करोगे, उतना ज़्यादा रेप केसेज़, रेप मर्डर में तब्दील होते जाएँगे। क्योंकि अगर उसने सबूत छोड़ दिया ज़िंदा, तो अब सीधे उसको फांसी होनी है। तो सबूत को ज़िंदा क्यों छोड़ेगा?

अगर उसने अपने विक्टिम को ज़िंदा छोड़ दिया, तो वो जानता है कि कानून इतना कड़ा है कि अब सीधे फांसी होगी। तो अब कहेगा — रेप तो किया है, लेकिन अब रेप में तो मुझे फांसी हो जाएगी, तो इसके लिए इसका मर्डर करना भी ज़रूरी है। तो लोगों का एक वर्ग ये भी कहता है। कानून सख़्त होना चाहिए, निश्चित रूप से। पर जिस बात से 10% फ़र्क़ पड़ना हो, हम उसकी ज़्यादा करें चर्चा, या जिन बातों से 90% का फ़र्क पड़ना हो, उनकी ज़्यादा चर्चा करें — ये हमें सोचना होगा।

अब जैसे आपने बात करी कि पहले किसी लड़की का बलात्कार होता था, तो सज़ा के तौर पर ये कह दिया जाता था कि — “लड़के, अब इससे ब्याह कर यही तेरी सज़ा है। तूने इसका बलात्कार किया है, अब तू इससे शादी कर ले। यही तेरी सज़ा है।” ये कोई सज़ा है? बल्कि इससे तो ये पता चल रहा है कि समाज कैसा है! लड़की के साथ तो दोहरा अन्याय हो गया न। आपको पता हो कि आपका जो वुड बी हस्बैंड है, जो आपका भावी पति है, वो किसी लड़की का बलात्कार कर बैठा है — तो क्या आप उससे शादी करोगे?

और अगर आपको पता हो कि आपका जो भावी पति है, वो आपका ही बलात्कार कर बैठा है, तो आप उससे शादी कर सकते हो क्या? तो ये तो लड़की के साथ दोहरा अत्याचार हो गया न — कि पहले तो उसका बलात्कार है, और फिर कह रहे हो कि जिसने बलात्कार किया है, उसी से तू शादी कर। और हम ये सोच रहे हैं कि सज़ा हम बलात्कारी को दे रहे हैं! सज़ा हम बलात्कारी को दे रहे हैं कि लड़की को दे रहे हैं?

पहले तो उसने अपराधी बनकर बलात्कार किया था। अब वो पति बन के बलात्कार करेगा। हर रात बलात्कार करेगा। और अब वो लीगली सेफ़ होकर, क़ानूनन सुरक्षित होकर बलात्कार करेगा। अब उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। वो कहेगा — मैं अब बलात्कारी थोड़ी हूँ! मैं पति हूँ और मैं तो अब बस पत्नी के साथ यौन संबंध बना रहा हूँ। इसको बलात्कार थोड़ी बोलते हैं!

इससे आपको इशारा मिल रहा होगा कि मैं कहाँ पर समस्या की असली जड़ को देख रहा हूँ। कहाँ पर देख रहा हूँ? वो हमारी सामाजिक मान्यता में है, वो हमारी रूढ़ि में है, हमारी सोच में है। हम जिस तरह का वर्ल्ड व्यू रखते हैं न भीतर — दुनिया के बारे में, खुद के बारे में, हम जो ख़्याल रखते हैं।

ज़िन्दगी को लेकर के — हमारी जो धारणाएँ हैं, मान्यताएँ, बिलीफ़्स हैं, उनमें है इस समस्या की जड़। उसको ज़ोर से पकड़ के हिलाना पड़ेगा, उखाड़ देना पड़ेगा।

तब जाकर के समाधान मिलेगा। नहीं तो आप क़ानून कड़ा करते जाओ। मैं कह रहा हूँ, मुझे डर है कि उससे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। एक ऐसा समाज जो लड़की को कमॉडिटी मानता हो, जो उसको इंसान से ज़्यादा देह की तरह देखता हो — वहाँ आपको ताज्जुब क्यों होता है कि बलात्कार होते हैं? बताइए। और भारत में जितने बलात्कार होते हैं, कुछ अनुमान कहते हैं कि उनका 10% भी प्रकाशित नहीं होता। प्रकाशित माने, ख़बर में ही नहीं आता। कई बार तो घर वालों तक को नहीं पता चलता। एफ़आईआर (फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट) तो बहुत दूर की बात है।

10% मामले हैं जो रोशनी में आते हैं। और 10% से भी और कम हैं जिन पर जाकर पुलिस में रिपोर्ट होती है। तो सोचो, बलात्कार कितना ज़्यादा कॉमन है। जितना हम सोच रहे हैं न, उससे कई गुना ज़्यादा हैं बलात्कार के मामले। बहुत बार तो लड़की या महिला ही कहती है — कि इसमें अब मिलना क्या है? एक मेरे साथ दुर्व्यवहार हो चुका है, और अब ये चीज़ लेकर के मैं कोर्ट-कचहरी करूँ, अदालत जाऊँ — तो वहाँ मेरे साथ और दुर्व्यवहार होगा, और बहुत बार होता भी है।

