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हमारे छह दुश्मन
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
17 min
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आचार्य प्रशांत: बहुत पुराना ग्रंथ है हमारा - श्रीमद्भगवद्गीता, इतना तो हम सब जानते ही हैं। उसमें इंसान के छह शत्रुओं की, छह दुश्मनों की बात करी है श्री कृष्ण ने। ठीक है?

उनको नाम दिया है - षड-रिपु (छह दुश्मन)

और क्या हैं वो?

काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य और लोभ।

ठीक है?

काम माने -  इच्छाएँ क्रोध माने - इच्छाओं की पूर्ति न होने पर उठने वाली उत्तेजित भावना। मद माने -  नशा (चेतना का अभाव)। मोह माने - किसी से जुड़ ही जाना। ऐसे जुड़ जाना कि उसके बिना अपने-आपको कमज़ोर समझने लगना, उसपर आश्रित हो जाना। मात्सर्य माने - ईर्ष्या, जेलसी। और लोभ तो जानते ही हैं हम -  लालच, ग्रीड।

ये हमें सब-के-सब सताते हैं, सब परेशान करते हैं। और ये छह अलग-अलग नहीं हैं। अभी मैं अगर आपसे पूछूँ कि इनमें से कौन-सा है जो आपके लिए सबसे ज़्यादा रेलेवॅन्ट, प्रासंगिक है, तो शायद अलग-अलग लोग अलग-अलग शब्द पर उँगली रखेंगे। कोई कहेगा, "मुझे क्रोध ज़्यादा आता है"। कोई कहेगा, "मैं मोह से ज़्यादा ग्रस्त हूँ"। कोई कहेगा, "डरा हुआ रहता हूँ"। कोई कहेगा, "लालच पकड़ लेता है कभी-कभी"। लेकिन ये छह-के-छह एक संयुक्त परिवार है, ये साथ-साथ ही रहते हैं। ऐसा तो हो सकता है कि इनमें से कोई एक किसी समय पर आपको लगे कि आप पर चढ़ा हुआ है, प्रबल है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं हुआ कि बाकी पाँच अनुपस्थित हैं। वो बाकी पाँच भी हैं, वो बस छुपे हुए हैं। बाकी पाँच भी हैं, बस छुपे हुए हैं।

तो हम सबको परेशान करने वाले ये छह दुश्मन, ये षड-रिपु अलग-अलग नहीं हैं, एक ही हैं। फिर एक ही हैं तो इनका कोई संयुक्त नाम भी होना चाहिए, कोई एक साझा नाम भी होना चाहिए। इनका वो साझा नाम है - अहम्, 'मैं' भावना।

हम जब कहें कि मैं इस चीज़ से परेशान हूँ या उस चीज़ से ग्रस्त हूँ या ये चीज़ मुझे पकड़ी हुई है, तो उस परेशानी का एक त्वरित इलाज मिल सकता है अगर हम उसी वक्त पर ज़रा-सा रुक करके, बस पाँच सेकेंड रुक करके ये पूछ लें कि, "कौन परेशान है? ये कौन है जो परेशान है? और जो परेशान है, उसका क्या छिन जाने वाला है? और जिस चीज़ के लिए परेशान है, मान लो पाने के लिए, अगर उसको पा लिया तो क्या मिल जाने वाला है?"

अगर ज़रा-सा ठहर करके बस ये जिज्ञासा कर लें, तो बिल्कुल ज़ाहिर हो जाएगा कि ये जो छह दुश्मन हैं, ये बाहरी नहीं हैं, ये हमारे भीतर ही हैं, और इन छहों दुश्मनों का जो एक नाम है, वो है - अज्ञान; जिज्ञासा न करना। जिज्ञासा करने से उत्तर मिलता है न? उसी का नाम 'ज्ञान' है। अहम् पलता है जिज्ञासा के अभाव में; जिसने पूछा नहीं, जिसने ठहर करके जाँच-पड़ताल नहीं की, उसी के भीतर भ्रम, अँधेरा, अज्ञान घूमता रहता है। जो ज़रा-सा रुक गया और जाँच-पड़ताल कर ली, वो पाता है कि तनाव हो, लालच हो, डर हो - ये तत्काल कम हो गए। मिट नहीं जाएँगे पर कम तुरंत हो जाएँगे। मिटाने के लिए लंबी साधना करनी पड़ती है। और यही सवाल न पूछो तो आदमी अपने ही विकारों के हाथों कठपुतली बना रहता है और परेशानी का कोई अंत नहीं है। कोई कितना भी परेशान हो सकता है।

