गुरु धोबी शिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार|
सुरति शिला पर धोइये, निकसे ज्योति अपार||
– संत कबीर
वक्ता: जब हम कपड़े की, साबुन की, मैल की और पानी की बात करते हैं तो ये सब एक ही तल पर होते हैं| साबुन हो या मैल हो दोनों पदार्थ हैं, भौतिक हैं, रसायन हैं| ठीक है ना? कपड़ा हो या पानी हो, ये भी वैसे ही हैं जैसे साबुन और मैल| यहाँ तक की कपड़ा धोने वाला और कपड़ा भी एक ही तल पर हैं, क्योंकि वो भी भौतिक ही हैं| जिस हाथ से कपड़ा धोया जाता है और जो कपड़ा होता है उसमे एक समानता तो है ही ना, और वो बहुत मूल-भूत समानता है; क्या समानता है? दोनों पदार्थ हैं, तो वो एक ही तल पर हो गए सारे|
लेकिन गुरु और शिष्य के बीच जो घटना घटती है वो तलों का अतिक्रमण होती है, उसमें सब कुछ उसी तल पर नहीं हो रहा होता है जिस तल पर कार्यक्रम शुरू हुआ होता है| शुरुआत होती है एक तल पर, अंत कहीं और होता है|
मैल क्या है? मैल ये भ्रम है, मैल ये भाव है कि मैं वो हूँ जो मैं अपनेआप को समझता हूँ, यही मन का मैल है, और यही मन है|
क्योंकि ये मैल यदि हट गया तो मन वो रहेगा ही नहीं जो वो अपने आप को समझता है| हम सब अपने आप को कुछ समझते हैं ना, हम सब अपने आप को किसी न किसी रूप में जानते हैं| कुछ न कुछ हमारी पहचान है, कुछ हमारी अपने बारे में धारणा है, “मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, मैं इतने साल का हूँ, मैं ये काम करता हूँ, मैं यहाँ का रहने वाला हूँ, मेरी ये जिम्मेदारियाँ हैं|”