लड़की जाए — कितने ही मामले हैं कि लड़की रेप की रिपोर्ट लिखाने गई, वहाँ पुलिस वालों ने ही उसका रेप कर दिया। और अभियुक्त को बचाने के लिए वहाँ पर जो वकील खड़ा है अदालत में — वो लड़की से और अटपटे सवाल पूछ रहा है, ताकि वो बेइज़्ज़त हो करके मुक़दमा वापस ले ले। लड़की कहती है — “मैं एक बार बेइज़्ज़ती बर्दाश्त कर चुकी हूँ, अब मैं और क्यों करूँ? मुझे कुछ करना ही नहीं। मैं चुपचाप घर जा रही हूँ, झेल लूँगी।”

ये समाज — इसको समझो। तुम ये माने बैठे हो कि समाज बहुत अच्छा है, क़ानून में बस कमी है। क्यों अपने आपको कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट दे रहे हो? क्यों कह रहे हो कि इस समाज का चरित्र बहुत अच्छा है? क्यों समाज को एक चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हो? मत दो भाई। इस समाज को अच्छा कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट देने की कोई ज़रूरत नहीं है। जो मामले होते हैं न, वो प्रतिनिधि मामले हैं — वे रेप्रेजेंटेटिव मामले हैं। वो ऐसा नहीं कि यूँही कोई आसमान से गिरा एलियन है जो आकर रेप कर गया। वो इसी समाज, इसी मिट्टी से उठा हुआ अपराधी है।

समाज जैसा होता है, उसी के प्रतिनिधि अलग-अलग क्षेत्रों में उभर के सामने आने लगते हैं।

इसी पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में, आज़ादी से पहले, समाज को लौ लगी थी — कि क्रांति, आज़ादी, “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो।” — और वो जो जज़्बा था, वो घर-घर, गाँव-गाँव, मोहल्ले-मोहल्ले फैला हुआ था। तो फिर उस जज़्बे के प्रतिनिधि के रूप में कुछ क्रांतिकारी खड़े हुए। वो क्रांतिकारी नहीं आ सकते थे अगर जो वाइडर सोसायटी है, जो पूरा समाज है — अगर उसमें जज़्बा न होता। समझ में आ रही है बात? माने कि जब हज़ार लोगों के दिलों में क्रांति की लौ जलती है, तो फिर एक होता है जो सड़क पर जाकर क्रांति करता है। ये "एक" कौन है? उन हज़ार लोगों का प्रतिनिधि है — रेप्रेज़ेंटेटिव है।

जब हज़ार लोग कहते हैं कि “हमें बुरा लग रहा है, क्यों हमारे ऊपर किसी बाहरी सत्ता का शासन है?” — जब हज़ार लोग कहते हैं “बुरा लग रहा है”, तब एक भगत सिंह होता है जो सीधे सड़क पर आ जाता है। कहता है — "ठीक है, बुरा लग रहा है? मैं करके ही दिखाऊंगा।" वो एक भगत सिंह हज़ार लोगों का प्रतिनिधि होता है। ऐसे ही नहीं आ गया। वैक्यूम में नहीं आ गया।

दंगे होते हैं, दंगों में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले हो सकता है बस 100 लोग हों — और शहर की आबादी है 10 लाख। लेकिन ये जो पूरा शहर है, उसी पर अभी सांप्रदायिकता का बुखार चढ़ा हुआ है। ये 100 लोग क्या हैं? उन 10 लाख लोगों के प्रतिनिधि हैं। ऐसी ज़मीन तैयार हो गई है कि उसमें से ये लोग पैदा हो रहे हैं। ठीक यही बात बलात्कारी पर भी लागू होती है। जब हज़ारों-लाखों लोग होते हैं न, जिनके भीतर लड़की की देह को नोच खाने के मंसूबे होते हैं, तो फिर एक सक्रिय बलात्कारी पैदा होता है, जो जाकर ये कुकर्म कर ही डालता है।

वो यूँही, मैं कह रहा हूँ, आसमान से नहीं टपका। वो इसी समाज से पैदा हुआ है। हज़ार लोगों ने मंसूबा बनाया था, इरादा बनाया था, एक ने करके ही दिखा दिया। और मौक़ा मिलता तो वो 1000 भी करके दिखाते। उन्हें मौक़ा नहीं मिला, या वो डरे रह गए, या वो आगे करेंगे कभी, या अगर वो कुछ नहीं कर सकते, तो शादी कर लेंगे। अब तो कोई नहीं कहेगा न कि बलात्कारी है। शादी कर लो, अब बलात्कार जायज़ हो जाता है। हमें उस समाज पर सवाल उठाना पड़ेगा जहाँ हज़ारों लोग आधी आबादी, आधे मनुष्यों — माने महिलाओं को सिर्फ़ जिस्म की तरह देखते हैं। समाज पर सवाल उठाइए, और जब तक इस तरह की सोच और संस्कृति रहेगी, छेड़छाड़, बलात्कार — ये आम बात रहेगी।