आदमी ने जैसे-जैसे तरक्की की है, आर्थिक तौर पर, तकनीकी तौर पर, वैज्ञानिक तौर पर, ज्ञान की क्रांति हुई है, सूचना क्रांति हुई है, वैसे-वैसे आदमी का तनाव भी ज़बरदस्त तरीके से बढ़ा है। आम आदमी को जितना तनाव आज से पचास वर्ष पहले हुआ करता था, उससे कई गुना तनाव आज ज़्यादा है। जनसंख्या का जितना अनुपात आज से पचास वर्ष पहले मनोरोगी था, डिप्रेशन या अवसाद और अन्य मनोरोगों की चपेट में था, उससे कई गुना ज़्यादा अनुपात आज मनोरोगी हो चुका है।

और कारण यही है। कारण है कि हम बाहर इतना ज़्यादा देखने लगे हैं, बाहर चीज़ें इतनी ज़्यादा बढ़ गयी हैं, बाहर उलझने के तरीके, बाहर उलझने के विषय इतने बढ़ गए हैं कि भीतर जिज्ञासा करने का हमको वक्त ही नहीं मिलता। हम पाँच सेकंड को भी ये नहीं पूछ पाते, "कौन है जो परेशान है? किसने उसे परेशान होना सिखाया?" हम परेशानी के चक्र में रहते हैं, ये नहीं पूछते कि जिसकी खातिर परेशान हैं, वो इतना कीमती हो कैसे गया? और अगर वो इतना कीमती है तो उसे खो करके मेरा ठीक-ठीक क्या मिट जाना है?

नहीं हुआ काम, क्या चला जाएगा? और हो भी गया, तो मिल क्या जाएगा? कुछ तो मिलता होगा, मैं इंकार नहीं कर रहा, कुछ खोता भी होगा - पर जो मिलता है या जो खोता है, क्या वो वाक़ई इतना बड़ा है कि उसकी खातिर आदमी अपना चैन गँवा दे? ये पूछना ज़रूरी है।

मैं बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ कि हम पागल हैं, विक्षिप्त हैं, और बिना बात के परेशान हो रहे हैं; परेशानी का कुछ सबब तो होगा। जो भी कोई व्यक्ति परेशान है, उसके पास कोई-न-कोई सार्थक कारण होगा। लेकिन उस कारण की, उस विषय की कुछ सीमाएँ तो होंगीं? हमारी परेशानी कोई सीमाएँ नहीं जानती। (छोटा-सा रिमोट कंट्रोल दिखाते हुए) विषय और कारण हों इतने बड़े, और परेशानी होती है इतनी बड़ी (दोनों हाथ फैलाकर इशारा करते हुए) क्योंकि हम जिज्ञासा नहीं करते। हम ठहर करके पूछते नहीं अपने आप से, अंतर्गमन नहीं करते कि, "बात क्या है?"

अच्छा, यही भीतर से आवाज़ उठ रही है न कि कुछ खोया, कुछ मिटा, कुछ टूटा? चलो, मान लिया कि खो ही गया, मिट गया, टूट गया - जो भी उपक्रम कर रहे थे, नहीं मिली सफलता - नहीं भी मिली सफलता तो क्या चला जाएगा? चलो, कुछ चला जाएगा, जितना जाएगा, उतनी ही चिंता करें। अब पता चला कि जाएगा एक यूनिट (इकाई) और उसके लिए चिंता कर रहे हो हज़ार यूनिट, तो फिर तो जन्म व्यर्थ गँवाया न?

