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हँस लो, रो लो, मज़े करो || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कैसे पता करूँ कि अगर कोई मुझे कुछ समझा रहा है, तो वो मेरे लिए ठीक है या नहीं? कैसे पता करूँ कि मेरी ज़िंदगी अंधेरे की तरफ़ बढ़ रही है, या रोशनी की तरफ़?

आचार्य प्रशांत: बात सीधी है। नज़र साफ़ होने लगी हो, बेहतर दिखाई देने लगा हो, तो जान लो कि रोशनी की तरफ़ बढ़ रहे हो। जो बातें पहले उलझी-उलझी थीं, अगर वो अब सरल और सुलझी हुई हो गई हैं, तो जान लो कि रोशनी की तरफ़ बढ़ रहे हो। और उलझने यदि यथावत हैं, तो जान लो कि अँधेरा क़ायम है।

एक ही तो सूत्र है, एक ही परख है – भ्रम का मिटना। जीवन से भ्रम अगर विदा होने लगे, तो जान लो कि जिस दिशा जा रहे हो, तुम्हारे लिए हितकर है। जब दिखाई देने लगे कि पहले जो सोचते थे, जैसे जीते थे, जो मानते थे, उसमें कहाँ खोट थी, कहाँ दोष था, तो जान लेना कि अब पहले से बेहतर हो गए हो।

तरीक़े और भी हैं। पाओ कि अब क्षमा करना आसान रहता है, मन में प्रेम ज़्यादा है, तो समझ लेना कि गति सही दिशा में हो रही है। पाओ कि अब चोट ज़रा कम लगती है, प्रभावित कम होते हो, भावनात्मक उतार-चढ़ाव ज़रा शिथिल हो गए हैं, तो जान लेना कि सही दिशा में हो। पाओ कि अब डर कम सताता है, पकड़ी हुई चीज़ों को छोड़ने को ज़्यादा तैयार हो, तो जान लेना कि सही दिशा में हो। पाओ कि अब झुकने को ज़्यादा तैयार हो, तो जान लेना कि ठीक जा रहे हो।

स्वास्थ्य हज़ारों तरीक़ों से अपनी घोषणा कर देता है। जो कर पाने में कल तक असमर्थ थे, अगर आज वो सहजता से होने लगे, तो लक्षण शुभ हैं। कल के दर्द आज आसानी से मिटने लगें, तो जान लेना कि खानपान, चर्या, व्यवहार सम्यक है; कहीं-न-कहीं से दवाई मिल रही है। पाओ कि अकारण मुस्कुराना अब ज़रा आसान हो गया है; दाम नहीं माँगते तुम मुस्कुराने के अब, दुनिया पर एहसान नहीं करते थोड़ी-सी मुस्कुराहट बिखेरकर; पाओ कि यूँ ही मग्न रहते हो बिना बात के, बुद्धू जैसे, तो जान लेना कि कुछ अच्छा ही हो रहा होगा।

नींद बेहतर आती होगी, (हँसते हुए) खाना बेहतर पचता होगा, जो चीज़ें छिन गईं, वो कम याद आती होंगी, जो चीज़ें मिलनी हैं, वो कम रिझाती होंगी — अच्छा है। पाने में विनम्रता आने लगती है, छोड़ने में मौज़ आने लगती है। कुछ मिलता है तो सिर आसानी से झुकने लगता है, कुछ बाँटते हो तो ऐसे बाँटते हो जैसे बाँटने से तुम्हें ही कुछ मिल गया।

कसौटियाँ तो और भी हैं, पर कहीं तुम उनमें उलझ न जाओ।

तुम दुनिया को समझने लगोगे और दुनिया को तुम समझ में आने ज़रा बंद हो जाओगे। ये अक्सर होता है।

जो लोग दुनिया को समझने लगते हैं, फिर दुनिया को वो कम समझ में आते हैं।

दुनिया कहने लगती है, ये आदमी गड़बड़ है। और जब तक तुम दुनिया को समझते नहीं, दुनिया तुम्हें ख़ूब समझती है।

जब लोग तुम्हें देखकर ज़रा चकित होने लग जाएँ, तो समझ लेना कि कुछ तो हो रहा है। हाँ, वो उनका चकित होना कई बार तुम्हें भारी भी पड़ सकता है, क्योंकि हम ऐसे हैं कि जब चकित होते हैं तो चिंतित भी हो जाते हैं। जो कुछ हमें समझ में नहीं आता, हमें लगता है कि कहीं हमारा दुश्मन न हो। हम जिसके इरादे पढ़ नहीं पाते, हमें लगता है कि कहीं इसके ख़तरनाक न हो इरादे। और कोई तुम्हारे इरादे पढ़ेगा कैसे, अगर तुम्हारे पास कोई इरादे हो ही न? तो बहुतों की नज़र में तुम ख़तरनाक हो जाओगे।

तुम कुछ कर रहे हो बस यूँ ही, बस यूँ ही, और लोग सकपकाएँ हुए हैं, अवाक्, "ये जैसे जी रहा है, ऐसे जी क्यों रहा है? ये जो कुछ कर रहा है, ये कर क्यों रहा है? ज़रूर कोई ख़ुफ़िया चाल है।" ये सब होना शुरू हो जाता है, पर ये सब ज़रा आगे के लक्षण हैं, इनको छोड़ो। मैंने कहा न, कहीं और बताने में बात उलझ न जाए।