इतना ही नहीं होगा, ये तो देखो — ये बहुत न रक्तरंजित घटना होती है — रेप और फिर रेप मर्डर। तो वो हमारे नोटिस में आ जाती है। महिलाओं का शोषण तो छोटे सब्टल तरीक़ों से हर जगह, हर पल ही चल रहा होता है। भाई, वो सामने नहीं आता क्योंकि वो नॉर्मलाइज़ हो चुका है। वो हमें लगता है ठीक ही बात है, कोई समस्या की बात थोड़ी है। उसको हम शोषण भी अब नहीं मानते, उसको हम कल्चर बोलते हैं। कल्चर माने क्या? जिस चीज़ का आप व्यवहार शुरू कर दो, वो कल्चर कहलाता है। जो चीज़ लोगों के एक समुदाय के आम व्यवहार में आ जाए, उसको ही कल्चर या संस्कृति बोलते हैं।

अब अभी रात के बज रहे होंगे — 11:00 बज रहा है। क्या बज रहा है? अब 12:00 बज रहा है। आप लोग अपने घर जाओगे। ये बाक़ी यहाँ पुरुष बैठे हैं, इन्हें भी कहीं इधर-उधर जाना होगा। मैं भी कहीं जाऊँगा। आपके लिए एक मुद्दा है कि आप यहाँ से कैसे जाओगे। इनके लिए मुद्दा नहीं है, मेरे लिए भी मुद्दा नहीं है। देखिए, ये बात भी शोषण की है।

आप यहाँ बैठे हो। अभी ये सत्र ख़त्म होगा, आपको सोचना पड़ेगा — शायद आप अभी से सोच रहे हो — और घड़ी की जितनी टिक-टिक हो रही होगी, वैसे ही आपका दिल भी धड़क रहा होगा कि रात और गाढ़ी होती जा रही है। सड़क पर जाना है, अनजान जगह क्या है, कैसे पहुँचे? ये शोषण नहीं है क्या? पर ये बात अब क्या हो चुकी है? नॉर्मलाइज़ हो चुकी है। इसको हमने कहा, "ये तो भाई लड़की है, तो थोड़ा सोचेगी न।" क्यों भाई? किस संविधान में लिखा है कि लड़की को ज़्यादा सोचना चाहिए अपनी सुरक्षा के बारे में? किस संविधान में लिखा है? वेदों में लिखा है? कहाँ लिखा है? बताओ न। कौन से शास्त्र में लिखा है ये कि लड़की को ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है?

पर हमने ये कर दिया है। पग-पग पर और पल-पल पर लड़की को बॉडी कॉन्शस होना पड़ता है। उसे सोचना पड़ता है कि मैं ठीक-ठाक हूँ? देह पर हमला तो नहीं हो रहा? उसे ये भी देखना पड़ता है कि आसपास के कैसे लोग हैं यहाँ पर कहीं पर — कौवे, गिद्ध, कुत्ते, भेड़ — ये मुझे घूर तो नहीं रहे?

मैं यहाँ आया, एक दिन मेरी कमीज़ ठीक नहीं थी। मैंने सोचा — देना भाई अपनी — मैंने पहन ली। मैं यहाँ बैठ गया, जो सफेद वाली मैं अभी दो-तीन दिन पहले पहन के बैठा था। मेरे लिए वो 2 मिनट का मामला था। और ऐसा ही कोई मुद्दा होगा तो किसी लड़की के लिए शायद आधे घंटे का हो, 1 घंटे का हो, 2 घंटे का भी हो सकता है। जो मेरे लिए 2 मिनट का मामला था, किसी लड़की के लिए 2 घंटे का हो जाएगा। क्योंकि समाज ने उसे बॉडी कॉन्शस बना दिया है। उसे बहुत सोचना पड़ता है अपने कपड़ों के बारे में — ख़ासकर पुरुषों के सामने। मेरे देखे, ये भी शोषण है।

ये लोग यहाँ आईं हैं। तुम लोग यहाँ पर आते हो, मस्त इधर-उधर अपना जा रहे हो, बैठ रहे हो, अपना काम कर रहे हो और किसी सही जगह बैठ जाते हो। जहाँ जाना होता, चले जाते हो। ये कहीं निकलते थोड़ी हैं — कुछ डर के मारे और कुछ संस्कार के मारे। संस्था से तीन या पाँच लड़कियाँ आईं थीं। आज एक ग़ज़ब राज खुला — गाड़ी चलाना तो छोड़ दो, इनको स्कूटी चलाना भी नहीं आता। और जिनको चलाना आता है, उनके पास लाइसेंस नहीं है। अब यहाँ तो स्कूटी ली जाती है रेंट पर। और जब रेंट पर लो तो क्या माँगता है? जिनको स्कूटी चलानी आती, उनके पास लाइसेंस नहीं है। कुछ को चलानी भी नहीं आती, और फोर व्हीलर चलाना तो बहुत ही दूर की बात है। मेरे देखे, ये भी शोषण है। तुम्हारे घर में तुम्हारे भाई भी रहे होंगे। उनके पास लाइसेंस होगा। तुम्हारे घर में तुम्हारे भाई होंगे — वो टू व्हीलर, फोर व्हीलर सब कुछ चलाते होंगे। तुमको तो नहीं मिल रहा न? ये समाज ऐसा है।