देखिए, हम किन चीज़ो के खोने की परवाह करते हैं? मान-सम्मान, रिश्ते, पैसा, पूँजी - इन्हीं के खोने की परवाह करते हैं न? जो एक हमारा सबसे कीमती संसाधन है, रिसोर्स है, हम उसके खोने की परवाह कम ही करते हैं, आपको थोड़ा ताज्जुब होगा।

अच्छा, आप बताइए, हमारा सबसे कीमती संसाधन क्या है?

प्रः स्वास्थ्य, शरीर।

आचार्य जी: एक जीव का, एक जीवित आदमी का सबसे कीमती संसाधन क्या है?

प्रः समय।

आचार्य जी: क्योंकि आप जीवित ही अपने-आपको एक समय तक बोलते हो न? जीवन माने - समय-सीमा; उसके बाद तो अपने-आपको आप जीवित भी नहीं बोलते। एक दिन आती है जब मौत, उठा ले जाती है, उसके बाद तो नहीं कहते कि, "मैं जीव हूँ," "जीवित हूँ," या कहते हो? तो सबसे कीमती संसाधन क्या है?

समय।

अब आप जब गढ़ना करते हो लाभ-हानि की तो उसमें समय को नहीं जोड़ते, जैसे समय की तो कोई कीमत ही न हो। हज़ार रुपए की कोई चीज़ है, उसके लिए आप चार घंटे से चिंता कर रहे हैं। चार घंटे आप सोच रहे हैं, "हज़ार रुपए," "हज़ार रुपए"। उस चार घंटे की कोई कीमत है या नहीं? उसका भी कोई प्रॉफिट-एंड-लॉस (लाभ और हानि) बनेगा या नहीं बनेगा? आप लोग तो आँकड़ों में सब दक्ष हैं, आपसे पूछ रहा हूँ। गढ़ना करते ही हैं तो पूरी गढ़ना कर लें। आदमी का अगर सबसे कीमती संसाधन समय है, तो हम कभी ये क्यों नहीं देखते कि कितना समय चिंता में व्यर्थ जा रहा है? समय बर्बाद करने के लिए कोई उल्टा-पुल्टा काम करना ही थोड़ी ज़रूरी है, बैठे-बैठे भी समय बर्बाद किया जा सकता है न? बैठे-बैठे क्या कर रहा है आदमी? चिन्ता कर रहा है।

समय व्यर्थ हुआ कि नहीं?

हमारे कोई हज़ार दो-हज़ार छीन ले, हमें बड़ा बुरा लग जाएगा। और चिन्ता कर-करके हम अपने आठ घंटे खराब कर लें, हमें बुरा ही नहीं लगता, बल्कि हमें लगता है कि हमने कुछ सार्थक काम करा है। और वो आठ घंटे शायद कई लाख की कीमत रखते थे, रखते थे कि नहीं रखते थे? हमारा समय मुफ़्त का है क्या? हमारा समय यूँ ही है क्या?

बताइए।

नहीं है न?

तो फिर उस समय का भी तो ख्याल करिए।

आत्म-जिज्ञासा के अभाव में आदमी अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिंता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या!

तो अध्यात्म का क्या मतलब ये नहीं है कि पाओ मत या कमाओ मत; अध्यात्म का मतलब ये है कि अगर हिसाब-किताब लगाते ही हो, गणित और गढ़ना करते ही हो, तो पूरी करो भाई। अध्यात्म माने पूर्णता, तो अध्यात्म में गढ़ना भी पूरी-पूरी होगी - पाया क्या, और लगाया क्या?

और इतना (एक हाथ की उँगलियों से छोटे का इशारा करते हुए) पाने के लिए अगर इतना (दोनों हाथ फैलाकर इशारा करते हुए) लगाया तो क्या मैं बुद्धिमान कहलाया? अध्यात्म नहीं कहता कि बुद्धू बन जाओ, अनाड़ी हो जाओ, तुम्हें कुछ समझ में न आए, सड़क के फ़कीर या भिखारी हो जाओ।

अध्यात्म कहता है - बुद्धिमान हो जाओ, और बुद्धि से भी आगे जो है, उसमें जीना सीखो। बुद्धि से आगे है - बोध।