जहाँ सब बंजर था, वहाँ से फूल मिलने लगेंगे। जहाँ से किसी को फूल मिलते नहीं, जहाँ से फूल पाने की कोई गुंजाइश नहीं, वहाँ से फूल मिलने लगेंगे और जहाँ से कल तक फूल मिलते थे, वहाँ से पत्थर। और मज़ेदार बात ये है कि वो जब पत्थर बरसेंगे तुम पर, तब भी तुम्हें फूल जैसे ही लगेंगे। तो ले-देकर तुम्हें तो हर जगह से फूल-ही-फूल मिले।

अब ये सब तुम्हें समझ में आ रहा हो तो ठीक है, न समझ में आ रहा हो तो बढ़ते रहो। फूलों की घाटी तक यात्रा करके ही पहुँचते हैं।

आइने में अपना ही चेहरा अजनबी लगेगा, और जब बेवजह दाँत फाड़ोगे आईने के सामने, तब ख़ुद को ही कहने का जी होगा, "भग पागल!" लजा जाओगे अपने को ही देखकर, "मैं इतना युक्तिहीन कैसे हो गया?" युक्तिहीन समझते हो? बिना चाल का, बिना युक्ति का, बिना कपट का।

अपनी ही सुंदरता पर रीझने लगोगे। बड़ी लाज-सी आती है जब दिखाई देता है कि तुम्हीं कितने सुंदर हो। अपने ही आईने में ख़ुद को देखोगे और लजाकर, मुस्कुराकर नज़रें नीची कर लोगे। कहते हैं न, “गोरी ब्लश (शरमाना) कर रही है।” (हँसते हुए)

इतने जीवंत, इतने सरल, इतने प्राणयुक्त हो जाओगे कि तुम जब एक भीड़ के बीच चलोगे, तो वो वैसा ही होगा कि जैसे किसी फैक्ट्री (कारख़ाने) में कोई आदमी मशीनों के बीच चलता हो। फैक्ट्री है, चल तो सभी रहे हैं—मशीनें भी चल रही हैं और उनके बीच में आदमी भी चल रहा है—पर चलने, चलने में अंतर है। आदमी की चाल निराली है, यहाँ प्राण है। वैसे ही तुम्हारी गति में, तुम्हारे चेहरे में, तुम्हारी बोली में कुछ ऐसा होगा जो दूसरों की आंतरिकता से बिलकुल ही अलग होगा।

मुस्कुरा तुम भी रहे हो, मुस्कुरा कोई और भी रहा है; बोल तुम भी रहे हो, बोल कोई और भी रहा है; जी तुम भी रहे हो, जी कोई और भी रहा है—पर तुम्हारे जीने में और उस दूसरे के जीने में बड़ा अंतर है।

तुम ऐसे हो जैसे ये दीया टिमटिमा रहा है, देखो इसको, और दूसरे ऐसे हैं जैसे ये बड़ी-बड़ी बिजली की रोशनियाँ। थोड़ी देर में ये दीया बुझ जाएगा, ये रोशनियाँ चलती रहेंगी, पर शिव के पास तो दीया ही आ पाया। ऐसे हो जाओगे।

जिन्हें शिवत्व का कुछ पता नहीं, वो कहेंगे कि "तुम्हारी रोशनी तो फीकी है, मद्धम है, कमज़ोर हो। देखो, दुनिया की रोशनी कितनी ज़ोर की है।" पर तुम्हें पता होगा लौ और शिव का रिश्ता; तुम्हें पता होगा वो आनंद जो शिव के पास बैठकर मिटने में आता है।

आँसुओं से परहेज़ ज़रा कम हो जाएगा। सहजता से रो लिया करोगे, जैसे सहजता से मुस्कुरा लोगे। मुस्कान भी स्वतः स्फूर्त होगी, आएगी, नाच जाएगी; आँसू भी स्वतः स्फूर्त होंगे, आएँगे, बरस जाएँगे; तुम न मुस्कान को आमंत्रित कर रहे हो, न आँसुओं को अवरुद्ध।

बैठे थे, बैठे-बैठे रो लिये, और आँसू टपक रहे थे; हम मुस्कुरा भी गए।

“क्या बात थी? क्यों रोए?”

“अरे! किसी बात पर रोया जाता है?”

कोई बात नहीं थी, तभी तो वर्षा हो पायी। जो किसी बात पर रोएँ, वो रो थोड़े ही रहे हैं, वो तो शोक मना रहे हैं। जो किसी बात पर मुस्कुराएँ, वो मुस्कुरा थोड़े ही रहे हैं, वो तो लार टपका रहे हैं। न हमें शोक है, न लोभ।

बादल छू जाता है दिल को तो आँखें बरस जाती हैं और हवाएँ छू जाती हैं दिल को तो मुस्कुराहट नाच जाती है, जैसे हवाओं के चलने पर पत्तियाँ झूमें। तो कुछ ऐसा माजरा होगा।

बैठोगे जवाब देने और कविता हो जाएगी। पता ही नहीं चलेगा कि वक्ता हो या शायर। पता ही नहीं चलेगा कि बोल रहे हो कि गा रहे हो। वक्त को यूँ बिताओगे जैसे वक़्त थम गया हो। बाद में घड़ी बोलेगी, "कई घंटे बीत गए।" तुम कहोगे, "चल झूठी! हम जहाँ थे, वहाँ सब थमा हुआ था।"

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