तुम कहोगे — हम तो बलात्कार की बात कर रहे थे, स्कूटी कहाँ से आ गई? मैं जहाँ से देख रहा हूँ, वहाँ पर —

ये सब समस्याएँ आपस में जुड़ी हुई हैं, इनकी एक ही जड़ है — हमारी बहुत पुरानी और बीमार सोच, जिसको हम अपनी परंपरा के नाम पर ढो रहे हैं।

"पराया धन" है। और "धन" माने इनएनीमेट चीज़, जिसको यहाँ से वहाँ हैंडओवर कराया जा सकता है। "लो भाई, कर दिया मैंने कन्यादान।" जड़ चीज़, जड़ पदार्थ है — वो भौतिक वस्तु है, देह मात्र है। तो कुल वो करे भी तो क्या? बस अपनी देह का ध्यान रख ले। उसकी सबसे बड़ी पूँजी क्या है? उसकी देह। बिगेस्ट एसेट इज़ द बॉडी। तो वो फिर बॉडी कॉन्शस होकर घूमती है। एक लड़की जितना अपने शरीर के बारे में सोचती है, लड़का थोड़ी सोचता है। ये बीमारी है।

वो मनु भाकर वहाँ पर ओलंपिक्स में दो पदक जीत के आई हैं। हिंदुस्तान वाले लगे हुए हैं — "इनको मॉडल बना देते हैं।" पूरा मीडिया लगा हुआ है इसी बात पे कि "गुड लुकिंग" है। एक से एक जलील किस्म की रिपोर्ट छप रही है मीडिया में। आप कहोगे — "अरे, ओलंपिक के मेडल जीतने में और रेप में क्या रिलेशन है?" है — गौर से देखो है।

भारत के लिए ये बहुत अनूठी बात थी कि एक ही ओलंपिक में किसी ने दो मेडल जीते हों पहली बार। गौरव की बात है, ग़ज़ब की बात है। वो लड़की यहाँ पर आई, मीडिया ने बात शुरू कर दी — "इसका ब्याह कब होगा? दामाद कौन बनेगा?" छाया रहा ये पन्नों पर। ये तो समाज है हमारा। मुश्किल से तो तुम्हें कहीं से एक-आध कोई मेडल मिल जाता है। और जब मिल जाता है तो तुम ये बदतमीज़ियाँ करते हो। इस समाज में अपराधी नहीं पैदा होंगे तो और क्या होंगे?

जब लड़की बस भोग की, खाने की वस्तु है, नोचने की वस्तु है, उसका शरीर ही सब कुछ है — तो एक से एक फिर भेड़िए पैदा हो जाते हैं जो नोच खाते हैं उसको। उसको इंसान की तरह देखो तो सही।

मेरे पास आँकड़े नहीं हैं और हो सकता है मैं गलत हूँ, पर खोजना — भारत के अलावा किसी और देश में इतने स्कूल्स हैं? ऑल गर्ल्स, ऑल बॉयज़। मुझे लगता है, पूरी दुनिया में तो को-एजुकेशन ही चलती है। इस्लामिक देशों को छोड़ देना — वो लोग हमसे बहुत आगे हैं। पर हमारी पूरी कोशिश है कि हम उनको पकड़ लें। ये जो पूरा खेल होता है कि लड़की को अलग कर दो, लड़के को अलग कर दो — ये क्या है? चौथी, पाँचवीं, छठी, आठवीं — यहाँ तुम लड़की-लड़के को अलग-अलग पढ़ा रहे हो। तुम क्या ट्रेनिंग दे रहे हो। यही तो की वो ह्यूमन बीइंग नहीं है, वो गर्ल है। आप सहज हो ही नहीं पाते। आप सहज हो ही नहीं पाते लड़की के साथ न।

हमें सिखाया भी यही जाता है — “लड़की से दूर रहो।” एक उम्र के बाद लड़के-लड़की कट्ठे खेल रहे हों, तो समाज की त्योरियाँ चढ़ जाती हैं। ये सब अपराधों की तैयारी है। जब लड़का लड़की के साथ सहज हो ही नहीं सकता, उससे मित्रवत व्यवहार कर ही नहीं सकता, तो फिर वो उसको ऐसे ही देखता है कि — "ये एक अजूबी चीज़ है। कहाँ से आई है?" फिर वासना और कई गुना बढ़ जाती है। अरे, लड़कियों के साथ उठो, बैठो, हँसो, खेलो — तो इतनी वासना नहीं चढ़ेगी। जितनी दूरी बना देता है ना ये समाज, वो बस वासना को बढ़ाने के काम आती है। जितनी दूरी बनाओगे, उतना ज़्यादा भीतर।