बुद्धि तो आधी-अधूरी चीज़ देखती है; बोध पूरी बात देखता है। बुद्धि बस इतना कहेगी कि फलाना काम कर रहा हूँ, इतना रुपया मिल जाएगा। रूपया तो गिनने वाली चीज़ है, स्थूल है न। (रुमाल दिखाते हुए) आप इसको देख सकते हो, गिन सकते हो। ये मिला, तो आप कहोगे कि ये मिला। ये आँखों को दिखाई देता है, हाथ में उठा सकते हो। लेकिन इसकी खातिर गँवाया क्या? वो हम नहीं देख पाते, क्योंकि जो चीज़ गँवायी, वो अक्सर सूक्ष्म होती है, सटल होती है, इनविज़िबल (अदृश्य) होती है।

अध्यात्म कहता है, उसको तो गिनो ही जो विज़िबल (प्रकट) है, स्थूल है, उसको भी तो गिनो जो दिखाई नहीं देता, सूक्ष्म है, अदृश्य है। आनंद दिखाई देता है क्या? (रुमाल को ऊपर उठाते हुए) आनंद को ऐसे हाथ में उठा सकते क्या?

पर आनंद की कोई कीमत है या नहीं है?

आप कुछ हज़ार या कुछ लाख पा लें और उसकी खातिर आनंद गँवा दें, तो बताइए ये सौदा मुनाफे का हुआ या घाटे का?

कहिए, हमारी ज़िंदगी की बात है।

प्रः घाटे का।

आचार्य जी: प्रेम तो सभी करते होंगे; परिवार होगा, माँ-बाप होंगे, पति-पत्नी होंगे, बच्चे होंगे। अपने बच्चे के प्रति जो प्रेम होता है, वो ऐसे (पुनः रुमाल ऊपर उठाते हुए) हाथ में उठाया जा सकता है क्या?

आप दिखा सकते हो, ये रहा प्रेम? पाँच-सौ ग्राम प्रेम! दिखा सकते हो क्या? तो अदृश्य है न प्रेम? लेकिन उसकी कोई कीमत है या नहीं? आपको एक लाख रुपया मिल जाए और आपकी ज़िंदगी से प्रेम गायब हो जाए, तो ये सौदा लाभ का हुआ या हानि का हुआ?

ज़ोर से बोलिए।

प्रः हानि का हुआ।

आचार्य जी: हानि का हुआ। हमारी बड़ी-से-बड़ी हानि करते हैं ये षड-रिपु। ये हमें जो ग्रॉस (स्थूल) है, जो मोटा-मोटा है, उसको दिखाते रहते हैं, और जो छुपा हुआ है, सूक्ष्म है, पर बहुत कीमती है, उसको देखने नहीं देते। और आदमी अपनी पूरी ज़िंदगी घाटे में बिताकर एक दिन खत्म हो जाता है। वो सोचता भले ही यही रहता कि ये है मेरी ज़िंदगी का गणित - इतना पाया इतना गँवाया, और उसमें नेट (कुल) उसको दिखाई दे रहा है प्रॉफिट ही, कि, "अरे, वाह! प्रॉफिट!" पर उसने ये जो ख़ाका खींचा है, उसने ये जो गणित लगाया है, ये गलत है, क्योंकि इसमें उसने कुछ एंट्रीज़ (प्रविष्टियाँ) करी ही नहीं हैं।

आपके सामने कोई स्टेटमेंट आता है, बैंक स्टेटमेंट आ गया जिसमें कुछ एंट्री ही गायब हैं, तो आप बैंक को पकड़ते हो न कि ये क्या गड़बड़ है?