पाकिस्तान वग़ैरह में होंगे। पाकिस्तान बहुत आगे है हमसे। अभी भारत को — जैसी भारत की अभी स्थिति चल रही है — इसी स्थिति को और बढ़ाना पड़ेगा, तो क़रीब 20 साल में फिर हम पाकिस्तान के लगभग बराबर पहुँच जाएँगे। कुछ जगहों पर जानते हो, ये तक मान्यता है — और वो कौन से हैं, तुम खोज लेना — कि जहाँ पर ये ट्राइबल कल्चर ज़्यादा चलता है। एक ट्राइब है, दूसरा ट्राइब है — कि अगर एक लड़के ने उस ट्राइब की किसी लड़की का रेप करा है, तो उस लड़की का भाई, पिता या पति — जो रेपिस्ट है — अब उसकी बहन का रेप करेगा, ये जस्टिस है। इस जस्टिस में मुझे बताओ, लड़की का क्या हुआ? ये ट्राइबल जस्टिस है। ये सचमुच चलता है।

ट्राइब ए, ट्राइब बी। इस ट्राइब के एक लड़के ने इधर की एक लड़की का रेप कर दिया। जिसका रेप हुआ है — उसका हस्बैंड, ब्रदर, या फादर — इन तीनों में से कोई भी अब ये हक़ पा जाता है कि जो रेपिस्ट है, उसकी बहन या पत्नी का रेप कर सकता है — लीगली। जब स्त्री को मनुष्य मानोगे ही नहीं, तो वो बस तुम्हारे भोग की, कंज़म्प्शन की चीज़ रहेगी — और क्या रहेगी? वो इंसान है — ये तो तब हो ना जब वो मेरे बगल में बैठकर पढ़ रही हो। मुझसे मैथ्स की प्रॉब्लम नहीं सॉल्व हो रही, उसने कर दी — तो मैं कहूँगा कि "भाई, बॉडी-वॉडी तो दूर की बात है — ये इंटेलिजेंस है। शी इज़ इंटेलिजेंस पर्सनिफाइड"

एक चीज़ जो मेरे साथ बड़ी अच्छी हुई, और मैं समझता हूँ, बहुतों के साथ हुई होगी — हम सबको आभारी रहना चाहिए। मुझे इतनी अच्छी टीचर्स मिलीं, और इतनी सशक्त महिलाएँ थीं वो — कि उनसे पढ़ने के बाद मेरे लिए ज़रा मुश्किल हो गया किसी औरत को ऑब्जेक्ट के रूप में देखना। और मुझे फ़क़्र है कि मैं अपनी ऐसी टीचर्स का स्टूडेंट था। सब लेडी टीचर्स। मुझे अपने कोई जेंट्स टीचर तो याद भी नहीं आते स्कूल के दिनों के। सब लेडीज़ — बहुत जबरदस्त, सशक्त, ज्ञानवान महिलाएँ और प्यार से भरी हुईं। पर वो वाला प्यार नहीं कि मुझे वो…सज़ा भी उन्होंने मुझे खूब दी। और आज मैं ऐसा हो पाया — उसमें योगदान उनका भी है, उन महिलाओं का जिन्होंने मुझे सज़ा दी थी — क्लास सिक्स, क्लास एट, क्लास टेन।

ज़रूरी है ना कि आप महिला को टीचर के रूप में भी देख पाओ। ज़रूरी है कि आप उसको कंपेटिटर के रूप में देख पाओ। ज़रूरी है कि आप उसको एक फेलो स्टूडेंट के रूप में देख पाओ। ज़रूरी है कि आप उसको कलीग के रूप में देख पाओ। वर्क प्लेसेस में महिलाएँ हैं, नहीं हैं। संसद में महिलाएँ हैं, नहीं हैं। बोर्डरूम में महिलाएँ हैं, नहीं हैं। महिला बस कहाँ है? किचन में है और बिस्तर पर है। तो पुरुष बस महिला को इन्हीं दो कामों के लिए देखता है फिर — खाना खिला दे, और बिस्तर पे आ जा।

और मैं इस बात में भी थोड़ा किस्मत वाला था। एज़ अ स्टूडेंट मुझे जो कंपटीशन मिली उसमें भी कुछ लड़कियाँ थीं जो बहुत आगे थीं। नाकों चने चबवाए थे उन्होंने मुझसे। जान लगानी पड़ती थी मुझे उन्हें एकेडमिकली बीट करने में। अब इज़्ज़त आती है। मैं कैसे उसको देखूँगा कि ये एक बॉडी है? भाई, वो एक इंटेलिजेंट कंपेटिटर है जो तुम्हें पटक के मारती है। मार्क्स देखो उसके। अब मैं उसको नहीं, सिर्फ़ एक बॉडी की तरह देख सकता भाई। नहीं पॉसिबल है। मैं उसके पास जा रहा हूँ, अपना प्रोजेक्ट दिखाओ भाई और मैं उसका प्रोजेक्ट देख रहा हूँ। मैं उससे कुछ सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं अब कैसे कहूँगा कि “आई एम ओगलिंग एट यू और लेट्स मीट फॉर कॉफी।” व्हाट? “मीट फॉर कॉफी?” तुम पहले मुझसे कुछ सीख लो। लुक एट द क्वालिटी ऑफ़ माय वर्क, माय एकेडमिक्स, माय प्रोजेक्ट्स, और अपना देख लो। मैंने सीखा है।

ये समाज लेकिन क्या इन रोल्स के लिए लड़कियों को तैयार कर रहा है? वो सिर्फ़ एक रोल के लिए तैयार कर रहा है लड़की को, क्या? — भोग्या। उसको खाना खिला ताक़ि उसके पेट की भूख शांत हो, और उसके बाद उसके तन की भूख शांत कर? ये कुल मिला के रोल है लड़की का। मैं जो बात जैसे बोल रहा हूँ, बहुत लोगों को बहुत कड़वी लग रही होगी। लगती है तो लगे। किसी की जान गई है। मुझे उसकी जान की फ़िक्र है, तुम्हें मिठाई खिलाना मेरा काम नहीं है। तुम्हें बात मेरी कड़वी लगती है तो लगनी चाहिए। लड़की को इंसान की तरह परवरिश तो दो। उसे इंसान बना के खड़ा तो करो।

जो छोटी सी होती है, उसको अलग तरह के कपड़े पहनाना शुरू कर दोगे और बहुत महंगे आते हैं, छोटी बच्चियों के कपड़े। छोटे लड़कों के कपड़े होंगे और छोटी लड़कियों के कपड़े होंगे। छोटी लड़की का कपड़ा दो गुना, तीन गुना महंगा होगा। उसके खिलौने भी अलग कर देते हैं, उसके रंग अलग कर देंगे — पिंक-पिंक। उसने बोला, उसे पिंक चाहिए। उसने बोला? तो काहे को उसको पिंकी बनाए दे रहे हो?

एक काम करना यहाँ बाज़ार में जाना और जो फॉर्मल सूट्स होते हैं लेडीज़ के, वो खरीदने की कोशिश करना। जितने बड़े ब्रांड हैं, सब में चले जाओ। बहुत मुश्किल हो जाएगा मिलना। सब में जो ब्रांड्स हैं न, जिनमें जाकर रेमंड्स, वनज़न, लुई, फिलिप — इन सब में चले जाओ। एरो भारत में यही है सब। फॉर्मल्स किनके मिलते हैं? लड़कों के। क्योंकि माना जाता है कि फॉर्मल काम माने ऑफिस का काम, तो वो तो लड़के ही करते हैं ना। लड़कियों के फॉर्मल सूट मिल जाते हैं पर मुश्किल से मिलते हैं। लड़कियों के क्या मिलते हैं आसानी से? “बोले चूड़ियाँ, बोले घाघरा।” जाओ घाघरा ख़रीदने, वो हर तीसरी दुकान में मिल जाएगा। लड़के के लिए फॉर्मल ऑफिशियल सूट और लड़की के लिए घाघरा चोली। और तुम्हें ताज्जुब है कि बलात्कार क्यों हो रहा है?

एक चीज़ में बस लड़कियों का बहुमत है — कॉस्मेटिक्स। 80-90% कॉस्मेटिक्स की सेल महिलाओं पर हो रही है। वहाँ पर समाज कोई कोताही नहीं करता। हाँ-हाँ बेटा, बताओ। नहीं। अच्छा पार्लर के लिए पैसे चाहिए। ज़रूर लो। परी बन के आना, पापा की परी। ₹5,000, तुम उसको परी बनाने के लिए ख़र्च कर सकते हो। और वो अभी बोले ₹5,000 दे दो, स्विमिंग सीखूँगी। तो पापा की बिल्कुल त्योरियाँ चढ़ जानी हैं। और ऐसे कांपेंगे पापा नहीं — “अब ये हमारे संस्कारी खानदान में नौबत आ गई है। हमारी लड़कियाँ पर पुरुषों के सामने बिकिनी पहन के तैरेंगी।” मैं देख रहा हूँ यहाँ किस-किस ने पिंक पहन रखा है। कई बार तो मैं पिंक पहनता हूँ, सिर्फ़ सॉलिडैरिटी दर्शाने के लिए कि मुझे अपनी तरफ़ का मानना है।

मैंने अपनी आँखों से देखा है। भाई-बहन हैं दोनों, और दोनों ऐसा नहीं कि बहुत चढ़ी उम्र के हैं, टीनेजर्स हैं दोनों। बहन बल्कि छोटी है। बहन 12-14 की होगी। भाई थोड़ा सा बड़ा है, भाई के मूंछें आने लगी हैं। ये दोनों कहीं बाहर से आ रहे हैं अभी। बरसात का मौसम और गर्मी उमस — ये दोनों आ रहे हैं, घर आ रहे हैं। और ये उमस है, ये दोनों बैठ रहे हैं। भाई बैठ रहा है ऐसे कूलर के सामने, ऐसे बैठा है और भाई ने पूरी शर्ट खोल दी। बहन टी-शर्ट पहन के गई थी, उसने एक बटन खोल दिया। और जब माँ ने उसको डांट लगाई है न, "लड़का है तू, लड़का है तू?" और उस बेचारी ने वो कहीं से चल के आ रही है, तो गर्मी और उमस के मारे कूलर के सामने बस टी-शर्ट का ऊपर का बटन खोल दिया। और माँ उस पर चढ़ बैठी है, “लड़का है तू?” और उसने बटन भी क्यों खोला? क्योंकि वो देख रही है बगल में भाई बैठा है। भाई ने पूरी शर्ट ही खोल दी है, और ऐसे करके कूलर के सामने हो गया है। बहन ने एक बटन यहाँ पर खोला है, टी-शर्ट का — "लड़का है तू?"