बोलो।

इसी तरीके से आप अपनी ज़िंदगी का जब लाभ-हानि का गणित लगाओ, तो उसमें एक-एक एंट्री होनी चाहिए न? स्थूल भी, सूक्ष्म भी; विज़िबल (प्रकट) भी, और इनविज़िबल (अप्रकट) भी तो होनी चाहिए। वो इनविज़िबल वाली हम छुपा जाते हैं! और इनविज़िबल जो एंट्रीज़ हैं, वो सबसे बड़ी हैं, सबसे कीमती हैं। और वो प्रॉफिटेबल (लाभकारी) ही हैं; वो प्रॉफिट हमसे छीन लेते हैं ये सब - भय, मोह, मद, मात्सर्य।

कुछ भी आप कर रहे हो, दिमाग पर ईर्ष्या नाच रही है, आप जो कुछ भी कर रहे हो, आपसे ठीक से होगा क्या?

सही-सही बताइए, होगा?

प्र: नहीं।

आचार्य जी: जो कुछ भी कर रहे हो तनाव में बैठकर कर रहे हो, वो ठीक से कर पाओगे क्या?

अच्छा छोड़ो कि व्यावसायिक काम, दफ्तर का काम, घर पर किसी से बात भी कर रहे हो, और तनाव में कर रहे हो, उस बातचीत में क्या गुणवत्ता बचती है?

नहीं बचती न?

लेकिन ठीक उस वक्त कोई बताने नहीं आएगा कि तुमको अभी-अभी पाँच हज़ार का नुकसान हो गया। आपने किसी से बातचीत करी घर में, मान लीजिए अपने पिता से करी, अपनी पत्नी से करी, और वो बातचीत सतही थी, उसमें कोई गुणवत्ता, कोई गहराई नहीं थी - ठीक उसी वक्त कोई खनखनाकर बताता है कि ये जो तुमने पंद्रह मिनट व्यर्थ कर दिए एक सतही बातचीत में, ये दस हज़ार का घाटा है! कोई बताता है क्या?

नहीं बताता न?

क्योंकि हर चीज़ रुपयों के आधार पर अभिव्यक्त भी नहीं की जा सकती।

और हम लोग ऐसे हैं जिनको आँकड़े ही समझ में आते हैं। दिक्कत ये है कि प्रेम हो, आनंद हो, सरलता हो, मुक्ति हो - ये सब आँकड़ों में आसानी से अभिव्यक्त नहीं हो सकते। चूँकि आँकड़ों में अभिव्यक्त नहीं हो सकते, तो हमको लगता है कि इनकी कोई हस्ती ही नहीं है, इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। हम संख्याओं के पुजारी हैं। हर वह चीज़ जो संख्या में लिखी जा सकती हो, हमको लगता है कि असली है, और जो चीज़ें संख्या में अभिव्यक्त नहीं हो सकतीं, हमको लगता है कि उनका कोई मूल्य ही नहीं है। तो हम उनको अलग कर देते हैं, हम उनको अपने हानि-लाभ के गणित में शामिल ही नहीं करते। ये तो बड़ी गलती हो गयी न?

एक बड़े संत हुए, उनका नाम है पलटू दास। कम लोगों ने सुना होगा, पर बड़े महिमावान। तो उनका एक वचन है कि,

सांई मेरा बाणियां, सहजि करै ब्यौपार।

बिन डांडी बिन पालड़ैं, तोले सब संसार॥

(वो जो मेरा परमात्मा है, वो वास्तव में एक बनिया है, और वो बड़ा व्यापार करता है। लेकिन बिना किसी तराज़ू के, बिना पलड़ों के, बिना वज़न के, वो पूरे संसार को तोले हुए है।)

तो परमात्मा भी उसको कहा गया है जो 'तोलना' जानता है। 'तोलना' माने समझते हैं? कीमत लगाना। आप जब सब्ज़ी खरीदने जाते हो और तोली जाती है, तो वास्तव में क्या किया जा रहा है?

उसकी कीमत लगाई जा रही है न कि अगर ढाई किलो है तो इतनी कीमत होगी। तो समझ लो वो परमात्मा हो गया जिसको सही-सही तोलना आ गया, यानि जिसको सही-सही वज़न करना, मूल्य करना आ गया।

हमें अपने आप से पूछना होगा, "हम कितना जानते हैं वज़न करना और मूल्य करना?"