अब बहन का तो जो हुआ सो हुआ, इसमें भाई का क्या हुआ? अब ये सोचो। फिर हमें ताज्जुब होता है कि बलात्कार क्यों होते हैं। और इसमें न लड़कियों के साथ तो बहुत बुरा होता ही है, लड़कों को भी जीवन भर की असहजता मिल जाती है। ये जो हम लड़के-लड़कियों को साथ बैठकर खुलकर खेलने-खाने नहीं देते, लड़के भी घोर असहज रहते हैं। उनके दिमाग पर बस सिर्फ़ लड़की नाचती है। जिस चीज़ को बहुत दूर की बना दोगे ना। ये मन का नियम है, वो चीज़ फिर मन पर नाचना शुरू कर देती है।

फिर वो उसी डेस्परेशन में उल्टे-पुल्टे फैसले ले लेते हैं शादी के। क्योंकि ज़िन्दगी भर लड़की देखने को नहीं मिली। और अब उम्र हो रही है तो कहते हैं कोई भी मिल जाए, कैसी भी मिल जाए, ब्याह कर दो। और उसमें फिर परिवार बर्बाद होते हैं, बच्चे बर्बाद होते हैं।

हमें थोड़ा खुली सोच वाला, खुला समाज चाहिए जो लड़कियों को देह की तरह नहीं, मनुष्य की तरह देख सके।

लड़के कितने असहज रहते हैं लड़कियों के साथ, इसका तुम्हें अंदाज़ा नहीं होगा। तुम लड़की हो ना? मुझसे पूछो। मैंने देखा है, बहुत-बहुत सालों तक। लड़की बगल से निकल जाए, लड़का बेहोश होकर गिर जाए, ये हालत रहती है। मैंने सचमुच एक को बेहोश होते देखा है। उसने हफ़्ते भर रिहर्सल की थी, "आई लव यू" बोलने की। बोले, जब वो असेंबली से लौट रही होगी, उस सीढ़ी के नीचे खड़ा रहूँगा और जब वो सीढ़ी पर चढ़ने वाली होगी तो अचानक से निकल के बोलूंगा, "आई लव यू।" एक हफ़्ते तक रिहर्सल कर रहा है। पूरी क्लास को पता है रिहर्सल कर रहा है। 12वीं का लड़का, 11वीं की लड़की। वो आई — रिहर्सल से वो ये निकला उसको देखा, वहीं गिर गया बेहोश।

पता नहीं क्या-क्या बढ़ गया होगा उसके शरीर में। तमाम तरीक़े के प्रेशर होते हैं। ब्लड प्रेशर ही थोड़ी होता है। आ रही है बात समझ में? कहाँ है स्कूटी? और जब उसको स्कूटी नहीं दोगे तो उसके लिए भी शादी बहुत ज़रूरी हो जाएगी, समझ रहे हो बात को? उसको अब जीवन में जल्दी से जल्दी कोई पुरुष चाहिए। लड़के को तो इसलिए चाहिए कि वो देह का भूखा है। और लड़की को इसलिए चाहिए कि कोई आए जिसे स्कूटी चलानी आती हो। वो स्कूटी चलाए, मैं पीछे बैठूँ। जब तुम अपने आप को इतना कमजोर बना लोगी तो तुम्हें फिर बहुत जल्दी किसी पुरुष के कंधों की ज़रूरत पड़ेगी। जब तुम्हें गाड़ी चलानी नहीं आती तो तुम्हें फिर पुरुष के रूप में एक ड्राइवर चाहिए होगा।

लड़की अपने आप को इतना दुर्बल बनने देती है कि फिर उसके लिए अनिवार्य हो जाता है, मजबूरी हो जाती है कि ज़िन्दगी में अब एक पुरुष होना ही चाहिए। नहीं हो तो उसका काम ही ना चले। क्यों अपने आप को इतना दुर्बल बनाती हो?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे ये केसस होते हैं, निर्भया केस भी हुआ था, ये केस भी हुआ है। इसमें ये भी ऑब्ज़र्व करा जाता है कि बॉडीज़ जो लड़कियों की रहती हैं, उनको बहुत बुरे तरह से वैंडलाइज़ करा जाता है। उनके प्राइवेट पार्ट्स और मतलब टॉर्चर ही करते हैं। एक तरह से रेप तक तो…।