क्रोध से हमें जो हानि होती है, हम कभी उसका मूल्य कर पाए? कितने रुपए की हानि हुई है आज तक क्रोध से, बताइए? किसने करा है मूल्य, बताइए? ये सब जानते होंगे कि घर बनवाया तो उसमें कितने रुपए लग गए, पर ये किसी को नहीं पता होगा कि क्रोध में या कामवासना में कितने का नुकसान कर लिया। है किसी को पता?

दुश्मन छुपा हुआ है, भीतर-ही-भीतर नुकसान दे रहा है। हम सोचते है कि हम बड़े चतुर हैं, बाहर वाली चीज़ें तो पकड़े हुए हैं न!

बाहर वाली चीज़ें अगर लाख की हैं तो भीतर वाली चीज़ करोड़ की है।

जो बाहर वाली चीज़ो में फँस करके भीतर वाली चीज़ को भूल गया, उसे अच्छा व्यापारी या अच्छा मुनीम, अच्छा अकाउंटेंट, अच्छा अफसर, अच्छा प्रबंधक - उसे कुछ भी नहीं 'अच्छा' कहा जा सकता। तो गणित ही गलत कर दी न। गणित के सवाल में उत्तर अगर गलत आया है तो नंबर नहीं मिलने के। आपने इतना लंबा उसमें प्रक्रिया दिखाई होगी, एक के बाद एक स्टेप (क्रम) दिखाई होगी कि समीकरण ऐसे हल किया, पर उत्तर गलत आया है तो क्या मिलता है? और मिलेगा भी तो कुछ दस में से दो नंबर, तीन नंबर, इससे ज़्यादा थोड़े ही मिलेगा, या मिलेगा?

हम भी ऐसे ही हैं। लेकिन हमारे लिए राहत की बात ये है कि सब कुछ बदला जा सकता है पाँच सेकंड की जिज्ञासा से। ये जो छह दुश्मन हैं, ये जब भी चढ़ें, तो क्या करना है? पाँच सेकंड के लिए रुक जाना है। बहुत ज़्यादा नहीं, पाँच सेकंड के लिए। और सवाल बस यही पूछ लेना है:

जिसके प्रति काम उठ रहा है, अगर उसको पा लिया तो वास्तव में क्या पाया? और नहीं पाया तो क्या गँवाया?

जिसके प्रति क्रोध उठ रहा है, अगर उसको दबा भी दिया, उसको अगर कुछ हानि पहुँचा भी दी, तो मुझे क्या मिल गया? और नहीं भी हानि पहुँचाई, तो खो क्या दूँगा भाई?

जिसके भी प्रति मात्सर्य अर्थात ईर्ष्या उठ रही है, उससे आगे भी निकल गए, तो किससे आगे निकल गए? वो कोई अपने अगल-बगल का ही तो है, उससे आगे निकल करके पा क्या जाएँगे? जब से इतने से थे, पढ़ने जाते थे, तब से तो ईर्ष्या में हैं। दूसरी कक्षा में पढ़ते थे, तब भी किसी से ईर्ष्या हुई, कि अरे उसके नंबर ज़्यादा आ गए; चौथी में थे तो देखा कि किसी की पेंट (पतलून) हमसे ज़्यादा अच्छी है, उससे ईर्ष्या हो गयी। थोड़े बड़े हुए तो देखा किसी की डिग्री हमसे ज़्यादा अच्छी है, उससे हो गयी। थोड़े और बड़े हुए तो देखा कि किसी की पत्नी ज़्यादा अच्छी है, उससे ईर्ष्या हो गयी। फिर देखते हैं किसी की कमाई ज़्यादा अच्छी है, किसी के लड़के-बच्चे ज़्यादा अच्छे हैं, किसी का घर ज़्यादा बड़ा है, उससे ईर्ष्या हो गयी।

क्या मिल गया इन चीज़ों से?

ये पाँच सेकंड बड़े काम की चीज़ हैं। ये पाँच सेकंड पूरा जीवन बचा सकते हैं। जीवन अनगिनत सेकंडों का है, पाँच सेकंड के निवेश से अगर वो बचता हो तो क्या बुरी बात?

ये व्यापार कुछ हुआ फायदे का, कि नहीं हुआ?

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