आचार्य प्रशांत: जो रेपिस्ट है ना, थोड़ा सा ध्यान से सोचो उसकी साइकोलॉजी क्या होगी? वो एक फ्रस्ट्रेटेड इंसान है। वो एक फ्रस्ट्रेटेड जानवर है। जो बहुत दिनों से मंसूबे लगाए बैठा था कि किसी औरत की देह मिल गई तो ना जाने कौन से स्वर्ग का सुख मिल जाएगा। उसके दिमाग में सिर्फ़ क्या नाचता है? सेक्स-सेक्स-सेक्स, बॉडी-बॉडी-बॉडी, वुमन-वूमन-वूमन। और एक दिन वो शिकार कर डालता है। वो किसी औरत को पकड़ कर के उसका रेप कर देता है। किस उम्मीद में? कि स्वर्ग सुख मिलेगा। ना जाने कौन सा ज़बरदस्त सुख है जो सेक्स से, रेप से मिलता है। कुछ नहीं मिलता। क्या मिलेगा? वो भी तब जबकि औरत छटपटा रही है, चिल्ला रही है, रो रही है, गिड़गिड़ा रही है, पलट के मार भी रही है। कौन सा सुख मिलेगा? कोई सुख नहीं मिलता।

जब कोई सुख नहीं मिलता और तुम बहुत सारी उम्मीद लेकर टूटे थे उसके ऊपर, तो तुम में क्या पैदा होगा? फ्रस्ट्रेशन और एंगर। तुम कहते हो इस ऑब्जेक्ट से मुझे इतनी ज़्यादा उम्मीद थी कि सुख मिलेगा, मिला नहीं तो फिर तुम उस ऑब्जेक्ट को ही तोड़-ताड़ देते हो। तो तू मुझे कुछ नहीं दे पाई ना? — ले। ये है उसकी साइकोलॉजी।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने अभी बोला था कि ये समाज के प्रतिनिधि हैं। अब वैसे जब सिचुएशंस होती हैं, उसके बाद ये भी ऑब्जर्वेशन रहता है कि सब कैंडल मार्च कर रहे हैं। समाज के ही लोग कर रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं है वो, निर्भया से आज तक कितनी कैंडल मार्चेस हो गईं। हम समझना ही नहीं चाहते हैं कि वास्तविक अंधेरा कहाँ है। इंडिया गेट पर कैंडल जलाने से कुछ नहीं होगा। इस समाज को यहाँ (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) कैंडल जलाने की ज़रूरत है, वो जल नहीं रही है। हम समझ ही नहीं रहे हैं कि असली अंधेरा क्या है। असली अंधेरा है कि हम बहुत डिपेंडेंट हैं अपनी बिलीफ़ पर और अपने पास्ट पर। हमें बहुत डर लगता है आँखें खोलकर यथार्थ को देखने में। आज सामने फैक्ट रियलिटी क्या है? ये हम नहीं देखना चाहते।

हमारे दिमाग में एक इमेज है — ऐसा है, ऐसा होता है, ऐसा ही तो है ना। हम ये नहीं देख पा रहे। तुम्हारी जो इमेज है, वो रियलिटी से तो मैच ही नहीं कर रही। लड़की क्या है? लड़का क्या है? लड़की के जीवन का उद्देश्य क्या है? लड़के का क्या उद्देश्य है? इन सब को लेकर हमारे पास बस इमेजेस हैं। बहुत पुरानी इमेजेस हैं, सदियों पुरानी हैं। हम उन्हीं इमेजेस पर चल रहे हैं। हम देख ही नहीं रहे कि उन इमेजेस पर चलने का आज अंजाम क्या है। जब तक हम अपनी एस्टैब्लिश्ड बिलीफ़्स और वैल्यू सिस्टम्स को चुनौती नहीं देंगे, तब तक जो हो रहा है, उसको बदलना मुश्किल पड़ेगा।

जो *मॉडर्न *हैं, उनके पास मॉडर्न बिलीफ़्स हैं। जो ट्रेडिशनलिस्ट्स हैं उनके पास ट्रेडिशनल बिलीफ़्स हैं। पर सच्चाई कोई आँख खोल के नहीं देखना चाहता — बाहर की सच्चाई और भीतर की सच्चाई। इंसान की सच्चाई क्या है? समाज की सच्चाई क्या है? ये सच्चाइयाँ कोई खोल के नहीं देखना चाहता। जो अपने आप को मॉडर्न वग़ैरह भी बोलते हैं ना, ये बस इस अर्थ में मॉडर्न हैं कि इनके पास मॉडर्न बिलीफ़्स हैं। पर हैं ये भी बस बिलीवर ही, नोअर नहीं हैं ये। जानते, ये भी कुछ नहीं है। इनके पास एक अल्टरनेट सेट ऑफ़ बिलीफ़्स आ गया। एक अल्टरनेट सेट ऑफ़ सुपरस्टिशन आ गया है। इनके पास मॉडर्न सुपरस्टिशन्स हैं। पर हैं ये भी सुपरस्टिशियस ही। तुम बढ़िया हो, पिंक मत पहनना। मैं पहनूँगा पिंक।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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